सुशील भाटी
ब्रिटिशराज के दौरान भारत में बहुत से लोगों ने अंग्रेजी हुकूमत के अत्याचारों और शोषण के खिलाफ संघर्ष किया और अपने प्राणों तक की आहूति दे दी। इनमें से बहुत से बलिदानियों को तो इतिहास में जगह मिल गयी परंतु कुछ के तो हम नाम भी नही जानते। ब्रिटिश साम्राज्य के विरूद्घ आम आदमी की लड़ाई लड़ने वाले कुछ ऐसे भी बलिदानी हैं जिन्हें भले ही इतिहास की पुस्तकों में स्थान नही मिला परंतु वे जन आख्यानों और लोक गीतों के नायक बन लोगों के दिलों पर राज करते हैं। ऐसा ही एक क्रांतिकारी और बलिदानी का नाम है झंडा गूंजा। मेरठ जिले के बूबकपुर ग्रांव के रहने वाले झंडा की ब्रिटिश राज और साहूकार विरोधी हथियारबंद मुहिम लगभग सौा साल तक लोक गीतों की विषय वस्तु बनी रही। आम आदमी की भाषा में इन लोक गीतों को झंडा की चौक चांदनी कहते थे। यह अब लुत्फप्राय है। अब इसके कुछ अंश ही उपलब्ध हैं, जिनका उपयोग इस लेख में कई जगह किया गया। झंडा की लोकप्रियता का आलम यह था कि 1970 के दशक तक ग्रामीण इलाके में जूनियर हाईस्कूल तक के बच्चे झंडा की चौक चांदनी घर घर जाकर सुनाते थे और अपने अध्यापकों की सहायतार्थ अनाज आदि प्राप्त करते थे। झंडा की चौक चांदनी की शुरूआत इस प्रकार है-गंग नहर के बायी ओर बूबकपुर स्थान जहां का झंडा गूजर हुआ सरनाम झंडा का में करूं बयान
सुन लीजो तुम धर के ध्यान….
लगभग सन 1880 की बात है। मेरठ के इलाके में झंडा का नाम एक मशहूर बागी था। उस समय अंग्रेजों का राज था और देहातों में साहूकारों ने लूट मचा रखी थी। अंग्रेजों ने किसानों पर भारी कर लगा रखे थे, जिन्हें अदा करने के लिए किसान अक्सर साहूकारों से भारी ब्याज पर कर्ज उठाने को मजबूर थे। साहूकारों को अंग्रेजी पुलिस, थानों, तहसीलों और अदालतों का संरक्षण प्राप्त था, जिनके दम पर साहूकार आम आदमी और किसानों का भरपूर शोषण कर रहे थे।
झंडा की बगावत की कहानी भी ऐसे ही साहूकार के शोषण के खिलाफ शुरू होती है। झंडा मेरठ जिले की सरधना तहसील के बूबकपुर गांव का रहने वाला था। यह गांव गंग नहर के बागी तरफ से है। वह अंग्रेजों की फौज में सिपाही था। उसके भाई ने पास के गांव दबदबा के साहूकारों से कर्ज ले रखा था। झंडा ने अपनी तनख्वाह से बहुत सा धन चुका कर दिया, परंतु साहूकारी हिसाब बढ़ता ही गया। एक दिन साहूकार झंडा के घर आ धमका और उसने जमीन नीलाम करने की धमकी देते हुए झंडा की भाभी से बदतमीजी से बात की। झंडा उस समय घर पर ही था, पर वह अपमान का घूंट पीकर रह गया। लेकिन यह घटना उसके मन को कचोटती रही और वह विद्रोह की आग में जलने लगा।
कुछ ही दिन बाद गांव के पश्चिम में नहर के किनारे एक अंग्रेज शिकार खेलने के लिए आया। उसका निशाना बार बार चूक रहा था। झंडा हंस कर कहने ल गा कि मैं एक गोली में ही शिकार को गिरा दूंगा। अंग्रेज उसकी बातों में आ गया और उसने चुनौती भरे लहजे में बंदूक झंडा को थमा दी। झंडा ने एक ही गोली से शिकार को ढेर कर दिया और बंदूक अंग्रेज पर तान दी और उसे धमकाकर बंदूक और घोड़ा दोनों लेकर चला गया।
उसके बाद झंडा ने अपना गुट बना लिया। कहते हैं कि उसने अंग्रेजी शासन सत्ता को चुनौती देकर दबथुवा के साहूकारों के घर धावा मारा। उसने पोस्टर चिपकवा कर अपने आने का समय और तारीख बताई और तयशुदा दिन वह साहूकार के घर पर चढ़ आया। भारी भरकम अंग्रेजी पुलिस बल को हरा कर उसने साहूकार के धन माल को जब्त कर लिया और बही खातों में आग लगा दी। साहूकार की बेटी ने कहा कि सामान में उसके भी जेवर है तो झंडा ने कहा कि बहन जो तेरे हैं ईमानदारी से उठा ले।
झंडा ने आम आदमी और किसानों को राहत पहंचाने के लिए साहूकारों के खिलाफ एक मुहिम छेड़ दी। अंग्रेजी साम्राज्य और साहूकारों के शोषण के विरोध में हर धर्म और जाति के लोग उसके गुट में शामिल होते गये जिसने एक छोटी सी फौज कर रूप ले लिया झंडा के आरोप बंदूकों से लैस होकर घोड़ों पर चलते थे। उसके प्रमुख साथियों में बील गांव का बलवंत जाट, बूबकपुर का मोमराज कुम्हार मथुरापुर का गोविंद गूजर जानी बलैनी का एक वाल्मीकि और एक सका जाति का मुसलमान था। सराना, बाडम और पथोली गांव झंडा के विशेष समर्थक थे। रासना के पारा ही उसने एक कुटी में अपना गुप्त ठिकाना बना रखा था। इलाके में प्रचलित मिथकों के अनुसार झंडा ने पंजाब और राजस्थान तक धावे मारे और अंग्रेजी सत्ता को हिला कर रख दिया। झंडा की चौक चांदनी स्थिति कुछ ऐसे बयां करती है-
गंग नहर के बायी ओर
जहां रहता था झंडा अडीमोर
ज्यों ज्यों झंडा डाका डाले
अंग्रेजों की गद्दी हाले
ज्यों ज्यों झंडा चाले था
अंग्रेजों का दिल हाले था
झंडा को आज भी किसान श्रद्घा और सम्मान से याद करते हैं। उसने मुख्य रूप से साहूकारों को निशाना बनाया। वह उनके वही खाते जला देता था। जिनके जेवर साहूकारों ने गिरवी रख रखे थे उन्हें छीनकर वापिस कर देता था और पैसा गरीबों में बांट देता था। वो गरीब अनाथ लड़कियों के भात भरता था। उसने अंग्रेजी पुलिस की मौजूदगी में मढीयाई गांव की दलित लड़की भात दिया था। कहते हैं कि वो जनाने वेश में आया था, भात देकर निकल गया। अंग्रेज हाथ मलते रह गये। झंडा और साहूकारों की इस लड़ाई में वर्ग संघर्ष की प्रति छाया दिखाई देती है। साहूकारों के विरूद्घ झंडा की ललकार पर चौक चांदनी कहती है-
जब झंडा पर तकादा आवे
झंडा नही सीधा बतलावे
साहूकारों से यह कह दीना
मैं भी किसी माई का लाल
मूारू बोड उदा दू खाल
हो होशियार तुम अपने घर बैठो
एक बार फिर मेरा जौहर देखो….
झंडा ने मेरठ इलाके में अंग्रेजी राज को हिला कर रख दिया था। अंग्रेजी शासन ने जमींदारों और साहूकारों को झंडा के कहर से बचाने के लिए पूरी ताकत झोंक दी। सरकार ने बूबकपुर में ही एक पुलिस चौकी खोल दी। इस स्थान पर आज प्राथमिकता स्कूल है। लेकिन इस सबके बावजूद झंडा बेबाक होकर बूबकपुर में भूमयिा पर भेली चढ़ाने आता रहा। होली दीवाली पर भी वह अपने गांव जरूर आता था। अंग्रेजी पुलिस का झंडा के टकराव पर चौक चांदनी कहती है-
एक तरफ पुलिस का डंडा
दूजी तरफ झंडा का डंका
अंग्रेज अफसर कहां तक जोर दिखावे
अपना सिर उस पर कटवावे….
एक दिन रासना गांव के एक मुखबिर ने पुलिस को झंडा के रासना के जंगल स्थित कुटी में मौजूद होने की सूचना दी। पुलिस ने कूटी को चारों ओर से घेर लिया। झंडा अंग्रेजों से बड़ी बहादुरी से लड़ा। दोनों ओर से भीषण गोलाबारी हुई। गोलाबारी के शांत होने पर जब अंग्रेज कुटी में घुसे तो उन्हें वहां कोई नही मिला। झंडा वहां से जा चुका था। परंतु उस घटना के बाद उसका नाम फिर कभी नही सुना गया। आज भी यह स्थान झंडा वाली कुटी के नाम से मशहूर है। यहां देवी मां का एक मंदिर है और एक आश्रम है। यहंा चौत्र के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को मेला लगता है, जिसमें आसपास के गांवों के लोग आते हैं जो आज भी झंडा को याद करते हैं और उसकी चर्चा करते हैं।
मैं वेद्यराज जीतराम शास्त्री ग्राम मथुरापुर निकट गाजियाबाद का निवासी हूं, झंडा क्रांतिकारी जो अंग्रेजों की नजर में डाक था, इसके बड़े भाई जिनका नाम। मैं नही जानता हूं, मेरे परिवार खानदान के दामाद थे। तेजस्वी ओजस्वी वलिष्ठ परिवार की वह महिला अंग्रेज के सामंती कड़वे बोल सहन नही कर सकी थी, उसने झंडा जो सिखवेश में रहता था, को चूड़ियां पहनने की बात कह दी थी। उसके इस ताने को सुनकर झंडा ने अंग्रेजी सामंतों के विरोध में उपरोक्त विवरण के अनुसार अपनी अपनी एक पार्टी बनाकर, अंग्रेजों के खजाने लूटने लगा थ। झंडा का विश्वास पात्र इनके भाई का साला गोविंद सिंह नागर था कहते हैं इसका कद छह फुट और हाथों के गहा आठ अंगुल चौड़े थे। यह पांच सौ ग्राम देशी घी और पांच किलो दूध रोजाना पीते थे। यह मेरेर खानदानी थे। करहड़ा गाजियाबाद में उन दिनों भीष्म जी की कुटी जो 1857 के स्वतंत्रता सेनानियों का गुप्त ठिकाना था। वहां से यह स्वतंत्रता सेनानी हमारे गांव के हिंडन बीहड़ में आ जाया करते थे। झंडा ओर गोविंद सिंह नागर सामंतों से लूटा हुआ धन स्वतंत्रता सेनानियों को पहुंचाते रहते थे। मेरे पिता श्री हरिसिंह नागर जो उदारवादी धर्मप्रेमी साहुकार थे, वह भी इन स्वतंत्रता के दीवानों की समय समय पर सहायता करते रहते थे पिताश्री हरिसिंह अंग्रेज सरकार को 10 रूपये सालाना हैसियत कर दिया करते थे।
ऐसे अनेक स्वतंत्रता सेनानियों का इतिहास स्मृति वन कर रह गया है।
1857 के गदर के समय मेरठ की आवादी कोई खास नही थी मेरठ जेल का शहर कोतवाली धनसिंह गूर्जर राणा वंश का युवा निकट पांचली गांव का था, गत वर्ष मायावती सरकार ने उनके नाम पर पीएसी छावनी का नामकरण किया था। इस बहादुर ने ही जेल के फ ाटक खोलकर सभी कैदियों को आजादी की लड़ाई में शामिल कर लिया था।
उत्तर प्रदेश के डिप्टी डायरेक्टर पुरातत्व विभाग से इंग्लैंड में वहां के संग्रहालय का सर्वेक्षण करने गये थे। गांधीजी के डाक्टर श्री श्री 108 स्वामी प्रकाश नंद सरस्वती पुराना नाम डा. लोकप्रकाश जो गाजियाबद की मिर्जापुर प्याऊ पर जहां पर अब उनके पौन शिष्य दर्शनानंद अभी भी गौशाला में रहते हैं।
स्वामी जी ने बतलाया कि उत्तर प्रदेश पुरातत्व के डायरेक्टर केपी श्री वास्तव को वहां पर सर टामसरो की डायरी मिली। इस डायरी में टामसरो लिखता है कि यदि इस क्षेत्र के गूजर बहादुरशाह की रसद लेकर दो घंटे ओर लड़ जाते तो हमें उस दिन ही भारत छोड़ना पड़ता, परंतु अन्य कई हिंदुस्तानी वर्ग के लोगों ने क्षेत्र के गूजरों की कोई सहायता नही करी थी। उल्टे अंग्रेजों का ही साथ दिया था। बाद में सीकड़ी मोदीनगर रोजामपुर गूजर और पांचली गांवों अंग्रेजों ने ध्वस्त कर दिया था।

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