रानी रामपाल को मिलेगा ‘राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार’

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योगेश कुमार गोयल

4 दिसम्बर 1994 को हरियाणा के शाहबाद मारकंडा में एक गरीब परिवार में जन्मी रानी के पिता रामपाल घोड़ा गाड़ी चलाकर और ईंटे बेचकर परिवार का गुजारा किया करते थे और दिनभर में बड़ी मुश्किल से केवल सौ रुपये तक ही कमा पाते थे।

भारतीय हॉकी के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है, जब महिला हॉकी टीम की किसी खिलाड़ी को खेल जगत का सर्वोच्च सम्मान ‘राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार’ दिया जाएगा। भारतीय महिला हॉकी टीम की कप्तान रानी रामपाल यह सम्मान पाने वाली देश की पहली हॉकी खिलाड़ी बन गई हैं। रानी से पहले हॉकी में बेहतरीन प्रदर्शन के लिए केवल दो हॉकी खिलाड़ियों 1999-2000 में धनराज पिल्लै को तथा 2017 में सरदार सिंह को ही यह सम्मान मिला है। इस दृष्टिकोण से रानी को बतौर कप्तान और खिलाड़ी के रूप में बेहतरीन प्रदर्शन के लिए मिला यह सर्वोच्च सम्मान उनके लिए बहुत मायने रखता है। रानी इस समय भारतीय खेल प्राधिकरण (साई) में राष्ट्रीय शिविर में हिस्सा ले रही हैं। इस सम्मान के लिए चयन होने पर उनका कहना है कि खेल जगत के इस सबसे प्रतिष्ठित सम्मान के लिए चयन होना उनके और विशेषकर उनके परिवार के लिए गर्व का पल है क्योंकि जब आपकी मेहनत को सम्मान मिलता है तो शानदार अहसास होता है। वह कहती हैं कि यह सम्मान उनके लिए और उन जैसे खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा का काम करेगा ताकि वे बड़ी उपलब्धियां हासिल कर देश को गौरवान्वित कर सकें।

4 दिसम्बर 1994 को हरियाणा के शाहबाद मारकंडा में एक गरीब परिवार में जन्मी रानी के पिता रामपाल घोड़ा गाड़ी चलाकर और ईंटे बेचकर परिवार का गुजारा किया करते थे और दिनभर में बड़ी मुश्किल से केवल सौ रुपये तक ही कमा पाते थे। रानी जब करीब छह साल की उम्र में स्कूल के रास्ते में खेल के मैदान में लड़कों को हॉकी खेलते देखती थी तो उनका भी हॉकी खेलने का मन करता था। एक दिन उन्होंने अपने पिता से जब अपने मन की बात कही कि वह भी हॉकी खेलना चाहती है तो पिता ने मना कर दिया। दरअसल उस समय लड़कियों का हॉकी खेलना समाज में काफी अजीब समझा जाता था और माना जाता था कि खेलों में लड़कियों का कैरियर कभी नहीं बन सकता। फिर भी जब रानी ने मन ही मन दृढ़ निश्चय कर लिया और अपनी जिद पर अड़ी रही तो आखिरकार उनके पिता उसकी जिद के आगे झुक गए। हालांकि रिश्तेदारों और समाज के लोगों ने इस फैसले का विरोध किया लेकिन रानी के पिता ने किसी की नहीं सुनी।

जब रानी शाहबाद हॉकी अकादमी में दाखिला लेने पहुंची तो पहले तो गुरु द्रोणाचार्य अवार्डी कोच बलदेव सिंह ने उन्हें दाखिला देने से इन्कार कर दिया था लेकिन जब उन्होंने उसका खेल देखा तो अकादमी में दाखिला देने को राजी हो गए। परिवार की आर्थिक हालत अच्छी नहीं थी और उनके पास कोचिंग के लिए भी पैसे नहीं थे, इसलिए रानी ने कई बार हॉकी की कोचिंग छोड़ने के बारे में सोचा लेकिन उनके कोच बलदेव सिंह तथा दूसरे सीनियर खिलाड़ियों ने ट्रेनिंग के लिए उनका पूरा सहयोग किया। बलदेव सिंह ने ही रानी के लिए हॉकी किट तथा जूते खरीदे और चंडीगढ़ में ट्रेनिंग के दौरान अपने घर में ही उनके रहने की व्यवस्था की। रानी बताती हैं कि वह केवल यही सोचकर बहुत मेहनत से प्रैक्टिस करती थी कि कच्चे घर में रहने वाले अपने परिवार के लिए एक दिन पक्का मकान बनवा सकेगी। आखिरकार उनकी मेहनत रंग लाई और 15 साल की उम्र में उन्हें भारतीय हॉकी टीम में खेलने का अवसर मिल गया। सबसे युवा भारतीय खिलाड़ी के रूप में विश्व कप में भाग लेने वाली रानी टूर्नामेंट की शीर्ष फील्ड गोल स्कोरर रही और उन्हें टूर्नामेंट की सर्वश्रेष्ठ युवा खिलाड़ी चुना गया था। जून 2009 में रूस के कजान में चैम्पियंस चैलेंज टूर्नामेंट के फाइनल मुकाबले में चार गोल कर भारत को जीत दिलाने वाली रानी को ‘द टॉप गोल स्कोरर’ और ‘द यंगेस्ट प्लेयर’ घोषित किया गया था। नवम्बर 2009 में एशिया कप में रजत पदक के साथ विजेता रही टीम इंडिया की जीत में भी रानी की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

2009 से लेकर अब तक के इन 11 वर्षों में रानी 200 से ज्यादा अंतर्राष्ट्रीय मैच खेलकर कई पुराने रिकॉर्ड तोड़ते हुए बहुत सारे नए रिकॉर्ड अपने नाम कर चुकी हैं। 2010 के एशियाई खेलों में शानदार प्रदर्शन को देखते हुए उन्हें एशियन हॉकी फेडरेशन द्वारा अपनी ऑल स्टार टीम में शामिल किया गया था। अपने अभी तक के कैरियर में वह 240 से अधिक मैच खेल चुकी हैं और उन्होंने कुल 118 गोल किए हैं। 2016 के रियो ओलम्पिक में वह भारतीय महिला हॉकी टीम का अहम हिस्सा थी। 2018 में हुए एशियाई खेलों से पहले वह टीम इंडिया की कप्तान बनी और उनकी कप्तानी में टीम ने महिला एशियाई कप 2017 में ऐतिहासिक जीत दर्ज करने के अलावा 2018 के एशियाई खेलों में रजत पदक भी जीता। उनकी कप्तानी में गत वर्ष भारत ने एफआईएच सीरीज का फाइनल मुकाबला जीतकर टोक्यो ओलम्पिक के लिए क्वालीफाई किया था। उस मुकाबले को जीतने में रानी के निर्णायक गोल ने बहुत अहम भूमिका निभाई थी और वह ‘प्लेयर ऑफ द टूर्नामेंट’ बनी थी। रानी रामपाल की अगुवाई में ही भारत ने तीसरी बार ओलम्पिक खेलों के लिए क्वालीफाई किया। भारतीय हॉकी टीम को अब तक की सर्वश्रेष्ठ नवीं रैंकिंग तक पहुंचाने में भी उनकी बड़ी भूमिका रही है।

इसी साल 30 जनवरी को रानी विश्व की पहली ऐसी हॉकी खिलाड़ी भी बन गई, जिसे प्रतिष्ठित ‘वर्ल्ड गेम्स एथलीट ऑफ द ईयर’ अवार्ड मिला। उनके नाम का चयन दुनियाभर के खेल प्रेमियों द्वारा की गई वोटिंग के आधार पर किया गया था। दुनिया के 25 शीर्ष खिलाड़ी इस अवार्ड की दौड़ में शामिल थे लेकिन सभी को पछाड़ते हुए रानी कुल 705610 वोटों में से 199477 वोट हासिल कर बाजी मार गई। उनके लिए यह अवार्ड इसलिए बेहद महत्वपूर्ण था क्योंकि पहली बार दुनिया के किसी हॉकी खिलाड़ी को खेल जगत का यह बड़ा अवार्ड मिला। उनके बाद 92539 वोटों के साथ दूसरे स्थान पर यूक्रेन के कराटे चैम्पियन स्टानिस्लाव होरूना रहे। 2016 में रानी को प्रतिष्ठित ‘अर्जुन पुरस्कार’ से सम्मानित किया जा चुका है और इसी वर्ष उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया है।

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