Categories
पर्व – त्यौहार भारतीय संस्कृति

शरद ऋतु के बारे में भारतीय ऋषियों का चिंतन

शरं ददाति इति शरदः ॥
शरद का अर्थ है कि जिस ऋतु में शर (बाण) प्राप्त हों वह शरद है। शर किसलिये? अपनी सुरक्षा के लिये। यही वह ऋतु है जब सरकण्डा मिलता है जिसका उपयोग बाण बनाने में किया जाता था। शर या इषु , मास इष ऋतु शरद ।
यही शर थे जिन्हें भूमि पर बिछाकर भीष्म को लेटाया गया था और एक गट्ठर सिर रखने के लिये भी दिया गया था।
बिना अच्छे आयुधों के युद्ध नहीं जीता जा सकता है। उस काल में धनुष-बाण ही सबसे अच्छा आयुध था, शत्रु को दूर से ही मारने के लिये इससे अच्छा कुछ नहीं था। शत्रु से दूरी बनाकर प्रहार करने से स्वयं को हानि होने की संभावना नहीं रहती है।
अमेरिका पहले वायुसेना, मिसाइल आदि का प्रयोग करता है बाद में अपने सैनिकों को ग्राउण्ड पर उतारता है।
इस प्रकार भारतीयों ने प्रथम सुरक्षा को वरीयता दी, इसके बाद ही भोजन का क्रम आता है।
शरद ऋतु की ही देन था आहार अर्थात् चावल ।
साठिया चावल और इसके साथ ही उगने वाला समा (सावां)। समा अर्थात् सम्वत्सर , एक वर्ष पूर्ण होने का काल । समा का एक अर्थ और भी है दिन-रात्रि के सम होने का काल अर्थात् विषुव । शरद में भी विषुव दिवस होता है।
शरद और सम्वत्सर एक ही अर्थ में प्रयुक्त हुये।
पश्येम शरदः शतम् ।।१।।
जीवेम शरदः शतम् ।।२।।
बुध्येम शरदः शतम् ।।३।।
रोहेम शरदः शतम् ।।४।।
पूषेम शरदः शतम् ।।५।।
भवेम शरदः शतम् ।।६।।
भूयेम शरदः शतम् ।।७।।
भूयसीः शरदः शतात् ।।८।।
(अथर्वसंहिता, काण्ड १९, सूक्त ६७)

एक वाप ने अपनी बेटी से पूछा था कि कौन सा फूल सबसे सुन्दर होता है तो बेटी ने उत्तर दिया था , वापू! कपास का फूल सबसे सुन्दर होता है।
मैत्रायणीयमानवगृह्यसूत्र के द्वितीय पुरुष के पन्द्रहवें खण्ड में ‘कर्त’ अर्थात् spindle का उल्लेख है।
कार्तिक मास कृत्तिका नक्षत्रयुक्त पूर्णमासी होने से होता है। कृत्तिका अर्थात् कर्तन करने वाली। कपास का कर्तन अर्थात् कपास काटना और फिर सूत कातना।
कर्तन शब्द कताई कार्य हेतु भी प्रयुक्त होता है। वेदमन्त्रों में कर्तवे क्रतु शब्दों को कपास कर्तन के सन्दर्भ में देखने से यह स्पष्ट होता है कि शतक्रतु उसे कह सकते हैं जिसने कपास की सौ फसलें उगा लीं। शरद में तैयार होने वाली कपास और जीवेम शरदः शतम्।
दीपावली में दीप प्रज्वलन हेतु जिस तेल और बाती(वर्तिका) की आवश्यकता है वह अभी प्राप्त होने वाली तिल और कपास की उपज से ही आती है। धान से खीलें मिलती हैं और ईख भी अभी आती है।
कार्तिक मास से कर्तन कार्य होने लगता है, जाड़ों के लिये रुई भरकर रजाई और गद्दों का तैयार किया जाना आरम्भ हो जाता है।

इन्वका को खोजते यहाँ तक पहुँचे । इन्वका मृगशीर्ष है, ओरॉयन के पाँच तारे।
इल्वलारि अगस्त्य हैं। सम्भवतः पहले मार्गशीर्ष की समाप्ति पर अगस्त्योदय होता होगा । शरद ऋतु का मास । शर का अर्थ ५ भी होता है।
इळा , इला , ऐळ ऐल । ऐला ? इलायची का देश ।
इलविला
भविष्यपुराण ३.३.१२.१०१( ऐलविली : योग सिद्धि युक्त कामी राक्षस, चित्र राक्षस का अवतार, कृष्णांश आदि द्वारा वध ), ३.४.१५.१( इल्वला : विश्रवा मुनि की तामसी शक्ति, यक्षशर्मा द्वारा आराधना, जन्मान्तर में यक्षशर्मा का कर्णाटक – राजा व इल्वला – पुत्र कुबेर बनना ),
भागवत पुराण ४.१.३७( इडविडा : विश्रवा – पत्नी, कुबेर – माता ), ९.२.३१( इडविडा : तृणबिन्दु व अलम्बुषा की कन्या, विश्रवा – भार्या, कुबेर – माता ),
वायु पुराण ७०.३१/२.९.३१( इडिविला : तृणबिन्दु – कन्या, विश्रवा – भार्या, कुबेर – माता ), ८६.१६/२.२४.१६(द्रविडा : तृणबिन्दु – पुत्री, विश्रवा – माता, विशाल – भगिनी ; तुलनीय : इडविडा),
विष्णु पुराण ४.१.४७( तृणबिन्दु व अलम्बुषा की कन्या ),
विष्णुधर्मोत्तर ३.१०४.५९( मृगशिरा नक्षत्र का नाम, आवाहन मन्त्र ),
लक्ष्मीनारायण संहिता २.८४+( पुलस्त्य – पत्नी ऐलविला ।
इडविड और द्रविड एक ही है?

ऋत, ऋतु और Ritual
क्रिया धातु ‘ऋ’ से ऋत शब्द की उत्पत्ति है। ऋ का अर्थ है उदात्त अर्थात ऊर्ध्व गति। ‘त’ जुड़ने के साथ ही इसमें स्थैतिक भाव आ जाता है – सुसम्बद्ध क्रमिक गति। प्रकृति की चक्रीय गति ऐसी ही है और इसी के साथ जुड़ कर जीने में उत्थान है। इसी भाव के साथ वेदों में विराट प्राकृतिक योजना को ऋत कहा गया। क्रमिक होने के कारण वर्ष भर में होने वाले जलवायु परिवर्तन वर्ष दर वर्ष स्थैतिक हैं। प्रभाव में समान वर्ष के कालखंडों की सर्वनिष्ठ संज्ञा हुई ‘ऋतु’ । उनका कारक विष्णु अर्थात धरा को तीन पगों से मापने वाला वामन ‘ऋत का हिरण्यगर्भ’ हुआ और प्रजा का पालक पति प्रथम व्यंजन ‘क’ कहलाया।

आश्चर्य नहीं कि हर चन्द्र महीने रजस्वला होती स्त्री ‘ऋतुमती’ कहलायी जिसका सम्बन्ध सृजन की नियत व्यवस्था से होने के कारण यह अनुशासन दिया गया – ऋतुदान अर्थात गर्भधारण को तैयार स्त्री द्वारा संयोग की माँग का निरादर ‘अधर्म’ है। इसी से आगे बढ़ कर गृह्स्थों के लिये धर्म व्यवस्था बनी – केवल ऋतुस्नान के पश्चात संतानोत्पत्ति हेतु युगनद्ध होने वाले दम्पति ब्रह्मचारियों के तुल्य होते हैं।

आयुर्वेद का ऋतु अनुसार आहार विहार हो या ग्रामीण उक्तियाँ – चइते चना, बइसाखे बेल …, सबमें ऋत अनुकूलन द्वारा जीवन को सुखी और परिवेश को गतिशील बनाये रखने का भाव ही छिपा हुआ है। ऋत को समान धर्मी अंग्रेजी शब्द Rhythm से समझा जा सकता है – लय। निश्चित योजना और क्रम की ध्वनि जो ग्राह्य भी हो, संगीत का सृजन करती है। लयबद्ध गायन विराट ऋत से अनुकूलन है। देवताओं के आच्छादन ‘छन्द’ की वार्णिक और मात्रिक सुव्यवस्था भी ऋतपथ है।
अंग्रेजी ritual भी इसी ऋत से आ रहा है। धार्मिक कर्मकांडों में भी एक सुनिश्चित क्रम और लय द्वारा इसी ऋत का अनुसरण किया जाता है। ‘रीति रिवाज’ यहीं से आते हैं। लैटिन ritus परम्परा से जुड़ता है। परम्परा है क्या – एक निश्चित विधि से बारम्बार किये काम की परिपाटी जो कि जनमानस में पैठ कर घर बना लेती है।

कभी सोचा कि ‘कर्मकांड’ में ‘कर्म’ शब्द क्यों है? कर्म जो करणीय है वह ऋत का अनुकरण है। कर्मकांडों के दौरान ऋत व्यवहार को act किया जाता है। Rit-ual और Act-ual का भेद तो समझ में आ गया कि नहीं? 🙂

शतपथ ब्राह्मण ८.३.४.१० में
इष, ऊर्ज, रयि व पोष,
(क्वांर/आश्विन), (कार्तिक), (अग्रहायण/मार्गशीर्ष), (पौष) ?

इन चार को अन्न रूपी पशु के चार पाद कहा गया है.
इष और ऊर्ज शरद ऋतु के मास हैं .
ज्वार, बाजरा , तिल आदि की प्राप्ति .
रयि (सम्पदा, समृद्धि) मार्गशीर्ष में धान की फसल आ जाने से होगी.
पोष … पौष मास पुष्य , पुष्टिकर्ता होने से .
.
वेदमन्त्रों में अश्विन के साथ इष की , ऊर्ज के साथ नपात् शब्द की बहुधा आवृत्ति है ।
नपात् का सम्बन्ध शरद सम्पात से है .
हो भी या नहीं भी ।

स्थूल विभाग से धान के दो प्रकार हैं।
१.वसहन २.जड़हन।
जो धान शरद विषुव (22/23 सितंबर) के पूर्व पुष्पित हो जाते हैं और अक्टूबर, नवंबर में तैयार होते हैं। उनको वसहन कहा जाता है।
शरद विषुव के बाद पुष्पित होने वाले जड़हन कहे जाते हैं। सुगन्धित धान जड़हन में आते हैं।
सस्य में कीटनाशक रसायन का प्रयोग—
अङ्गिरसों ने कठिनाई से वृष्टि द्वारा ओषधियों को उत्पन्न किया। पितरों ने विष से उसका लिम्पन कर दिया । तब पितरों को भाग देने से ओषधियां स्वादिष्ट बनी ।

अङ्गिरसो वै सत्रमासत। तेषां पृश्निर्घर्मधुगासीत्। सर्जीषेणाजीवत्। तेऽब्रुवन्। कस्मै नु सत्रमास्महे। येस्या ओषधीर्न जनयाम इति।ते दिवोवृष्टिमसृजन्त। यावन्तः स्तोका अवापद्यन्त। तावतीरोषधयोऽजायन्त। ता जाताः पितरो विषेणालिम्पन्। – – – – – – – – -तै.ब्रा.२.१.१.१

अन्य सन्दर्भ भी मन्त्रों में हैं।

कौषीतकीब्राह्मण में आग्रयणेष्टि में स्पष्ट रूप से वर्षा से उत्पन्न होने वाले ‘श्यामाक’धान का उल्लेख है, शरद-ऋतु में नवसस्येष्टि यज्ञ होता है।

आग्रयणेन अन्न अद्य कामो यजेत वर्षास् आगते श्यामाक सस्ये ।
इससे भी स्पष्ट है कि “श्यामाक” धान की विधिवत् कृषि की जाती थी।

फुटकर शब्दों में थोक बात कहना चाहूँगा …
इषे त्वा ऊर्जे त्वा ॥ भारत में एक ऋतु दो माह की कही जाती है, उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्र के लिये यही अनुभव में भी है।
इष और ऊर्ज मास शरद ऋतु के मास कहे जाते हैं, भारत की कृषि
वर्षा पर आधारित रही है। वर्षा ऋतु के भी दो मास होना चाहिये,
लेकिन हम पाते हैं कि वर्षा ऋतु को चौमासा कहा जाने लगा है,
वर्षा दो ही मास होती है, फिर चार मास कैसे हो गये?
वर्षारम्भ पर किसान आनन्दित होता है, अन्य जन लेखक कवि बाल युवा युवती भी आनन्दित होते हैं लेकिन इनका आनन्दित होना अभौतिक है।
किसान का आनन्दित होना ही वास्तविक आनन्द है, अन्नदा धरती, अन्नद कृषक और इसमें हेतु होती है वर्षा ।
क्वांर और कार्तिक माह वर्षा ऋतु के दो मास होते थे, इसे बरतने वाले लोग परम्परा से इन मासों के साथ वर्षा ऋतु का व्यवहार करते चले आ रहे थे,
४००० – ५००० वर्ष बीत गये
तब लगा कि क्वांर कार्तिक (इष ऊर्ज) से बहुत पहले ही वर्षा होने लगी है, सावन भादों में । सावन से शुरू होकर छिटपुट क्वांर कार्तिक तक …. तो वर्षाकाल सम्बन्धी बातों का समन्वय सावन भादों (श्रावण – श्रविष्ठा) से करते हुये क्वांर कार्तिक को भी स्मृति में बनाये रखा ।
ऋतुचक्र भ्रमणशील है सो यहाँ पर भी वह रुक नहीं सकता था..
और पीछे सरक कर यह आषाढ़ में आया और एक पैर जेठ की ओर उठा दिया।
घाघ कहते हैं कि ऋतु को एक महीना पहले ही आया जानो, जेठ में ही आषाढ़ के कृत्य करो.. जेठ में ही खेत की जुताई कर डालो।
घाघ यह भी कहते हैं कि खेत को दोबार जोतना तभी फसल अच्छी होगी।
तो बात है वर्ष के सबसे बड़े दिन की, जब दक्षिणायनारम्भ होता है
पुराने विवरण यह बताते हैं कि इस दिवस में रात्रि होती है १२ मुहूर्त की और दिन होता है १८ मुहूर्त का यानी १४ घण्टे से भी कुछ अधिक का ।
भारत में दक्षिणायनारम्भ दिवस पर छाया मापन और दिवस प्रमाण ज्ञात करने की प्राचीन परम्परा रही है। यदि आप साढ़े तेइस अंश उत्तरी अक्षांश के दक्षिण में हैं तो ठीक मध्याह्न होने पर आपकी छाया पृथ्वी पर नहीं बनेगी । एक पल के लिये ही सही आप अपने आपको देवता फील कर सकते हैं, क्योंकि देवों की भी छाया नहीं बनती है।
आर्य्यभट, वराहमिहिर ने ऋतु के सरकने की बात पर विचार किया
है , पूर्वाचार्यों और गर्ग तथा नारद जैसे ऋषियों के वचनों को ध्यान में रखकर ही इन दोनों ने अयन की गति और अयन के समायोजन हेतु गणितीय सूत्र दिये । जिनकी चर्चा आगे होगी.
वराहमिहिर और आर्य्यभट से कम से कम पाँच हजार वर्ष पहले से चली आ रही चान्द्रमास और सौरवर्ष पर आधारित व्यवस्था में ऋतुवर्ष का छोटा होना एक समस्या बनकर उभरा । इस पर देश में ही नहीं विदेशों में भी विचार हुआ, विचार विमर्श, विचार और ज्ञान का विनिमय हुआ।
रामायण और महाभारत में विनिमय को आसानी से देखा समझा जा सकता है, विनिमय (exchange) अर्थात् बदले में कुछ पाना । यदि हमारे पास देने के लिये कुछ नहीं है तो पाने की सम्भावना शून्य के निकट होगी।
भगवान् के वचनों में – पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति….
यह सूत्र है कुछ पाने का, Give&Take
✍🏻अत्रि विक्रमार्क और गिरिजेश राव जी की पोस्टों से संग्रहित

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
hititbet giriş
hititbet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
hititbet giriş
hititbet güncel giriş
hititbet giriş
vdcasino giriş
vdcasino güncel giriş
vdcasino giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
hitit medya
Hititbet Giriş
Hititbet Giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
tuzla cilt bakım merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet
hititbet güncel adres
hititbet 2026
hititbet giriş
hititbet giriş
Tuzla Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
solobet giriş
hititbet giriş
kralbet
betnano
betnano
betnano
kralbet
kralbet
kralbet
setrabet
setrabet
kralbet
hititbet
hititbet
Tuzla Cilt Bakım
İstanbul Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet Giriş
Hititbet Giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betgaranti giriş
Tuzla Cilt Bakım
Tuzla İpek Kirpik
Tuzla Lenf Drenaj
Kolaybet Giriş
Betgaranti Giriş
kralbet
kralbet
betnano
betnano
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
imajbet giriş
betpark giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
Hititbet Giriş
xslot giriş
kralbet
betnano
kralbet
Hititbet App
hititbet giriş
hititbet
bettilt giriş
meritking giriş
matbet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
kralbet
kralbet
betnano
betnano
kralbet
kralbet
imajbet giriş
xslot giriş
xslot giriş
betvole giriş
betvole giriş
bettilt
betvole giriş
betvole giriş
bettilt
gobahis giriş