हिंदू धर्म के दिग्विजय व्याख्याता युगदृष्टा विवेकानंद और उनका हिंदुत्व दर्शन-3

दिनेश चंद्र त्यागी
गतांक से आगे…
भारतवासियों के धन्यवाद के पात्र हैं हार्वर्ड विश्व-विद्यालय के प्रो. राइट जिनसे परिचित होने पर स्वामी जी ने धर्म सभा के लिए परिचय पत्र न होने की कठिनाई बताई। विद्वान प्रोफेसर स्वामी जी से प्रथम वार्तालाप में ही इतने अधिक प्रभावित हो गये थे कि उन्होंने कहा-To ask swami, for your credentials is like asking the sun to state its right to shine. आप से परिचय पत्र पत्र मांगना, स्वामी जी ऐसा ही है जैसे सूर्य से उसके चमकने के अधिकार का प्रमाण मांगना। धर्म महासभा के आयोजक प्रो. राइट के मित्र थे, उन्हें स्वामी जी का परिचय पत्र लिखते हुए प्रो. राइट ने उल्लेख किया–here is a man who is more learned than all our learned professors put to gether. समस्त प्राध्यापकों के सम्मिलित ज्ञान से भी अधिक ज्ञान रखने वाला एक व्यक्ति अर्थात स्वामी विवेकानंद।
इस प्रकार अधिक२त प्रतिनिधि बने हमारे चरित्रनायक। उस विराट आयोजन में स्वामी विवेकानंद ने 17 दिन में जो अवसर उन्हें दिये गये, तदनुसार कुल 11 व्याख्यान प्रस्तुत किये।
11 सितंबर, 15, 19, 23, 26 व 27 सितंबर 1893 को जो छह व्याख्यान हुए-विशेषत: कोलंबस हाल में वे बहुत प्रसिद्घ पा चुके हैं। इसके अतिरिक्त धर्म महासभा के अंतर्गत विज्ञान विभाग एवं महिला विभाग द्वारा विशेष रूप से आयोजित कम से कम 5 भाषणों का उल्लेख Record of world’s Parliament of Religions  में विश्व धर्म संसद के अभिलेख उपलब्ध है। वैज्ञानिक विभाग के भाषणा ये थे-
(1) आस्तिक हिंदू और वेदांत दर्शन 22 सितंबर प्रात: 10-11 बजे।
(2) भारत के आधुनिक धर्म 22 सितंबर अपरान्ह अधिवेशन।
(3) पूर्व के भाषणों पर भाषण 23 सितंबर 1893।
(4) हिंदू धर्म का तत्व 25 सितंबर 1893।
(5) पांचवां भाषण था प्राच्यनारी 23 सितंबर महिला विभाग।
युगपुरूष स्वामी विवेकानंद हिंदू धर्म के प्रतिनिधि के रूप में शिकागो धर्म सम्मेलन में पहुंचे और इस ओजस्विनी व्याख्यान माला के उपरांत वे महान सेनानायक धर्म सम्राट के रूप में विश्वमंच पर सुप्रतिष्ठित हुए।
विवेकानंद साहित्य भाग 1
इस वर्ष 22 मई को बुद्घ पूर्णिमा का सुअवसर है अत: इस अवसर पर बौद्घ धर्म और स्वामी विवेकानंद विषय पर भी कुछ विचार पाठकों को रोचक प्रतीत होंगे।
26 सितंबर 1893 के भाषण में स्वमीजी ने इस विषय पर सारगर्मित विचार प्रस्तुत किये-
बौद्घ धर्म हिंदू धर्म की ही निष्पत्ति है, हिंदू धर्म के स्वामी जी का तात्पर्य वैदिक धर्म से है।
भगवान बुद्घ प्रथम महापुरूष थे जिन्होंने धर्म प्रचार के लिए हजारों मिशनरी विदेश भेजे।
एक हजार बौद्घ भिक्षु चीन में मौत के घाट उतार दिये गये तो भी सारा चीन एक बार बुद्घ के चरणों में नत बना दिया गया।
बौद्घ धर्म के अनुयायियों ने दूसरे धर्म के लोगों को सर्वाधिक संख्या में धर्मान्तरित करने में सफलता प्राप्त की है, किंतु इसके लिए कभी शक्ति का प्रदर्शन नही किया, रक्त की नदियां नही बहाई। फिर भी बौद्घों की संख्या उनसे अधिक है जो एक हाथ में तलवार और दूसरे में अपना धर्मग्रंथ लेकर मानवता को रौंदने निकले थे। यह है भारत की मिट्टी का आदर्श।
बौद्घ धर्म हिंदू धर्म का एक विद्रोही शिशु है। हिंदू धर्म में समय समय पर हो जाने वाली बहुत सी विकृतियों के विरूद्घ स्वयं हिंदुओं ने ही विरोध का शंख फूंका-हमें अपने धर्म में सुधार के लिए सुधारकों को विदेशों से आयात नही करना पड़ा।
हमारे सनातन धर्म में भगवान बुद्घ को नवम अवतार माना है। विश्व में धार्मिक सहिष्णुता का इससे बडा कोई उदाहरण नही मिल सकता।
भगवान कृष्ण ने इस विषय में गीता में हमारा पथ प्रदर्शन किया है-जहां भी तुम्हें मानव सृष्टिï को उन्नत बनाने वाली और पोवन करने वाली अतिशय पवित्रता और असाधारण शक्ति दिखाई दे तो जान लो कि वह मेरे तेज के अंश से ही उत्पन्न हुआ है।
23 सितंबर 1893 शिकागो सम्मेलन में स्वामी विवेकानंद जी ने प्राच्य न ारी विषय पर एक विशेष भाषण दिया।
धर्म महासभा की महिला समिति की अध्यक्षा श्रीमती पाटर पॉमर ने इस भाषण का आयोजन जैक्सन स्ट्रीट शिकागो के महिला भवन में किया था। स्फुट विचारों का अवलोकन करें-
किसी भी राष्टï्र की प्रगति का सर्वोत्तम थर्मामीटर है, वहां की महिलाओं के साथ होने वाला व्यवहार।
भारत में स्त्री जीवन के आदर्श का आरंभ और अंत मातृत्व में ही होता है। प्रत्येक हिंदू के मन में स्त्री शब्द से मातृत्व का स्मरण हो आता है और हमारे यहां ईश्वर को मां कहा जाता है। (त्वमेव माता च पिता त्वमेव)।
पश्चिम में स्त्री पत्नी है, भारत में स्त्री माता है। पश्चात्य देशों में गृह की स्वामिनी और शासिका पत्नी है, भारतीय गृहों के परिवार की स्वामिनी और शासिका माता है।
पश्चिम में माता को पत्नी के अधीन रहना पड़ता है क्योंकि वह घर पत्नी का है। हमारे घरों में पत्नी को माता के अधीन रहना होता है।
ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति वे हाथ हैं जो सर्वप्रथम नवजात शिशु का पालना झुलाते हैं। विश्व में मां नाम से अधिक पवित्र और निर्मल दूसरा कौन सा नाम है जिसके पास वासना कभी फटक भी नही सकती। यही भारत का आदर्श है।
आधुनिकता और नारी समानता की डींग हांकने वाले पश्चिमी सभ्यों को स्वामी जी स्मरण दिलाते हैं कि पश्चिमी आलोचकों ने हिंदुओं के रीति रिवाज के संबंध में चाहे जो कहा हो, भारतीय नारी की दासता के विषय में कुछ भी टिप्पणी की हो, किंतु मैंने भारतवर्ष में कभी किसी स्त्री को बैल के साथ हल में जोते जाते या कुत्ते के साथ गाड़ी खींचते नही देखा, जैसा यूरोप के कुछ देशों में होता आया है।
अमेरिका की माताओ, क्या आप माता होने के लिए कृतज्ञ हैं? क्या आप यह समझती हैं कि मातृत्व प्राप्त करके आप पवित्रतापूर्ण गौरव को प्राप्त करती हैं? आप अपना हृदय टटोले और पूंछ? यदि नही तो आपका विवाह मिथ्या है आपका नारीत्व मिथ्या, और आपकी शिक्षा एक ढकोसला है और यदि आपके बच्चे प्रभु की प्रार्थना के बिना जन्म लेते हैं, तो वे संसार के लिए अभिशाप सिद्घ होंगे।
हमारे स्मृतिकार कहते हैं कि वही सनातन आर्य हैं, श्रेष्ठ है जो प्रार्थना के द्वारा जन्म लेती हैं।
धर्म और विज्ञान : स्वामी विवेकानंद की दृष्टिï में।
शिकागो सम्मेलन के विज्ञान विभाग में स्वामी जी ने उन पश्चिमी लेखकों एवं कथित इतिहासकारों के ग्रंथों को चुनौती दी जो दर्पपूर्ण घोषणा करते हैं कि भारत में कोई अनुसंधान कभी नही हुआ।
क्रमश:

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