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राजनीति

कांग्रेस को ‘किसान प्रेम’ और उसके चलते लिए जा रहे कृषि से संबंधित फैसले रास नहीं आ रहे

अजय कुमार

कृषि संबंधी विधेयकों के पास होने के बाद देश के अनेक हिस्सों में राजनीति का गरमाना जितना स्वाभाविक है, उतना ही चिंताजनक भी है। विरोधी दलों के नेताओं द्वारा किसानों के प्रदर्शन के सहारे मोदी सरकार की छवि को पूंजीपतियों वाली सरकार के तौर पर पेश किया जा रहा हैं।

कांग्रेस फिर ‘सड़क’ पर है। किसानों के नाम पर कांग्रेसी जगह-जगह उग्र प्रदर्शन कर रहे हैं। प्रदर्शन का स्वरूप ठीक वैसा ही है जैसा उसने भूमि अधिग्रहण बिल, कश्मीर से धारा 370 हटाने, एक बार में तीन तलाक, सर्जिकल स्ट्राइक, राफेल विमान खरीद, नागरिकता संशोधन बिल (सीएए), अयोध्या विवाद आदि के समय किया था। यानि सच्चाई को छिपा कर झूठ का आभामंडल तैयार करने वाला। कोरोना महामारी एवं पाकिस्तान और खासकर चीन से तनातनी के बीच भी कांग्रेस प्रदर्शन कर रही है। आम कांग्रेसी तो दूर राहुल गांधी तक चीन के प्रवक्ता की तरह व्यवहार कर रहे हैं। कांग्रेस उन मौकों पर कुछ ज्यादा उतावली दिखाई देती है, जब किसी राज्य में चुनाव होने को होते हैं। बिहार और पश्चिम बंगाल में इसी वर्ष तो पंजाब जहां कांग्रेस की सरकार है, में करीब दो वर्षों के बाद विधान सभा चुनाव होने हैं, इसलिए कांग्रेस नहीं चाहती है कि प्रधानमंत्री मोदी किसानों के हित में कोई ऐसा फैसला लें जिसका खामियाजा कांग्रेस को चुनाव के मैदान में भुगतना पड़े।

चुनावी माहौल में कांग्रेस को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का ‘किसान प्रेम’ और उसके चलते लिए जा रहे कृषि से संबंधित फैसले रास नहीं आ रहे हैं। दोनों सदनों में कांग्रेसी सांसद मोदी सरकार की नीयत पर सवाल उठा रहे हैं। और तो और पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह भी अपनी सरकार और कांग्रेस के चुनावी घोषणा पत्र में किए गए वायदों, जिसे मोदी सरकार पूरा कर रही है, को भूल कर ओछी सियासत में लगे हैं।

किसान बड़ा वोट बैंक है इसलिए हमले की रफ्तार भी तीव्र है। कांग्रेस के सुर ठीक वैसे ही हैं जैसे 2015 में मोदी सरकार के प्रथम कार्यकाल के दौरान भूमि अधिग्रहण बिल के समय देखने को मिले थे, तब पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने एलान कर दिया था कि मोदी सरकार द्वारा किसानों के हितों पर डाका डाल करके औद्योगिक घरानों से लिए गए भारी कर्ज को चुकाने के लिए भूमि अधिग्रहण विधेयक लाया गया है। उस समय राहुल के साथ-साथ पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी कहा था कि नया विधेयक 2013 के कानून को कमजोर करने के लिए लाया गया है।

कांग्रेस का विरोध समझ में आता, यदि उसकी सोच किसान हितों से जुड़ी नजर आती, लेकिन नजारा दूसरा है। किसानों के बहाने कांग्रेस मोदी सरकार को झुकाना चाहती है। इसी के चलते कांग्रेस कृषि संबंधी उन विधयकों का विरोध कर रही है, जिसे वह अपने कार्यकाल में कानून जामा पहनाना चाहती थी, लेकिन इच्छाशक्ति के अभाव में वह ऐसा कर नहीं पाई थी। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने एक कार्यक्रम के दौरान किसानों को उनकी फसल पूरे देश में कहीं भी बेचने देने की छूट मिले, इसकी वकालत करते हुए कहा था कि इससे किसानों को उनकी पैदावार का उचित दाम मिलेगा और बिचैलियों की भूमिका काफी सीमित हो जाएगी, लेकिन यही काम जो मोदी सरकार ने कर दिखाया तो कांग्रेसी प्रलाप कर रहे हैं। किसानों को उल्टी-सीधी जानकारी देकर भड़काया जा रहा है। कांग्रेस ने कृषि संबंधी विधयेक पास होने के बाद उसके विरोध में जो बिगुल फूंक रखा है, उसके लिए मोदी सरकार भी कम जिम्मेदार नहीं है। अगर विधेयक पास कराने से पूर्व किसानों को विश्वास में ले लिया जाता तो शायद कांग्रेस को मुखर होने का बड़ा मौका नहीं मिलता। कांग्रेस तो कांग्रेस जब भाजपा गठबंधन के प्रमुख घटक आकाली दल की मंत्री हरसिमरत कौर को इस बात का मलाल हो कि विधेयक पास करने से पूर्व अकाली दल को विश्वास में नहीं लिया गया तो समझा जा सकता है कि मोदी सरकार से कहीं न कहीं चूक तो हुई है। वैसे ऐसे लोग भी कम नहीं हैं जिनको लगता है कि पंजाब की सियासत में किसानों के दबदबे को देखते हुए अकाली दल कोटे की मंत्री ने मंत्री पद छोड़ा है।

बहरहाल, कृषि संबंधी विधेयकों के पास होने के बाद देश के अनेक हिस्सों में राजनीति का गरमाना जितना स्वाभाविक है, उतना ही चिंताजनक भी है। विरोधी दलों के नेताओं द्वारा किसानों के प्रदर्शन के सहारे मोदी सरकार की छवि को पूंजीपतियों वाली सरकार के तौर पर पेश किया जा रहा हैं। मोदी सरकार भले किसानों के लिए अच्छा कानून लाई हो, लेकिन उसे विरोधियों की चालबाजियों के चलते बड़ा सियासी नुकसान न हो, इसके लिए मोदी सरकार को किसानों का विश्वास जीतने का क्रम लगातार जारी रखना चाहिए। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इन विधेयकों के विरोध में केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने न सिर्फ इस्तीफा दे दिया, बल्कि उनका इस्तीफा स्वीकार भी कर लिया गया। खैर, सरकार ने अपनी ओर से साफ संकेत दे दिया है कि वह इस मामले में पीछे नहीं हटेगी। अगर कोई फैसला देश या किसी समाज के हित में लिया जा रहा है तो सरकार को दबाव में आकर पीछे हटना भी नहीं चाहिए। मगर यह भी सच है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कृषि विधेयकों के पास होने के बाद जिस तरह से किसानों को समझा रहे हैं, अगर वह पहले यह कदम उठा लेते तो ज्यादा बेहतर रहता। पीएम ने कृषि संबंधी विधेयकों की पैरोकारी करते हुए स्पष्ट कर दिया है कि जो किसानों से कमाई का बड़ा हिस्सा खुद ले लेते हैं, उनसे किसानों को बचाने के लिए इन विधेयकों को लाना बहुत जरूरी था। उन्होंने यह भी कहा कि ये तीनों विधेयक किसानों के लिए रक्षा कवच बनकर आए हैं। प्रधानमंत्री की भावना के अनुरूप ही किसानों को विश्वास में लेने की जरूरत है।

लब्बोलुआब यह है कि कोई भी फैसला लेने से पूर्व किसी भी सरकार के लिए जनभावनाओं को ध्यान में रखते हुए जनता से संवाद बनाना जरूरी है। इसी तरह से विपक्ष को भी विश्वास में लिया जाना चाहिए। यह सब लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है। लेकिन यह सिक्के का एक पहलू है, जब विपक्ष सरकार के किसी भी फैसले या निर्णय का विरोध के नाम पर विरोध करेगा तो सरकार ऐसे विपक्ष से संवाद बनाना उचित नहीं समझेगी। बात हरसिमरत कौर के इस्तीफे की है तो सब जानते हैं कि पंजाब और हरियाणा की राजनीति किसानों के इर्दगिर्द घूमती रहती है। पार्टियों और नेताओं में खुद को किसान सिद्ध करने की होड़ रहती है। ऐसे में अकाली दल के केंद्रीय मंत्रिमंडल से बाहर जाने का सीधा अर्थ है कि अकाली दल मोदी सरकार के लिए किसानों की नाराजगी मोल नहीं लेना चाहता है। वह विरोध को झेलने की स्थिति में नहीं है। हरसिमरत कौर के ऐन मौके पर इस्तीफा देने के कारण ही प्रधानमंत्री ने कहा था कि राजनीतिक पार्टियों द्वारा यह दुष्प्रचार किया जा रहा है कि किसानों से धान-गेहूं इत्यादि की खरीद सरकार द्वारा नहीं की जाएगी, जो झूठ है।

उम्मीद है कि कृषि संबंधी विधेयकों के पास होने के बाद फैली भ्रांति प्रधानमंत्री के किसानों को संबोधन के बाद काफी हद तक दूर हो गई होगी। जो नेता खुद को किसानों का पक्षधर बताते हैं, उन्हें आगे आकर किसानों के लाभ को सुनिश्चित करना चाहिए। कृषि क्षेत्र में खुला बाजार और कंपनियां हमारे देश में नई बात नहीं है, इस खुले बाजार में भी किसानों के हितों की रक्षा करना सरकारों की जिम्मेदारी है। देश में किसानों की बदहाली से सभी वाकिफ हैं, इसलिए उनकी हरेक चिंता का निवारण करना सरकारों का प्राथमिक दायित्व है। यह भी ध्यान रहे, किसानों का शोषण करने वाले लोग विदेश से नहीं आते, यहीं हमारे बीच से खड़े होते हैं। कृषि और कृषकों के दुश्मन दलालों और कंपनियों को स्थानीय स्तर पर ही संगठन की शक्ति से नियंत्रित करना होगा।

किसान नेता अगर साफगोई से विधेयक के बारे में किसानों को समझाएं तो हो सकता है कि कुछ दिनों में विरोध के सुर फीके पड़ जाएं। जहां तक बात किसानों के लिए मोदी सरकार द्वारा लिए गए फैसलों की है तो, पूरी दुनिया के किसान जिस कृषि बाजार और व्यवस्था के सहारे फलफूल रहे है, उसी व्यवस्था से भारत के किसानों को नुकसान होगा, ऐसा नहीं सोचा जा सकता है। फिर ऐसे निर्णय तो पूर्ववर्ती मनमोहन सरकार भी लेना चाहती थी। तमाम राज्यों की गैर भाजपाई सरकारों को घटिया सियासत से बाज आना चाहिए। जब प्रधानमंत्री मोदी बार-बार कह रहे हैं कि किसानों के हित के साथ-साथ राज्य सरकारों को मंडी से मिलने वाले राजस्व में कोई बदलाव नहीं किया गया, तो बेकार का हौवा खड़ा करना देशहित में नहीं है। चुनाव आते हैं, चले जाते हैं, लेकिन देश सर्वोपरि होता है। यह किसी को नहीं भूलना चाहिए। किसानों के लिए जो ‘कल’ मनमोहन सरकार में सही था वह ‘आज’ मोदी सरकार के समय गलत कैसे हो सकता है।

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