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आज का चिंतन-17/10/2013

नालायक और धूत्र्त होते हैं

कामों के बोझ का राग अलापने वालेimages (11)

– डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

 

आजकल कामों से जी चुराने वालों की तादाद हर तरफ बढ़ती ही जा रही है। हमारे यहाँ भी ऎसे लोगों की कोई कमी नहीं है जिनके लिए पूरी जिन्दगी एक ही बहाने भर से निकल जाती है और वह है – खूब काम हैं, फुर्सत ही नहीं मिलती, वर्कलोड ज्यादा है, कैसे करें काम… आदि-आदि। हर ़क्षेत्र के लोगों के लिए काम के घण्टे अलग-अलग निर्धारित हैं जिनमें आसानी से अपने जिम्मे के काम निपट सकते हैं।

आज भी हर जगह इक्का-दुक्का संख्या में बिरले लोग जरूर हैं जो अपने कर्मयोग के साथ ईमानदारी बरतते हुए पूरा जी लगा कर काम करते हैं और समय पर काम करना उनकी आदत में गहरे तक शुमार है। दूसरी तरफ हर गलियारे में उन लोगों की भरमार है जिनके लिए पूरा दिन भी काम निकालने के लिए कम पड़ता है। ऎसे लोगों की समस्या ही यही है के ये कोई काम समय पर नहीं कर पाते हैं, खूब सारे कामों का ये कितना ही शोरगुल करें मगर रोजमर्रा के कामों का रोजाना मूल्यांकन होने की व्यवस्था हो तो यह बात साफ तौर पर उभर कर सामने आएगी कि यह सिर्फ बहाने से कुछ ज्यादा नहीं है।

हममें से कई लोग हैं जिनका दिन भर का कामकाज न उपयोगिता पूर्ण रहता है, न हमारी कोई उत्पादकता। ऎसे में हमारे जीवन का एकमेव लक्ष्य यही होता है कि जैसे-तैसे दिन गुजार देना और शाम होते ही जयघोष लगा देना – ‘दिन अस्त, मजूर मस्त।’ ऎसे लोग शाम होने का इंतजार करते हैं और जैसे ही ड्यूटी टाईम पूरा हो जाता है इनके चेहरों पर प्रसन्नता अपने आप तैरनी शुरू हो जाती है।

हम रोजाना के लोक व्यवहार में महसूस करते हैं कि खूब सारे लोग अभिनय तो दिन भर ऎसा करेंगे कि जैसे उन्हीं पर सारे दफ्तर-दुकान या संस्थान का बोझ है और जो कुछ चल रहा है वह उन्हीं की बदौलत चल रहा है। इस बात को सीधी और सरल देहाती भाषा में कहें तो ऎसे लोग उस श्वानदेव के समान हैं जो बैलगाड़ी के नीचे चल रहे होते हैं और इन्हें हमेशा यह भ्रम बना रहता है कि बैलगाड़ी उन्हीं के दम पर चल रही है।

इस किस्म के लोग अपने कार्य स्थलों में दिन भर में कई-कई चक्कर लगाते रहेंगे। कई लोग हाथ में बस्ता लिये, काख में फाईलें दबाये ऎसे परिभ्रमण करते रहते हैं जैसे कि वार्षिक बजट पेश करने जा रहे हों।  दिन भर जहाँ इनका परिभ्रमण होगा वहाँ इनका एक ही तकिया कलाम होगा- खूब काम है, अकेले ही सब कुछ करना पड़ता है… आदि-आदि। इनसे कोई शाम को पूछे कि कितना काम किया, तो ये बगले झाँकते नज़र आएंगे।

हकीकत ये है कि ऎसे लोगों को कोई सा काम दे दिया जाए ये जितने दिनों इसे लम्बा खींच सकते हैं, खिंचते रहेंगे। इनकी मनोवृत्ति यही रहती है कि एक बार जल्दी काम पूरा कर लें, तो फिर दूसरा काम पकड़ा देंगे। इससे तो अच्छा है कि एक काम के लिए ही कई-कई दिन गुजार दो। आदमियों की यह प्रजाति उन सभी संस्थानों और क्षेत्रों के लिए हमेशा सरदर्द रहती है जहाँ इनकी पावन और गर्वीली मौजूदगी होती है।

इस किस्म के लोगों की भी कई उप प्रजातियां हैं। कुछ ऎसे हैं जिन्हें कुछ सूझ नहीं पड़ती, और इस कारण लेटलतीफी और बहानेबाजी करते हैं। कुछ को अपने मूल काम कभी पसंद नहीं आते, इन्हें औरों की थाली का खाना ही ज्यादा रास आता है इसलिए अपने निर्धारित काम-धंधों को छोड़कर चकाचौंध और लोकप्रियता पाने की गरज से उन गलियारों में आ धमकते हैं जहाँ उनकी पूछ होती है।

अधिकांश के लिए जिन्दगी भर पैसा बनाना ही मुख्य मकसद होता है और ऎसे में ये लोग वे ही काम करते हैं जिनमें इन्हें कोई कमीशन या दलाली मिलती है। इन पेटेंट भिखारियों को दान-दक्षिणा न मिले तो ये काम का बोझ होने का बहाने बनाते रहते हैं और कोई काम नहीं करते। इसी प्रकार कुछ लोग नकारात्मक मानसिकता के होते हैं जिनके लिए पूरी जिन्दगी विघ्नसंतोषी रहकर औरों के कामों में दखल डालना और नकारात्मक माहौल खड़ा कर देना ही मुख्य उद्देश्य होता है। इस किस्म के लोगों की मौजूदगी जहां होती है वहाँ भी कोई काम समय पर नहीं हो सकता, बल्कि ये लोग हर काम में अपनी टाँग अड़ाने के लिए बेताब रहते हैं और इस कला में माहिर होते हैं कि कोई सा काम कैसे बिगाड़ा जाए।

आदमियों की इन विचित्र प्रजातियों के बीच रहते हुए खूब काम होने का बहाना बनाने वाले लोगों के बारे में यह तो कहा ही जा सकता है कि ये लोग चतुर, नालायक और धूत्र्त होते हैं। ऎसे लोगों को सीधा करना उसी तरह मुश्किल है जिस तरह कुत्ते की पूँछ को सीधा करना। ऎसे लोगों को ढोते रहना हम सभी की मजबूरी है।

कार्य-संस्कृति का जिस कदर ह्रास हो रहा है उसे देखकर यही लगता है कि इन नालायकों और बहानेबाजों का भविष्य अच्छा है क्योंकि जो जिस अनुपात में कमीन, नालायक, निकम्मा और धूत्र्त होता है, वह सैटिंग में भी उतना ही माहिर होता है। फिर एक ही गोत्र के लोग आजकल सभी स्थानों पर बहुतायत में पाए जाने लगे हैं।

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