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व्यक्तित्व

साहित्य क्षेत्र का अवधी नक्षत्र अवधेश

“चीर करके बादलों के व्यूह को,
भानु मुस्काता हुआ फिर आ रहा।
हाथ में लेकर कलम – दावात को,
अवध जग का दर्द निर्भय गा रहा।।”

साहित्य के व्यापक सिंधु में भावनाओं के विशुद्ध गंगाजल से अंजलि भर-भर हमारे कुल का एक कलमकार लेखनी से आचमन कर रहा है। उसे विश्वास है कि इस बार का सागर मंथन व्यर्थ नहीं जाएगा……विष और अमृत का पृथक्करण होकर रहेगा……परिष्करण होना तय है।

साइंस, तकनीक, संस्कृत और साहित्य में संतुलन बनाने का हुनर कोई डॉ अवधेश कुमार अवध से सीखे! उत्तर प्रदेश के चन्दौली जिले के एक छोटे से गाँव मैढ़ी में ये पैदा हुए। इस संयुक्त रघुकुल में इनके पिता स्व. शिवकुमार सिंह तीन भाई थे और इनकी पीढ़ी के कुल दस भाई/बहनों में इनका क्रमांक नौवाँ रहा। गाँव के सरकारी स्कूल में आठवीं तक पढे़ और इसी बीच परुष काल ने पिता की छत्रछाया सर से छीन ली। उस पिता की जिन्हें स्थानीय लोग श्रद्धा से “बाबूजी” कहते थे।

परिजनों के सहयोग से पढ़ाई चलती रही और अन्तर्मुखी व्यक्तित्व ने इन्हें साहित्यिक पुस्तकों को पढ़ने और मन के उद्वेग को लिखने में संलग्न रखा। प्राथमिक कक्षाओं से ही कविता और संवाद लेखन के प्रति मन आकर्षित रहा। कक्षा नौ से बारह तक की शिक्षा बड़े भाई की छत्रछाया में हुई जहाँ किशोर वय में लेखन एक जुनून बन गया। नाटक, कविता, शेर, भाषण आदि डायरी की शोभा बने। उस स्वर्ण काल का एक दोहा देखें-

“मेरे नैनन तूँ बसा, हिय में तेरा नेह।
कहाँ बसाऊँ अन्य छवि, खाली रहा न गेह।।”

तदनन्तर कॉलेज की पढ़ाई और लेखन सहगामी हो गए। लेख “हिंदी काले अंग्रेजों के चंगुल में”, लघुकथा “गीता की सौगंध”, रेखाचित्र “जब कोई स्वामी शीलभंग करेगा” और कविता “जानवरों की नई जगह” इनकी प्रारम्भिक प्रकाशित कृतियाँ हैं। उदाहरणार्थ एक कविता देख सकते हैं-

“अब जानवर नहीं रहते,
कबीले, बस्ती जंगल में।
मिलना है तो चले जाओ,
राजनीति के दंगल में।।”

इन्होंने सदैव दोनों मुख्य विधा यथा काव्य और गद्य में संतुलन बनाए रखा। अपनी संस्कृति, सभ्यता, धरोहर, राष्ट्रीयता, अनमोल ब्राहमण ग्रंथ आदि से सदैव प्रभावित रहते हैं तो इसके विपरीत सामाजिक विषमता, साम्प्रदायिकता, झूठ, अन्याय तथा ठगी आदि से कुपित और दुखी भी।

मन्दिर की सीढ़ी से श्रमिक हुआ वापस।
मस्जिद का मजदूर पुन: शर्मिंदा है।।
ईंट – मसालों में जिसने श्रम घोला था।
आज उसी दर पर वो त्याज्य पुलिंदा है।।

जनतन्त्र के नाम पर जन को तन्त्र से दूर रखने का षड्यन्त्र कलम में आग भर देता है। भारतीय राजनीति में परिवारवाद और घोटालों का वर्चस्व रहा है जो कवि को चैन लेने नहीं देता। महाकवि दिनकर का ये अनुयायी दिनकर की ही तर्ज पर सत्ता को ललकारता है-

“मैं जनपथ का पथिक राजपथ से सवाल दुहराऊँगा।
दोनों में क्या है अन्तर तस्वीर आज दिखलाऊँगा।।”

अवध जी औपचारिक शिक्षा के साथ और बाद भी विभिन्न विषयों पर स्वाध्ययन करते रहे। किसी भी विषय को इन्होनें पराया नहीं माना। तकनीक, वाणिज्य, भाषा एवं मानविकी संकायों से जुड़े रहे। किसी भी विषय के छात्र अक्सर समस्याओं का समाधान कराने आते और संतुष्ट होकर लौटते।

“उर में भक्ति,हाथ में गीता और साँस में योग रहे।
नजर लक्ष्य से भटक न पाए एवं देह निरोग रहे।।”

विवाह हुआ, बाप बनें, आवश्यकताएँ बढ़ीं और जैसा कि अक्सर संयुक्त परिवार में होता है, रिश्ते संकीर्ण होने लगे। शिव पुरुष पिताजी के उपरान्त शिवा भवानी सुश्री शिवमुनी देवी ने रघुकुल को संजोये रखा। सैकड़ों लोग इन्हें “चाची” के नाम से सम्बोधित करते थे जिनको काल ने हृदयाघात के बहाने छीन लिया। इस भौतिक धुरी के उखड़ते ही परिजनों की मानसिक विकृतियाँ और स्वपोषक कूटनीति परिलक्षित होने लगे। अभाव का प्रभाव स्वभाव को अस्थिर करने लगा। विभिन्न कॉलेजों में विभिन्न विषयों के शिक्षक भी बनें…..मान, सम्मान और पहचान मिली लेकिन आर्थिक न्यूनता अडिग रही। मध्यम स्तरीय कृषक होकर भी परिजनों की असंवेदनशीलता और निज दायित्वबोध के कारण कृषि-मजदूर सरिस अभावग्रस्त रहे…….संरक्षक मात्र बने रहे, स्वामी नहीं।

भारत के सुदूर पूर्वोत्तर के मेघालय में एक निजी सीमेंट कम्पनी में बड़े भाई की पहचान से सिविल विभाग में काम करने का अवसर मिला। आत्मनिर्भरता बढ़ी और पढ़ाई की दबी ख़्वाहिशें पुन: जागृत हो उठीं। मूल आवश्यकताओं के नीचे दबा साहित्य प्रेम फिर से मुखर हो उठा। लेखनी के साथ ही सोशल मीडिया पर अंगुलियों ने भी थिरकना शुरु कर दिया। फेसबुक में मधुशाला समूह ने छंदों में समृद्ध किया। गुरुवर बी एम सैनी ने “अवध” नाम देकर सँवारा। आ. रणवीर सिंह अनुपम दादा ने मात्रा संयोजन के गुर सिखाये तथा एकल काव्य संकलन “लुढ़कती लेखनी” ने साहित्यिक पहचान
दी। लुढ़कती लेखनी पढ़ने में गुजरात का एक पाठक इतना निमग्न हुआ कि हत्या/ आत्महत्या का विचार त्याग दिया। इस पारितोषिक के समक्ष बड़े- बड़े सम्मान भी तुच्छ हैं। “कवियों की मधुशाला” से एक मुक्तक द्रष्टव्य है-

नाज़ उठाकर सर, आँखों पर, बैठाया तुझको पाला ।
मृदु भावों से अंजलि भर भर, तुझे किया मैं मतवाला ।
इस पथ पर आने वाले सब,बार बार करते पूछा-
बोलो साकी कहाँ मिलेगी, ये कवियों की मधुशाला ।।

फिर तो लेखन इनका जुनून बन गया। कई दर्जन पुस्तकों की समीक्षा, भूमिका लेखन, संपादन, पत्रकारिता, आलेख लेखन व काव्य सृजन अनवरत चलने लगे। अवधपति श्रीराम को आराध्य मानकर उनके इस वंशज ने हर सुख को उनको अर्पित किया तथा हर दु:ख में उनको याद किया। सामाजिक अवमूल्यन, पारिवारिक शोषण, राजनैतिक भ्रष्टाचार, आर्थिक विषमता, नैतिक पतन और पर्यावरण ह्रास ने हृदय को झकझोर दिया और भाव द्रवित होकर लेखनी से नि:सृत होकर शब्द का रूप ले लेते। लोकमंगल की प्रखर भावना सह लेखनी को सत्यायुध बनाने का उद्देश्य साँसों में समाया हुआ है। साँस -साँस में कर्म का उद्घोष है-

“दूर से नापी न जाएगी नदी,
कूदने से ही मिलेगी थाह,प्यारे।”

“जन सरोकार से दूर रहकर साहित्य निष्प्राण हो जाएगा”, “कवि का दायित्व”, “बुधनी”, “गाय बिना गोदान”, “कुशवाहा कांत की मौत-मिस्ट्री”, “पूर्वोत्तर में हिंदी की दशा-दिशा” और “प्रेमचंद के हंस का संजय” आदि प्रमुख गद्य लेखन हैं। काव्य सृजन में “दोहा-द्रोणिका”, “जनपथ बनाम राजपथ”, “माँओं की कुर्बानी”, “प्यार की परिभाषा”, “चक्रव्यूह का मोह-द्वार”, “मैं गीत न कोई गाऊँगा” तथा “स्त्री और उसका घर” उल्लेखनीय हैं। डॉ अवध ने “माँ” को कई कविताएँ समर्पित की हैं। उस माँ पर जो भारत माँ सरीखी “माई” है जिसकी हजारों संतानों में एक ये भी हैं और अब तक ये अपने आपको सबसे समृद्ध इसलिए मानते हैं कि ऐसी माँ के साहचर्य में हैं। माँ के लिए उनकी परिभाषा देखें-

“ना ऐसी, ना वैसी होती।
माँ तो माँ के जैसी होती।।”

सम्मान की ललक न होने पर भी सम्मान पत्र पाने का सिलसिला चला आ रहा है। विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ ने माँ क्षिप्रा के पावन तट पर विद्यावाचस्पति की मानद उपाधि से नवाजा। राजभाषा हिंदी संस्थान जोरहाट, असम ने भी उत्कृष्ट लेखकीय योगदान के लिए प्रशस्ति पत्र प्रदान किया। नूतन साहित्य कुंज, अवध मगध साहित्य तथा पूर्वाशा हिंदी अकादमी द्वारा न केवल हिंदी अपितु हींदीतर लोगों को भी हिंदी से जोड़ने का कार्य कर रहे हैं। “सच की दस्तक” ने सुदूर रहते हुए भी काशी से जोड़ रखा।अन्तरराष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग की विशेष निगरानी समिति का वॉलंटियर बनकर भी मानव जाति के प्रति समर्पित हैं।

“शोषण का साम्राज्य मिटाकर समरसता फैलाएँगे।
माना कठिन डगर है लेकिन, जाएँगे तो जाएँगे।।”

आकाशवाणी, दूरदर्शन, राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं से सम्बद्ध हैं। दलों के दलदल से बाहर रहते हुए हाथों में कर्म और हृदय में भक्ति लेकर मानवता की अलख जगाने में अहर्निश लगे हुए हैं। बेजुबानों की जुबान बनकर उल्लेखनीय भूमिका निभा रहे हैं।सच कहूँ तो मैनें बहुत सारे लेखकों को पढ़ा और कवियों को सुना है पर अवधेश जी के कलम में साहित्य के प्रति जो निष्ठा है और अपने रहस्मयी शब्दों द्वारा पाठकों को सम्मोहित करने की जो कला है वह विरलों के पास ही होती है जो कि अस्तित्व प्रदत्त है। यह महान लेखक हिंदी साहित्य के विराट क्षितिज में किसी नक्षत्र की भाँति चमक रहा है और वो समय दूर नहीं जब लोग इन्हें साहित्य के सूर्य की संज्ञा देगें।

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