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किसने बनाया चीन को भारत का पड़ोसी – 1

लेखिका :- प्रो. कुसुमलता केडिया

जैसा मैंने पूर्व के अपने उद्बोधनों मंे बताया है, हुआंगहुआ, जिसे विगत 100 वर्षों से यूरोप के लोगों ने पहली बार भारत के द्वारा प्राचीन काल से प्रयुक्त चीन शब्द को ग्रहण कर ‘चाईना’ कहना शुरू किया है और जिसे वे पहले ‘कैथे’ और ‘सेरे’ कहते रहे हैं, प्रशांत महासागर के तट पर स्थित एक बहुत छोटा सा राज्य रहा है। जिसके पास प्राचीन इतिहास संबंधी जो कुछ भी संकेत अब तक मिले हैं, वे अधिकतम 2200 वर्षों के स्वयं उनके अनुसार मिले हैं और इन 2200 वर्षों में से 1800 वर्ष यह हुआंगहुआ क्षेत्र विदेशी शासकों की अधीनता में ही रहा है। इस पर भरतवंशियों, तिब्बत, मांचू, मंगोल और तुर्कों का शताब्दियों तक शासन रहा है। 1932 से 1935 ईस्वी तक इसे ‘सोवियत रिपब्लिक आफ चाईना’ कहा गया।

1 अक्टूबर 1949 को स्तालिन के शिष्यों में से एक मामूली शिष्य माओ जे दुंग ने स्तालिन के प्रति भक्ति और निष्ठा की होड़ में उनका विश्वास जीतने के बाद सोवियत संघ की छत्रछाया में इसे ‘पीपुल्स रिपब्लिक आफ चाईना’ घोषित किया और द्वितीय महायुद्ध में इंग्लैंड, फ्रांस, सोवियत संघ तथा अमेरिका के पक्ष (जिसे मित्र शक्तियां कहा जाता था) की विजय जर्मनी और जापान तथा तुर्की आदि केन्द्रीय शक्तियों पर होने के बाद स्तालिन ने जापान के द्वारा अधिकृत मांचू राज्य और मांचुओं के संपूर्ण राज्य तथा मंगोलों के राज्य के दक्षिणी हिस्से सहित तुर्किस्तान के क्षेत्र को माओ की कम्युनिस्ट पार्टी के अधीन कर दिया। तब से इस पूरे क्षेत्र को ‘पीपुल्स रिपब्लिक आफ चाईना’ कहा जा रहा है। इसमें मूल क्षेत्र से कई गुना अधिक बडे़ क्षेत्र सम्मिलित कर दिये गये जो द्वितीय महायुद्ध में विजय पाने पर मित्र शक्तियों ने सोेवियत पक्ष को दिये थे।

चौथी शताब्दी ईस्वी में फाहियान नामक तीर्थ यात्री इस राज्य से चल कर दुर्गम मार्ग को पार करता हुआ कई दिनों की यात्रा के बाद भारत पहुंचा था। उसने इसे अपने राज्य से बहुत दूर सुदूूर पश्चिम में स्थित पवित्र राष्ट्र भारत की तीर्थ यात्रा कहा है। उसके साथ चार अन्य तीर्थ यात्री भी थे। अनेक पर्वतों को पार करने के बाद संपूर्ण वर्षा ऋतु में वे एक पर्वतीय क्षेत्र में रूके रहे, क्यांेकि चातुर्मास में यात्रा भगवान बुद्ध द्वारा वर्जित थी। उसके बाद गोबी मरूस्थल को बड़ी कठिनाई से पार कर अपने राज्य की सीमा से बहुत दूर नवपा नामक नगर में पहुंचे। फाहियान ने इसे हिन्दुओं का नगर कहा है और यह कहा है कि यहां श्रमण अधिक निष्ठापूर्वक हिन्दू धर्म का पालन करते हैं और शेष नागरिक थोड़ी शिथिलता से धर्म का पालन करते हैं।
तदुपरान्त उसने कुस्तन का वर्णन किया है जो उसके अनुसार भी एक हिन्दू राष्ट्र था। उसके वैभव का फाहियान और व्हेनसांग दोनों ने अलग-अलग वर्णन किया है। फाहियान का समय चतुर्थ शताब्दी ईस्वी है और व्हेनसांग का समय सातवी शताब्दी ईस्वी है। बीच में छठी शताब्दी ईस्वी में शुंगयुन नामक एक अन्य तीर्थयात्री ने भी अपने तीर्थ मार्ग में पड़ने वाले कुस्तन नामक हिंदू राष्ट्र का वर्णन किया है। जिससे स्पष्ट है कि इन 400 वर्षों में लगातार कुस्तन हिन्दू राष्ट्र ही रहा था।
कुस्तन के बाद इन तीनों ही तीर्थयात्रियों ने गांधार जनपद नामक हिन्दू क्षेत्र का वर्णन किया है और इसे इंद्रदेव का क्षेत्र कहा है। अपने राज्य से कुस्तन तक पहुंचने में इन लोगों को लगभग एक माह लगा और फिर वहां से गांधार क्षेत्र पहुंचने में 15 दिन लगे। इन्होंने सिंधु नदी का दर्शन किया और उसकी विशालता तथा महिमा का गौरवगान किया है। तीनों ही यात्रियों ने कुस्तन से लेकर गांधार तक सर्वत्र हिन्दू राज्य बताया है और गांधार को सम्राट अशोक द्वारा शासित धर्मक्षेेत्र कहा है। उन्होंने यह भी लिखा है कि सम्राट अशोक के पुत्र का नाम धर्मविवर्धन था जिसे कुणाल भी कहा जाता था क्योंकि उसके नेत्र बहुत सुन्दर थेे। अशोेक को भी शोक रहित और आनंदमय बोध की दशा में रहने के कारण ही अशोेक कहा जाता था। क्योंकि धर्म की साधना से आनंद की उत्पत्ति होती है। स्पष्ट है कि अशोक सनातन धर्म का ही अनुयायी शासक था।

इन तीर्थयात्रियों के विवरण के विस्तार का यहां प्रसंग नहीं है। मुख्य बात यह है कि हुआंगहुआ भारत से हजारों किलोमीटर दूर सुदूूर प्रशांत महासागर के तट पर स्थित एक छोटा सा राज्य ही 20वीं शताब्दी ईस्वी के पहले तक रहा है, जिस पर मंगोलों, मांचुओं, तिब्बत के शासकों और तुर्कों का समय-समय पर अधिपत्य रहा है।

सार यह है कि इन 2200 वर्षों में कभी भी चीन यानी हुआंगहुआ भारत का पड़ोसी नहीं रहा है। महत्वपूर्ण यह है कि द्वितीय महायुद्ध के बाद पुरस्कार के रूप में स्तालिन द्वारा माओ को सौंपे गयेे बड़े क्षेत्र को ‘पीपुल्स रिपब्लिक आफ चाईना’ घोषित करने के बाद भी चीन भारत का पड़ोसी नहीं रहा है क्योंकि तिब्बत एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में बीच में विद्यमान था। अतः 15 अगस्त 1947 को जब अंग्रेजों के द्वारा सौंपी गई गद्दी गांधीजी के शिष्यों – श्री जवाहरलाल नेेहरू आदि ने संभाली औेर जब शेष भारतीय राजाओं ने ेचक्रवर्ती सम्राट कोे माननेे की प्राचीन भारतीय परंपरा का अनुसरण करतेे हुुये केेन्द्रीय शासक के रूप मेें इनकोे मान्यता देे दी, तब तक भी तिब्बत एक स्वतंत्र राष्ट्र केे रूप मेें विद्यमान था और चीन की सीमायें तिब्बत कोे छूूतीं थीं।

तब फिर चीन भारत का पड़ोेसी कब बना और किसने इसे भारत का पड़ोेसी बनाया? उपलब्ध अभिलेखों से प्र्रमाणित है कि जवाहरलाल नेहरू स्तालिन केे शागिर्द थेेे और साक्ष्यों से यह पुष्ट होता हैे कि माओे जे दुंग की पार्टी द्वारा तिब्बत कोे हड़पवाने के लिये जवाहरलाल नेहरू ने उनके ही संकेेत पर आगेे के कदम उठायेे। जैसा कि जवाहरलाल नेहरू स्मारक कोष नई दिल्ली द्वारा अनेक खंडों में प्रकाशित ‘जवाहरलाल नेहरू के विशिष्ट कार्य’ नामक प्रकाशनों से पुष्ट होता है। यहां हम उनमें से कुुछ को ेआपकेे सामने रखते हैं।
1 अक्टूूबर 1949 ईस्वी में माओ जे दुंग की कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा हुुुआंगहुआ और उससेे जुुड़े क्षेत्रोें पर कब्जा जमानेे और उसे पीपुुल्स रिपब्लिक नामक झूठा नाम देेनेे केे 20 दिन पहलेे ही 10 सितम्बर 1949 ईस्वी कोेे जवाहरलाल नेेहरू ने अपनेे वित्त मंत्री जान मथाई्र कोेे लिखा – ‘चीन एक वर्ष केेे भीतर तिब्बत पर आक्रमण कर सकता हैै। यह चीन कोे भारत की सीमाओं के सामने लाकर खड़ा कर देगा।’ (जवाहरलाल नेहरू के विशिष्ट कार्य खंड 12, पृृष्ठ 410)
स्पष्ट है कि श्री नेहरू कोे माओ की अगली हरकतोें की जानकारी थी औेर यह पता था कि माओ तिब्बत पर आक्रमण करेगा। इससे अनुमान होता हैे कि स्तालिन ने अपने शागिर्द नेहरू को माओे की भावी योजनाओं की जानकारी इस रूप में दी थी कि जिससे वेे उसमेें सहायक बन सकें। यह बात जान मथाई को लिखे उसी पत्र के आगेे केेे इन वाक्यों सेेे स्पष्ट होेती है, जिनमें सेे पहला वाक्य वेे संभवतः जानबूूझकर रिकार्ड दुरूस्त रखनेे के लियेे लिख रहे थे और अगलेे वाक्य में उनकी मनोेेयोेजना स्पष्ट होे जाती हैे:-
‘हमें अपनी सीमाओं केे पास सड़कों का निर्माण करवाना चाहियेे। हम इस कार्य कोे फिलहाल धीमी गति सेेे आगेेे बढ़ा सकतेे हैं क्यांेकि अभी हमारेे पास कुछ समय है।’ (वही पृष्ठ 411)
स्पष्ट हैे कि जवाहरलाल नेेहरू को माओ द्वारा भारत सेे टकराव दिखाने की निश्चित तिथि का भी अनुुमान था और वेे तय कर चुकेे थेे कि तिब्बत पर माओ जेे दुुंग का कब्जा कराना है और फिर भारत का बहुत बड़ा क्षेेत्र भी युद्ध का नाटक रच कर माओे कोे सौैंप देेना हैे ताकि कम्युुनिस्ट पार्टी का एक विशाल भारतीय क्षेत्र पर कब्जा हो सकेे। साथ ही, भविष्य में कभी उन पर उंगली उठेेगी, इस आशंका सेे वेे यह भी रिकार्ड पर ला रहेे थे कि चीन अर्थात माओ जे दुुंग केे आक्रमण की संभावना की उन्हें जानकारी हैे औेर उसेे रोेकने के लिये वेे भारतीय सेनाओं केे लिये आवश्यक सड़क सुुविधायेें बनाना तोे चाहतेे हैं परंतुु क्या करेें, भारत की मुख्य समस्या गरीबी हैे और उसेे सुलझानेे में जुटेे रहनेे के कारण भारत सरकार केे पास सीमाओं की रक्षा की तैेयारी केे लिये साधन नहीं हैें यद्यपि बेचारेे प्र्रधानमंत्री इस तैयारी केे लिये कसमसा रहेे हैैं।
कुछ महीनों केेे बाद येे खबरें सार्वजनिक होनेे लगीं कि माओ की सेनायें जो वस्तुतः उसकी पार्टी केे लड़ाके थे, तिब्बत की ओर बढ़ रहेे हैं। इससे भारत द्वारा चीन को रोेकनेे के लिये शक्ति का प्रयोग भारत द्वारा कियेे जाने की मांग उठेगी, यह समझकर उन्होंने संसद में एक भाषण दिया जिसमेें शांतिपूूर्ण सहअस्तित्व और पंचशील का उपदेेश झाड़ा और यह कहा कि हम पड़ोेसी राज्यों में किसी प्रकार शक्ति का प्रयोग करने के विरूद्ध हैं।
2 दिसम्बर 1950 को उन्होंने कुछ समय पहले अपना दूत बनाकर बीजिंग भेजे गये कवलम माधव पणिक्कर को लिखा कि ‘मेरे द्वारा संसद में हमारी विदेश नीति पर दिये गये भाषणों की प्रतियां आपको मिल गई होंगी।’ यहां स्पष्ट संकेत था कि पणिक्कर माओ और उनके मंत्रिमंडल के साथियों और अफसरों को ये प्रतियां पहुंचा दें जिससे कि वे तिब्बत पर आक्रमण करने में झिझके नहीं और निश्चिंत रहें कि भारत उन्हें रोकेगा नहीं। इसी पत्र में वे आगे लिखते हैं – ‘मैंने अधिकांश लोगों पर अपना प्रभाव छोड़ा है। पर क्या करें, कुछ लोग ऐसे हैं, जिन्हें शक्ति के प्रयोग के अतिरिक्त, इस मामले पर और कुछ सूझता ही नहीं।’
इस बीच भारत में चरणबद्ध रूप से कम्युनिज्म लाने के लिये और भारत की नितान्त प्रतिकूल परिस्थितियों को इसके लिये क्रमशः अनुकूल बनाने के लिये वे माओ की कम्युनिस्ट पार्टी का तिब्बत और भारत के उत्तरी क्षेत्र पर कब्जा चाहते थे और इसके लिये व्यवस्थित कार्य कर रहे थे। यह इससे भी स्पष्ट हो जाता है कि उन्होंने माओ जे दुंग के लड़ाकों द्वारा तिब्बत पर कब्जा करने और तिब्बितियों का जनसंहार करने के लिये बहुत बड़ी मात्रा में चावल तथा अन्य खाद्य सामग्री भेजी और सैन्य वाहनों के लिये पेट्रोल आदि भी भेजे। जिनका प्रमाण उनके आगे के पत्रों और संसद में दिये गये उनके वक्तव्यों से प्राप्त होता है, जिन्हें हम अधिकृत अभिलेखों के साथ प्रस्तुत करेंगे।(क्रमशः……….अगले भाग में जारी…)
✍🏻प्रो0 कुसुमलता केडिया

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