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इतिहास का भ्रम

वास्तव में यह बहुत ही दुखद तथ्य है कि कांग्रेस के लोग हमारे क्रान्तिकारियों को अपने भाषणों में गाली-गलौज तक किया करते थे । इसके उपरान्त भी वर्तमान प्रचलित इतिहास में कुछ इस प्रकार का भ्रम पैदा करने का प्रयास किया गया है कि जैसे कांग्रेस के
लोग क्रान्तिकारियों के प्रति वैमनस्य का नहीं बल्कि प्रेम प्यार का भाव रखते थे । जबकि इस पत्र की भाषा से स्पष्ट है कि कांग्रेस का आचरण अपने क्रान्तिकारियों के प्रति बहुत ही निन्दनीय था। यही कारण था कि सरदार भगतसिंह और उनके साथियों को गांधीजी के उपरोक्त लेख पर बहुत अधिक आपत्ति हुई थी । इस आपत्ति को प्रकट करते हुए इस पत्र में आगे लिखा गया था –

” इस विषय में गाँधी जी ने जो विजय प्राप्त की वह एक प्रकार की हार ही के बराबर थी और अब वे ‘दि कल्ट ऑफ दि बम’ लेख द्वारा क्रान्तिकारियों पर दूसरा हमला कर बैठे हैं। …… इस लेख में उन्होंने तीन बातों का उल्लेख किया है। उनका विश्वास, उनके विचार और उनका मत। हम उनके विश्वास के सम्बन्ध में विश्लेषण नहीं करेंगे, क्योंकि विश्वास में तर्क के लिए स्थान नहीं है। गाँधी जी जिसे हिंसा कहते हैं और जिसके विरुद्ध उन्होंने जो तर्कसंगत विचार प्रकट किए हैं, हम उनका सिलसिलेवार विश्लेषण करें।
गाँधी जी सोचते हैं कि उनकी यह धारणा सही है कि अधिकतर भारतीय जनता को हिंसा की भावना छू तक नहीं गई है और अहिंसा उनका राजनीतिक शस्त्र बन गया है। हाल ही में उन्होंने देश का जो भ्रमण किया है , उस अनुभव के आधार पर उनकी यह धारणा बनी है, परन्तु उन्हें अपनी इस यात्रा के इस अनुभव से इस भ्रम में नहीं पड़ना चाहिए। यह बात सही है कि (कांग्रेस) नेता अपने दौरे वहीं तक सीमित रखता है जहाँ तक डाकगाड़ी उसे आराम से पहुँचा सकती है, जबकि गाँधीजी ने अपनी यात्रा का दायरा वहाँ तक बढ़ा दिया है जहाँ तक मोटरकार द्वारा वे जा सकें। इस यात्रा में वे धनी व्यक्तियों के ही निवास स्थानों पर रुके। इस यात्रा का अधिकतर समय उनके भक्तों द्वारा आयोजित गोष्ठियों में की गयी उनकी प्रशंसा, सभाओं में यदा-कदा अशिक्षित जनता को दिए जाने वाले दर्शनों में बीता, जिसके विषय में उनका दावा है कि वे उन्हें अच्छी तरह समझते हैं, परंतु यही बात इस दलील के विरुद्ध है कि वे आम जनता की विचारधारा को जानते हैं।”

गांधीजी ‘जननायक’ नहीं थे

गांधीजी के विषय में यह एक कटु सत्य है कि वह बाहर से अर्थात अफ्रीका से आए और देश की राजनीति में उन्हें अंग्रेजों ने जानबूझकर स्थापित किया । गांधीजी राजनीति के लायक नहीं थे , परन्तु इसके उपरान्त भी अंग्रेजों ने उन्हें अपने सहयोग व उचित समय पर समर्थन के लिए भारत की राजनीति में अपना एक ‘मोहरा’ बनाकर प्रस्तुत किया । गांधीजी इस पर सहमत हो गए । गांधीजी के बारे में यह भी सच है कि वह कभी की जनता के बीच जाकर ‘जननायक’ के रूप में स्थापित नहीं हो पाए ।
कहने का अभिप्राय है कि उन्होंने देश की जनता की परेशानियों , दुख – दर्द ,कष्ट आदि को समझने का कभी प्रयास नहीं किया ।यद्यपि प्रचलित इतिहास में उन्हें कुछ इस प्रकार दिखाया जाता है कि जैसे वह एक ‘जननायक’ थे और देश के जनसाधारण की समस्याओं से पूर्णतया परिचित थे । हम भी किसी सीमा तक यह मान लेते हैं कि उन्होंने कांग्रेस के आन्दोलनों को जनान्दोलन के रूप में स्थापित करने में सफलता प्राप्त की थी, परन्तु इस सबके उपरान्त भी यह अर्धसत्य ही है । पूर्ण सत्य यही है कि वह कांग्रेस के नेता नहीं थे और देश के नायक होकर भी जननायक नहीं थे।
” कोई व्यक्ति जनसाधारण की विचारधारा को केवल मंचों से दर्शन और उपदेश देकर नहीं समझ सकता। वह तो केवल इतना ही दावा कर सकता है कि उसने विभिन्न विषयों पर अपने विचार जनता के सामने रखे। क्या गाँधी जी ने इन वर्षों में आम जनता के सामाजिक जीवन में कभी प्रवेश करने का प्रयत्न किया ? क्या कभी उन्होंने किसी सन्ध्या को गाँव की किसी चौपाल के अलाव के पास बैठकर किसी किसान के विचार जानने का प्रयत्न किया ? क्या किसी कारखाने के मजदूर के साथ एक भी शाम गुजारकर उसके विचार समझने की कोशिश की है ? पर हमने यह किया है इसलिए हम दावा करते हैं कि हम आम जनता को जानते हैं। हम गाँधी जी को विश्वास दिलाते हैं कि साधारण भारतीय साधारण मानव के सामने ही अहिंसा तथा अपने शत्रु से प्रेम करने की आध्यात्मिक भावना को बहुत कम समझता है। – – – हम यह बात स्वयं के अनुभव के आधार पर कह रहे हैं। वह दिन दूर नहीं जब लोग क्रान्तिकारी विचारधारा को सक्रिय रूप देने के लिए हजारों की संख्या में जमा होंगे।”

गांधी एक भी शत्रु का हृदय परिवर्तन करने में सफल नहीं हुए

गांधीजी अहिंसा के माध्यम से अपने शत्रुओं और विरोधियों का हृदय परिवर्तन करने की बात अक्सर कहा करते थे । इस पर भी हमारे क्रान्तिकारियों का उनसे गहरा मतभेद था । अपने इस पत्र में सरदार भगत सिंह ने गांधी जी से स्पष्ट पूछा कि वह क्या कोई एक भी ऐसा उदाहरण बता सकते हैं कि जिससे उनके सत्य , अहिंसा और प्रेम के मानवीय विचारों से उनके किसी एक विरोधी का भी हृदय परिवर्तन हो गया हो ?
”गाँधी जी घोषणा करते हैं कि अहिंसा के सामर्थ्य तथा अपने आप को पीड़ा देने की प्रणाली से उन्हें यह आशा है कि वे एक दिन विदेशी शासकों का हृदय परिवर्तन कर अपनी विचारधारा का उन्हें अनुयायी बना लेंगे। अब उन्होंने अपने सामाजिक जीवन के इस चमत्कार के प्रेम संहिता के प्रचार के लिए अपने आप को समर्पित कर दिया है। वे अडिग विश्वास के साथ उसका प्रचार कर रहे हैं, जैसा कि उनके कुछ अनुयायियों ने भी किया है। परन्तु क्या वे बता सकते हैं कि भारत में कितने शत्रुओं का हृदय-परिवर्तन कर वे उन्हें भारत का मित्र बनाने मे समर्थ हुए हैं ? वे कितने ओडायरों, डायरों तथा रीडिंग और इरविन को भारत का मित्रा बना सके हैं ? यदि किसी को भी नहीं तो भारत उनकी विचारधारा से कैसे सहमत हो सकता है कि वे इग्लैंड को अहिंसा द्वारा समझा-बुझाकर इस बात को स्वीकार करने के लिए तैयार करा लेंगे कि वे भारत को स्वतन्त्रता दे दे ?
यदि वाइसराय की गाड़ी के नीचे बमों का ठीक से विस्फोट हुआ होता तो दो में से एक बात अवश्य हुई होती, या तो वाइसराय अत्यधिक घायल हो जाते या उनकी मृत्यु हो गयी होती। ऐसी स्थिति में वाइसराय तथा राजनीतिक दलों के नेताओं के बीच मन्त्रणा न हो पाती, यह प्रयत्न रुक जाता उससे राष्ट्र का भला ही होता। – – – यदि बमों का ठीक से विस्फोट हुआ होता तो भारत का एक शत्रु उचित सजा पा जाता। मेरठ तथा लाहौर-षड्यन्त्र और भुसावल काण्ड का मुकदमा चलानेवाले केवल भारत के शत्रुओं को ही मित्र प्रतीत हो सकते हैं। ‘साइमन कमीशन’ के सामूहिक विरोध से देश में जो एकजुटता स्थापित हो गई थी,गाँधी तथा नेहरू की राजनीतिक बुद्धिमत्ता के बाद ही इरविन उसे छिन्न-भिन्न करने में समर्थ हो सका। आज कांग्रेस में भी आपस में फूट पड़ गई है। हमारे इस दुर्भाग्य के लिए वाइसराय या उसके चाटुकारों के सिवा कौन जिम्मेदार हो सकता है ? इस पर भी हमारे देश में ऐसे लोग हैं जो उसे भारत का मित्र कहते हैं।”

कांग्रेस को अहिंसा की सनक छोड़नी होगी

“देश में ऐसे भी लोग होंगे जिन्हें कांग्रेस के प्रति श्रद्धा नहीं, इससे वे कुछ आशा भी नहीं करते। यदि गाँधी जी क्रान्तिकारियों को उस श्रेणी में गिनते हैं तो वे उनके साथ अन्याय करते हैं। वे इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि कांग्रेस ने जन जागृति का महत्वपूर्ण कार्य किया है। – – – जब तक कांग्रेस में सेन गुप्ता जैसे ‘अद्भुत’ प्रतिभाशाली व्यक्तियों का, जो वायसराय की ट्रेन उड़ाने में गुप्तचर विभाग का हाथ होने की बात करते हैं तथा अन्सारी जैसे लोग, जो राजनीति कम जानते और उचित तर्क की उपेक्षा कर बेतुकी और तर्कहीन दलील देकर यह कहते हैं कि किसी राष्ट्र ने बम से स्वतन्त्रता प्राप्त नहीं की – जब तक कांग्रेस के निर्णयों में इनके जैसे विचारों का प्राधान्य रहेगा,तब तक देश उससे बहुत कम आशा कर सकता है। क्रान्तिकारी तो उस दिन की प्रतीक्षा में हैं जब कांग्रेसी आन्दोलन से अहिंसा की यह सनक समाप्त हो जाएगी और वह क्रान्तिकारियों के कन्धे से कन्धा मिलाकर पूर्ण स्वतन्त्रता के सामूहिक लक्ष्य की ओर बढ़ेगी। इस वर्ष कांग्रेस ने इस सिद्धान्त को स्वीकार कर लिया है, जिसका प्रतिपादन क्रान्तिकारी पिछले 25 वर्षों से करते चले आ रहे हैं। हम आशा करें कि अगले वर्ष वह स्वतन्त्रता प्राप्ति के तरीकों का भी समर्थन करेगी।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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