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विशेष संपादकीय

मनुज धर्म और पशु

मैं प्रात:काल भ्रमण कर रहा था। मैंने देखा-सड़क के एक किनारे पर दो कुत्ते एक दूसरे के लिए गुर्रा रहे थे। कुछ ही क्षणों में एक कुत्ते ने सहम कर अपनी गर्दन नीची कर ली और अपनी पूंछ पिछली टांगों के बीच में दे ली। दूसरा बलशाली कुत्ता सहमे हुए कुत्ते के ‘आत्मसमर्पण’ के भाव को देखकर उससे बिना कुछ कहे आगे निकल गया।
दोनों कुत्तों के इस क्रिया कलाप ने मुझे सोचने के लिए विवश किया। मैं सोच रहा था कि कई बार हम ऐसा भी देखते हैं कि एक कुत्ता दूसरे डरे हुए कुत्ते की छाती पर आ चढ़ता है, पर वह दूसरा कुत्ता डरकर धरती पर लेट जाता है। वह दांत निकालता है और मानो बलशाली कुत्ते से अपने प्राणों की भीख मांगता है। तब अधिकांशत: ऐसा होता है कि बलशाली कुत्ता डरे हुए कुत्ते को छोड़कर आगे बढ़ जाता है, उसे मारता नही है। वह समझ जाता है कि दूसरे ने डरकर तेरे सामने आत्मसमर्पण कर दिया है।
पर मनुष्य ऐसा नही करता। मनुष्य जिससे शत्रुता मानता है उसे नष्ट करके ही दम लेना चाहता है। मनुष्य के सामने दूसरा मनुष्य डरे या सहमे या आत्मसमर्पण करे, वह सारी क्रियाओं को दूसरे मनुष्य का नाटक कहकर उपेक्षित करता है और उसके प्राण ले बैठता है। अच्छा कौन हुआ मनुष्य या कुत्ता?
जब मनुष्यों में दो भाई परस्पर किसी बात पर लड़ते झगड़ते हैं, तो अक्सर उस समय भी उनकी कुत्तों से उपमा दी जाती है। कारण इसका यही है कि कुत्तों में ‘स्वजातिद्रोह’ भयानक स्तर का होता है। परंतु ध्यान रहे कुत्तों में ‘स्वजातिद्रोह’ तो होता है पर स्वरक्तद्रोह नही होता। कभी भी कोई कुत्ता अपने सजातीय बंधु का मांस नही खाता। वह मृत कुत्ते को सूंघकर चला जाता है। कभी भी मृत बंधु के मांस को न खाकर अपने भाई को श्रद्घांजलि देना वह अपना धर्म मानता है। परंतु मनुष्य क्या करता है? भाई ही भाई की हत्या कर डालता है। कितने ही स्थानों से रोंगटे खड़े करने वाली सूचनाएं मिलती हैं कि अमुक व्यक्ति ने अमुक व्यक्ति की हत्या की और उसके मृत देह को फ्रीज में रखकर दस दिन तक खाता रहा।
कितने ही स्थानों पर मनुष्य-मनुष्य के गर्भस्थ शिशुओं को (समय पूर्व गर्भपात कराके) पकौड़ी की भांति तलकर खा रहा है। अच्छा कौन हुआ? -कुत्ता या मनुष्य।
कुत्ता स्वामी भक्त होता है। जिसका खाता है उसके प्रति कृतघ्नता का प्रदर्शन नही करता। सदा ही कृतज्ञ भाव का प्रदर्शन करता है और अपने स्वामी की चरणवंदना करता है। परंतु मनुष्य स्वार्थ के लिए मित्रता करता है, स्वार्थ के लिए संबंधों का निर्वाह करता है। दूसरों के प्रति ‘यूज एण्ड थ्रो’ की नीति अपनाता है। कभी भी किसी के प्रति कृतज्ञ नही होता। छोटी छोटी गलतियों को पकड़ पकड़कर शिकायतों का ढेर लगाये रखता है और उन शिकायतों की जलन से स्वयं भी जलता है और दूसरों को भी जलाता है। अब एक दूसरा उदाहरण लें। लगभग एक वर्ष पूर्व मैं इसी प्रकार प्रात: कालीन भ्रमण पर था। तब एक प्रात: एक कुत्ता मुझे दिखाई दिया। वह कुत्ता मेरी ओर टकटकी लगाए देख रहा था। मानो मुझे देखना चाहता था कि यह व्यक्ति मुझसे कहेगा या यूं ही निकल जाएगा? मैंने उसकी मानसिकता को समझा और अपनी बात की पुष्टिï के लिए यूं ही धरती की ओर मैं झुका और झुककर मैंने ईंट पत्थर उठाने का नाटक किया। जब तक मैं ऊपर उठा तब वह कुत्ता बड़ी तेजी से भाग कर मैदान छोड़ चुका था। अगली प्रात:काल में वह कुत्ता मुझे फिर वहीं उसी स्थान पर मिला जहां पहले दिन मिला था।
पर आज उसके साथ चार पांच कुत्ते और थे। वह मुझे फिर पहले दिन की भांति ही देखने लगा। मैंने देखा कि वह अपने अन्य साथियों को भी अपनी भाषा में समझा चुका था कि इस व्यक्ति से खतरा हो सकता है। मैंने फिर पहले दिन वाला नाटक किया और वह अपने सभी साथियों के साथ वहां से भाग लिया। मैंने यह प्रयोग उस कुत्ता समुदाय पर बार-बार किया।
तब मैंने समझा कि कुत्ते ने मुझसे होने वाले संकट को अपने अन्य सभी साथियों को भी बताया और उन्हें भी मुझसे बच निकल कर भागने के लिए प्रेरित किया। अब आइए चलते हैं मनुष्य की ओर। कुछ समय पूर्व केदारनाथ में प्राकृतिक आपदा आई तो वहां मनुष्य ने मनुष्य के साथ क्या किया? वहां व्यक्ति को ही व्यक्ति ने लूटा, मृत देहों की अंगुलियों को केवल इसलिए काट डाला कि उनमें अंगूठियां थीं।
बात साफ है कि मनुष्य ने मनुष्य को आपत्ति में सहयोग नही दिया अपितु उसे नोंचा, और अपनी पाशविकता का खेल खेला।
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इन दोनों उदाहरणों से यही सिद्घ होता है कि मनुष्य अपने धर्म को भूल गया या उससे पतित हो गया है जबकि पशु जगत अपने धर्म को भूला नही है वह आपदाकाल में भी उस पर स्थिर रहता है। यहां तक कि जिसे हम कुत्ता कहते हैं वह भी अपने धर्म का निर्वाह उसी प्रकार कर रहा है जैसे सृष्टि के प्रारंभ में कर रहा था। जबकि मनुष्य ने अपना धर्म भुला दिया। महान कौन है-मनुष्य या पशु?

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