‘कृषि बिल’ मदारी का खेल बनाते हमारे राजनीतिज्ञ

Modi

प्रभुनाथ शुक्ल

केंद्र सरकार की तरफ़ से कृषि सुधार पर लाया गया बिल सत्ता और विपक्ष की राजनीति में ‘मंदारी और सपेरे’ का खेल बन गया है। सरकार ने बीन बजाई और उसकी झोली से एक उम्दा ‘किसानहित’ बिल निकल गया। लेकिन यह खेल दूसरे सियासी मदारियों को नहीँ पच रहा है। कृषि सुधार के तीन विधेयकों पर सड़क से लेकर संसद तक की राजनीति गरमा गई है। एकबार किसान फ़िर सियासी मोहरा बन गया है। किसान, कितना मुनाफे और घाटे में होगा यह तो वक्त बताएगा लेकिन सत्ता और विपक्ष दोनों किसानों की चिंता में दुबले दिखते हैं। किसान हिमायती बनाने में संसद में जिस तरह माननीयों का दंगल देखने को मिला उसे अनैतिक राजनीति की पराकाष्ठा ही कहा जाएगा। उपसभापति के आसन के सामने आकर माननीयों ने बिल की प्रतियों को फाड़ माइक तक तोड़ डाली। इस अमर्यादित आचरण के लिए सांसदों को पूरे सत्र के लिए निलम्बित करना पड़ा। फ़िलहाल यह आचरण संसदीय मर्यादा के खिलाफ है हम किसी भी कीमत पर इसका समर्थन नहीँ करते हैं।

देश का किसान हमेशा राजनीति का़ मोहरा बना है उस पर केवल राजनीति हो रही है। लेकिन अभी किसानों का आंदोलन पंजाब, हरियाणा, मध्यप्रदेश के साथ पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक सीमित है। जबकि विपक्ष चाहता है कि इसकी आग पूरे देश में फैले। केंद्र सरकार बिल को लेकर इतनी उतावली क्यों है। बिल को पास कराने में उसने जल्दबाजी क्यों दिखाई। सरकार बिल पर मत विभाजन को क्यों तैयार नहीँ हुई। सरकार वास्तव में अगर किसान हितैषी है तो इतनी जल्दबाजी दिखाने की क्या ज़रूरत है। सरकार बिल लाने के पूर्व इस बिल को क्यों किसानों के बीच लेकर नहीँ गई। किसानों की राय लेना सरकार ने क्यों उचित नहीँ समझा। सरकार विपक्ष के आरोपों पर क्यों सफाई देती फ़िर रही है। अखबारों में इश्तहार देकर नफे नुकासान बता रही है। यहीं काम उसने पहले क्यों नहीँ किया। अगर विपक्ष मतविभाजन पर अड़ा था तो ध्वनिमत पर उसने भरोसा क्यों जताया। देश की 80 फीसदी मेहनतकश आबादी के भाग्य का फैसला जो बिल करने वाला है उसे ध्वनिमत से पास करना कहाँ का इंसाफ है। ध्वनिमत का प्रस्ताव विषम स्थितियों में होना चाहिए लेकिन अब यह उपाय सत्ता की कमजोरी बनता दिखता है।

केंद्र सरकार जिन तीन विधेयकों को ऐतिहासिक बता रही है उनमें एक ‘कृषक उपज व्‍यापार और वाणिज्‍य’ संवर्धन और सरलीकरण विधेयक है। इस बिल पर सरकार का कहना है कि यह बिल किसानों को पूरी उपज मंडी से बाहर बेचने की आजादी देता है। फ़िर क्या इसके पहले ऐसा नहीँ होता था क्या। किसानों तो तब भी पूरी आजादी के साथ अपनी उपज को कहीँ भी बेंच सकता था। सरकार का इस प्राविधान में यह दावा है कि इस बिल से किसान अपनी उपज को एक राज्य से दूसरे राज्य में ले जा सकता है। इस श्रेणी में कितने फीसद किसान आएंगे यह सरकार ख़ुद जानती है। किसान अगर अपनी फसल मंडी से बाहर बेचेगा तो कहाँ बेचेगा। उसे खरीदने वाला कौन होगा। उसकी शर्त क्या होगी। किसान क्या अपनी शर्त के मुताबिक अपनी उपज बेंच पाएगा। आख़िर खरीदने वाली वह संस्थाएं कौन होंगी ? साफ जाहिर है की सरकार की यह नीति ‘कॉरपोरट जगत’ को फायदा दिलाएगी।

लोकसभा और राज्यसभा से पास दूसरा बिल कृषक सशक्‍तिकरण से सम्बन्धित है। यह बिल पूरी तरह कॉरपोरट जगत’ पोषक बनता दिखता है। यह अनुबंध खेती को अधिक बढ़ावा देगा। मध्यमवर्गीय किसान को बहुत बड़ा फ़ायदा होने वाला फ़िलहाल नहीँ दिखता है। तीसरा बिल आवश्यक वस्तु से सम्बन्धित है। जिसमें अनाज, दलहन, तिलहन, खाद्य तेल, प्‍याज़ आलू को आवश्‍यक वस्‍तुओं की सूची से हटाने का विधान करता है। इसका मतलब आवाश्यक वस्तुओं की जमाखोरी अब अपराध नहीँ होंगी। कोई भी व्यापारी किसानों से इन वस्तुओं की खरीद कर जमाखोरी कर मुनाफा कमा सकता है। इससे बजार में आम आदमी के लिए संकट पैदा हो सकता है। आवश्यक और ज़रूरी खाद्य वस्तुओं की कीमतें बढ़ सकती हैं। आम आदमी की क्रयशक्ति से बाजार बाहर हो सकते हैं। ऐसा इस लिए भी होगा कि जब सरकार कह रही है कि किसान किसी भी कीमत पर मंडी से बाहर अपनी उपज बेंच सकता है। फ़िर क्या खरीददार किसानों को मुंहबोली कीमत चुका अपनी ऊँची कीमत बजार से नहीँ वसूलना चाहेगा? अगर ऐसा होगा तो फ़िर सरकार के ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ का क्या होगा।

बिल के बाद बजार पर क्या सरकार का नियंत्रण होगा कि कोई भी ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ से नीचे किसान की उपज नहीँ खरीद सकता है। ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ की शर्त क्या वर्तमान में लागू हैं ? वर्तमान समय में किसानों का विश्वास जीतने के लिए गेहूँ की एमएसपी 50 रुपए बढ़ा दिया है। अब यह 1925 के बजाय 1975 रुपए प्रति कुंतल (एमएसपी) होगी। लेकिन आम किसान 1400 से 1500 रुपए में खुले बजार और साहूकार अपनी उपज बेंच रहा है, फ़िर ‘एमएसपी’ का क्या फायदा। इससे आम किसान को कोई लाभ होने वाला नहीँ है। इस हालत में कृषि के लिए बजार नियंत्रण प्रणाली की ज़रूरत है। सरकारी खरीद तो एक निश्चित सीमा और समय तक होती है जबकि किसान अपनी उपज तभी बेचता है जब उसे अगली फसल की बेहतर उम्मीद होती है। क्योंकि उसे कृषि लागत निकालने के साथ परिवार का पेट भरने की जरूरत पड़ती है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कृषि बिल को किसानों के लिए नया अध्याय बताया है। उन्होंने विपक्ष पर किसानों को गुमराह करने का भी आरोप लगाया है। प्रधानमंत्री ने साफ कहा है कि मंडी परिषद नहीँ ख़त्म होगी और ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ जारी रहेगा। यहीं वजह रही कि सरकार ने समय से पहले फसलों का समर्थन मूल्य बढ़ा दिया। किसान संगठनों का आरोप है कि नए क़ानून के लागू होते ही कृषि क्षेत्र भी पूँजीपतियों के हाथ में चला जाएगा। कॉरपोरट जगत अपनी शर्तों पर किसानों से अनुबंध करेगा। अपने माफिक खेती कराएगा। मंडी समितियां ख़त्म हो जाएंगी। जिसकी वजह से किसानों की बोली नहीँ लग पाएगी उसकी उपज का समुचित मुनाफा नहीँ मिलेगा। देश के जानेमाने कृषि विशेषज्ञ देवेंद्र शर्मा किसानों की इस आशंका को सच मानते हैं। बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा है कि किसानों को अगर बाज़ार में अच्छा दाम मिल ही रहा होता तो वो बाहर क्यों जाते। जिन उत्पादों पर किसानों को एमएसपी नही मिलती, उन्हें वो कम दाम पर बेचने को मजबूर हो जाते हैं। आने वाले समय में ये होगा कि धीरे-धीरे मंडियां ख़त्म होने लगेंगी। उन्होंने आशंका जताई है कि तीन लाख मंडी मज़दूरों के साथ-साथ क़रीब 30 लाख भूमिहीन खेत मज़दूरों के लिए यह जोखिम भरा होगा।

देश में कृषि सुधार एक अहम ज़रूरत है लेकिन किसान और मजदूर हमेशा वोटबैंक की राजनीति का हिस्सा रहा है। यह विषय राजनीति से ऊपर उठ कर है लेकिन सम्भव नहीँ दिखता है। इस अहम बिल पर सरकार को विपक्ष की बात को तरजीह देनी थीं, लेकिन सरकार ऐसा नहीँ किया। लॉकडॉन में अगर भारत की कृषि अर्थव्यवस्था इतनी मज़बूत न होती तो क्या हालात होते इसकी कल्पना की जा सकती है। ऐसे में किसानों पर राजनीति बंद होनी चाहिए।

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