Categories
धर्म-अध्यात्म

कालसर्प योग एवं मंगली दोष

शास्त्रों ने जो भी नीति नियामक हमारे सामने रखे हैं उनमें से एक है *’देयं परं किं ह्यभयं जनस्य. . . . ‘* जिस पर हमारे ज्योतिषियों ने साफ़ अनदेखी कर रखी है। उल्टे भय विस्तारण के अनेकानेक करतब ढूंढे जाते हैं। मङ्गली दोष, कालसर्प दोष, राहु काल इत्यादि जैसे कई नुस्खे हैं जिनका भय विस्तारण के माध्यम से अपनी पण्डिताई को प्रतिष्ठापित करने के सिवाय और कोई दूसरा उद्देश्य नहीं है।

आज इस ज्योतिषज्ञान सन्दर्भित आलेख के माध्यम से हम कालसर्प दोष और मङ्गली दोष के बारे में जानने समझने का प्रयास करेंगे।

*>> कालसर्प दोष -*

सर्वप्रथम मैं आपको डॉक्टर बी. वी. रमन जो फलित ज्योतिष के जगत में विशेष स्थान रखते थे, का स्वयं का कथन स्पष्ट कर दूं।
उनका यह कथन *’थ्री हण्ड्रेड इम्पॉर्टेण्ट काम्बिनेशंस’* नामक पुस्तक के पृष्ठ 326 पर प्रकाशित है। लिखते हैं, “Strictly speaking KSY (Kaal Sarp Yoga) does not find the place in the classical astrological literature. How this yoga gained currency and gathered a sinister meaning *is not clear.”*

मैंने स्वयं ने भी ज्योतिष के आधार ग्रन्थों में इस योग के बारे में कुछ नहीं पढ़ा है। अस्तु यह लेख पूरी तौर पर फलित शास्त्र के आधुनिक ब्रह्म ज्ञानियों का कर्तव है। जो है और जैसा है, उसको जान लेना आप सबके लिए बहुत जरूरी है ताकि आप स्वयं गुमराह ना हों और आपके होते हुए, आपका निकटवर्ती समाज भी गुमराह ना हो‌।

कहा गया है कि यदि कुण्डली (ग्रह चक्र) में सूर्य से शनि तक के सभी ग्रह राहु और केतु के मध्य में हों और कोई भी घर खाली न हों तो (उस काल को जिस काल में ऐसी ग्रह स्थिति बन रही है) काल सर्प नामका दोष होता है। यदि उस समय में किसी व्यक्ति का जन्म होता है तो यह दोष उस समय में जन्मे हुये अर्थात *’जातक’* को मिलता है। मूल रूप से कालसर्प दोष की यही परिभाषा है।

अब क्योंकि यह दोष बहुत कम बनता है तो भयदोहन के लिए और इसकी उपयोगिता का क्षेत्रफल बढ़ाने के निमित्त इसकी परिभाषा में से *”कोई भी घर खाली न हो” वाली शर्त हटा दी गयी और ‘सभी ग्रह राहु और केतु या केतु और राहु के मध्य स्तिथ हों’* ऐसा भी जोड़ दिया गया।

पुनः कालान्तर में कालसर्प दोष के कई प्रकार भी बना दिये गए जो कि इस बात पर निर्भर करते हैं कि ग्रहों का क्रम क्या है, कौन -कौन से ग्रह किस- किस राशि मे हैं। 12 प्रकार तो राहु की राशि के आधार पर ही बना दिये गए। भिन्न भिन्न प्रकार के सर्पदोषों के भिन्न भिन्न फलितार्थ बना लिए गए।

वस्तुतः प्रत्येक वर्ष औसतन 50 दिन ऐसा योग बन सकता है। इस प्रकार प्रत्येक वर्ष लगभग 14% व्यक्तियों की कुण्डली में किसी न किसी प्रकार का कालसर्प दोष मिलेगा।

आप सब राहु व केतु के विषय में इतना तो जानते ही होंगे कि राहु व केतु कोई पिण्ड नहीं है अपितु ज्यामितीय बिन्दु मात्र है। इनका कोई पञ्चभौतिकीय अस्तित्व नहीं है। इसीलिए इनमें रङ्ग इत्यादि की लक्षणा या गुण धर्मिता होने का प्रश्न ही नहीं उठता।

ज्योतिषीय भाषा में कहें तो ये विमण्डल (चन्द्रमा का परिक्रमा पथ) और क्रान्तिवृत्त (सूर्य का परिक्रमा पथ) के कटान बिन्दु मात्र हैं। इसीलिए ये सदैव एक दूसरे से 180° की दूरी पर होते हैं। इसी से कुण्डली में इन्हें एक दूसरे से सातवें घर में ही दिखाया जाता है। ये ग्रहण गणना के गणितीय बिन्दु होने से अशुभ याने फलित की भाषा में कहें तो अकारक माने गये हैं। राहु और केतु को इसीलिए अशुभ की श्रेणी में रखा जाता क्योंकि सूर्य या चन्द्रमा के राहु या केतु बिन्दु की निर्धारित निकटता पर होने से ही सूर्य या चन्द्र ग्रहण होता है। इसमें चन्द्र और सूर्य ग्रहण को एक अशुभत्व के रूप में राहु और केतु के परिणामों से जोड़कर देखा गया है।

इस प्रकार से कालसर्प दोष केवल और केवल फलित ज्योतिष का *’भय विस्तारण से धन कमाओ’* का हेतु मात्र है।

फरवरी 1980 की एस्ट्रोलॉजिकल मैगजीन के पृष्ठ 184 पर कालसर्प योग का विस्तृत विवेचन और विश्लेषण प्रस्तुत करते हुए यह निष्कर्ष लिया गया था कि (इस फलित शास्त्रीय) काल सर्प योग के विचार में निम्नलिखित बातों पर ध्यान जाना आवश्यक है –

1- राहु और केतु के साथ कोई भी ग्रह नहीं होना चाहिए।

2- राहु या केतु लग्न में नहीं होना चाहिए।

3- ग्रह श्रङ्खला की गिनती लग्न से सीधे राशि चक्र के क्रम में होनी चाहिए। केतु किन्तु हमेशा अन्त में होना चाहिए।

4- कोई भी शुभ ग्रह या अशुभ भाव का अधिपति राहु या केतु को देख रहा हो तो कालसर्प योग प्रभावी नहीं होता।

5- राहु पर शनि की दृष्टि कालसर्प योग को निरस्त करती है।

बृहत संहिता के राहुचार अध्याय में लिखा है –

*अथ तु भुजगेन्द्र रूपः पुच्छेन मुखेन वा स गृह्णाति। मुख पुच्छान्तर सन्स्थम स्थगयति कस्मान्न भगणार्ध।।*

अर्थाय यदि राहु सर्पाकार होता तो अपने मुख या पुच्छ से छः राशियों के अन्तर पर स्तिथ सूर्य या चन्द्रमा को अपने मुख या पुच्छ में लेते समय बीच की सभी छः राशियों और इनमें स्तिथ सभी ग्रहों को भी अन्धेरे से ढक लेता। अर्थात राहु न तो सर्पाकार है और न ही छाया ग्रह। आशय यह है कि यदि राहु सर्पाकार होता या छाया ग्रह होता तो ग्रहण (चन्द्र ग्रहण) के समय जब सूर्य व चन्द्रमा 180° की दूरी पर होते है और चन्द्रमा छाया से ग्रस्त होता है तो उसी समय राहु के बीच की सभी राशियों और उनमें स्तिथ ग्रहों को भी अन्धेरे से ढक देना चाहिए था। किन्तु ऐसा नहीं होता है। इसीलिए स्पष्ट है कि राहु न तो सर्पाकार है और न ही छायाग्रह है। इस प्रकार देखा जाए तो कालसर्प दोष का फलित ज्योतिष के ही प्रामाणिक ग्रन्थों में उल्लेख नहीं है। बल्कि राहु/केतु के सर्पाकार होने या छायाग्रह होने का निराकरण ही है। खगोल विज्ञान से भी कालसर्प दोष का कोई आधार सिद्ध नहीं होता।

*>>>मङ्गली दोष -*

उपरोक्त, स्वर्गीय डॉ० बी. वी.रमन की ही पुस्तक मुहूर्त और इलेक्शनल एस्ट्रोलॉजी पृष्ठ 105 में भी मङ्गली योग का उल्लेख *”The so-called kuja dosha”* कहते हुए किया है।

*धने ब्यये च पाताले जामित्रे चासष्टमे कुजा; स्त्रीणां भर्तुविनाशंच भर्तुणां स्त्री विनाशनम्।*

उत्तर भारतीय शास्त्रियों के द्वारा *’धने’ (लग्न से दूसरा स्थान) के स्थान पर ‘लग्ने’ (कुण्डली का पहला स्थान)* पढ़ा जाता है।

उक्त में कहा गया है कि यदि मङ्गल ग्रह धन (द्वितीय/उ.भा.-लग्न याने प्रथम), चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या द्वादश भाव में हो तो मङ्गली दोष होता है। अर्थात् मङ्गल की उपरोक्त में से कोई स्थिति यदि कन्या की कुण्डली में हो तो वह ‘पति के लिए’ और यदि लड़के की कुण्डली में ऐसी स्थिति हो तो वह स्थिति ‘पत्नी के लिए’ अशुभ या अकारक होती है। कुल मिला कर इसे दाम्पत्य जीवन के लिए अशुभ माना गया है।

मङ्गली दोष में भी भयदोहन को बढ़ाने के उद्देश्य से कुछ परिवर्तन किया गया है। अब यह जोड़ दिया गया है कि मङ्गल को लग्न कुण्डली के साथ-साथ चन्द्र कुण्डली से भी देखा जाना चाहिए। अर्थात यदि मङ्गल चन्द्रमा से 1/2, 4, 7, 8 व 12वें घर मे हो तो भी मङ्गली दोष होगा। पुनः मङ्गली दोष के समय जिस राशि में मङ्गल है उसके अनुसार भी फल भिन्न भिन्न होता है। मङ्गली दोष के प्रतिकार के लिए भी कई दोषभङ्ग योग बनाये गए हैं। क्योंकि हर वो व्यक्ति जिसकी कुण्डली में मङ्गली दोष हो, दाम्पत्य जीवन से दुखी ही हो, ऐसा भी नहीं है। जो भी कुछ प्रत्यक्ष हो उसके लिए कोई न कोई कारण निरूपित किया जा सके उद्देश्य ऐसी व्यवस्था को बनाए रखना है।

अगर आप इस दोष की परिभाषा को जरा ध्यान से देखेंगे तो पाएंगे कि कुण्डली के कुल 12 घरों में से 5 में यदि मङ्गल हो तो यह दोष हो जाता है। इस प्रकार लगभग 42% व्यक्तियों की कुण्डली में यह दोष उपलब्ध होगा। अब यदि चन्द्र कुण्डली से भी देखा जाना है तो निश्चित ही प्रभावित व्यक्तियों की संख्या बढ़ जाएगी। दाम्पत्य जीवन में पति-पत्नी के बीच व्यवहार सभी लोगों के लिए बदलता रहता है। कभी अच्छा तो कभी थोड़ा मन मुटाव होता ही रहता है। इस सब के कारण मङ्गली दोष का दोहन अधिक किया जा सकता है और इसीलिए मङ्गली दोष को इतना अधिक उपलब्ध बनाया गया है।

फलित शास्त्रियों ने मङ्गली दोष के लिए भी कुछ निवारक तथ्य स्पष्ट किए हैं किन्तु आम जनता के संज्ञान में फलित पण्डित इन तथ्यों को जन संज्ञान में बिल्कुल भी नहीं आने देते। जैसे –

1- दूसरे घर में मङ्गल मिथुन या कन्या राशि में हो,

2- 12वें घर का मङ्गल वृषभ या तुला राशि का हो,

3- चौथे घर का मङ्गल मेष या वृश्चिक राशि का हो, सातवें घर का मङ्गल कर्क या मकर राशि का हो,

4- आठवें घर का मङ्गल धनु या मीन राशि का हो और

5- यही नहीं किसी भी स्थान पर यदि मङ्गल सिंह या कुम्भ राशि में हो तो मङ्गली दोष नहीं होता है।

वस्तुतः मङ्गल हमारे जीवन को इस प्रकार से प्रभावित कर ही नहीं सकता। मङ्गल के फलित शास्त्रीय प्रभाव खगोल विज्ञान से भी अप्रमाणित हैं।

फलित शास्त्र के सम्बन्ध में अन्य भी कई योग आदि प्रचलन में हैं। उन पर भी हमारा यही कहना है। फलित ज्योतिष (शास्त्र) के ग्रन्थ बृहज्जातक में लिखा है – *”पूर्वशास्त्रानुसारेण मया वज्रादयाः कृताः। चतुर्थ भवने सूर्यात् ज्ञसितौ भवमः कथम्।।”*

अर्थात् वराहमिहिर स्वयं कह रहे हैं कि पूर्व शास्त्रों के अनुसार मैने वज्रादि योग लिख तो दिए हैं पर वे असम्भव हैं क्योंकि सूर्य से चतुर्थ स्थान में बुध और शुक्र भला कैसे जा सकते हैं।

फलित ज्योतिष के योगों को फलित ज्योतिष के ही ग्रन्थों में असम्भव कह कर फलित ज्योतिष की सत्यता स्पष्ट कर दी गई है। नक्षत्र सूचियों ( तथाकथित ज्योतिषियों) के द्वारा अपने मन्तव्य की सिद्धि के लिए इन्हें छुपाया गया है। स्पष्ट है कि फलित ज्योतिष के परचम निराधार हैं।

अब रही बात फलित पण्डितों के द्वारा कालसर्प दोष या ‘ऊटपटाङ्ग कृत्यों के द्वारा’ मङ्गली दोष की शान्ति कर देने की बात तो हम इस विषय में अधिक न लिखते हुए शास्त्र वचन को उद्धृत कर देना मात्र पर्याप्त समझते हैं –

*ना भुक्तं कर्म क्षीयते कल्प कोटि शतैरपि। अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभ्।।*

– आचार्य दार्शनेय लोकेश।

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
hititbet giriş
hititbet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
hititbet giriş
hititbet güncel giriş
vdcasino giriş
vdcasino güncel giriş
vdcasino giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
hitit medya
Hititbet Giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
tuzla cilt bakım merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet
hititbet güncel adres
hititbet 2026
hititbet giriş
hititbet giriş
Tuzla Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
solobet giriş
hititbet giriş
kralbet
betnano
betnano
betnano
kralbet
kralbet
kralbet
setrabet
setrabet
kralbet
hititbet
hititbet
Tuzla Cilt Bakım
İstanbul Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet Giriş
Hititbet Giriş
Tuzla Cilt Bakım
Tuzla İpek Kirpik
Tuzla Lenf Drenaj
Kolaybet Giriş
Betgaranti Giriş
kralbet
kralbet
betnano
betnano
Hititbet Giriş
kralbet
betnano
kralbet
Hititbet App
hititbet giriş
hititbet
kralbet
kralbet
betnano
betnano
kralbet
kralbet
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betorder giriş
betgaranti giriş
Hititbet Giriş
kralbet
kralbet
betnano
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
atlasbet
atlasbet
betnano
betnano
kralbet
hititbet
hititbet
betgaranti giriş
betpark giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
betpark giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
xslot giriş
Hititbet
Hititbet Güncel Giriş
Hititbet Yeni Giriş
Hititbet Resmi Gİriş
xslot giriş
betgaranti giriş
hitbet giriş
hitbet giriş