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आज का चिंतन

आज का चिंतन-31/08/2013

हिन्दुस्तान में
यही सबसे बड़ी बुराई है

– डॉ. दीपक आचार्य
9413306077

बस-रेल, चौराहों-सड़कों से लेकर गप्पस्थलों तक सभी जगह आजकल ऐसे लोगों की खूब बहुतायत रहती है जो बात-बात में कहने के आदी हो गए हैं कि हिन्दुस्तान में यही सबसे बड़ी बुराई है। और अभिव्यक्ति भी ऐसी मुखर होकर करेंगे कि जैसे इन्हें हिन्दुस्तान के बारे में मूल्यांकन का कोई आईएसओ प्रमाण पत्र हासिल हो।अपने देश में जो कुछ होता रहा है, हो रहा है और होने वाला है, उसके लिए हम ही जिम्मेदार हैं। इसके लिए न किसी को दोष दिया जाना चाहिए, न दिया जा सकता है। जो लोग किसी अनमनी बात के लिए हिन्दुस्तान को दोषी ठहराते हैं वे खुद को भी गाली बक रहे हैं और अपने उन पूर्वजों को भी, जिन्होंने यह उन्नत देश सौंपा है।जो लोग खुद अकर्मण्य, भ्रष्ट, व्यभिचारी, नालायक, बेईमान, चोर-उच€के और उदासीन हैं उन्हें दूसरों पर किसी भी प्रकार की अंगुली उठाने का कोई अधिकार नहीं है। आमतौर पर हमारे यहाँ जाने किस दुर्भाग्य या संकर बीजों के प्रभाव से लोगों की एक किस्म ऐसी पैदा हो चुकी है जो खुद कुछ करना नहीं चाहती, सिवाय औरों को कोसने तथा दोष देने के।

जब हम खुद अकर्मण्यता ओढ़ कर सो जाते हैं तब हमें लगता है कि यह सारा जमाना ही है जिसे हमारे लिए कुछ करने के वास्ते पैदा किया हुआ है। उपदेशकों और सलाह देने वालों की भारी भीड़ हर जगह है जो उन नाकारा साण्डों की तरह व्यवहार करती है जिनका सायास बधियाकरण कर दिया गया है। ये लोग उपदेश देंगे, सलाह देंगे और नहीं मानने पर कोसेंगे। खुद को कुछ करने को कहो, तो पीठ दिखाकर अपना रूख कहीं ओर कर लेंगे।आमतौर पर माना यह जाता है कि शिकायत वही करता है जो कमजोर होता है। दमदार लोग तो ढेर सारी चुनौतियों के बीच भी रास्ता निकाल ही लेते हैं। कुछ लोग ताजिन्दगी शिकायत करते रहने को अपना स्वभाव मान बैठते हैं। फिर ऐसे लोगों को अपने घर-परिवार से लेकर समुदाय और क्षेत्र भर में शिकायतें परोसना और आनंद लेना ही जीवन का लक्ष्य हो जाता है।

ऐसे शिकायती लोग कालान्तर में खुराफाती किस्म में तŽदील हो जाते हैं और ऐसा आक्रामक व्यवहार करने लग जाते हैं कि यदि इन्हें सिंग, खुर और नाखून, पैने दाँत और जहर मिल जाए तो पूरी दुनिया को तबाह कर दें। इन लोगों को यह भ्रम हमेशा बना रहता है कि वे समाज और देश के भाग्यविधाता हैं और वे जैसा सोचते हैं उसी के अनुसार समाज और देश को चलना और ढलना चाहिए।ऐसे महामूर्ख और खुराफाती शिकायती किस्म के आदमी और जगहों के साथ ही अपने पावन कहे जाने वाले इलाकों में भी खूब हैं। कभी ये खुले साण्डों की तरह अकेले मुँह मारते रहते है, कभी शूकरों के परिवार की तरह समूहों में चहलकदमी करते हुए जमाने भर को सूंघने और नाप लेने की जुगत में होते हैं। अपने आस-पास सभी प्रकार के जानवर भी हैं, और आदमी भी।इन सबके बावजूद हमारा कर्त्तव्य यह बनता है कि देश को दोष देने की बजाय अपने भीतर के दोष समाप्त करें, देश और समाज का सुनहरा स्वरूप अपने आप सामने आ जाएगा। जो लोग खुद कुछ नहीं कर सकते हैं, उन लोगों की बातों का कोई वजन या वजूद नहीं होता। ये ऐसे ही है जैसे रास्ते चलते हुए कुत्ते भौंकते हैं, गधे रेंकते हैं और पागल अपनी भाषा में चिल्लाते रहते हैं।

हिन्दुस्तान को बनाने का काम हमारा है। दूसरों की तरफ न देखकर हम अपने आपको सुधारने का प्रयास आरंभ कर दें तो आने वाले समय में हमारी पीढ़ियाँ कभी यह नहीं कह पाएंगी कि अपने हिन्दुस्तान में यही सबसे बड़ी बुराई है।ऐसी फालतू की बातें वे लोग करते हैं जिन्होंने हिन्दुस्तान को न जाना है, न जानने की कोशिश की है। देश ने €या दिया, इसकी बजाय यह सोचें कि देश को हमने €या दिया। इस एकमात्र प्रश्न का उत्तर हमारी सारी शंकाओं और भ्रमों का समाधान कर देने के लिए काफी है।

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