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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

हे! अर्जुन, उठो। भारत मां की तस्वीर बनाने को

img1120125229_1_1गीता का अनमोल गीत भारत की अमूल्य सांस्कृतिक विरासत है। विश्व का कोई भी धर्म ग्रंथ इतने जीवनप्रद और ज्ञानप्रद संवादों को समाविष्ट कर ‘युद्घभूमि’ में खड़े होकर नही लिखा गया। सचमुच युद्घ में भी ‘जीवन और ज्ञान’ का उपदेश करना अनुपम और अद्वितीय है। क्योंकि जब सामने शत्रु सेना युद्घ के लिए उद्यत हो, तब उसके प्रति हिंसा, प्रतिकार और प्रतिशोध की बातों से तो विश्व का इतिहास भरा पड़ा है, परंतु शत्रु की हिंसा में जीवन और ज्ञान का संदेश खोजना किसी ‘कृष्ण’ जैसे विवेकी सारथि के लिए ही संभव है।

राज्य में हिंसा, रक्तपात, लूट, आतंक और मृत्यु का तांडव जब-जब बढ़ता है, तब तब उसकी अंतिम परिणति युद्घ के रूप में ही होती है। पश्चिमी जगत ने हिंसा, रक्तपात, लूट, आतंक, और मृत्यु के खेल को मानव हृदय का स्वाभाविक गुण माना है, इसलिए पश्चिमी जगत ने युद्घ को मनुष्य की ‘फितरत का तकाजा’ कहा है। इसलिए पश्चिमी चिंतन ने विश्व को युद्घ का भय दिखाया है- उसका एक ऐसा चित्र खींचकर कि जैसे वह एक ऐसा सुप्त ज्वालामुखी है जो कभी भी फूट सकता है और भारी विनाश कर सकता है। फलस्वरूप पश्चिमी जगत के लिए युद्घ एक अबूझ पहेली है। यही कारण है कि पश्चिमी जगत सदा ही युद्घ की तैयारी करता रहता है,-हथियारों का निर्माण करके।

जबकि भारत का चिंतन कुछ दूसरे प्रकार का है। भारत कभी युद्घ से चिंतित नही रहा, क्योंकि भारत ने युद्घ को मानव के स्वभाव का नही अपितु ‘दानव की फितरत’ माना है। इसलिए दानव को समाप्त करने के लिए राज्य की खोज की गयी। राज्य को बताया गया कि ‘दानव को मिटाओ और मानव को बचाओ’ ये तुम्हारा राजधर्म है।

पश्चिमी जगत ने कानून में दानव और मानव को एक माना। इसलिए वहां हत्या हत्या है। जबकि दानव की हत्या को भारत में वध से अधिक उच्च माना गया और कहा गया कि दानव का विनाश करना पुण्य है। इसलिए दानवता का नाश करने के लिए भारत और भारत का प्रत्येक नागरिक सक्रिय रहता था। फलस्वरूप राज्य में शांति रहती थी। बुरे को बुरा समाज भी कहता था और राष्ट्रीय विधि भी कहती थीं, सारे शास्त्र, सारे ग्रंथ बुरे की परिभाषा बताते हैं और निर्धारित करते हैं कि यदि व्यक्ति में ये दुर्गुण है तो उसे समाज के लिए अयोग्य समझा जाए। यहां दानव दानव है और मानव मानव है। यहां दानव को मानव बनाने के लिए प्रयास तो किया जा सकता है परंतु उसे समाज झेलता ही रहे, यह संभव नही है।

आज भारत ने भी पश्चिमी चिंतन को पकड़ लिया है। हर घर में हिंसा की, रक्तपात की, मृत्यु की और युद्घ की लपटें उठ रही हैं। हर घर में महाभारत हो रहा है। युद्घ के लिए सेनाएं सन्नद्घ हैं। अर्जुन का रथ दोनों पक्षों की सेनाओं के मध्य आकर खड़ा हो गया है। पर आज का अर्जुन स्वयं हतप्रभ है, इस बात से नही कि सामने खड़े लोग उसके अपने हैं, अपनों को मारने के लिए तो वह आया है-इतना तो उसे पता है। वह हतप्रभ इस बात से है कि उसका सारथि कृष्ण उसके साथ नही है। उसका रथ बिना कृष्ण का है। वह कृष्ण जो उसे युद्घ में नीति और न्याय का पाठ पढ़ाता, वह कृष्ण जो उसे युद्घ में ज्ञान और जीवन का पाठ पढ़ाता। कहां गया? आज के महाभारत के मंचन का यही सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न है?

क्या कभी हमने सोचा है कि अंतत: गीता पर ही इतने अधिक भाष्य क्यों लिखे गये  कि उसने विश्व के अन्य सब ग्रंथों को पीछे छोड़ दिया? और यह भी कि अंतत: गीता से ही सारे विश्व के विद्वानों ने भांति भांति से अपने भीतर चल रहे महाभारत को शांत करने के लिए ज्ञान क्यों प्राप्त किया? उन्हें गीता से शांति मिली, क्योंकि उन्होंने अपने भीतर के कृष्ण को जगा लिया और अपने महाभारत में अपनी भूमि को संतुलित बना लिया।

पर, आज का अर्जुन हताश है, निराश है, किंकर्त्तव्यविमूढ़ है। क्योंकि उसके साथ कृष्ण नही है और ना ही उसने कृष्ण को अपने साथ रहने दिया है। आज युद्घ के समय ‘कृष्ण’ को वनवास दे दिया गया है। अर्जुन को अहंकार है कि वह बिना कृष्ण के ही युद्घ जीत लेगा। जबकि हर अर्जुन के लिए महाभारत से भी बड़ा महाभारत चुनौती बना फुंकार रहा है। राजकीय सेनाएं ही नही, अपितु सारी प्रजा भी युद्घ के नगाड़े बजा रही है। शांति में से क्रांति की आग निकल रही है और उसकी लपटें अकेले अर्जुन की ओर बढ़ती जा रही हैं। कहीं कहीं तो युधिष्ठर भी अर्जुन को लक्ष्य बनाकर भाला तान रहा है। कितना भयंकर तांडव है? आज आवश्यकता तो कृष्ण की है पर हर स्थान व मोर्चे पर अर्जुन उतारे जा रहे हैं। परिणाम क्या होगा? कुछ कहा नही जा सकता।  लोग इस संकट में जिस जिस को कृष्ण बनाकर उतारते हैं वही संकट के बीच में जाकर अर्जुन का अवतार रूप दृष्टिगोचर होता है, उसका कृष्णत्व उसकी दुर्बल इंद्रियों की भेंट चढ़ जाता है, जब-वह पुत्र, पत्नी, पुत्री, या अन्य किसी परिजन के बहकावे में आकर अपनों पर तीर चलाने  लग जाता है और वह देखता है कि उसके तीरों से दूसरों को तो क्षति नही पहुंची, परंतु स्वयं उसके चारों ओर अवश्य भयंकर अग्निकाण्ड होने लगा है, अपने तीरों से निकलने वाली अग्नि से अर्जुन झुलस रहा है और दुर्योधन अट्टहास कर रहा है।

हर अर्जुन अपने घर को ही नही बचा पा रहा है। शत्रु बड़ा शांतमना दूर से बैठा अट्टहास कर रहा है। अर्जुन हार रहा है और अपनी पीठ अपने आप थपथपा रहा है कि मैं योद्घा हूं-अहम ब्रह्ममास्मि! अर्जुन  का हाथ केवल गाण्डीव पर जाता है और वह न्याय के नैसर्गिक सिद्घांतों की उपेक्षा करते हुए ‘मात्स्य न्याय’ करने के लिए आतुर हो उठता है। उसे नही पता कि मात्स्य न्याय तो अपने आप में अन्याय है। जहां अविद्या को विद्या, मृत्यु को अमृत्य और अन्याय को न्याय माना जाए वहां कृष्ण नही आ सकते। कृष्ण वहीं होंगे जहां प्राकृतिक न्याय के सिद्घांतों का पालन करते हुए विवेकपूर्ण निर्णय लिये जाते हों और सदा धर्मानुसार कार्य व्यवहार चलाया जाता हो। जहां न्याय का पक्ष होता है, उसी के रथ पर कृष्ण सारथि की भूमिका का निर्वाह करते हैं।  जहां अर्जुन इन गुणों से हीन होता है वहां कृष्ण उसके सारथि नही होते। आज के अर्जुन की वास्तविक समस्या ही ये है कि वह उक्त गुणों से युक्त नही है।

आज का अर्जुन यही नही समझ पा रहा है कि वर्तमान चल रहा है और इसी में जीने के क्या अर्थ हैं? हर व्यक्ति अपनों से इसलिए कटता जाता है क्योंकि वह अतीत में जीता है! सबकी शिकायतें हैं कि मैंने अमुक के साथ में ये किया और अमुक के साथ ये किया। पर अमुक ने क्या किया? अत: अभिप्राय: है कि फल पर आज के अर्जुन ने अधिकार जमा लिया है कि मैंने अमुक के साथ ये किया था तो मुझे भी उसका परिणाम ऐसा ही मिलेगा। जबकि विश्व पहले विश्वास दिलाता है और फिर विश्वासघात करता है। इस सत्य को अर्जुन भूल रहा है। कृष्ण ने यही तो कहा था कि आज के वर्तमान को देख, भूत को भूल जा, और भविष्य को ‘हविष्य’ समझ ले। मौनाहुति डाल, अपने पुरूषार्थ की और ईश्वरीय कर्मफल व्यवस्था में विश्वास करते हुए आगे बढ़। दुनिया से भागो मत, दुनिया को कांटों का ताज समझो और स्वयं को भीष्म पितामह की भांति कांटों की शरशय्या पर लिटा लो। दूषित रक्त को बहने दो। अपनो के ही व्यंग्य बाण, अपनों के ही शूल जितने चुभेंगे उतना ही दूषित रक्त बाहर जाएगा और हम पवित्र होते जाएंगे।

जीवन आंख मिचौनी का खेल है। जो आज साथ चलते दीख रहे हैं वो कल बिछुडेंगे भी। समझ लो कि जो संकल्प आपने अपने घर और समाज को उन्नत और ऊंचा बनाने के लिए व्यक्त किये थे, उन्हें केवल और केवल आप ही जानते हो। दूसरे उन्हें जानते भी होंगे तो भी वो उनके संकल्प तो नही थे, ये तो आपके हैं। इसलिए अपने संकल्पों को दूसरों से फलीभूत कराते देखने की अपेक्षा क्यों करते हो? क्यों करते हो ये बचकानी हरकत? अपने सपनों का खून अपने आप मत करो।

अर्जुन, उठो। भारत मां की तस्वीर तुम्हें ही बनानी है, जो इसके हैं ही नही या जो इसे केवल विद्रूपित करना ही अपना राष्ट्रधर्म मानते हैं, उन्हें तुम अपना मान रहे हो। बस, यही तुम्हारी भूल है। कृष्ण को खोजो, और उसे बताओ कि मैंने निद्रा त्याग दी है और मैं अपने राष्ट्रधर्म को पहचान गया हूं। मैं अपने संकल्पों को पहचान गया हूं। मुझे सत्य का भान हो गया है। मुझे युद्घ का ज्ञान हो गया है। इसलिए मेरे सारथि बनो और मुझे उपकृत करो।

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