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इतिहास के पन्नों से

पूर्वोत्तर की वीरांगनाएं

डॉ. राजश्री देवी

भारत के स्वतंत्रता संग्राम के समय पूर्वोत्तर से भी ऐसे अनेक वीर योद्धा और वीरांगना हुए, जिन्होंने इस देश के लिए अपना जीवन न्योछावर किया। कितनों से सीने में गोलियां खाईं और कितने ही वीर फांसी के तख्ते पर चढ़ गए। किंतु राष्ट्रीय धरातल पर ऐसे वीरों और वीरांगनाओं की कोई खास चर्चा नहीं है और न ही लोग इनके त्याग को पहचानते हैं। केवल राज्य की सीमा तक हर इनकी शौर्यगाथाएं सीमित रह गयीं। आज इस लेख में कुछ वीरांगनाओं के साहसिक कार्यों को संक्षिप्त रूप में दर्शाया गया है।

पहली महिला शहीद भोगेश्वरी फुकननी

भोगेश्वरी फुकननी असम की पहली महिला शहीद हैं। उनका जन्म 1885 को असम के नगांव जिले में हुआ था। स्वतंत्रता संग्राम के समय असम में सबसे ज्यादा रक्तपात नगांव जिले में ही हुआ था। बचपन से ही देशभक्त स्वभाव की भोगेश्वरी ने अपने पति और आठ बच्चों को छोड़कर स्वयं को आंदोलन में झोंक दिया। भोगेश्वरी के आंदोलन ने मुक्त विद्रोह का रूप धारण कर लिया था। 42′ के 25 अगस्त को उन्होंने अपने दल के साथ स्थानीय डाकघर, तहसील कार्यालय और रेलवे स्टेशन को ध्वस्त कर दिया। थोड़ी दूरी पर बेजेजीया नामक स्थान पर टंक रोड के ऊपर स्थित पुल को भी उखाड़ दिया। ब्रिटिश सेना के बाधा को भी परवाह किये बिना उन्होने अपना आंदोलन जारी रखा।

उसी वर्ष 28 अगस्त के दिन अपने दल का नेतृत्व करते हुए जब वे आगे बढ़ीं तो पुलिस की गोली से उनके सहकमी कलाई कोच, हेम, बरा शहीद हुए और अन्य छह लोग घायल हो गए। फिर जंगल बलहू नामक स्थान पर पुल को नष्ट करने के लिए वे जुलूस बनाकर आगे बढ़ी। इस बार पुलिस की गोली में फिर हेमराय पातर और गुर्णाथ बरतुलै शहीद हुए। पर भोगेश्वरी ने जो ठान लिया था, वह करके ही दम लिया।
वे एक पत्नी थीं, एक मां थी। घर संसार की जिम्मेदारी भी उन पर थी। अपने हाथ से कपड़े बुनकर घरवालों को पहनाती थी। पर इसके बीच भी उनके ह्रदय में देशप्रेम और आजादी की ज्वाला धधक रही थी। हर क्षण वे देश की आजादी के लिए जेल जाने को तैयार थी। एक बार वे जुलूस में निकलीं। गांववालों को सचेत करने और पुलिस के आने की खबर देने के लिए उनके सहयोगी तिलक डेका ने रण का घंटा बजाया तो पुलिस ने उन्हें गोली मार दी। फिर भी वे न डरी और आगे बढ़कर अपने ससुराल के गांव बढ़मपुर के पास पुलिस के हाथ से शांति सेना शिविर पर कब्जा कर लिया। इसके लिए पुलिस के बर्बर अत्याचार का भी उन्होंने सामना किया। इसी से पूरी जनता ने उग्ररूप धारण कर लिया। सब लोग तिरंगा लेकर आगे बढऩे लगे। भोगेश्वरी की सहेली रत्नमाला से पुलिस ने तिरंगा छीन लिया और वे जमीन पर गिर पड़ी। तिरंगे को पुलिस का कप्तान फिनिश शाहब अपमान कर फेकने ही वाला था कि भोगेश्वरी गरज उठीं। वे आगे बढ़ी तो पुलिस ने उन्हें रोका। भोगेश्वरी ने तिरंगे के डंडे से ही कप्तान के मुंह में आघात कर दिया और उसने भोगेश्वरी के माथे पर कई गोलियां दाग दी और उनके माथे के छिथड़े उड़ गए और वे शहीद हो गयीं।

कनकलता बऊआ

वर्ष 1942 के आंदोलन में असमिया रमणी कनकलता का येागदान भी अविस्मरणीय हैं। तेजपुर के शहपुर में वे जन्मी थी। 42 के आंदोलन के समय उन्होंने मृत्यु वाहिनी में योगदान किया और तब वे केवल सत्रह वर्ष की थी। और विवाह के लिए कुछ ही महीने रह गये थे। पूर्व निर्धारित सिद्धा्ंत के अनुसार दरंग जिले की कांग्रेस कमेटी ने 42 के 20 सितंबर के दिन जिले के सभी पुलिस चौकियों में तिरंगा फहराने का काम हाथ में लिया। हर थाने की तरफ लोग तिरंगे के साथ जुलूस बनाकर निकले। गहपुर थाने के जुलूस का नेतृत्व पुष्पलता दास के हाथों में था। पर देशभक्त कनकलता ने स्वंय आगे आकर उसका नेतृत्व अपने कंधों पर लिया। मृत्यु वाहिनी के सदस्यों को यह आदेश दिया जा चुका था कि तिरंगे को सीधा रखना है, किसी भी हाल में पीछे नहीं मुडऩा है, बाधाओं को पार कर आगे चलते रहना है और पुलिस की गोली से अगर तिरंगा पकडऩेवाला गिर जाय तो एक के बाद दूसरे को तिरंगे की जिम्मेदारी संभालनी है।

शांतिवाहिनी के चार हजार और अपनी मृत्यु वाहिनी के चार हजार कुल आठ हजार लोगों के जुलूस को नेतृत्व कर कनकलता आगे बढ़ी। पहले शांतिपुर्ण रूप से तिरंगा फहराने के लिए उन्होंने थाने के आफिसर से अनुमति मांगी। पर आफिसर ने आंखे लाल कर उन्हें आगे बढऩे से रोकने की कोशिश की। कनकलता यह कहते हुए कि भैया आप अपना काम कीजिए और मैं अपना काम करती हूं, आगे बढ़ी। तभी अधिकारी ने उन्हें कई गोलियों से छलनी कर दी। वे नीचे गिर गयीं और साथी मुकुंद काकती ने तब तिरंगा संभाला। कुछ ही क्षण बाद कनकलता का प्राण पखेरू उड़ गया और वे शहीद हो गयीं।

द्वारिकी दासी बऊआ

द्वारिकी बऊआ 1921 से ही स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय थी। उनके पति आनंदराम बऊआ भी स्वतंत्रता सेनानी थे। इसीलिए आंदोलन में भाग लेना उनके लिए और आसान हो गया था। वे बचपन से ही साहसी और देशप्रेमी थी। देश की स्वाधीनता के सपने में वे आतुर रहती थी। एक लड़की होकर घर से बाहर निकलना आसान न था। पर विवाह के बाद जब पति से सहयोग मिला तो खूलकर आंदोलन में कूद पड़ी।

सन 1921 में शराब, भांग आदि के विरोध में असम में प्रचार अभियान चरम पर था। इसी अभियान में द्वारिकीजी ने अपने गोलाघाट वासियों को जगाने का काम किया। लागेां को स्वंतत्रता संग्राम में भाग लेने के लिये उत्साहित किया। 1932 में वे गर्भावस्था में थी और तब भी बढ़—चढ़ कर आंदोलन में भाग लेना उन्होंने नहीं छोड़ा था। अपने गांव की महिलाओं का नेतृत्व कर वे आगे बढ़ रही थी, तभी पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। 6 महीने तक स़श्रम कारावास हुआ। गर्भ से होने के कारण उनकी सेहत बिगडऩे लगी। फिर भी जेल से आंदोलन को दिशा निर्देश करती रहीं। उसी बीच जेल के अस्वास्थ्यकर परिवेश के चलते डिसेंट्री हो गयी। पर जेल अधिकारियों को इसकी परवाह न थी। उन्हें अपने साथियों के द्वारा सशर्त मुक्ति के लिए सरकार से आवेदन करने की सलाह दी गयी पर अपने परिवार और कोख की संतान से भी उन्होनें अपने कर्तव्य को अधिक महत्व दिया। तब उनके पति और बड़ा बेटा भी दूसरे जेल में बंद थे। उसके लिए द्वारिकी जी के मन में कोई दु:ख नहीं था। 1932 के 25 अप्रैल के दिन उन्हें जेल के चिकित्सालय तक ले जाया गया। 26 अप्रैल के दिन गर्भस्राव के चलते द्वारिकी जी ने अंतिम सांस ली और देश के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी।

शहीद मालती

असम के चाय बगीचों में काम करने वाले लोगों के जीवन अंग्रेजों के जमाने में हमेशा पीड़ा, शोषण, कुपोषण, अशिक्षा, दरिद्रता आदि से भरा हुआ था। हांलाकि अभी स्थिति बदली है, पर तब चाय बगीचों के अंग्रेज मालिक श्रमिकों के कठोर परिश्रम के बदले में न्यूनतम धन देते थे और उन्हें लूटकर, शोषण कर मालिकपक्ष और अमीर बनता था। ऐसे ही परिवेश में मालती का भी जन्म हुआ था। पुरूष और महिला श्रमिक दोनों ही दिनभर के कठोर परिश्रम के बाद स्थानीय शराब पीकर धुत्त रहते थे और मालिकपक्ष भी यही चाहता था ताकि उनके समाज में कोई जागरूकता सृष्टि न हो। जाहिर सी बात है श्रमिक मालती को भी शराब की लत थी। पर मालिकपक्ष के शोषण के विरूद्ध उनके दिल में आग जल रही थी। एक मजदूर लड़की के दिल के विद्रोह की बात सुननेवाला कोई नहीं था।

असहयोग आंदोलन के समय महात्मा गांधी तेजपुर आए और आंदोलन में महिलाओं के भी योगदान की बात सुनकर वे रोमांचित हो उठीं। उस समय स्वतंत्रता सेनानी यहां वहां छूप छुपकर अपना कार्य कर रहे थे। एक दिन चाय बगीचे में भी वे छुपने आये तो मालती ने दिल की बात उनलोगों से कहा। उन लोगों से सकारात्मक उत्तर मिलते ही वे शराब छोड़कर शराब निवारण अभियान की नेत्री गयी। असहयोग आंदोलन से लेागों को जुडऩे के लिए लोगों में जागरूगता लाकर अंग्रेज के विरूद्ध भड़काने लगी। असहयोग और शराब निवारण आंदोलन को नाकामयाब करने के लिए अंग्रेज सिपाही मालती और उनके साथियों पर टूट पड़े और लाठियों की आघात से मालती शहीद हो गयी।

किरणबाला बरा

किरणबाला बरा एक साहसी महिला थी। आंदोलन, जनसभा आदि में वे बढ़ चढ़कर भाग लेती थी। उस समय स्त्री शिक्षा की सुविधा बहुत कम होने के कारण वे शिक्षा तो नहीं ले पायीं,पर उनके व्यक्तित्व से सभी लोग मुग्ध थे। महिला समाज का उन्होंनें नेतृत्व किया। उन्होंने महिलाओं के साथ मिलकर खादी कपड़ों के उत्पादन पर जोर दिया और वह कपड़ा कांग्रेस कामेटी को दान कर देती थी। गुणेश्वरी देवी, मोहिनी गोहांई, धर्मेश्वरी गगै आदि महिलाएं उनकी साथी थी। इन सबसे मिलकर किरणबालाजी ने ब्रह्मपुत्र रैली में घूम-घूमकर महिला संगठन का काम करती थी। स्वतंत्रता के लिए जो भी सभा समिती जुलूस पिकेटिंग आदि अनुष्ठान होना होता था, वे उनका प्रचार व प्रसार करती थी और स्वयं भी भाग लेती थी।
1919 के 22 मई और 24 मई के दिन महिलाओं की जागृति के लिए आयोजित विशाल सभा में उन्होंने उदान्त और ओजस्वी भाषण दिया था जिससे व्यापक रूप से महिला समाज प्रभावित हुआ था। 1931 के 5 जुलाई मे एक शराब निवारण सभा में भाषण देते हुए विदेशी वस्त्र बहिष्कार पर भी भाषण रखा। लोग इतने उत्तेजित हो गए कि सभा के बीच ही लोगों ने विदेशी कपड़ा जलाना आरंभ कर दिया और महिलाओं ने गहने फेंक दिये। सभा स्थल के पास ही एक नाम धर था। उन्होंने सभी को वहां लेजाकर भगवान का नाम लेकर शपथ दिलाया कि वे देश के लिए काम करेंगे। किरणबाला का पूरा जीवन गरीबी में बीता। हमेशा खाने पहनने के लिए चिंता करनी पड़ती थी, पर वे कभी कर्तव्य से विचलित नहीं हुई। 1932 के 9 सिंतबर के दिन आंदोलन के दौरान उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और स्वाधीनता प्राप्ति तक वही रहीं।

बुद्धेश्वरी सैकिया

बुद्धेश्वरी सैकिया एक अग्रणी स्वतंत्रता सेनानी थी। बचपन से ही वे निर्भीक थी और सत्य तथा आत्मरक्षा के लिए वे हमेशा लड़ती आयी थी। जैसे—जैसे वे बड़ी होती गयी विद्रोह का भाव भी गति पकडऩे लगा था। शिक्षिका के रूप में उन्होंने जीवन कार्य का प्रारंभ किया। 1942 के आंदोलन के लहर से वे भी प्रभावित हुई थीं। 7 अक्टूबर के दिन उनका गृह शहर लखीमपुर में एक विराट जुलूस निकला था। जो लोग उस जुलूस में सबसे आगे थे उनमें से एक बुद्धेश्वरी भी थीं।

स्वाधीनता संग्राम में एकाग्रचित होकर अपना योगदान देने के लिए ही उन्होंने अपनी शिक्षिका की नौकरी भी छ़ोड़ दी। पहले तो वे स्वयंसेविका थीं। पर बाद में मृत्युवाहिनी की सदस्यता लीं। वे सरकार की नजर में आ गयी थीं। इसलिए घर—बार छोड़कर छिप छिपकर रहना पड़ता था। इससे घर के लोग भी नाराज हो गए थे। उन्होंने गांव—गांव जाकर महिलाओं को संगठित किया और उनमें विद्रोह के भाव को जाग्रत किया। महिला संग्रामियों के प्रशिक्षण और और संगठन में उन्होंने जोर दिया। स्वदेशी वस्त्र उत्पादन के लिए जगह—जगह पर ”बुनकर संघ”की स्थापना की। अशिक्षित महिलाओं को शिक्षादान का कार्य भी उन्होंने किया। इन सब कार्यों के लिए वे गांव—गांव जाकर लोगों के घर रात गुजारती थीं। बहुत जल्द वे महिला समाज की नेत्री बन गयी थी।

1942 के 9 अक्टूबर में रेल पलटने की घटना में दोषी कहकर जब कुशल कुंवर को फांसी देने की घोषणा की गयी तो इसके विरोध में 1943 के 15 जून को उनके नेतृत्व में ही लखीमपुर में बड़ा जुलूस निकाला गया। सभा का भी आयोजन किया गया। पुलिस की बाधा के बाद भी बुद्धेश्वरी जी ने वहां उदात्त भाषण दिया और फिर वे गिरफ्तार कर ली गयीं।

गुणेश्वरी देवी

गुणेश्वरी देवी भी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की एक सक्रिय सेनानी थी। पर वे इतिहास में कही गुम हो गयीं। वे नगांव जिले में जन्मी थी। पढ़ाई की सुविधा तो उन्हें नहीं मिली पर वे घरेलू कामों में पारंगत थी। वे घर में बैठी नहीं रहीं और स्वाधीनता आंदोलन में कूद पड़ी।

1930 में राउंड टेबल कॉन्फे्रंरेंस के विरोध में देशभर में प्रतिवाद हुआ था, व असम में भी हुआ। नगांव शहर में दो तरफ से दो जुलूस निकला। उनमें से एक जुलूस का नेतृत्व गुणेश्वरी देवी ने किया। दूसरे जुलूस के नेतृत्व में कणपाई दास नामक जो महिला थीं उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया तो गुणेश्वरी देवी को ही दोनों जुलूसों का नेतृत्व करना पड़ा। जुलूस को पुलिस के विरोध का सामना करना पड़ा। गुणेश्वरी देवी ने पुलिस की लाठी को ही छीन लिया। पुलिस ने उन पर अत्याचार किया।

इस अत्यचार के विरोध में फिर हड़ताल की घोषणा की गयी। नगांव शहर में पिकेटिंग गुणेश्वरी देवी के नेतृत्व में हुई थी। यहीं पर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। जुर्माना भी तय की गयी। पर उन्होंने देने से इंकार कर दिया तो सजा की अवधि बढ़ायी गयी। उन्हें द्धितीय श्रेणी के कारागार में रखकर अत्याचार किया गया पर वे टूटी नहीं।

कुछ दिन बाद जेल से रिहा होकर वे और जोरों—शोरों से आंदोलन में कूद पड़ी। विदेशी सामग्री का विरोध और महिलाओं के बीच आंदोलन के प्रति जागरूकता सृष्टि करने में उनका अवदान अविस्मरणीय रहा। गांव—गांव जाकर वे स्वयंसेवकों को भर्ती करवाती थीं। नशीले पदार्थों के बहिष्कार में भी उनकी बहुत बड़ी भूमिका रही। सभाओं में उदात्त भाषण देने की जुर्म में वे कई बार जेल गयीं। इसी तरह उन्होंने देश की आजादी की लड़ाई में अपना सहयोग दिया।

उपरोक्त नामों के अलावा और भी अनगिनत नाम है, जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया था। ऐसी वीरांगनाओं ने अपने व्यक्तिगत सुख—दु:ख को किनारा करके समाज के बारे में सोचा, जीवनभर दु:ख सहा पर कभी हार नहीं मानी। इन लोगों के उदात्त सोच और महानता का ही परिणाम है कि आज हम स्वाधीन भारत में जी पा रहे हैं।

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