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आओ कुछ जाने

कैसे होता सूर्य ग्रहण?

बहुत दिनों से सोच रहा हूं,
मन में कब से लगी लगन है।
आज बताओ हमें गुरुजी,
कैसे होता सूर्य ग्रहण है।

बोले गुरुवर?,प्यारे चेले,
तुम्हें पड़ेगा पता लगाना।
तुम्हें ढूढ़ना है सूरज के,
सभी ग्रहों का ठौर ठिकाना।

ऊपर देखो नील गगन मे,
हैं सारे ग्रह दौड़ लगाते।
बिना रुके सूरज के चक्कर?
अविरल निश दिन सदा लगाते।

इसी नियम से बंधी धरा है,
सूरज के चक्कर करती है।
अपने उपग्रह चंद्रदेव को,
साथ लिये घूमा करती है।

चंद्रदेव भी धरती माँ के,
लगातार घेरे करते हैं।
धरती अपने पथ चलती है,
वे भी साथ? चला करते हैं।
कभी कभी चंदा सूरज के ,
बीच कहीं धरती फँस जाती।
धरती की छाया के कारण,
धूप चाँद तक पहुंच न पाती।

इसी अवस्था में चंदा पर,
अंधकार सा छा जाता है।
समझो बेटे इसे ठीक से,
चंद्र ग्रहण यह कहलाता है।

बहुत दिनों से सोच रहा हूं,
मन में कब से लगी लगन है।

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