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हमारे क्रांतिकारी / महापुरुष

आर्य समाज की महान धरोहर थे महात्मा आनंद स्वामी

 

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15 अक्तूबर/जन्म-दिवस

 

आर्य समाज के वरिष्ठ नेता महात्मा आनन्द स्वामी का जन्म 15 अक्तूबर, 1883 को हुआ था। उनके पिता मुंशी गणेश दास हिन्दू समाज की कुरीतियों से दुखी होकर ईसाई बनने जा रहे थे; पर तभी उनकी भेंट महर्षि दयानन्द सरस्वती से हो गयी। उन्होंने मुंशी जी को बताया कि ये कुरीतियाँ सनातन हिन्दू धर्म का अंग नहीं है। देश, काल परिस्थिति के कारण कुछ लोग या समूह अज्ञानवश इन्हें अपनाते हैं। अतः ईसाई बनने के बदले उन्हें हिन्दू समाज की कुरीतियों को दूर करने का प्रयास करना चाहिए।

मुंशी जी की आँखें खुल गयीं। अब वे महर्षि दयानन्द सरस्वती और आर्यसमाज के भक्त बन गये। इनके घर में एक बालक का जन्म हुआ, जिसका नाम खुशहाल चन्द रखा गया; पर जैसे-जैसे बालक बड़ा हुआ, तो सबके ध्यान में आया कि यह बालक मन्दबुद्धि है। यह देखकर स्वामी नित्यानन्द ने बालक को गायत्री की साधना करने को कहा। इससे खुशहाल चन्द की बुद्धि जाग्रत हो गयी और उसका जीवन बदल गया।

कुछ समय बाद खुशहाल का विवाह और एक सन्तान हुई। अब मुंशी जी उसे व्यापार में लगाना चाहते थे; पर उसका मन तो अब पढ़ने-लिखने में ही अधिक लगता था। एक बार आर्य समाज जलालपुर के वार्षिकोत्सव में महात्मा हंसराज जी आये। खुशहाल ने उनके भाषण की रिपोर्ट बनाकर उन्हें दिखाई, तो वे बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने खुशहाल को लाहौर आने को कहा।

लाहौर में हंसराज जी ने खुशहाल को ‘आर्य गजट’ के सम्पादक श्री रामप्रसाद जी के पास लेखन कला के अभ्यास को भेजा; पर रामप्रसाद जी ने उन्हें लेखा विभाग में लगा दिया। उन्हें 30 रु. वेतन मिलता था, जिसमें से काफी धन कार्यालय के हिसाब की पूर्ति में लग जाता था। शेष से उनका पेट ही नहीं भरता था। जब हंसराज जी को यह पता लगा, तो उन्होंने खुशहाल को आर्य गजट का सह सम्पादक बनवा दिया। अब तो वे दिन-रात काम में लगे रहते। इससे उनका स्वास्थ्य बिगड़ गया। यह देखकर उनकी पत्नी मेलादेवी भी लाहौर आ गयी। अब खर्च और बढ़ गया, जबकि आय सीमित थी।

एक बार मेलादेवी ने अपने मायके से 15 रु. मँगा लिये। जब खुशहाल जी को यह पता लगा, तो उन्होंने कहा कि पैसे तो मैं भी मँगा सकता था; पर इससे मेरी तपस्या भंग हो जाती। इसके बाद मेलादेवी ने घोर कष्टों में भी ससुराल या मायके से पैसे मँगाने की बात नहीं की। जब ‘दैनिक मिलाप’ का प्रकाशन शुरू हुआ, तो खुशहाल चन्द को उसके काम में लगा दिया गया।

एक बार घी समाप्त होने पर मेलादेवी ने अपने पुत्र को उनके पास भेजा। तभी खुशहाल जी को मिलाप के लिए अनेक धनादेश मिले थे; पर उन्होेंने उसे घी के लिए खर्च करने से मना कर दिया। संन्यास के बाद उनका नाम आनन्द स्वामी हो गया। दिल्ली आने पर वे अपने पुत्र के घर न जाकर आर्य समाज भवन में ही ठहरते थे। एक बार बेटा उन्हें लेने आया, तो वे किसी के घर से माँगी हुई रोटी खा रहे हैं। बेटे के नाराज होने पर उन्होंने स्पष्ट कहा कि संन्यासी को भिक्षावृत्ति से ही पेट भरना चाहिए।

विरक्त सन्त महात्मा आनन्द स्वामी का जीवन उस प्रकाश स्तम्भ की भाँति है, जिसके प्रकाश में हम कभी भी अपने जीवन का मार्ग निर्धारित कर सकते हैं। इस प्रकार के भाव पूण्य संदेश के लेखक एवं भेजने वाले महावीर सिघंल मो 9897230196

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