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गायत्री मंत्र से सिद्घि प्राप्त व गुरू मंत्र के प्रचारक

गुरू मन्त्र
ओ३म भुर्भूव: स्व:। तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।
धियो यो न: प्रचादयात ।।

महेन्द्र सिंह आर्य
यह मंत्र संसार के सब गुरू मंत्रों का गुरू मंत्र है। इस मंत्र की बराबरी संसार कोई का कोई भी गुरू मंत्र नही कर सकता। क्योंकि इस गुरू मंत्र का सृष्टा, दृष्टा व नियंता आप सच्चिदानंदस्वरूप निराकार, निर्विकार, सर्वज्ञ, अनंत, अनादि, अनुपम, एक रस ज्ञान का स्वामी, दयालु, सृष्टिकर्ता, संसार का कर्ता, भर्ता, हर्ता, सर्वव्याप्त, नित्यशुद्घबुद्घमुक्तस्वभाव, सब सुखों का दाता, सर्वत्र प्राप्त होता, वेद ज्ञान का दाता जो जीवों को उनके कर्मो के आधार पर उनको शरीर धर्म, अर्थ, काम मोक्षादि पदार्थों का देने वाला सर्वव्यापक, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वान्तर्यामी, न्यायकारी, सर्वशक्तिमान, सर्वनियन्ता, सव का उत्पादक, माता पिता गुरू, राजा सर्व न्यायाधीश, जो जन्म व मृत्यु को कभी प्राप्त नही होता। जो नाडी बंधन में कभी नही आता, जो संसार के किसी पदार्थ का भोग नही कर्ता और क्षमादि गुणों से रहित (किसी को माफ नही करता) जो सृष्टि का निमित्त कारण आदि। उपरोक्त गुणों से युक्त है। यह गायत्री गुरू मंत्र के उपासक का रक्षक आप ओउम है।
और अन्य संसार में प्रचलित सभी गुरू मंत्रों के सृष्टा। अल्पज्ञ, देहधारी, दुखी, परतंत्र, पराश्रित, वेदनिन्दक, मरकर अपने कर्मों का फल ओउम से पाने वाले। अपने अपने मंत्रों के निर्माता तो हैं। पर नियंता नही हैं। क्योंकि संसारके अंदर सर्वगुण संपन्न केवल एक ओउम है। हम सब जीवात्मा और संसार की समस्त रचन सामग्री। जो संसार का उपादान कारण सब उसके आधीन है।
गायत्री गुरू मंत्र सत्यता पर आधारित है। इसलिए इस सत्य को किसी से छुपाने की आवश्यकता नही है।
क्योंकि आज नकली मन घडंत कपोल कल्पित तथाकथित अपनी पूजा के लिए गुरू मंत्रों को छिपाकर डराकर मंत्र देने का प्रचलन धर्म के दुश्मनों ने चला दिया है। छिपाया अपनी कमजोरियों, कमियों, व कुकर्मों आदि को जाता है। गलत व्यक्ति को अपनी पोल खुलने का भय कर वक्त सताता रहता है। अपने अच्छे कर्मों को सब मनुष्य बताना चाहते हैं। क्योंकि उससे गौरव की प्राप्ति होती है।
अर्थात सत्य को छिपाने की कोई आवश्यकता नही है और जिसको छिपाने की आवश्यकता है। वह सत्य नही है सब मनुष्य अर्थात स्त्री, पुरूष, बच्चे, युवा व वृद्घ इस गुरू मंत्र का जाप कर सकते हैं।
पदार्थ :-हे मनुष्यो! सब हम लोग (य:) जो (न:) हम लोगों (धिय:) बुद्घियों को (प्रचोदयात) उत्तम गुण कर्म और स्वभावों में प्रेरित करें उस (सवितु:) संपूर्ण संसार के उत्पन्न करने वाले और संपूर्ण ऐश्वर्य से युक्त स्वामी और (देवस्य) संपूर्ण ऐश्वर्य के दाता प्रकाशमान सब के प्रकाश करने वाले सर्वत्र व्यापक अंतर्यामी के (तत) उस (वरेण्यम) सब से उत्त प्राप्त होने योग्य (भर्ग:) पापरूप दुखों के मूल को नष्ट करने वाले प्रभाव को (धीमहि) धारण करें।
भावार्थ :-जो मनुष्य के सब के साक्षी पिता के सदृश वर्तमान न्यायेश दयालु शुद्घ सनतन सब के आत्माओं के साक्षी परमात्मा की ही स्तुति और प्रार्थना करके उपासना करते हैं उनको कृपा का समुद्र सब से श्रेष्ठ परमेश्वर, दुष्ट आचरण के पृथक करके श्रेष्ठ आचरण में प्रवृत्त करा और पवित्र तथा पुरूषार्थयुक्त करके धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को प्राप्त कराता है। जो इस गुरू मंत्र का जप तदर्थभावना व तदानुकूल आचरण से करते हैं। उनके सब दुख दरिद्रता समाप्त हो जाते हैं। क्योंकि जप के प्रभाव से (ओउम) आत्मा में, सत्य पुरूषार्थ, पराक्रम, निरालस्यता और विज्ञानादि गुणों को उत्पत्ति कर देता है जिससे सुख साधनों की प्राप्ति हो जाती है। गुरू मंत्र जप करने की विधि जब आप जप करना चाहते हैं।
प्रात: व सांय काल स्नान या मुख्य हाथ पैर धोकर किसी एकांत स्थान में जाकर जहां पर शुद्घ वायु आती और जाती हो किसी साफ आसन पर बैठकर लंबे लंबे स्वास लेते रहें कम से कम दो बार और अधिक से अधिक सामर्थानुसार गुरू मंत्र का जप व अर्थ विचार करें निरंतर जप के सफलता सिद्घ हो जाती है।

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