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आज का चिंतन

माता पिता की सेवा से ही संतान का जीवन सफल व सुखी होता है

ओ३म्
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हम इस संसार में माता-पिता के द्वारा जन्म प्राप्त पर यहां आये हैं। यदि हमारे माता-पिता न होते तो हमारा जन्म नहीं हो सकता था। हमारे जन्म की जो प्रक्रिया है उसमें हमारे माता-पिता को अनके प्रकार के कष्ट उठाने तथा पुरुषार्थ करने पड़ते हैं। यह ऐसा कार्य है कि जो कोई किसी दूसरे के लिये नहीं करता व कर सकता है। हमारा जन्म पूर्वजन्म में मनुष्य या किसी अन्य योनि में मृत्यु होने के पश्चात अपने कर्माशय को भोगने के लिये होता है। ईश्वर का विधान है कि मृत्यु होने पर जीवात्मा पुराना शरीर त्याग कर सूक्ष्म शरीर सहित शरीर से बाहर आ जाती है और जन्म प्राप्ति हेतु ईश्वर की प्रेरणा से अपने कर्माशय के योग्य माता-पिता के शरीरों में मनुष्यादि किसी योनि में ईश्वर की प्रेरणा से प्रवेश करती है वा माता के गर्भ में स्थित होती है। माता को अपनी सन्तान की रक्षा में अनेक प्रयत्न करने पड़ते हैं जिससे स्वस्थ शिशु का जन्म हो सके। यदि माता से कोई असावधानी हो जाये तो इससे भावी सन्तान को अनेक प्रकार की हानियां हो सकती हैं। दस मास गर्भ में रहकर मनुष्य का जन्म शिशु के रूप में होता है। नवजात शिशु रोने के अलावा अपना कुछ काम नहीं कर सकता। माता को अपनी सन्तान की आवश्यकताओं का ज्ञान होता है। वह उसे दुग्धपान कराने सहित उसको स्नान व निद्रा कराके उसका पोषण आदि करती है। उसका मल-मूल साफ करती है तथा अनेकानेक विघ्नों से उसकी रक्षा करती है।

दस माह तक अपने गर्भ में रखकर अपनी सन्तान को रखने से माता को अनेकानेक कष्ट उठाने पड़ते हैं जिसका शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता। यह सब मातायें अपनी सन्तान के सुख व उन्नति के लिये करती हंै। उसके बाद भी सन्तान की शिक्षा, रक्षा व पालन पोषण करने में माता को विशेष ध्यान देना पड़ता है। वर्षों तक की माता-पिता की तपस्या के बाद सन्तानें कुछ ज्ञान व धनोपार्जन का कार्य करने में समर्थ होती हैं। ऐसा करते हुए माता-पिता की आयु बढ़ती जाती है और वह प्रौढ़ व वृद्ध हो जाते हैं। उनके जीवन का युवावस्था का स्वर्णिम समय सन्तान की रक्षा, पालन पोषण व उनकी शिक्षा-दीक्षा में ही व्यतीत हो जाता है। आयु बढ़ने के साथ माता पिता के शरीर भी बलहीन होते जाते हैं और आजकल अनेक रोग भी कुछ माता-पिताओं को हो जाते हैं। प्रौढ़ व रुग्ण अवस्था में उनको अपने युवा सन्तानों की सहायता व सेवा की आवश्यकता पड़ती है। यह सहायता व सेवा सन्तान का भी कर्तव्य व धर्म होता है। प्राचीन काल से हमारे देश में वैदिक संस्कारों का प्रचलन रहा है। सब देशवासी संयुक्त परिवार में रहते थे और किसी को किसी प्रकार का कष्ट व दुःख होने पर एक दूसरे की सेवा करते थे। सन्तानें भी अपने माता-पिता की सेवा को अपना मुख्य धर्म व कर्तव्य समझती थीं परन्तु देश की आजादी के बाद देश मंग जो अंग्रेजी व स्कूली शिक्षा को लाया गया उससे सन्तानों में अपने कर्तव्यों की उपेक्षा भी देखने को मिलती है। आजकल सन्तानें माता-पिता की वह सेवा नहीं कर पाती जैसी कि उनसे अपेक्षा की जाती है। जो कुछ करती हैं वह धन्य हैं और जो नहीं करती उन्हें अपने आचार व विचारों में सुधार करना चाहिये।

जो सन्तानें वर्तमान समय में अपने माता-पिता की सेवा व सहायता की उपेक्षा करती हैं, उनसे अच्छा व्यवहार नहीं करतीं, उन्हें याद रखना चाहिये कि भविष्य में उन्हें भी माता-पिता बनना है और उनके साथ भी वैसा कुछ हो सकता है जैसा कि वह अपने माता-पिता आदि की उपेक्षा करके करते हैं। अतः संतानों को आरम्भ से ही उनके कर्तव्यों का बोध घरेलु व स्कूली शिक्षा में कराया जाना आवश्यक है। यदि उन्हें माता-पिता की सेवा विषयक संस्कार नहीं दिये जायेंगे तो बड़े होने पर कुछ कानून आदि बनाकर भी उनसे सेवा नहीं कराई जा सकती। जो सन्तानें अपने माता पिता की सेवा के स्थान पर उनकी उपेक्षा करती ह,ैं उनसे माता-पिता को सामथ्र्यवान होते हुए भी अनेक प्रकार के क्लेश होते हैं जिससे उनका जीवन चिन्ताओं व कष्टों में व्यतीत होता है। अतः धर्म व समाज शास्त्रियों को इस समस्या पर विचार कर उसके निवारण में कार्य करना चाहिये जिससे प्रौढ़ व वृद्धावस्था में माता-पिता सुख का जीवन व्यतीत कर सकें।

वैदिक धर्म एवं संस्कृति संसार की सबसे प्राचीन वा आदि संस्कृति है। वैदिक धर्म का प्रादुर्भाव ईश्वरीय ज्ञान वेदों से हुआ है। वेदों में माता, पिता तथा आचार्य को देवता कहा गया है। देवता वह होता है जो अनायास, बिना किसी प्रत्युपकार की भावना से दूसरों को कुछ न कुछ देता है। जड़ देवताओं पर विचार करें तो अग्नि, वायु, जल, अन्न, भूमि, गो आदि पशुओं से हमारा जीवन चलता है। यदि यह पदार्थ न हों तो हम जीवित नहीं रह सकते। इस लिये वेदों में इन सब पदार्थों को जिनसे हमें सुख प्राप्ति व पोषण होता है, देवता कहा जाता है। जड़ देवताओं के अतिरिक्त चेतन देवताओं में परमात्मा के बाद माता, पिता तथा आचार्य आदि का स्थान आता है। जीवित देवताओं में सन्तानों के सर्वाधिक पूजनीय, आदरणीय व आज्ञाओं का पालन करने योग्य माता, पिता व आचार्यों का स्थान होता है। मनुस्मृति के एक श्लोक में कहा गया है कि जहां नारियों वा माताओं के प्रति सद्व्यवहार होता है, वहां नारियां प्रसन्न व सन्तुष्ट रहती हैं तथा वहां उन परिवारों में सन्तान के रूप में देवता निवास करते हैं। यह देवता बचपन से ही देव बनकर आजीवन वृद्धावस्था पर्यन्त भी देव बने रहते हैं। अतः नारी जाति को वैदिक शिक्षाओं से युक्त, धर्म पारायणा तथा अपने कर्तव्यों के पालन में सजग व जागरुक रहना आवश्यक होता है। तभी वह गरिमा को प्राप्त हो सकती हैं।

वेदों की एक अत्यन्त उपादेय शिक्षा है कि भाई को भाई से, बहिन को बहिन से तथा भाई व बहिनों को भी परस्पर द्वेष भाव नहीं रखना चाहिये। सब भाई बहिन आपस में मित्रवत् प्रेम व स्नेह के व्यवहार से आबद्ध रहें। ऐसा करने पर ही मनुष्य व परिवार की उन्नति व सुखों में वृद्धि होती है। इस बात को सिद्धान्त रूप में प्रत्येक मनुष्य स्वीकार करता है परन्तु यह व्यवहार में देखने में नहीं आतीं। इसका कारण यही प्रतीत होता है कि मनुष्यों को अपने वैदिक कर्तव्यों व उनके महत्व का ज्ञान नहीं है। यदि ऐसा हो और वह इनका अवश्य पालन करें जिससे मनुष्य जीवन से अनेक दुःखों का निवारण हो सकता है। इस अभाव को दूर करने के लिये हमें सबसे अच्छा उपाय यही लगता है कि सभी आर्य व हिन्दू परिवारों में सत्यार्थप्रकाश, वेद, उपनिषद, दर्शन, विशुद्ध मनुस्मृति, चतुर्वेद भाष्य तथा आर्य विद्वानों के वेद विषयक व्याख्या ग्रन्थों की प्रतिष्ठा होनी चाहिये। सबको नियमित एक से दो घण्टे इन ग्रन्थों का स्वाध्याय करना चाहिये और आर्यसमाज के सत्संगों में भी सबको जाना चाहिये जहां वैदिक विद्वानों के जीवन के उत्थान व देश की उन्नति के उपदेश होते हैं। सत्पुरुषों वा ज्ञानियों की संगति से मनुष्य को अकथित लाभ होता है। इससे अज्ञानी व निरक्षर मनुष्य भी प्रेरणा ग्रहण कर उच्च कोटि का विद्वान बन सकता है। हमने यहां तक पढ़ा है कि श्मशान घाट में काम करने वाला एक बालक गुरुकुल के आचार्य के सम्पर्क में आकर कालान्तर में बहुत बड़ा विद्वान बन गया जिसकी संगति करने में विद्वान लोग भी अपना गौरव समझते थे। अतः न केवल माता-पिता की सेवा एवं कृतघ्नता से बचने के लिये स्वाध्याय व सत्संग की आवश्यकता है वहीं जीवन का सर्वविध कल्याण करने के लिये भी स्वाध्याय व सत्संग सहित ईश्वरोपासना आदि पंच महायज्ञों का किया जाना आवश्यक सिद्ध होता है।

माता-पिता की आदर्श सेवा का उदाहरण हमें बाल्मीकि रामायण ग्रन्थ का अध्ययन करने से भी मिलता है। राम वैदिक धर्म व संस्कृति के मूर्तरूप थे। उन्होंने वैदिक धर्म की शिक्षाओं को आत्मसात किया था। वह प्रातः व सायं अपनी सभी माताओं व पिता की चरण वन्दना व उनका सत्कार किया करते थे। उनका आचरण व व्यवहार आदर्श व्यवहार था। उन्होंने जीवन में अपने पिता व किसी माता को अपने किसी व्यवहार से शिकायत व आलोचना का अवसर नहीं दिया। इस कर्तव्य परायणता के लिये उन्हें अनेक कष्ट भी उठाने पड़े जिन्हें उन्होंने सहर्ष स्वीकार किया। पिता के वचनों का पालन करने तथा माता कैकेयी को सन्तुष्ट करने के लिये ही उन्होंने चैदह वर्ष वन में साधु वेश में रहना स्वीकार किया था। उन्होंने सहर्ष अपने छोटे भाई भरत को अपना राज्य प्रदान किया था जिसके वह स्वयं अधिकारी थे और प्रजा व भाई भी उनको ही राजा के रूप में देखना चाहते थे। ऐसा उदाहरण विश्व के इतिहास में मिलना असम्भव है। राम के द्वारा अपने पिता को कहे यह वचन सुनकर तो उनके प्रति श्रद्धा कई गुणा बढ़ जाती है जब वह पिता को कहते हैं कि आप मुझे अपने दुःख का कारण बताईये। यदि आप कहेंगे तो मैं बिना सोचे विचारे जलती हुई चिता में भी कूद कर अपने प्राण दे सकता हूं। क्या इससे बड़ा अपने पिता को सुख देने वाला सर्वस्व त्याग का उदाहरण कहीं मिल सकता है? जो सन्तानें अपने माता-पिता की सेवा-शुश्रुषा से दूर हैं, उन्हें अवश्य ही रामायण व इस प्रकार के उदाहरणों पर ध्यान देना चाहिये। माता-पिता ने उनके पालन पोषण में दुःख सहन किये हैं उन पर भी सन्तानों को विचार करना चाहियें।

आज के समाज में हम देखते हैं कि शिक्षा व संगति के कारण सन्तानों वा युवा पीढ़ी को माता-पिता के प्रति अपने कर्तव्यों का यथोचित ज्ञान नहीं है। वह प्रायः स्वच्छन्द जीवन व्यतीत करना चाहते हैं। ऐसा सोचना व करना भारतीय वैदिक संस्कृति के सर्वथा विपरीत तथा भोगवादी पश्चिमी संस्कृति की देन है। ऐसा करना जीवन के उत्तर काल में अवश्य दुःख वा क्लेश देता है। अतः हमें अपनी संस्कृति पर पुनः लौटने की आवश्यकता है। हमने अनेक परिवारों में वृद्ध माता-पिताओं से उनके सन्तान-मोह व सन्तानों के माता-पिता के प्रति अप्रिय व्यवहार के कृत्यों को देखा, सुना व अनुभव किया है। इसी कारण हमने इस लेख की इन पंक्तियों को लिखा है। लेख को समाप्त करने से पूर्व हम महाभारत में यक्ष के प्रश्नों के उत्तर में कहे गये युधिष्ठिर जी के वचनों को उद्धृत करना चाहिते हैं। राजा युधिष्ठिर में यक्ष को कहा था कि माता पृथिवी से भारी है। पिता आकाश से भी ऊंचा है। मन वायु से भी अधिक तीव्रगामी है और चिन्ता तिनकों से भी अधिक असीम विस्तृत व अनन्त है। युधिष्ठिर के वचन हैं ‘माता गुरुतरा भूमेः पिता चोच्चतरं च खात्।’ शास्त्र माता को सन्तान की निर्माता बताते हैं। महाराज मनु ने कहा है कि दस उपाध्यायों से एक आचार्य, सौ आचार्यों की अपेक्षा एक पिता और हजार पिताओं की अपेक्षा एक माता गौरव में अधिक वा बड़ी है। वैदिक संस्कृति में प्रति दिन जीवित माता-पिताओं की पूजा व सेवा-सुश्रुषा करने का विधान है। हमने इन श्रेष्ठ परम्पराओं को छोड़कर अपनी भारी क्षति व परजन्म के सुखों का नाश किया है। हमें पुनः वैदिक धर्म व संस्कृति को प्रवृत्त कर जन्म व परजन्म में होनेवाली हानियों से बचना चाहिये। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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