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मुजफ्फरनगर दंगों का असली गुनाहगार कौन है

रज्जाक अहमद

मुजफ्फ रनगर शहर व देहात में दंगा कैसे हुआ? अब इस पर से पर्दा उठ चुका है। इसका असली गुनाहगार कौन-कौन हैं? यह सबके सामने है। 27 अगस्त को मामूली छेड़छाड़ से शुरू हुआ दंगा जिसमें तीन जानें चली गयी थी उसमें दोशियों के खिलाफ निश्पक्ष व कड़ी कार्यवाही हो जाती तो षायद दंगा नहीं होता और बाद में हुई पचासों हत्याऐं नही होती पचास हजार लोग बेघर ना होते। सरकार की ना समझी या प्रषासन की लापरवाही ने यह सब कराया या तो इसकी गंभीरता को नहीं समझा या जान-बूझकर ऐसा किया गया ये अलग विशय है। लेकिन अब इसके बाद राजनीति के व्यापारियों को मुद्दा मिल गया। दंगा होने के बाद जिले में धारा 144 लगा दी गयी थी इसके बाद भी कानून की परवाह न करते हुये, वहाँ के बसपा सांसद कादिर राणा, विधायक नूर सलीम राणा, विधायक सईदुज्जमा, सपा नेता राषिद सिद्दीकी व अन्य ने एक समुदाय विषेश की पंचायत की जिसमें भीड़ के सामने तमाम तरह के भड़काऊ भाषण दिये गये। जिसने बहुसंख्यक समाज में उत्तेजना पैदा कर दी। रोष बढ़ता गया पहले हत्याओं में कार्यवाही ठीक से नही हुई और अब पंचायत के खिलाफ भी कुछ नहीं हुआ, इसी से जनभावना भड़की इसका फ यदा उठाते हुये दूसरे वोटों के व्यापारी नेताओं ने 7 सितम्बर की पंचायत का ऐलान कर दिया, जिसका मुद्दा धर्म व बेटी को बनाया गया, प्रचार भी उसी का हुआ। सरकार व प्रशासन इसे समझने में नाकाम रहा। पंचायत में लाखों की भीड़ जुटी देखकर भाजपा विधायक संगीत सोम, विधायक सुरेश राणा, सत्यपाल मलिक, यशपाल मलिक, राकेश टिकैत राष्टरीय लोक दल नेता व अन्य ने इसका राजनीतिक लाभ उठाने के चक्कर में खूब भडकाऊ भाषण दिये, जिसका नतीजा आज हमारे सामने है। कितने बेगुनाह लोग मारे गये। मरने वालों में वे सब लोग थे जिनका ना तो दंगे से मतलब था ना पंचायत से। ये सब खेतीहर मजदूर या साझे पर खेती करने वाले या किसानों की बेगार करने वाले लोग थे। ना पहली पंचायत के नेताओं का ना दूसरी पंचायत के नेताओं का ना कोई परिवार का मरा और न ही रिष्तेदार मरा। दंगा क ई थाना क्षेत्रों में फैल गया प्रषासन मूकदर्शक बना रहा। रही सही कसर डी.एम. व एस.एस.पी. के तबादले ने पूरी कर दी। दंगा डयूटी पर तैनात एस.पी क्राईम राम अभिलाष त्रिपाठी का ये कहना है कि ये तो होना ही था। किस तरफ इशारा करता है। क्या दंगा नियोजित था अब शुरू हुआ लाशों पर सियासत का खेल। विधान सभा में मुजफ्फरनगर कांड पर दो घंटे चली बहस में पार्टी नेताओं ने दंगा पीडितों पर कम अपने पार्टी के हित व वोट बैंक पर ही ब्यान दिया। एक दूसरे ने अपने विरोधियों पर ही हमला किया। पीडितों पर बोलने के लिए किसी के पास समय नहीं था। दंगे पर हो रही मुस्लिम राजनीति में उलेमा भी कूद पड़े ये सब अखिलेश सरकार को धमकाकर अपने हित साधना चाहते हैं। अब दौर शुरू होगा गिरफ्तारी का फि र गिरफ्तारी को कैसे भुनाया जाये इसके लिए धरना प्रदर्शन बन्द जेल में बन्द नेताओं के छूटने के बाद लम्बे-लम्बे जूलुस जैसे इन्होंने देश के लिए बहुत बड़ा काम किया है। दंगे में उजाड़ दिये गये लोगों की चिन्ता किसी को नहीं। इमाम बुखारी का ब्यान आजम खाँ को पार्टी से निकाल दिया जाये, इमाम साहब क्या आजम खाँ को पार्टी से निकाल देने से प्रदेश में दंगे रूक जायेंगे आपको पता होना चाहिये सत्रह महिने की अखिलेष सरकार में प्रदेष में अब तक 39 सांप्रदायिक दंगे हुये हैं। अब मुजफ्फरनगर को जोड़ कर 40 हो गये। लेकिन ये दंगा प्रदेश का सबसे बड़ा दंगा था, कुछ मुस्लिम धर्म गुरू दिल्ली जाकर मुलायम सिंह से मिले लगता है फिर कोई नया सौदा हो रहा है। उप्र सरकार की कार्य प्रणाली व पूरा सिस्टम सवालों के घेरे में है। सभी पार्टी व नेता वोटों का समीकरण फिट कर रहे हैं। इनमें कुछ हिन्दुओं के अलम्बरदार है। कुछ मुसलमानों के ये ना देश के हमदर्द हैं। ना समाज के ये सिर्फ वोटों के व्यापारी हैं। विश्वास कहाँ-2 टूटा जिस किसान नेता महेन्द्र सिंह टिकैत की एक आवाज पर लाखों किसान अपना घर व बच्चे छोड़ कर महीनों तक सड़कों व पार्कों में पड़े रहते थे। उनमें ना कोई हिन्दू ना कोई मुसलमान ना दलित होता था सबकी एक ही बिरादरी थी किसान, सबका एक जगह खाना एक हुक्का एक ही मकसद आज उसी के बेटे ने किसानों का जाति बिरादरी में बांट दिया संवेदना खत्म हो इन्सानियत मर गई हैवानियत ने अपना काम किया सरकार के गलत फैसले ने सब कुछ तबाह कर दिया। ए.डी.जे. कानून व्यवस्था अरूण कुमार का ये ब्यान मुझे यू.पी. में काम नही करवाने केन्द्र में प्रतिनियुक्ति पर जाना चाहते हैं। यह बयान किस तरह इशारा करता है। दबाब कितना था यह अधिकारियों की लाचारी भी दर्शाता है। अब ए.डी.जे. अरूण कुमार को हटा दिया गया वजह रही नेताओं पर लग रही रासुका का विरोध। अब अखिलेष यादव जी कहते है कि यू.पी. में कानून व्यवस्था ठीक करने की जरूरत है। मुख्यमंत्री जी कानून से पहले आत्मा ठीक करने की जरूरत हैै। दंगा पीडितों के बीच प्रधानमंत्री जी गये साथ में सोनिया गांधी व राहुल भी गये हालात देखकर व दंगा पीडितों से मिलकर उन्होंने दंगईयों के खिलाफ कडी कार्यवाही का भरोसा दिलाया कार्यवाही होनी भी चाहिए और सख्त से सख्त होनी चाहिए। मगर निश्पक्ष व दोनों तरफ से गुनहगारों के खिलाफ। इसका दूसरा पहलू ये भी है कि क्या कड़ी कार्यवाही इस मसले का हल है। जो विश्वास टूट गया है आपसी सौहार्द खत्म हो गया है। अविष्वास ने घेर लिया है, समाज में जो खाई पैदा हो गई है क्या ये सब बहाल हो पायेगा। मैं समझता हूँ कि किसी भी सख्त कार्यवाही से दरार और बढ़ेगी अगर इसे कम करना है तो आप सी भाईचारा व वही पुराना सौहार्द फिर कायम करना होगा। उजाड़ दिये गये परिवारों को विश्वास दिलाकर उन्हें फिर बसाना होगा। अगर इस वैमन्शय को कम करना है। तो सभी समाज के जिम्मेदार लोग व सामाजिक कार्यकर्ता लोगों को जोड़कर बैठे। उजड़े लोगों को बसाने में सहयोग करें और नेता वोटों की राजनीति बन्द करें। यह तभी हो सकता है जब सभी पार्टियों के उन नेताओं को इससे अलग रखा जाये जो पंचायतों से जुड़े हैं या इस सबके लिये दोशी है और सरकार से भी प्रार्थना है कि अब यह नूरा कुश्ती बन्द होनी चाहिये। बहुत नुकसान व बर्बादी हो चुकी है। जनता से कुछ भी छुपा हुआ नही है। सब कुछ पर्दे से बाहर है। पहले यह सब अंग्रेज किया करते थे। अब फर्क इतना है कि वो गोरे थे ये काले है। मुख्यमंत्री जी, दंगे में हिन्दु मरे या मुसलमान, मजदूर मरे या किसान हिसाब सबका, जवाब सबका आप ही को देना है।
(लेखक वरिष्ठ समाज सेवी हैं)

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