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आज का चिंतन

महर्षि दयानंद का गृहस्थ आश्रम पर पठनीय महत्वपूर्ण उपदेश

ओ३म्

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ऋषि दयानन्द का सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ विश्व प्रसिद्ध ग्रन्थ है। इसके चौथे अध्याय में समावर्तन, विवाह तथा गृहाश्रम पर उपदेश प्रस्तुत किये गये हैं। जैसा उपदेश ऋषि दयानन्द जी ने सत्यार्थप्रकाश में प्रस्तुत किया है वैसा उनके समय व पूर्वकाल में अन्यत्र प्राप्त होना दुर्लभ था। इसका दिग्दर्शन कराने के लिये हम इस अध्याय से ऋषि के कुछ उपदेशात्मक वचनों को प्रस्तुत कर रहे हैं।

ऋषि दयानन्द कहते हैं कि ब्रह्मचर्याश्रम आचार्यानुकूल वर्तकर, धर्म से चारों, तीन वा दो, अथवा एक वेद को सांगोपांग पढ़ के जिसका ब्रह्मचर्य खण्डित न हुआ हो, वह पुरुष वा स्त्री गृहाश्रम में प्रवेश करें।

जो स्वधर्म अर्थात् आचार्य और शिष्य का यथावत् धर्म है उससे युक्त पिता, जनक वा अध्यापक से ब्रह्मदाय अर्थात् विद्यारूप भाग का ग्रहण और माला का धारण करने वाला शिष्य अपने पलंग पर बैठे हुए आचार्य का प्रथम गोदान से सत्कार करे। वैसे लक्षणयुक्त विद्यार्थी को भी कन्या का पिता गोदान से सत्कृत करे।

गुरु की आज्ञा ले स्नान कर गुरुकुल से अनुक्रमपूर्वक (अपने माता-पिता के पास) आ के ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अपने वर्णानुकूल सुन्दर लक्षणयुक्त कन्या से विवाह करे। जो कन्या माता के कुल की छः पीढ़ियों में न हो और पिता के गोत्र की न हो तो उस कन्या से विवाह करना उचित है। इसका यह प्रयोजन है कि जैसे परोक्ष पदार्थ में प्रीति होती है वैसी प्रत्यक्ष में नहीं होती। जैसे किसी ने मिश्री के गुण सुने हों और खाई न हो तो उसका मन उसी में लगा रहता है। जैसे किसी परोक्ष वस्तु की प्रशंसा सुनकर मिलने की उत्कट इच्छा होती है, वैसे ही दूरस्थ अर्थात् जो अपने गोत्र वा माता के कुल में निकट सम्बन्ध की न हो उसी कन्या से वर का विवाह होना चाहिये।

निकट और दूर विवाह करने में गुण यह हैं-

1- एक–जो बालक बाल्यावस्था से निकट रहते हैं, परस्पर क्रीडा, लड़ाई और प्रेम करते, एक दूसरे के गुण, दोष, स्वभाव, बाल्यावस्था के विपरीत आचरण जानते और नंगे भी एक दूसरे को देखते हैं, उन का परस्पर विवाह होने से प्रेम कभी नहीं हो सकता।

2- दूसरा–जैसे पानी में पानी मिलने से विलक्षण गुण नहीं होता, वैसे एक गोत्र पितृ वा मातृकुल में विवाह होने में धातुओं के अदल-बदल नहीं होने से उन्नति नहीं होती।

3- तीसरा–जैसे दूध में मिश्री वा शुण्ठयादि औषिधियों के योग होने से उत्तमता होती है वैसे ही भिन्न गोत्र मातृ पितृ कुल से पृथक् वर्तमान स्त्री पुरुषों का विवाह होना उत्तम है।

4- चौथा–जैसे एक देश में रोगी हो वह दूसरे देश में वायु और खान पान के बदलने से रोग रहित होता है वैसे ही दूर देशस्थों के (वर व कन्याओं के) विवाह होने से उत्तमता है।

5- पांचवें–निकट सम्बन्ध करने में एक दूसरे के निकट होने में सुख दुःख का भान और विरोध होना भी सम्भव है, दूर देशस्थों में नहीं और दूरस्थों के विवाह में दूर-दूर प्रेम की डोरी लम्बी बढ़ जाती है, निकटस्थ विवाह में नहीं।

6- छठे–दूर-दूर देश के वर्तमान और पदार्थों की प्राप्ति भी दूर सम्बन्ध होने में सहजता से हो सकती है, निकट विवाह होने में नहीं। इसलिये-

दुहिता दुर्हिता दूरे हिता भवतीति।। निरुक्त।।

कन्या का नाम दुहिता इस कारण से है कि इसका विवाह दूर देश में होने से हितकारी होता है निकट रहने से नहीं।

7- सातवें–कन्या के पितृकुल में दारिद्रय होने का भी सम्भव है क्योंकि जब-जब कन्या पितृकुल में आवेगी तब-तब इसको कुछ न कुछ देना ही होगा।

8- आठवां–निकट विवाह होने से एक दूसरे को अपने-अपने पितृकुल के सहाय का घमण्ड और जब कुछ भी दोनों में वैमनस्य होगा तब स्त्री झट ही पिता कुल में चली जायेगी। एक दूसरे की निन्दा अधिक होगी और विरोध भी, क्योंकि प्रायः स्त्रियों का स्वभाव तीक्ष्ण और मृदु होता है, इत्यादि कारणों से पिता के एक गोत्र, माता की छः पीढी और समीप देश में विवाह करना अच्छा नहीं।

चाहे कितने ही धन, धान्य, गाय, अजा, हाथी, घोड़े, राज्य, श्री आदि से समृद्ध ये कुल हों तो भी विवाह सम्बन्ध में निम्नलिखित दश कुलों का त्याग कर दें।

1- जो कुल सत्क्रिया से हीन, 2- सत्पुरुषों से रहित, 3- वेदाध्ययन से विमुख, 4- शरीर पर बड़े बड़े लोम, 5- अथवा बवासीर, 6- क्षयी, दमा, खांसी, 7- आमाशय, 8- मिरगी, 9- श्वेतकुष्ठ और 10- गलितकुष्ठयुक्त कुलों की कन्या वा वर के साथ विवाह होना न चाहिए, क्योंकि ये सब दुर्गुण और रोग विवाह करने वाले के कुल में भी प्रविष्ट हो जाते हैं, इसलिये उत्तम कुल के लड़के और लड़कियों का आपस में विवाह होना चाहिये।

न पीले वर्ण वाली, न अधिकांगी अर्थात् पुरुष से लम्बी चैड़ी अधिक बलवाली, न रोगयुक्ता, न लोमरहित, न बहुत लोमवाली, न बकवाद करनेहारी और भूरे नेत्रवाली, न ऋक्ष अर्थात् अश्विनी, भरणी, रोहिणीदेई, रेवतीबाई, चित्तारी आदि नाम वाली, तुलसिया, गेंदा, गुलाब, चम्पा, चमेली आदि वृक्ष नामवाली, गंगा, जमुना आदि नदी नामवाली, चाण्डाली आदि अन्त्य नामवाली, विन्ध्या, हिमालया, पार्वती आदि पर्वत नामवाली, कोकिला, मैना आदि पक्षी नामवाली नागी, भुजंगा आदि सर्प नाम वाली, माधोदासी, मीरादासी आदि प्रेष्य नामवाली और भीमकुअरि, चण्डिका, काली आदि भीषण नामवाली कन्या के साथ विवाह न करना चाहिये क्योंकि ये नाम कुत्सित और अन्य पदार्थों के भी हैं। जिसके सरल सूधे अंग हों विरुद्ध न हों, जिस का नाम सुन्दर अर्थात् यशोदा, सुखदा आदि हो, हंस और हथिनी के तुल्य जिस की चाल हो, सूक्ष्म लोम केश और दांत युक्त और जिस के सब अंग कोमल हों, वैसी स्त्री के साथ विवाह करना चाहिये।

विवाह का समय और विवाह के प्रकार कि कौन सा विवाह अच्छा है, ऋषि दयानन्द कहते हैं कि सोलहवें वर्ष से लेके चैबीसवें वर्ष तक कन्या और 25 पच्चीसवें वर्ष से ले के 48वें वर्ष तक पुरुष का विवाह समय उत्तम है। इस में जो सोलह की कन्या और पच्चीस के युवक का विवाह करे तो निकृष्ट, अठारह बीस वर्ष की स्त्री और तीस पैंतीस वा चालीस वर्ष के पुरुष का मध्यम, चैबीस वर्ष की स्त्री और अड़तालीस वर्ष के पुरुष का विवाह उत्तम है। जिस देश में इसी प्रकार विवाह की विधि श्रेष्ठ और ब्रह्मचर्य विद्याभ्यास अधिक होता है वह देश सुखी और जिस देश में ब्रह्मचर्य, विद्याग्रहणरहित बाल्यावस्था और अयोग्यों का विवाह होता है वह देश दुःख में डूब जाता है। क्योंकि ब्रह्मचर्य विद्या के ग्रहणपूर्वक विवाह के सुधार ही से सब बातों का सुधार और बिगड़ने से बिगाड़ हो जाता है।

कन्या का विवाह 16 से 24 वर्ष की आयु में ही उत्तम होता है। इसका कारण यह है कि सोलहवें वर्ष के पश्चात चैबीसवें वर्ष पर्यन्त विवाह होने से पुरुष का वीर्य (पौरुष शक्ति) परिपक्व, शरीर बलिष्ठ, स्त्री का गर्भाशय पूरा और शरीर भी बलयुक्त होने से सन्तान उत्तम होते हैं। इस प्रकरण में ऋषि ने मिथ्या के त्याग व सत्य के ग्रहण का उल्लेख कर कहा है कि अप्रमाणिक ग्रन्थों के कथनों को छोड़कर वेदों के प्रमाण से सब काम करने चाहियें। ऋषि दयानन्द ने यह भी लिखा है कि कन्या रजस्वला हुए पीछे तीन वर्ष पर्यन्त पति की खोज करके अपने तुल्य पति को प्राप्त होवे, इससे पूर्व नहीं।

चाहे लड़का व लड़की मरणपर्यन्त कुमार (अविवाहित) रहें परन्तु असदृश अर्थात् परस्पर विरुद्ध गुण, कर्म, स्वभाव वालों का विवाह कभी न होना चाहिये। इस से सिद्ध हुआ कि पूर्वोक्त विवाह की निर्धारित आयु वा समय से पहले वा असदृशों का परस्पर विवाह न होना योग्य है। ऋषि दयानन्द यह भी उपदेश करते हैं कि कन्या व वर का विवाह माता पिता के अधीन न होकर लड़का लड़की के आधीन होना उत्तम है। जो माता पिता विवाह करना कभी विचारें तो भी लड़का लड़की की प्रसन्नता के विना न होना चाहिये। क्योंकि एक दूसरे की प्रसन्नता से विवाह होने में विरोध बहुत कम होता है और सन्तान उत्तम होते हैं। अप्रसन्नता के विवाह में नित्य क्लेश ही रहता है। विवाह में मुख्य प्रयोजन वर और कन्या का है माता पिता का नहीं। क्योंकि जो उनमें परस्पर प्रसन्नता रहे तो उन्हीं को सुख और विरोध में उन्हीं को दुःख होता है। ऋषि आगे कहते हैं कि जिस कुल में स्त्री से पुरुष और पुरुष से स्त्री सदा प्रसन्न रहती है उसी कुल में आनन्द, लक्ष्मी और कीर्ति निवास करती है और जहां विरोध, कलह होता है वहां दुःख, दारिद्रय और निन्दा निवास करती है। इसलिये जैसी स्वयंवर की रीति आर्यावर्त में परम्परा से चली आती है वही विवाह उत्तम है। जब स्त्री पुरुष विवाह करना चाहैं तब विद्या, विनय, शील, रूप, आयु, बल, कुल, शरीर का परिमाणादि यथायोग्य होना चाहिये। जब तक इनका मेल नहीं होता तब तक विवाह में कुछ भी सुख नहीं होता और न बाल्यावस्था में विवाह करने से सुख होता है।

हमने इस लेख में ऋषि दयानन्द सरस्वती जी के सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ के चतुर्थ समुल्लास के आरम्भ में प्रस्तुत कुछ विचारों को दिया है। ऋषि ने अपने वचनों के समर्थन में मनुस्मृति, शतपथ-ब्राह्मण, निरुक्त, पाराशरी, शीघ्रबोध, ब्रह्मपुराण आदि के प्रमाण भी लिखे हैं। हमने इन प्रमाणों को यहां छोड़ दिया है। पाठक महानुभाव कृपया सत्यार्थप्रकाश का चैथा समुल्लास पूरा पढ़े तो इससे उन्हें इस विषय पर ऋषि दयानन्द के युक्तियुक्त विचारों का परिचय मिलेगा जो पुरातन होते हुए भी आधुनिक वर्तमान काल में भी प्रासंगिक हैं। इसके साथ ही संस्कारविधि का गृहस्थाश्रम प्रकरण भी पढ़ना चाहिये। हम आशा करते हैं कि इस लेख में प्रस्तुत संक्षिप्त विचारों से पाठकों को लाभ होगा और वह सम्पूर्ण सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ को पढ़कर लाभ उठायेंगे तथा ज्ञान की निभ्र्रान्त स्थिति को प्राप्त होंगे। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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