Categories
कृषि जगत

भारत की समृद्धि का मूल आधार है कृषि

डॉ. कृपाशंकर तिवारी

भारत के कृषि प्रधान होने का दावा हमारे किसानों ने सही साबित किया है। आज भारत, कृषि विकास में प्रमुख स्थान प्राप्त कर चुका है। राष्ट्रीय आय का 33त्न भाग कृषि से ही प्राप्त होता है। भारत की लगभग 70त्न आबादी कृषि से जुड़ी है। भारत का प्रत्येक नागरिक प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि से जुड़ा है। भारतीय समाज के एक बहुत बड़े वर्ग के लिये कृषि ही जीवन शैली है। हमारी आजीविका परंपरायें रीति रिवाज, सांस्कृतिक विरासत और पहचान लोककलायें, संस्कार, हर्ष, विषाद, जीवन और मृत्यु के साथ जीवन के ताने बाने का केन्द्र हमारी कृषि ही रही है। किसी स्थान या क्षेत्र विशेष की प्रगति, वहां के समय तंत्र के साथ कृषि प्रणालियों पर निर्भर करती है।
कृषि को सभी सभ्याताओं की जननी कहा गया है। भारत में हमेशा प्रमुख आर्थिक गतिविधियों कृषि पर केन्द्रित रही हैं। प्राचीन काल से भारतीय समाज की समृद्धि कृषि से ही जुड़ी थी। हमारे पूर्वज हजारों वर्ष पूर्व कृषि की उन्नत तकनीकों उन्नत बीजों मृदा संरक्षण और कृषि यंत्रों के उपयोग से परिचित थे। वे स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप कृषि उत्पादन में निपुण थे। यह हमारी परंपरागत कृषि व्यवस्था ही थी जिसको आधुनिक रूप देकर भारत आज खाद्यान्न में अत्मनिर्भर है। यह आत्मनिर्भरता, भारत के लिय एक महान उपलब्धि है। आज भारत नीली क्रांति, श्वेत क्रांति भूरी क्रांति, पीली क्रांति और हरित क्रांति के नये शिखर पर है। इस सफलता के पीछे हमारा ज्ञान हमारी समृद्ध कृषि विरासत के साथ उन्नत कृषि तकनीकें शोध और आधुनिक प्रौद्योगिकी है।
देश की निरंतर बढ़ती आबादी और घटते संसाधनों के दृष्टिगत कृषि विकास को नई दिशा देने की जरूरत है। कृषि संस्थानों में स्थानीय आवश्यकताओं एवम् संस्थानों के अनुरूप नये पाठ्यक्रम नये ज्ञानक्षेत्र विकसित करने होगें। भारत में कृषि भूगोल मौसम, मिट्टी की संरचना और जल उपलब्धता के आधार पर होती है। हमारे पूर्वज गैर परंपरागत उर्जा का बेहतर उपयोग जानते थे। वे बॉयोमास का उपयोग, शुष्क खेती, मृदा संरक्षण, भूमि एवम जल प्रबंधन, जल ग्रहण क्षेत्र विकास के साथ जल स्त्रोतों के संरक्षण और संवर्धन में माहिर थे। कृषि के साथ एक विशाल और विराट पारिस्थितिक तंत्र के संरक्षण का ज्ञान उन्हें था। वन और वन्य प्राणी संरक्षण, जैव विविधता संरक्षण, लोक संस्कृति ग्रामीण शिल्प और वनोपज उत्पाद संरक्षण उनके जीवन से जुड़ा था। भारतीय समाज में पेड़ों जीव जन्तुओं वनस्पतियों नदियों के साथ प्रकृति को विभिन्न रूपों में पूजने के माध्यम से संरक्षण प्रदान करने की नायाब परंपरा थी।
वैदिक काल में लोगों का मुख्य भोजन घी, दूध, शाक भाजी, अनाज और मोटे अनाज ही थे। उस काल में कृषि को लगातार उन्नत बनाने के प्रयोग किये गये।
बौद्धकाल में देश की अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार कृषि ही था। मगध शासनकाल में व्यापारिक फसलों एवम् फलों के उत्पादन व वनों को लगाने की नीति बनाई गई। इसमें आम, कटहल एवम् अनाज जैसे गेहूं धान जौ दलहन, तिलहन आदि का उत्पादन बड़ी मात्रा में होने लगा। देश के नागरिकों की आवश्यकताओं के लिये यह पर्याप्त था। 535 ई॰ से 1300 ई॰ तक व्यापारिक फसलों जैसे इलाइची अफीम और नील आदि का उत्पादन होता था साथ ही निर्यात भी किया जाता था। 9 वीं से 11 वीं शताब्दी तक कृषि कार्य उन्नतशील तरीकों से किया जाने लगा। सुपाड़ी, केला, कटहल, गन्ना आम तथा जामुन की फसलें होने लगी। इसी समयकाल में वृक्षारोपण भी एक बड़े पैमाने पर किया गया।
मध्यकालीन भारत में (1206 से 1900 वीं शताब्दी) कृषि एवम उद्यान कार्य पर विशेष बल दिया गया। नहरों का निर्माण, बगीचों की स्थापना, विस्तार और प्रबंधन किया गया। मक्का आलू शकरकंद, टमाटर, पपीता, मिर्च काजू और मूंगफली का उत्पादन होने लगा। इसी काल में भारत फलों और अनाज फसलों से समृद्ध हो गया। 18 वीं तथा 19 वीं शताब्दी में कृषि अनुसंधान उन्नत कृषि तकनीकों का विकास और कृषि शिक्षा का चलन, प्रचार और महत्व कम था। इसी बीच जूट चाय, कपास नील तथा गन्ना जैसी फसलें आई।
ब्रिटिश शासन काल में खेती पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया गया। सन् 1885 में बिहार में कृषि विभाग स्थापित हुआ। 1906 में इंपीरियल एग्रीकल्चर इंस्टीट्यूट पूसा में स्थापित हुआ और 1908 में पूरे देश में छ: कृषि महाविद्यालय खोले गये।
आधुनिक भारत में कृषि
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सरकार का प्रमुख उद्देश्य देश के नागरिकों को पर्याप्त मात्रा में खाद्यान्न उपलब्ध कराना रहा, जिसके कारण विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से कृषि संस्थानों को अर्थिक सहायता प्रदान करने के साथ कृषि संस्थानों, विश्वविद्यालयों आदि की संख्या में भी वृद्धि की गई। 1 अप्रैल 1951 को पहली पंचवर्षीय योजना शुरू की गई जिसमें 124 करोड़ तथा नवीं पंचवर्षीय योजना 1996-97 से 2002-2003 में लगभग 60000 करोड़ रूपये का प्रावधान रखा गया।
खाद्यान्न उत्पादन- नये कीर्तिमानों एवम सफलता की कहानी
स्वतंत्रता प्राप्ति के समय हमारा देश खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर नहीं था, जबकि वर्तमान में देश की विशाल जनसंख्या का पेट भरने के बाद अब हम खाद्यान्न निर्यात में भी सक्षम है। इससे करोड़ों रूपये की विदेशी मुद्रा भी प्राप्त होती है। हमारा कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 329 मिलियन हैक्टेयर है जो विश्व के क्षेत्रफल का मात्र 2.4त्न है एवम धरती की 15त्न मानव जनसंख्या को भोजन देता है। हमारी भूमि में कृषि उत्पादन की क्षमता बढ़ाने की काफी गुंजाइश एवम् जरूरत है। हरित क्रांति अवधि 1968-88 तक वार्षिक खाद्यान्न वृद्धि 2.3त्न रही थी। डा. एम.एम. स्वमीनाथन के नेतृत्व में हरित क्रांति का सूत्रपात हुआ। देश में उन्नतशील खाद्यान्न फसलों के बीज, खाद, कीटनाशक आधुनिक कृषि यंत्र, सिंचाई सुविधाओं का विस्तार तेज गति से हुआ। हरित क्रांति के ही कारण गेहूं में 2) धान में 3, ज्वार में 5, बाजरा में 5) तथा मक्का में 3) गुना उत्पादन वृद्धि दर्ज की गई। आज देश में गेहूं का उत्पादन 90 मिलिटन टन है। भारत चावल निर्यातकों में विश्व का दूसरा देश बन गया है। चावल उत्पादन में यह वृद्धि देश के कृषि वैज्ञानिकों के प्रयासों से ही संभव हुई है। बासमती चावल जो देश की ही देन है, से 96-97 में 4.90 लाख टन निर्यात कर 1197.75 करोड़ रूपये प्राप्त किये। सन 1949-50 में 54.9 मिलियन टन था जो अब 200 मिलियन टन हो चुका है। प्रति हैक्टेयर उपज 553 कि० है॰ ये बढ़कर अब 1450 कि० है॰ हो चुकी है। उपज दर में बढ़ोत्तरी 2.8त्न रही। 2005 तथा 2010 तक क्रमश: 205.26 तथा 250.61 मिलियन टन खाद्यान्न की जरूरत होगी।
धान की नीरजा, लन्घ्रिी एवम गेहूं की यू.पी. 2338, सोनालिका, सुजाती आदि नई प्राजातियां कृषि संस्थानों की ही देन है। अत: आधुनिक कृषि तकनीक ने देश के कृषि विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
पीली क्रांति
देश के कुल कृषि क्षेत्र में 10त्न क्षेत्र में तिलहन होते हैं। इसमे 3 करोड़ किसान लगे हैं। 1980-89 में 16 लाख टन तिलहन प्रतिवर्ष आयात किया गया जिसमें 1000 करोड़ रु. की राशि व्यय हुई। तिलहन उत्पादन और प्रतिव्यक्ति उपभोग अत्यन्त कम रहा। भारत सरकार ने 1987-88 में तिलहनों की वृद्धि हेतु ”टेक्नालॉजी मिशनÓÓ का गठन किया जिसकी नीतियों के कारण तिलहन उत्पादन में 40त्न के लगभग वृद्धि हुई। भारत में आयात का बोझ समाप्त होने के साथ साथ 1992 में 1000 करोड़ से ऊपर का निर्यात भी हुआ। 75त्न ये अधिक तिलहन उत्पादन सीमांत कृषक हैं जिनके पास दो हैक्टेयर से भी कम जमीन है। तिलहन के लिये सिंचित क्षेत्र केवल 15त्न है। धान्य फसलों की तुलना में इनमें बीमारियों व कीड़ों का प्रकोप अधिक होता है। जिससे सुरक्षा आवश्यक है पर सुविधायें साधन कम है। तिलहनों की उन्नतशील किस्मों का उत्पादन अभी भी प्रयोगात्मक दशा में है। हमारे देश में 1996-97 में 242.1 लाख टन तिलहन उत्पादन रहा। 1997-98 में 255 लाख टन उत्पादन रहा जो 2005 तक 300 लाख टन होने का लक्ष्य है।
यद्यपि पीली क्रांति की सफलता में अनेक बाधायें रही हैं फिर भी तकनीकी प्रयास कारगर साबित होगें, ऐसा विश्वास है।
श्वेत क्रांति
देश में श्वेत क्रांति के फलस्वरूप दुग्ध उत्पादन में काफी वृद्धि हुई। राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड की भूमिका इस कार्य में सराहनीय रही। भारत में दूध की उपलब्धता पिछले 25 वर्षों में बढ़ी है। 1970 में 107 ग्राम/दिन से अब 192 ग्राम/दिन दूध प्रति व्यक्ति उपलब्ध है। आबादी के विस्तार के साथ दूध और दुग्ध उत्पादों की बढ़ती मांग के दृष्टिगत डेयरी क्षेत्र में अभी बहुत कुछ करना शेष है। दुधारू जानवरों के लिये चिकित्सालय, पशु चिकित्सा महाविद्यालय के अलावा उन्नत प्रजाति के गाय, भैंस, बकरी के लिये भी उच्च तकनीक जरूरी है।
भूरी क्रांति
हमारा देश उर्वरक उत्पादन में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा देश है। उरर्वक के विवेकपूर्ण और संतुलित उपयोग से खाद्यान्न में 50त्न वृद्धि संभव है। मृदा परीक्षण के बाद ही मृदा में उरर्वकों की मात्रा निश्चित की जाती है। देश में सिंचाई क्षेत्र विस्तार के साथ ही कृषि योग्य भूमि भी बढ़ी है। मृदा के रासायनिक स्वभाव में परीक्षण के बाद मिट्टी में कमी वाले घटक के अनुरूप खाद का प्रयोग किया जाता है। मृदा जांच प्रयोगशालाओं एवम कृषि तकनीक उन्नयन संस्थानों की स्थापना के बाद देश में खाद की खपत और खाद्यान्न उत्पादन बढ़ा है।
नीली क्रांति
हमारा देश विश्व के सात प्रमुख मछली उत्पादक देशों में से एक है। देश को मछली निर्यात से विदेशी मुद्रा की अत्यधिक मात्रा प्राप्त होती है। वर्तमान समय में देश के अंदर भी मछली पालन के लिये केंद्र सरकार द्वारा गठित जलकृषि प्राधिकरण से पूर्वनुमाति लेनी पड़ती है। जिससे आय बढ़ती है।
भारतीय अर्थव्यवस्था एवम वाणिज्यिक फसलें
रबर चाय-काफी काजू जूट तम्बाकू और कपास देश के लिये बहुमूल्य विदेशी मुद्रा अर्जित करने में प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं। 1996-97 में भारत को केवल काफी के निर्यात से 38 करोड़ डालर की विदेशी मुद्रा प्राप्त हुई।
भारत में सन् 1947 से लेकर अब तक वाणिज्यिक फसलों के उत्पादन में कई गुना वृद्धि हुई है जैसे 1950-51 में देश में 24.6 हजार टन काफी का उत्पादन हुआ जो 95-96 में 233 हजार टन तक पहुंच गया। चाय का 95-96 में 762.35 मिलियन कि॰ उत्पादन हुआ जो वर्ष 94 से 34त्न अधिक था 95-96 में रबर का उत्पादन 5.07 लाख टन रहा जो 2000-2001 में 6.38 लाख टन पहुंच गया। 95-96 में कपास का उत्पादन 14.3 मिलियन गांठो का था जो बढ़कर 20 मिलियन गांठों तक पहुंच गया। तम्बाकू एवम जूट का उत्पादन भी इसी गति से गढ़ा। 1940 में जूट का उत्पादन मात्र 17 लाख गांठ था जो 1951 में बढ़कर 34 लाख गांठ हो गया। 95-96 में 94 लाख गांठ जूट उत्पादन किया गया जो 2001 में 112 लाख गांठ हो गया। देश में लगभग 40 लाख किसान जूट की खेती करते हैं। जूट से निर्मित उत्पादों से लगभग तीन करोड़ 90 लाख रूपये का निर्यात किया गया जो 2001 में 25 करोड़ से अधिक हो गया।
काफी के उत्पादन में भारतीय काफी बोर्ड का बहुत बड़ा योगदान रहा। बोर्ड ने उन्नतशील किस्म के नये बीजों को उपलब्ध कराया साथ ही विपणन एवम अन्य अनुसंधान कार्यों के करने में मदद की। यह बोर्ड काफी बागान लगाने वालों को तकनीकी व आर्थिक सहायता उपलब्ध कराता है। जूट उत्पादन में वृद्धि के लिये भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अंर्तगत बंगाल में बैरक में जूट कृषि अनुसंधान संस्थान स्थापित किया गया। कोलकाता स्थित जूट प्रौद्योगिक अनुसंधान शाला भी जूट से संबंधित उन्नत प्रौद्योगिक के विकास का कार्य करती है। भारतीय जूट निगम, राष्ट्रीय जूट विविधकरण केंद्र तथा जूट विकास परिषद के सदस्यों की सहायता से राष्ट्रीय स्तर पर जूट उत्पादन की जानकारी व जूट कृषि विस्तार जैसे कार्यों का संपादन होता है। विभिन्न प्रकार की पैकिंग पर्दे, फर्श, बिछौने, मोटे कपड़े टाइल्स बोर्ड जैसी उपयोगी तथा सजावटी वस्तुयें बनायी जाती है। जिनकी विदेशों में बहुत मांग है। अत: इस क्षेत्र उन्नत कृषि तकनीकों का समन्वयन कर जूट बाजार को नई ऊंचाई दी जा सकती है।
रबर का उत्पादन भारतीय रबर बोर्ड के संरक्षण में किया जाता है। इस बोर्ड में रबर के नये क्लोनीय बीज तैयार करने के अलावा रबर रोपण करने वालों को आर्थिक सहायता उपलब्ध करायी जाती है।
फल एवम् सब्जी उत्पादन के क्षेत्र में देश ने आत्मनिर्भरता ही नहीं बल्कि अभूतर्पूव तकनीकी प्रगति भी की है। कृषि का वैज्ञानिक ढ़ंग से ज्ञान होने पर ही आधुनिक ढंग अपनाये जा सकते हैं। फार्मिंग वह कृषि है जिससे फल-फूल व सब्जी को बड़े पैमाने पर व्यवसायिक दृष्टिकोण से अपनाया जा सकता है। केरल में पिछले वर्षों में सब्जी उत्पादन में आत्मानिर्भरता के लिये हरित वर्ष मनाया गया।
भारत का फल उत्पादन में महत्वपूर्ण स्थान है। भारत में विश्व के कुल फल उत्पादन का 8त्न फल उत्पादन होता है। भारत में फल उत्पादन का क्षेत्रफल 45 लाख हैक्टेयर है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का 8त्न बागवानी अनुसंधान पर व्यय किया जाता है। हमारे देश में प्रतिदिन प्रतिव्यक्ति फल उपलब्धता 60 ग्राम ही है जो विश्व के विकसित देशों से काफी कम है।भारत में कृषि उत्पाद या कृषि अवशेषों के उपयोग से अनेक कुटीर उद्योग लगाये गये हैं तथा अनेक नये उद्योगों की संभावना है। कपड़ा उद्योग, हस्त निर्मित कागज उद्योग, चीनी उद्योग आदि के लिये कच्चा माल कृषि से ही प्राप्त होता है।
दूसरी हरित क्रांति
आज देश की बढ़ती जनसंख्या की जरूरतों से निपटने के लिये कृषि वैज्ञानिक ऊतक संर्वद्धन द्वारा फसलों की उपयोगी प्राजातियों का प्रसार कर रहे हैं। इसके द्वारा बहुत कम संसाधनों के प्रयोग से न्यूनतम स्थान व लागत द्वारा बहुत बड़ी संख्या में उपयोगी पौधों को पैदा किया जा सकता है औषधि फसलें, व्यावहारिक फसलें चारा फसलें, इमारती लकड़ी वाले वृक्ष व सुंदर पुष्प् वाली फसलों को नई प्रजातियों को पैदा किया जा रहा है। यूके लिरटस, शहतूत, आंवला, आम शीशम सागौन, गुलमोहर एवम अनेक फूलवाले पौधों का ऊतक संवद्र्धन द्वारा उत्पादन संभव है। देश के विकास में आधुनिक अर्थ व्यवस्था का आधार कृषि व कृषि आधारित उद्योग है। कृषि कार्यों के साथ कृषि गतिविधियों को बदलते आधुनिक वैज्ञानिक रूप् को अनुरूप ढालना है। इस कार्य उत्कृष्ट कृषि, तकनीक एवम निरंतर अनुसंधान जरूरी है। देश की विशाल जनसंख्या का पोषण कृषि क्षेत्र की प्रथम जिम्मेवारी है। आर्थिक संपन्नता एवम् प्रगति के लिये खाद्यान्न एवम वनोत्पादों का निर्यात एक जरूरी कदम साबित हुआ है। आधुनिक कृषि तकनीकों का प्रभावोत्पादक विस्तार लगातार जारी रहे इस हेतु सरकार के साथ कृषि शिक्षा एवत महत्व मिलना चाहिये। देश में उन्नत कृषि संस्कृति को सुदृढ़ कर ही भारतीय अर्थव्यवस्था को स्थायी मजबूती दी जा सकती है। बिना कृषि से कामयाबी हासिल किये हम किसी सुखद भविष्य की कल्पना नहीं कर सकते।

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
betpark
mavibet giriş
imajbet güncel
betpark giriş
imajbet giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
imajbet güncel
imajbet güncel giriş
imajbet giriş
imajbet güncel
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
safirbet giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
savoycasino giriş
savoycasino giriş
savoycasino giriş
savoycasino giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
holiganbet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betnano güncel
betnano güncel giriş
bettilt giriş
imajbet güncel
imajbet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti
bettilt giriş
imajbet güncel
imajbet güncel giriş
bettilt giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
Grandpashabet giriş
safirbet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
artemisbet giriş
holiganbet güncel
grandpashabet giriş
safirbet giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
holiganbet giriş
vaycasino giriş
artemisbet giriş
artemisbet giriş
artemisbet giriş
artemisbet giriş
betpark giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
grandpashabet
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş