सैकड़ों रियासतों में बंटे भारत को अखंड बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका थी सरदार पटेल की

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जो लोग यह मानते हैं कि भारत में कभी एक राष्ट्र की भावना नहीं रही वह भारत के इतिहास और भारतीय और भारतीय संस्कृति के प्रति शत्रुभाव रखने वाले हैं । भारत प्राचीन काल से राष्ट्र , राष्ट्रवाद और राष्ट्रीयता के भाव से भरा हुआ रहा है । इस भावना को भंग करने के दृष्टिकोण से अंग्रेजों ने जाते-जाते भारत की रियासतों के सामने यह प्रस्ताव रख दिया था कि वह चाहें तो पाकिस्तान में सम्मिलित हो सकती हैं , चाहे तो भारत के साथ जा सकती हैं और यदि इन दोनों के साथ न जाकर अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रखना चाहती हैं तो वह ऐसा भी कर सकती हैं । स्पष्ट है कि अंग्रेजों के इस प्रस्ताव से भारत की एकता को भंग करने का षड्यंत्र रचा गया था इस प्रकार तत्कालीन भारतीय नेतृत्व के सामने भारत की राष्ट्रीय एकता और अखंडता को बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती बन गया था ।
सौभाग्य से उस समय भारत के पास सरदार पटेल जैसा लोह पुरुष विद्यमान था । जिसने अपने दूरदर्शी और दृढ़ नेतृत्व के चलते भारत के टुकड़े होने से बचाने में और अंग्रेजों के षड्यंत्र को विफल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सरदार पटेल स्वतंत्र भारत के पहले उप प्रधानमंत्री और गृहमंत्री बनाए गए थे।
तब भारत में 565 देशी रियासतें थीं। जूनागढ़, हैदराबाद और कश्मीर को छोड़कर शेष सभी देसी रियासतों ने स्वेच्छा से भारतीय परिसंघ में सम्मिलित होने की स्वीकृति दी थी। वास्तव में सरदार पटेल के दृढ़ नेतृत्व के कारण यह संभव हुआ था , अन्यथा कई रियासतों के शासकों के मन में देश के टुकड़े करने की योजनाएं बलवती होने लगी थीं।
इन 565 रजवाड़ों में से अधिकतर प्रिंसली स्टेट (ब्रिटिश भारतीय साम्राज्य का हिस्सा) थे और ये सभी न केवल भारत के हिस्से में आए अर्थात सभी ने एक-एक करके विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए। बाद में सरदार वल्लभ भाई पटेल की सूझ से शेष रियासत भी भारतीय परिसंघ में विलय को सहमत हो गईं।
हैदराबाद और जूनागढ़ की रियासतों को भारत के साथ सम्मिलित कराने में भी सरदार पटेल की सूझबूझ और दृढ़ नेतृत्व शक्ति ने ही अपना चमत्कार किया था , अन्यथा उस समय देश के प्रधानमंत्री रहे पंडित जवाहरलाल नेहरू के ढुलमुल नेतृत्व के कारण यह भी संभव था कि देश के भीतर हैदराबाद और जूनागढ़ नाम की दो और कश्मीर समस्याएं हमारे लिए पैदा हो जाती।

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