स्वतंत्रता दिवस की 66वीं वर्षगांठ भारत मना रहा है। इस पावन अवसर पर हम एक दूसरे को शुभकामनाएं प्रेषित कर रहे हैं। सचमुच पिछले 66 वर्षों में हम दो चार कदम नही अपितु मीलों चले हैं, बहुत कुछ किया गया है। बहुत कुछ किया जा रहा है पर जितना किया गया या किया जा रहा है उससे अधिक किया जाना शेष है। जो किया गया अथवा राष्ट्रहित में जो किया जा रहा है उसका अभिनंदन, वंदन और नमन होना ही चाहिए। इसलिए शुभकामनाओं का आदान प्रदान भी होना चाहिए।
आज इस पावन अवसर पर भारत जैसे सनातन राष्ट्र को और यहां के निवासियों को कुछ सोचने की, समझने की और अंतरावलोकन करने की आवश्यकता है। क्योंकि देश की आधे से अधिक जनसंख्या इस समय भी गरीबी और भुखमरी से जूझ रही है। लोगों को सत्ता भयमुक्त समाज नही दे पायी,भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन नही दे पायी। भय, भूख और भ्रष्टाचार व्यापकतर से व्यापकतम होता गया और देश के संसदीय लोकतंत्र में दीमक की भांति प्रविष्ट हो गया है। चिंताएं बढ़ी हैं, घटी नही है। कारण खोजने होंगे, कि अंतत: क्या कारण रहे जो लोकतंत्र का रथ संकल्पित राजपथ पर आगे न बढ़कर कीचड़ में जा फंसा?
हमसे भूल हुई और पहली भूल रही कि हमने स्वयं को अपनी प्राचीनता से काटा, अपने सांस्कृतिक मूल्यों से और गौरवपूर्ण अतीत से और अपने मूल से काटा। प्रत्येक मनुष्य आदिपुरूष का नवीन संस्करण होता है। प्रकृतिचक्र को देखिए पुरातन ही नूतन बन रहा है। पुरातन और नूतन के इस सत्य को जो समझ लेता है वही सनातन के रहस्य को जान लेता है। वही भारत के सनातनपन को समझ लेता है। मनुष्य आदि पुरू ष का ही नही परमपुरूष ईश्वर का भी नवीन संस्करण है। ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ का यही अर्थ है। जब हम ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ को समझ लेते हैं तो ज्ञात होता है कि मैं ही मनु हूं, मैं ही ययाति हूं, मैं ही अग्नि, वाय, आदित्य, अंगीरा हूं, मैं ही कपिल हूं, गौतम हूं, कणाद हूं, जैर्मिन हूं, पतंजलि हूं, राम हूं, कृष्ण हूं। तुलसी हूं, सूर हूं, कबीर हूं, मैं ही दयानंद हूं मैं ही विवेकानंद हूँ, मैं ही गांधी हूं और मैं ही सावरकर हूं।
ऐसी स्थिति उत्पन्न होते ही गांधी-सावरकर का भेद समाप्त हो जाता है, क्योंकि मैं जब दोनों हूं तो जो जहां गलत है, वह वहां से पीछे हट जाता है, जहां वह गलत है और दोनों निर्भ्रांत होकर एक साथ रहते हैं। गलतियां वो करते हैं जो दोनों में से केाई एक होते हैं। एक होते ही पूर्वाग्रहवादी बुद्घि हम पर हावी होती है और हम महापुरूषों का भी बंटवारा करने पर लग जाते हैं, और हमारे दृष्टिïकोण की असीमता ससीमता में सिमटने लगती है, तब हम आदिपुरूष और परमपुरूष के संस्करण नही रह पाते हैं।
प्रत्येक महापुरूष का नवीन संस्करण यदि हम अपने आपको मानते और प्रत्येक महापुरूष को यदि हम अपने भीतर अनुभव करते, उसका नया संस्करण स्वयं को मानते तो हम किसी ‘अवतार के अवतरणÓ की प्रतीक्षा नही करते। कृष्ण जी को गये पांच हजार वर्ष हो गये हैं और हम उनके किसी अवतार की प्रतीक्षा कर रहे हैं। हमने ये नही समझा कि कृष्ण जब अपने अवतार की बात कर रहे हैं, तो वह जीवात्मा के विराट स्वरूप की बात कर रहे हैं, जिसे उन्होंने आदिपुरूष की अपने भीतर व्याप्त एक झलक समझा और हमें संदेश दिया कि जब अधर्म की वृद्घि हो तो स्वयं कृष्ण बन जाना। यदि हम कृष्ण के नवीन संस्करण बन जाते तो आज इस देश में करोड़ों कृष्ण होते। हम किसी अवतार की प्रतीक्षा कर रहे हैं। यह भूल कर कि हम ही कृष्ण हैं और हम की उसके अवतार हैं। यदि ऐसी सोच आज भी हमारी सबकी बन जाए तो भय, भूख और भ्रष्टाचार की महाव्याधि छूमंतर हो जाए।
रथ हांकने वाले अधिरथ का पुत्र कर्ण अपने पुरूषार्थ और उद्यमशील स्वभाव के कारण स्वयं महारथी बन गया। इस्राइल जैसा देश अपने जातीय अभिमान के कारण विश्व में अपना गौरवपूर्ण स्थान बनाने में सफल रहा, चीन जैसा दब्बू राष्ट्र हमारे पड़ोस से उठा और ऊंचाई पर पहुंच गया। कई लोग अधिरथ से महारथी बने। कई देश ऊंचाईयों का इतिहास लिखने में सफल रहे, पर हम महारथी से अधिरथ बन गये। अपनी विदेश नीति तक को अमेरिका के यहां गिरवी रख दिया। दूसरों से पूछ पूछकर रथ हांकने की स्थिति में आ गये। आज जयचंद देश की संसद में बैठे हैं और अमेरिका के राष्ट्रपति के लिए 65 जयचंद पत्र लिखते हैं कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को बीजा मत देना। 65 वर्ष में 65 जयचंद तैयार हो गये, परंतु देशाभिमानी और जाति अभिमानी ‘पृथ्वीराज’ पैदा नही हुए। इसका कारण यह रहा कि हमने महापुरूषों के निर्माण के लिए जो उद्योग स्थापित किये उसके लिए सारा कच्चा माल (बौद्घिक मार्गदर्शन) हमने विदेशों से आयात करना आरंभ कर दिया। फलस्वरूप हम महारथी से अधिरथ बन गये। आज महारथियों का नही अपितु अधिरथों का राज है। सोचिए कि क्या कभी कोई राष्ट्र अधिरथों के शासन से महान बन सकता है? कदापि नही। देश को तो महारथी ही चाहिए। पिछले 65 वर्ष से ये राष्ट्र महारथी की खोज में है। हर 15 अगस्त पर इस देश की आत्मा रोती है और हमसे महारथी की अपनी पुरानी मांग को दोहराती है। कितने लोगों ने देश की आत्मा की इस महारथी की मांग को समझा है, सुना है और जाना है? जब जब अवसर आए तो हमने इसे ‘देवेगौड़ा’ दिये या ‘मनमोहन सिंह’ दिये। महारथी तो नही दिए। दोषी हम सब हैं, कोई एक व्यक्ति या कोई एक राजनीतिक दल इसके लिए अकेला दोषी नही है।
हमने 15 अगस्त 1947 को जब देश को आजाद कराया था तो एक संकल्प लिया था, जिसे पंडित नेहरू ने राष्ट्रीय संकल्प के रूप में रखा था कि ये देश कभी विश्वगुरू रहा है और हम इसे पुन: विश्वगुरू के सम्मानित स्थान पर विराजमान कराएंगे। आज इस देश के पास ढाई अरब हाथ हैं, सवा अरब मस्तिष्क है और विश्व की सबसे अधिक युवा शक्ति भी इसके पास है-परंतु उनमें से कितने लोग इस राष्ट्रीय संकल्प के प्रति प्रतिबद्घ हैं कि हम देश को पुन: विश्वगुरू के सम्मानित स्थान पर विराजमान कराएंगे? मैं ऐसे लोगों की संख्या शून्य कतई नही कहूंगा पर नगण्य अवश्य कहूंगा। ऐसे लोग नगण्य क्यों हो गये? इसलिए कि जिन्होंने ये संकल्प लिया था वही हमें बताने लगे कि मस्तिष्क तो जर्मनी के पास है, ब्रिटेन के पास है, अमेरिका के पास है, हमारे पास क्या है? इसलिए विश्वगुरू बनने वाले वैश्विक शिष्यता की नपुंसक मानसिकता से ग्रस्त हो गये। आज तो स्थिति ये है कि गुरू बनने का संकल्प लेने वाले शिष्य बनने के योग्य भी नही रहे हैं।
उद्यमशीलता और पुरूषार्थी स्वभाव लोगों को और उनके राष्ट्र को महान बनाता है। भारत में आप संतरी से मंत्री तक किसी भी व्यक्ति से पूछिए कि आप क्या करते हैं तो वह आपको अपनी नौकरी पेशे के विषय में बताएगा और यदि वह नौकरी में है तो ये अवश्य कहेगा कि बस करना कुछ नही पड़ता। बड़े आराम की नौकरी है। चपरासी कहेगा कि बस फाइलें इस रूम से उस रूम तक ले जाने का काम है। बाबू कहेगा कि थोड़ी बहुत लिखा पढ़ी करनी पड़ती है। बॉस कहेंगे कि काम तो मेरा स्टाफ ही कर लेता है, पर फिर भी कुछ समय के लिए तो जाना ही पड़ता है। मंत्री जी का तो कहना की क्या है? उनकी अकर्मण्य शैली से तो सब परिचित हैं ही। कहा जाता है ना कि जैसी भावना होती है वैसा ही मनुष्य बन जाता है। कामचोरी हमारी भावना बन गयी तो कामचोरों का बहुत बड़ा समाज हमने खड़ा कर लिया। इसलिए ढाई अरब हाथों वाला और सवा अरब मस्तिष्कों वाला देश होकर भी भारत दीन-हीनों का देश है। सब मांगने की पंक्ति में खड़े हैं। सबने कटोरे ले रखे हैं। कोई कहता है हमें जातीय आरक्षण दो तो केाई कहता है हमें धार्मिक आरक्षण दो। पूरे देश में चारों ओर मांगने वालों का ही शोर है और मांगने वालों की ही प्रबलता है। छोटी सी बात पर हम मांगने वालों की ही भांति लड़ते हैं, झगड़ते हैं और विश्व को अपनी महानता का परिचय देते हैं। विराट के संस्करण नही रहे और पुरातन के नूतन स्वरूप नही बने उसी का तो विकृत स्वरूप है-ये। ह्यूगो ने कहा है कि लोगों में शक्ति का नही संकल्प का अभाव होता है। सचमुच ह्यूगो ठीक कह रहे हैं। शक्ति तो हमारे पास भी पर्याप्त है, पर संकल्प शक्ति क्षीण है। यदि हम संकल्प शक्ति के विषय में चिंतन करें तो ज्ञात होता है कि इस सृष्टि के मूल में भी परमपुरूष की संकल्प शक्ति कार्य कर रही है। इस प्रकार संकल्पशक्ति के विषय में प्रत्येक मनुष्य से अपेक्षा की जाती है कि वह एक अच्छे उत्तराधिकारी की भांति उत्तराधिकार में मिली संपत्ति को बढ़ाकर अगली संतति को सौंपे। जब कोई उत्तराधिकारी अपने पिता से मिली विरासत को इसी भावना से बढ़ाकर अगली पीढ़ी को सौंपने के लिए संकल्पित हो जाता है तो उसका वंश उन्नति करता है। ऐसा व्यक्ति पुरातन का नवीन संस्करण बन जाता है, वह पुरातन को वर्तमान में और वर्तमान को भविष्य में उतारकर नया चित्र बनाता रहता है। हम भारतीय भी यदि पुरातन को वर्तमान में उतारकर भविष्य का चित्र बनाना आरंभ करें और इसी के लिए संकल्पबद्घ हो जाएं तो हमारे ढाई करोड़ हाथों को और सवा अरब मस्तिष्कों को देश से भय, भूख व भ्रष्टाचार को मिटाने में देर नही लगेगी। आवश्यकता आदि पुरूष का संस्करण बनने की है, अधिरथ से महारथी बनने की है, विश्वगुरू बनने की है, शक्ति को संकल्प बद्घ करने की है। स्वतंत्रता दिवस के इस पावन अवसर पर ऐसी शुभकामनाओं के साथ ही हम आगे बढ़ें और अपना महारथी चुनें तो ही देश का कल्याण होगा।

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