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आज का चिंतन

यम नियमों के पालन से ही आत्मा की उन्नति होना संभव है

ओ३म्

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मनुष्य शरीर में आत्मा का सर्वोपरि महत्व है। शरीर को आत्मा का रथ कहा जाता है और यह है भी सत्य। जिस प्रकार हम रथ व वाहनों से अपने गन्तव्य स्थान पर पहुंचते हैं उसी प्रकार से मनुष्य शरीर मनुष्य की आत्मा को उसके लक्ष्य ईश्वर-प्राप्ति कराता है। ईश्वर सर्वव्यापक होने से आत्मा को हर समय व हर स्थान पर प्राप्त रहता है। उसे ईश्वर को पुकारना होता है और इसके साथ ही अपने को ईश्वर से भेंट व साक्षात्कार करने का पात्र बनाना पड़ता है। यदि हममें पात्रता न हो तो हम संसारिक सामान्य लोगों से भी नहीं मिल सकते। हम जिनसे मिलना चाहते हैं व जिनसे भेंट करने का निवेदन करते हैं वह भी हमारी पात्रता को देखकर ही हमें मिलने का समय देते हैं। अतः संसार का स्वामी, रचयिता व पालक, भी हमें तभी साक्षात्कार कराता है जबकि हम उसके लिये पात्र होते हैं। ईश्वर के साक्षात्कार व उससे भेंट के लिये हमें ईश्वर की उपासना करनी होती है। उपासना की सफलता पर ही हमें ईश्वर का साक्षात्कार वा प्रत्यक्ष होता है। ईश्वर का साक्षात्कार क्यों आवश्यक है? इस प्रश्न पर विचार करते हैं तो हमें आत्मा के अज्ञान की भूख की तृप्ति ईश्वर के साक्षात्कार को प्राप्त करने पर ही समाप्त होती प्रतीत होती है। जिस मनुष्य ने ईश्वर को प्राप्त नहीं किया है उसका जीवन अधूरा व अनुपयोगी ही कहा जा सकता है। हम जो पुरुषार्थ करते हैं उसका उद्देश्य यदि आत्मा की उन्नति व दुर्गुणों तथा दुव्र्यसनों का नाश वा सुधार नहीं है तो हमारा पुरुषार्थ करना व्यर्थ सिद्ध होता है।

हमारा शरीर हमसे भोजन व वस्त्रों की अपेक्षा रखता है। इसे निवास व विश्रामकी भी आवश्यकता होती है। इससे अधिक यदि हम धनोपार्जन करते हैं अथवा अपना सारा जीवन ही धनोपार्जन वा भौतिक सम्पत्ति के अर्जन व संचय में लगाते हैं, तो यह सर्वथा उचित नहीं है। हमें आत्मा की उन्नति पर भी ध्यान देना चाहिये। आत्मा की शुद्धि विद्या व तप से होती है। इससे सम्बन्धित शास्त्रीय सिद्धान्त है कि मनुष्य का शरीर जल से तथा मन सत्य से शुद्ध होता है। विद्या व तप से आत्मा शुद्ध होती है तथा बुद्धि ज्ञान से शुद्ध होती है। मनुष्य के शरीर में आत्मा से इतर मन, बुद्धि सहित मानव शरीर भौतिक तत्वों से बना होता है। अतः हमारा शरीर जड़ अर्थता चेतना से विहीन होता है। मन व बुद्धि को सत्य व ज्ञान से शुद्ध करने का अर्थ आत्मा की उन्नति ही होता है। सत्य व ज्ञान की अपेक्षा बुद्धि को अपने लिये नहीं होती अपितु शरीरस्थ आत्मा को होती है। आत्मा की उन्नति के लिये ही परमात्मा ने मनुष्य को शरीर व उसमें मन व बुद्धि आदि ज्ञान प्राप्ति में सहायक इन्द्रियां व अन्तःकरण आदि दिये हैं। अतः हमें मन व बुद्धि सहित शरीर का उपयोग करते हुए आत्मा को ज्ञान व तप से युक्त कर अपनी आत्माओं की उन्नति करनी चाहिये। ऐसा करने से ही मनुष्य का जीवन सफल होगा और जीवन के उत्तर काल में आत्मा की उन्नति होकर मनुष्य ईश्वर का साक्षात्कार कर सकता है अथवा वह साक्षात्कार होने के निकट पहुंच सकता है। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिये ही परमात्मा ने हमें मनुष्य शरीर दिया है। इसे जानकर हमें अपने जीवन के उद्देश्य को पूरा करने में लग जाना चाहिये। धनोपार्जन व धनसंचय से जीवन का लक्ष्य सिद्ध नहीं होता। इसके विपरीत आत्मा की तप, सत्य व ज्ञान से उन्नति करते हुए ईश्वर का साक्षात्कार करना ही जीवन का उद्देश्य व लक्ष्य सिद्ध होता है।

आत्मा की उन्नति में वैदिक शिक्षा सहित भौतिक एवं आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति का सर्वाधिक महत्व होता है। ज्ञान प्राप्ति करने के साथ ज्ञान के अनुरूप आचरण का महत्व ज्ञान प्राप्ति जितना ही होता है। यदि हमने ज्ञान प्राप्त कर भी लिया और उसके अनुरूप आचरण नहीं किया तो ज्ञान प्राप्ति का लक्ष्य पूरा नहीं होता। इसलिये हमें अपने कर्मों व आचरणों पर विशेष ध्यान देना चाहिये। इसकी परीक्षा ही हम प्रातः व सायं सन्ध्या करते हुए करते हैं। सन्ध्या में जहां हम अपने शरीर को स्वस्थ रखने पर विचार करते हैं और शरीर व इन्द्रियों को बलवान रखने में ईश्वर की सहायता की याचना करते हैं वही पाप कर्मों से बचने के लिये अघमर्षण मन्त्रों का पाठ भी करते हैं। हम यह विचार करते हैं कि इस संसार का रचयिता, पालक व स्वामी ईश्वर है, वह सभी दिशाओं में विद्यमान है, हमें देख रहा है और हमारी रक्षा कर रहा है। हमें उसकी अनुमति से ही संसार का सीमित मात्रा में आवश्यकता के अनुरूप ही उपभोग करना है। अधिक उपभोग करना हानिकारक होता है। हम जितना अधिक उपभोग करेंगे उतना ही अधिक संसार में फंसेंगे जिसका परिणाम आवागमन वा जन्म-मरण तथा सुख व दुःखों की प्राप्ति होता है। सभी दुःखों की सर्वथा निवृत्ति के लिये ही आत्मा का कर्तव्यों का पालन करना उद्देश्य होता है जो कि हमें विचार व चिन्तन सहित वेद व ऋषि-मुनियों के ग्रन्थों का स्वाध्याय व विचार करने पर ज्ञात होता है। हमारे मार्गदर्शन के लिये ही परमात्मा ने सृष्टि के आरम्भ में चार वेदों ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद का ज्ञान हमारे पूर्वज चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य व अंगिरा को दिया था। यह ज्ञान आज भी प्रासंगिक एवं सार्थक है। यह ज्ञान स्वयं में पूर्ण होने के कारण इसमें किसी प्रकार की वृद्धि व सुधार की आवश्यकता नहीं है। इस ज्ञान को प्राप्त होकर इसके अनुसार ही अपना जीवन बनाकर अर्थात् आचरण कर हम आत्मा को दुःखों से मुक्त तथा मोक्ष के निकट ले जा सकते हैं। मनुष्य जीवन का उद्देश्य भोग व अपवर्ग ही है। ‘भोग’ आत्मा द्वारा पूर्वजन्म व वर्तमान जन्म के क्रियमाण कर्मों का सुख व दुःख रूपी फल का भोग होता है और अपवर्ग वेद ज्ञान के अनुरूप साधना से अर्जित जन्म व मरण के बन्धनों से मुक्त होकर केवल आत्मा के परमात्मा में निवास व विचरण करने को कहते हैं जहां दुःख का लेश मात्र भी नहीं होता तथा जीवात्मा को अखण्ड व दीर्घ काल तक स्थाई सुख, आनन्द व कल्याण की प्राप्ति होती है।

मनुष्य की आत्मा की उन्नति के अनेक उपयों व साधनों में पांच यम व पांच नियमों का महत्वपूर्ण योगदान है। आत्मा की उन्नति असत्य के त्याग तथा सत्य के ग्रहण से होती है। यजुर्वेद का मन्त्र 30.3 ‘ओ३म् विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव। यद् भद्रन्तन्न आसुव।।’ है। इसका अर्थ है- ‘हे सकल जगत् के उत्पत्तिकर्ता, समग्र ऐश्वर्ययुक्त शुद्धस्वरूप, सब सुखों के दाता परमेश्वर! आप कृपा करके हमारे समस्त दुर्गुण, दुव्र्यसन और दुःखों को दूर कर दीजिए ओर जो कल्याणकारक गुण, कर्म, स्वभाव और पदार्थ हैं, वह सब हमकों प्राप्त कीजिए।’ इस वेदमन्त्र से असत्य व दुरितों का त्याग तथा सत्य, सद्कर्मों व सद्गुणों का ग्रहण व धारण ही मनुष्य का कर्तव्य विदित होता है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये ही महर्षि पतंजलि ने योगदर्शन में पांच यमों व पांच नियमों का समाधि की प्राप्ति के साधक ‘योग’ को सफल करने के लिये आधार बताया है। यह पांच यम हैं अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य तथा अपरिग्रह। पांच नियम हैं शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय तथा ईश्वर प्रणिधान। यदि हम अपने जीवन को इन 10 साधनों को सफल करने में लगायें तो हम मनुष्य जीवन को उसके लक्ष्य मोक्ष के निकट तक ले जा सकते हैं। हम इसके जितना निकट होते हैं उतना ही हमारा जीवन सफल होता है और जितना दूर जाते हैं उतना ही हम असद्कर्मों व दुःखों में फंसते हैं।

अहिंसा का अर्थ होता है कि हम सभी प्राणियों के प्रति वैर का त्याग का कर दें और सबको अपनी आत्मा के समान समझें। हम असत्य का त्याग व सत्य का ग्रहण करें। सत्य वह है जिसका प्रकाश वेदों में किया गया है। वेदाज्ञा का पालन ही कर्तव्य व सत्य का पालन है तथा उसका पालन न करना ही असद्कर्मों में फंसना है। अस्तेय का अर्थ है कि हम छिप कर कोई कार्य व व्यवहार न करें। हम किसी अन्य के अधिकार की वस्तु को अपने अधिकार में लेने के लिये किसी अनुचित साधन का प्रयोग न करें। अस्तेय का अर्थ चोरी न करना व इस प्रवृत्ति का त्याग करना होता है। ब्रह्मचर्य का अर्थ इन्द्रियों का पूर्ण संयम व उन पर अधिकार करना होता है। ईश्वर का ध्यान व चिन्तन करते हुए अपने जीवनको सद्कर्मों में व्यस्त रखना व स्वाध्याय व तप में लगे रहना ही ब्रह्मचर्य है। अपरिग्रह का अर्थ अधिक मात्रा में धन संचय न कर अपनी आवश्यकता को सीमित करना और अल्प साधनों में जीवनयापन करते हुए पूर्ण सन्तुष्ट रहना होता है।

शौच आन्तरिक व बाह्य स्वच्छता को कहते हैं। हमारी आत्मा में कभी मलिन विचार नहीं आने चाहियें और न ही हमें कभी कोई निषिद्ध व निन्दित कार्यों को करना चाहिये। मनुष्य को हानि व लाभ तथा सुख व दुःख में सदा सन्तुष्ट रहना चाहिये। मनुष्य का जीवन तप अर्थात् वेद विहित कार्यों यथा पंचमहायज्ञों आदि में लगा रहना चाहिये। मनुष्य को वेद व ऋषियों के उपनिषद, दर्शन तथा विशुद्ध मनुस्मृति आदि ग्रन्थों का स्वाध्याय करना चाहिये। सत्यार्थप्रकाश तथा ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका आदि ग्रन्थ भी स्वाध्याय के लिये अत्युत्तम ग्रन्थ हैं। इनके अध्ययन से मनुष्य की सभी शंकायें व भ्रम दूर हो जाते हैं। इनका अध्ययन भी प्रतिदिन नियत समय पर करना चाहिये। पांचवा नियम है ईश्वर प्रणिधान। ईश्वर में व उसकी व्यवस्था में मनुष्य को पूर्ण विश्वास रखना चाहिये। पहाड़ के समान दुःख प्राप्त होने पर भी विचलित व दुःखी नहीं होना चाहिये अपितु उसे अपने किसी पूर्व कर्म का फल मानकर उसे सन्तोष के साथ भोगना चाहिये। ऐसा जीवन ही आध्यात्मिक जीवन का आधार होता है। इसका लाभ वर्तमान में भी होता है और इसके साथ भविष्य व परजन्मों में भी इससे अनेक प्रकार से लाभ मिलता है। यही मनुष्यों के लिये करणीय कर्तव्य हैं। ऐसा करते हुए ही हमारी आत्मिक उन्नति होती है। हम ईश्वर का साक्षात्कार करने के लिये पात्र बनते हैं। मनुष्य के सभी दुःख दूर होते जाते हैं और मृत्यु से पूर्व ईश्वर का प्रत्यक्ष व साक्षात्कार होकर जन्म-मरण वा आवागमन से हमारा आत्मा छूट जाता है। यदि हम सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ का अध्ययन करेंगे तो हम इन बातों को भली प्रकार जान सकते हैं। अतः सत्य का ग्रहण, असत्य के त्याग सहित यम व नियमों का पालन अवश्य करना चाहिये क्योंकि यही जीवन में सुख व उन्नति का आधार हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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