संस्कारहीनता ही है

समस्याओं की जड़

– डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

मनुष्य के रूप में पैदा हो जाना और मनुष्यता होना दो अलग-अलग बातें हैं। मनुष्य का शरीर कोई भी प्राप्त कर सकता है लेकिन उसमें मनुष्यता हो ही, यह जरूरी नहीं है। इंसानियत अपने साथ मनुष्य होने के गुण-धर्म लेकर आती है और सच्चे अर्थों में मनुष्य कहलाने का अधिकारी वही है जिसमें मानवीय गुणों और मूल्यों का समावेश हो।

इंसानियत के संस्कार हों, मानवीय संवेदनाएं होें तथा प्राणी मात्र एवं समुदाय के लिए जीने की भावना हो, उन्हीं लोगों को सही मायने में मनुष्य कहा जा सकता है। अपना ही अपना पेट भरना तो कोई जानवर भी सहजता से कर ही लेता है। मनुष्यता मौलिक गुणधर्म है जिस न्यूनाधिक प्रभाव हर इंसान में होता है। कुछ में पूर्ण होता है जबकि कुछ में न्यून स्तर पर। कई ऎसे होते हैं जिनमें संस्कार तो होते हैं किंतु अपने स्वार्थों और ऎषणाओं के आगे इनका अस्तित्व गौण हो जाता है। और संस्कारों की परतें जिन्दगी भर ऎसी दबी रहती हैं जैसे कोयले की खान में हीरे।

आजकल घर-परिवार, समाज और अपने क्षेत्र से लेकर देश-दुनिया तक भौतिक विकास का समंदर जरूर लहरा गया है लेकिन संस्कारों का दरिया सिमट चुका है। हर क्षेत्र में आज समस्याओं और त्रासदियों के साथ ही मानवीय भूलों और मानवनिर्मित आपदाओं का ताण्डव दिखाई देने लगा है। आदमी आदमी से खुश नहीं है, आदमी जमाने से खुश नहीं है, और आदमी अपने आप से भी खुश नहीं है।

शिक्षा का विकास निस्सन्देह सभी जगह हुआ है, तालीम के ताल-तलैया लहरों का मंजर दिखा रहे हैं और तरक्की के मामले में हम आसमान की बुलंदियों को छूने लगे हैं। इन सभी के बावजूद आदमी से आदमी, आदमी से जमाना खौफ खाने लगा है।  अपरिमित शैक्षिक विकास खूब हुआ दिखता है और ऎसे में लगता है कि हम सभी इतने शिक्षित और समृद्ध हो चले हैं कि अब हमें आगे कुछ करने की जरूरत ही नहीं है। इसके बावजूद हर इकाई के साथ समस्याएं, विषमताएं और दुर्भाग्य का साया क्यों जुड़ता जा रहा है? इस बारे में गंभीरता से सोचने की जरूरत है।

हकीकत यह है कि हमने शिक्षा पर खूब ध्यान दिया है मगर संस्कारों को गौण मान लिया है। इसी असंतुलन का परिणाम है कि हम और हमारा परिवेश समस्याओं से घिरता ही चला जा रहा है और ये समस्याएं नए-नए रूपाकारों में हमारे सामने आ रही हैं।  संस्कारहीनता और आत्मकेन्दि्रत जीवनपद्धति ने पारिवारिक एवं सामाजिक व्यवस्थाओं को बरबाद करके रख दिया है।

न हमारे भीतर मानवीय मूल्यों की सुगंध रही है, न हम औरों तथा समाज-देश के लिए जीने का जज्बा रखते हैं। हालात ये हो गए हैं कि ‘विद्या ददाति विनयं…..’  की बजाय आज की विद्या विनय, शालीनता, धीर-गांभीर्य, पात्रता, इंसानियत के बुनियादी तत्वों सभी से हमें दूर कर चुकी है। हम कितने ही उच्च शिक्षित हो जाएं, मगर हमारे भीतर संस्कारों का अभाव है, तो हमें मान लेना चाहिए कि इस शिक्षा का कोई मूल्य नहीं है।

एक अनपढ़ आदमी जितना निरपेक्ष, भोला और सहज होता है, पढ़े-लिखे आदमी में इसका सौवां हिस्सा भी आजकल देखने को नहीं मिलता, कुछ अपवाद जरूर हो सकते हैं। आज समाज को सर्वाधिक खतरा अनपढ़ों से नहीं है बल्कि उन लोगों से हो गया है जो पढ़-लिख गए हैं मगर संस्कारहीन हो चले हैं।

समाज और देश में आज सारे अनैतिक काम करने वाले, भ्रष्ट, बेईमान, कानून तोड़ने वाले, धींगामस्ती करने वाले, अपने पॉवर का दुरुपयोग करने वाले, शोषण और अत्याचार-अन्याय ढाने वाले, चोर-उचक्के, रिश्वतखोर, बदमाश, व्यभिचारी और आतंकवादी वे लोग हैं जो पढ़े-लिखे कहे जाते हैं। पढ़ाई-लिखाई से ज्यादा संस्कारों का होना जरूरी है, यह बात जब तक हमें समझ में नहीं आएगी, तब तक न समाज का भला हो सकता है, न देश का।  इस संस्कारहीनता को दूर किया जाना देश की प्राथमिक जरूरत होनी चाहिए।

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