जीवन में संयम , सीमित आवश्यकता एवं शक्ति संचय आवश्यक है

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ओ३म्

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संसार में सभी जीवन पद्धतियों में वैदिक धर्म एवं तदनुकूल जीवन पद्धति श्रेष्ठ व महत्वूपर्ण है। इसे जानकर और इसके अनुसार जीवन व्यतीत करने पर मनुष्य अनेक प्रकार की समस्याओं से बच जाता है। मनुष्य को अपनी शारीरिक शक्तियों के विकास वा उन्नति पर ध्यान देना चाहिये। इसके लिये उसे समय पर जागना, शौच, भ्रमण, आसन व व्यायाम सहित ईश्वर का ध्यान व वायुशोधक अग्निहोत्र पर भी ध्यान देना चाहिये। इन कार्यों का हमारी जीवन की उन्नति अर्थात् सुखों की वृद्धि से सीधा सम्बन्ध होता है। यह काम अधिक आयु में करने योग्य नहीं अपितु इसका पालन मनुष्य को युवावस्था से ही आरम्भ कर देना चाहिये। इन कार्यों को करते हुए मनुष्य को वेद व वैदिक साहित्य के अध्ययन की रुचि भी उत्पन्न करनी चाहिये और प्रतिदिन नियमित रूप से निर्धारित समय, अथवा जब सुधिवा हो, स्वाध्याय व पढ़े विषयों का मनन अवश्य ही करना चाहिये। स्वाध्याय करते समय हमें ध्यान रखना चाहिये कि हम जो पढ़ रहे हैं वह सत्य है अथवा नहीं। असत्य प्रतीत होने पर योग्य विद्वानों से उनका समाधान करा लेना चाहिये। ऐसा करने से मनुष्य को लाभ होता है। इससे वह अज्ञान व अन्धविश्वासों से बच जाता है। एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि मनुष्य को सदैव श्रेष्ठ मनुष्यों व विद्वानों की ही संगति करनी चाहिये। ऐसे लोगों की संगति वा मित्रता कदापि नहीं करनी चाहिये जो दुव्र्यसनों से ग्रस्त हों। व्यवहार व कार्यों से दुष्ट वा व्यस्नी व्यक्तियों की संगति करने पर वह दुव्र्यस्न मित्रता करने वाले मनुष्य को भी लग सकते हैं और उसका जीवन नष्ट हो सकता है। आज देश व विश्व में सर्वत्र भौतिकवाद छाया हुआ है। पश्चिमी तौर तरीकों से युक्त जीवन श्रेयस्कर नहीं है। इसके बुरे परिणाम अनेक रोगों व व्याधियों तथा अवसाद आदि के रूप में कुछ समय बाद सम्मुख आते हैं। मनुष्य को अपने मन व आत्मा को पवित्र विचारों व भावनाओं से युक्त रखना चाहिये। इस उद्देश्य की पूर्ति स्वाध्याय तथा श्रेष्ठ योग्य व पात्र वैदिक विद्वानों के सत्संग से होती है। अन्धविश्वासों से युक्त साहित्य के अध्ययन व उनके आचार्यों के सत्संग व प्रवचनों से अविद्या जीवन में आ जाती है जो जीवन की उन्नति के स्थान पर अवनति उत्पन्न करती है। अतः मनुष्य को अपना जीवन बहुत ही सोच विचार कर योग्य विद्वानों की संगति, उनके मार्गदर्शन सहित सत्साहित्य के अध्ययन वा स्वाध्याय में व्यतीत करना चाहिये। ऐसा करते हुए पुरुषार्थयुक्त जीवन व्यतीत करने व समकालीन ज्ञान व विज्ञान से युक्त होने से ही मनुष्य का जीवन उन्नत, विकसित व अभीष्ट उद्देश्यों व उत्तम सुखों को प्राप्त करने में सफल होता है।

मनुष्य को संयमपूर्ण जीवन व्यतीत करने पर ध्यान देना चाहिये। धर्म के दश लक्षणों में प्रथम लक्षण धैर्य है। सम व विषम परिस्थितियों में धैर्य रखना ही मनुष्य के लिए उत्तम है। यदि जीवन में धैर्य न हो तो मनुष्य का जीवन दुःख, चिन्ताओं व कष्टों से युक्त हो जाता है। परमात्मा ने हमें पांच ज्ञानेन्द्रियां एवं पांच कर्मेन्द्रियां दी हैं। हमें अपनी सभी इन्द्रियों को पवित्र रखना चहिये। सन्ध्या करते हुए हम परमात्मा से इनकी पवित्रता, शक्ति व बल से युक्त होने तथा जीवन के अन्तिम समय तक बलवान बने रहने अथवा निर्बल न होने की प्रार्थना करते हैं। परमात्मा ने ही हमें हमारा शरीर दिया है। वही हमारी सभी ज्ञान व कर्मेन्द्रियों का रचयिता, स्वामी व दाता है। जब हम उससे प्रार्थना करने के साथ प्रार्थना के अनुरूप साधन, उपाय व प्रयत्न करते हैं तो हमें उस कार्य में सफलता मिलती है। अतः हमें अपने शरीर की रक्षा के सभी उपायों को जानना चाहिये और उनका पालन भी अवश्य करना चाहिये। प्रायः देखा होता है कि हमें अपने व्यस्त जीवन में शरीर रक्षा के साधनों का अभ्यास करने के लिये समय नहीं मिलता। ऐसी स्थिति में हमें अपने जीवन में किये जाने वाले अनावश्यक, कम उपयोगी व जीवन उन्नति में बाधक सभी कामों को छोड़ देना चाहिये। ऐसा करने से हमें नित्य कर्मों को करने के लिये समय अवश्य मिलेगा जिससे हमारा वर्तमान, भविष्य व परजन्म सभी सुखी एवं सन्तुष्टि प्रदान करने वाले होंगे। अतः सभी इन्द्रियों को संयम में रखकर उनका जीवन की उन्नति के कार्यों में ही उपयोग करना चाहिये और उनसे भोग व सुख प्राप्ति यथासम्भव कम से कम प्राप्त करनी चाहिये। यही सुखी एवं सफल जीवन का आधार प्रतीत होता है।

सुखी एवं सन्तुष्ट जीवन का एक मन्त्र यह भी है कि अधिक पुरुषार्थ व अधिक धनोपार्जन करने सहित आवश्यक कार्यों में न्यूनतम धन का व्यय करना चाहिये। पहले हमारे पूर्वज सस्ते वस्त्र धारण करते थे। आज महंगे वस्त्र व अन्य सामानों को धारण करने की प्रवृत्ति देखी जाती है। इसने भी लोगों की अर्थव्यवस्था को कमजोर किया है। इससे सीमित साधनों वाले परिवारों में सदस्यों के जीवन में अवसाद उत्पन्न हो सकता है। यदि हमारे पास आचवश्यकतानुसार धन है तो उसे शुभ कार्यों में दान आदि देकर व्यय करने की मनाही नहीं है। दान व दूसरों की सहायता भी हमें युक्तिसंगत रूप से कुछ व अधिक अपनी सामथ्र्य को ध्यान में रखते हुए अवश्य करनी चाहिये। हमारी आवश्यकतायें कम होंगी तो हमारे पास धन बचेगा जिससे हमें सन्तुष्टि प्राप्त होगी और विपदकाल में यह धन हमारी एक मित्र के रूप में सहायक होगा। ऐसा ही होता भी है। आज की युवा पीढ़ी को देखते हैं तो उन्हें आधुनिक जीवन व्यतीत करने, खर्चीले सामान का उपयोग करने, उनमें दिखावे की प्रवृत्ति होने, ऋण लेकर अपनी महत्वाकांक्षायें पूरी करने और उस ऋण की किश्तों के भुगतान में ही अपने वेतन का अधिकांश भाग भुगतान करने की प्रवृत्ति व स्थिति देखी जा रही है। आजकल कोरोना महामारी के समय में हमारे बहुत से युवाओं के रोजगार चले गये या उनके वेतन बहुत कम कर दिये गये। ऐसे समय में उनको आर्थिक कठिनाईयां आ रही हैं। उन्होंने अपने जीवन को जिन सुख व भोगयुक्त जीवन का पर्याय बना लिया है उसमें अनेक प्रकार की बाधायें आ गई हैं। इससे देश के युवक युवतियां बड़ी संख्या में परेशान है। युवाओं को इस परिस्थिति को भी एक चुनौती के रूप में लेना चाहिये और यदि कुछ अनावश्यक सुखों का त्याग हो सके तो उन्हें करके अपने सभी काम स्वयं करते हुए वैदिक धर्म एवं संस्कृति के अनुसार मितव्ययता व सुख व भोग से रहित त्यागपूर्ण जीवन व्यतीत करने की आदत डालनी व बनानी चाहिये। पुरुषार्थ को भी बढ़ाकर और ईश्वर में विश्वास रखते हुए तथा सच्चे वैदिक विद्वानों से मार्गदर्शन प्राप्त कर अपने जीवन को समयानुकूल व्यतीत करने का अभ्यास करना चाहिये। ऐसा करने से जिन परिवारों में कोरोना के कारण रोजगार आदि का संकट आया हुआ, उससे उबरने में उन्हें सहायता मिलेगी, ऐसा हम समझते हैं।

जीवन में शक्ति संचय का होना आवश्यक है। मुख्य शक्ति संचय तो हमारे व हमारे परिवार के सभी सदस्यों का स्वस्थ एवं बलवान होना है। बलवान व्यक्ति से रोग दूर रहते हैं। उसकी कार्यक्षमता भी अधिक होती है। ऐसे ही व्यक्ति दीर्घजीवी होते हैं तथा जीवन में सुखों का अनुभव करते हैं। त्याग पूर्ण स्वस्थ जीवन से मिलने वाला सुख अनापशनाप भोगों, आधुनिक नाना प्रकार के भोजनों तथा सैरसपाटों के सुख से कहीं अधिक श्रेष्ठ होता है। हम वैदिक जीवन व्यतीत करेंगे तो हमारे पास कुछ मात्रा में धन का संचय भी हो सकता है। पारिवारिक व्यक्ति को अपनी आवश्यकताओं तथा विपरीत व भविष्य में अनायास आने वाले विघ्नों के लिये धन संचय आवश्यक है। धन भी एक शक्ति के समान है। धन से हम अपनी अनेक आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। सद्कार्यों में दान देने से मनुष्य को सुख मिलता है तथा उसका यश भी बढ़ता है। बहुत सी स्वयंसेवी संस्थायें यथा वैदिक गुरुकुल तथा वैदिक साधन आश्रम आदि लोगों की भलाई का ही काम करते हैं। ऐसी संस्थाओं में दान करने से यह चलेंगी तो इससे हमारे वैदिक धर्म एवं संस्कृति को लाभ होगा। अतः शारीकि शक्ति को बढ़ाने व उसका संचय करने के साथ धन का संचय करने से भी जीवन में सुख तथा हमारा भविष्य सुरक्षित व निश्चिन्त बनता है। हमें इन उपायों पर ध्यान देना चाहिये।

हमने आज कुछ समययह चिन्तन किया है जिसे हम अपने विज्ञ मित्रों को प्रस्तुत करते हैं। शायद किसी को अच्छा लगे। ओ३म् शम्ं

-मनमोहन कुमार आर्य

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