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भारतीय संस्कृति

भारतीय संस्कृति से  ओतप्रोत परिवार, हमें त्याग सिखाता है

डॉ. कृष्णचंद्र पांडेय

कहा जाता है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। यूं तो सृष्टि के प्रत्येक प्राणी का अपना समाज होता है। परन्तु प्रत्येक प्राणी अपने सामाजिक धर्म के बन्धन से बंधा हो, यह आवश्यक नही है। परन्तु मनुष्य के साथ यह शर्त है कि वह धर्म से संचालित हो।
आहार निद्रा भय मैथुन आदि सभी प्राणियों में समान होते हैं, चाहे वह पशु हो अथवा मनुष्य हो। ये सारी क्रियायें सभी प्राणियों में सामान्य रूप से होती है। परन्तु मनुष्य को पृथक दिखने के लिए एक विशेष गुण होता है। वह है धर्म अर्थात् कर्तव्य, करणीय-अकरणीय का विवेक। मेरा क्या कर्तव्य है, मेरे लिए करने योग्य क्या है, यह विवेक मनुष्य के पास होता है अन्य पशुओं में नहीं होता इसी को धर्म कहा गया है। यह धर्म ही मनुष्य में पशुओं की तुलना में अधिक होता है। इसीलिए उस सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी कहा गया है। धर्म से च्युत व्यक्ति पशु के समान है।
सृष्टि के प्रत्येक पदार्थ का अपना गुण धर्म होता है। यह उसका धर्म ही उसको पृथकत्व की अनुभूति कराता है। क्योंकि प्रत्येक पदार्थ का अपना अलग धर्म होता है। जैसे अग्नि का धर्म उष्णता है, जल का धर्म तरलता है सूर्य का धर्म तेज है चन्द्रमा का धर्म शीतलता है अध्यापक का धर्म अध्यापन है, छात्र का धर्म अध्ययन है आदि। यदि वह पदार्थ अपना धर्म त्याग दे तो प्रकृति में निकृति आ जाना स्वभाविक है।
हम यहां मनुष्य की बात कर रहे है मनुष्य का अपना धर्म है इसीलिए उसे बाकी प्राणियों से पृथक माना जाता है। मनुष्य चूंकि सामाजिक प्राणी है, अत: उसका दायित्व भी व्यक्तिगत के साथ सामाजिक अधिक है। अब समाज की लघु इकाई है परिवार तथा परिवार की वृहद् ईकाई है पूरी पृथिवी। इसीलिए हमारे ऋषियों ने हमें व्यक्ति से परमेष्ठि तक की यात्रा करायी है। सम्पूर्ण वसुधा को परिवार माना है। परन्तु यह वसुधा परिवार की इकाई भी तभी सुदृढ़ हो सकेगी जब व्यक्ति स्वधर्म का पालन करेगा। अपने धर्म का पालन करना ही उसे लघु परिवार से बृहत् परिवार को स्वीकार करने की प्रेरणा देगा। जो अपने लिए जीता है, वह पशु है और जो दूसरों के लिए जीता है वही मनुष्य है। यह तेरा है यह मेरा है ऐसा विचार तो क्षुद्र ह्दय वाले लोग करते है। उदार ह्दयी के लिए तो सम्पूर्ण वसुधा परिवार है।

परिवार बनने के लिए सबसे पहले यह तेरा, यह मेरा का विचार समाप्त होना आवश्यक है। परिवार के लिए मैं से ऊपर उठकर हम का विचार करना होता है। एक व्यक्ति पहले केवल स्वयं का विचार करता है। 22-25 वर्ष की अवस्था में उसका विवाह हो गया। अब उसका सोच मैं से हटकर पत्नी के साथ भी जुड़ गया। यही भाव पत्नी के मन में भी रहता है। जो पहले केवल अपना विचार करती थी अब वह पत्नी के रूप में पति की अर्धागिनी के रूप में अपने स्वत्व से ऊपर उठकर पति—पत्नी के रूप में लघु परिवार के रूप में हम हो गये। बस या रेल में यात्रा करते समय जो खिड़की वाली सीट पाने के लिए झगड़ जाता था, विवाह होते ही वह उस सीट को स्वेच्छा से पत्नी के लिए त्याग देता है। एक सीट के लिए झगडऩे वाला व्यक्ति अचानक त्यागी हो जाता है क्योंकि अब वह परिवार बन चुका है परिवार हमें त्याग सिखाता है। परिवार ज्यों—ज्यों बड़ा होता है त्यों—त्यों उसका त्याग बढ़ता जाता है। भारतीय संस्कृति की यह विशेषता है कि वह हमे त्याग सिखाती है। त्याग से परिवार संस्था का निर्माण हुआ है। विश्व कही पर परिवार रूप संस्था आरम्भ में नही थी केवल भारत ही ऐसा देश है जहां परिवार संस्था आदि काल से चली आ रही है। परिवार हमें त्याग करना खिखाता है। इसलिए भारतीय संस्कृति त्यागमयी संस्कृति है। यूरोप की संस्कृति भोग संस्कृति है क्योंकि वहां परिवार संस्था का को प्रावधान नहीं है। हमारा सौभाग्य है कि हम उस देश और समाज में जन्मे है जहां त्याग को सर्व श्रेष्ठ स्थान दिया है जो जितना बड़ा त्यागी होता है उतना ही वह पूज्य होता है भारत में सर्वाधिक सम्मान सम्यासियों को प्राप्त है भारत का सन्यास अपने का त्याग कर सम्पूर्ण वसुधा को अपना परिवार मानता है।
परिवार संस्था का आधार है विवाह विवाह मात्र स्त्री पुरूष का मिलन मात्र नहीं है उसका एक वैज्ञानिक रहस्य है। आजकल विवाह शब्द का अर्थ नहीं समझाया जात है। सारी वैदिक परम्परायें अवश्यक होती होगी परन्तु विवाह शब्द का अर्थ कोई नहीं बताता। विशेषत्वेन वहति इति विवाह जिस सम्बन्ध को विशेषत्व से वहन किया जाय वह विवाह है। पत्नी को अर्धांगिनी कहा गया है अर्थात् पुरूष का आधा अंग। मनुष्य विवाह के पश्चात् ही पूर्वत्व को प्राप्त होता है।

पति पत्नी एक दूसरे के बिना अपूर्ण है, इसलिए विवाह एक विशेष सम्बन्ध है। यह दूसरे का साथ निभाने का सम्बन्ध नही अपितु अपना साथ निभाने का सम्बन्ध है। जहां अपनापन है, जहां द्वित्व नहीं है, जहां एकत्व है। विवाह प्रमाणपत्र लेकर घूमना विवाह नहीं है, विवाह आत्मिक सम्बन्ध है। विवाह केवल दो व्यक्तियों का मिलन मात्र नहीं है बल्कि दो परिवार मिलकर एक हो जाते हैं, तब विवाह कहलाता है। इससे में परिवारिक मूल्यों की रक्षा होती है। विवाह होते ही पति—पत्नी गृहस्थी हो जाते हैं, गृहस्थ जीवन समस्त सामाजिक और राष्ट्रीय जीवन का आधार है। भारतीय परम्परा के चार आश्रमों में शेष तीन आश्रम ब्रह्मचर्या, वानप्रस्थ तथा सन्यास तीनों गृहस्थ आश्रम पर ही अवलम्बित हैं। इसलिए विवाह हमारी संस्कृति में सबसे अनोखी और असामान्य परम्परा है। बिना विवाह के वह गृहस्थ नहीं हो सकता। यही परिवार का आधार है। इन पारिवारिक मूल्यों की रक्षा के लिए चार बातें आवश्यक है आत्मीयता, त्याग, सहयोग और संगठन।

आत्मीयता
परिवार जीवन का महत्वपूर्ण अंग है आत्मीयता। समय कितना भी बदल जाय परिवार आत्मीयता से ही बनता है। जहां आत्मीयता होगी वहां परिवार होगा। जिस कार्यालय में कर्मचारियों में परस्पर आत्मीय भाव होता है, उसे हम परिवार कहने लगते हैं। जहां आत्मीयता होती है तो एक दूसरे का सुख-दु:ख अपना सुख-दु:ख लगने लगता है। जहां इस प्रकार की आत्मीता होती है तो वह परिवार बन जाता है। ज्यों—ज्यों यह आत्मीयता का दायरा बढ़ता जाता है परिवार का आकार भी बड़ा होने लगता हैं। सम्पूर्ण भारतवर्ष एक परिवार बन जाता है। केवल भारत ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण वसुधा ही परिवार बन जाती है। हमारे ऋषियों का कितना व्यापक दृष्टिकोण था जो सम्पूर्ण विश्व को एक परिवार के रूप में मानते थे। इसीलिए उन्होंने वसुधैव कुटुम्बकम् का विचार दिया।

त्याग
आत्मीयता के विकास में त्याग की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका है। त्याग से ही परिवार बनता है। जहां एक दूसरे के प्रति आत्मीयता है, त्याग है, वहीं परिवार कहलाता है। विवाह परम्परा में सबसे पहले अपने स्वत्व का त्याग करना होता है विवाह के पश्चात स्त्री तथा पुरूष से मैं का भाव समाप्त होकर हम का भाव निर्माण होता है। दोनों को अपनी व्यक्तिगत ऐषणाओं का त्याग करना पड़ता है। त्याग का सबसे बड़ा उदाहरण यदि कही देखना है तो रामायण का अध्ययन करना चाहिए। यहां प्रत्येक पात्र त्याग की प्रतिमूर्ति है। इसीलिए आदर्श परिवार का निर्माण करने के लिए लोग रामायण का पाठ करते हैं। रामायण हमें त्याग सिखाती है। आज प्रत्येक परिवार में रामायण को आदर्श माना जाता है। आदर्श पुत्र कैसा हो, आदर्श माता—पिता, आदर्श भाई, आदर्श पत्नी, आदर्श मित्र यहां तक कि आदर्श शत्रु का दिग्दर्शन रामायण में मिलता है। अपने कष्ट को भूल कर उसके कष्टों को दूर करना ही तो परिवार का लक्षण है।

सहयोग
तीसरा तत्व है सहयोग। परस्पर सहयोग पारिवारिक जीवन का प्रमुख आयाम है। आत्मीयता है, त्याग भी है परन्तु सहयोग की भावना का अभाव है तो निश्चित रूप से परिवार का सुलक्षण नहीं है। एक दूसरे के प्रति सहयोग की भावना परिवार को दृढ़ करती है अपने साथी का सहयोग पति—पत्नी का आपसी सहयोग मित्रों में सहयोग की भावना परिवार संगठन को सुदृढ़ करते है।

संगठन
चौथा बिन्दु है संगठन। संगठन का अर्थ है एकत्रित आना एक साथ मिलकर कार्य करना। संगठन के भाव से परिवार सुदृढ़ होता है। इसमें चारों तत्व एक दूसरे के साथ संलग्न हैं। जहां आत्मीता है, वहां त्याग होगा, जहां त्याग होगा वहां सहयोग होगा, जहां आत्मीयता, त्याग और सहयोग होगा, वहां संगठन होगा। जहां ये चारों तत्व विद्यमान है, वह परिवार कहलाता है। यही चारों तत्व पारिवारिक, सामाजिक तथा राष्ट्रीय भाव को दृढ़ करने के लिए आवश्यक हैं। समाज तथा राष्ट्र के प्रति आत्मीयता, त्याग, सहयोग तथा सम्पूर्ण समाज एक सूत्र रूप संगठित होकर उन्नति कर सकता है। भारतीय संस्कृति में मनुष्य के चिन्तन के विस्तार को सीमा में बांध कर नहीं रखा। सम्पूर्ण सृष्टि के प्रति एकात्म हो जाना व्यक्ति की मानसिक चेतना का विकास है। व्यष्टि से परमेष्टि तक सभी एक सूत्र मे बंधे है। इससे भी आगे हमारे ऋषि ने नेति—नेति कहा। अर्थात् यह भी की इति नहीं है इससे भी परे कुछ है तो वह भी इस परिवार के दायरे में आता है। क्योंकि अखिल ब्रह्माण्ड का नायक एक है तो ब्रह्माण्ड के सभी जीव चेतन अचेतन सभी एक ही पर शक्ति से नि:सृत है। इस लिए उस वृहत् परिवार के सदस्य है के अपनी चेतन शक्ति का विकास करने की आवश्यकता है।

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