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कश्मीर में बहने लगी है धीरे-धीरे विकास की बयार

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

हालांकि किसी भी बड़ी घटना के एक साल के परिणामों का विश्लेषण करना उसके साथ न्याय नहीं कहा जा सकता क्योंकि दशकों की व्यवस्था को तोड़कर नया रचने के लिए समय, धन और लोगों की मानसिकता में बदलाव की लंबी पारी खेलनी होती है।

आजादी के आंदोलन में जिस तरह से अगस्त माह का विशेष महत्व रहा है वहीं आजादी के बाद की अन्य घटनाओं के साथ ही दो घटनाएं अगस्त माह को विशेष व ऐतिहासिक बना देती हैं। पहली 5 अगस्त 2019 को कश्मीर में धारा 370 और धारा 35 ए के प्रावधान हटाना और दूसरी 2020 में 5 अगस्त को ही राम मंदिर का शिलान्यास। कश्मीर व लद्दाख को अलग-अलग टेरिटरी बनाए जाने पर अनेक आशंकाएं व्यक्त की गई थीं, लेकिन चाहे देश हो या विदेश, सारी आशंकाएं निर्मूल साबित हो गई हैं। आतंकियों की छुट-पुट घटनाओं और पाकिस्तान द्वारा सीजफायर की की जा रही घटनाओं को अलग कर दिया जाए तो आज कश्मीर और लद्दाख के हालातों में तेजी से बदलाव देखने को मिल रहा है। लद्दाख में आज चीन की नापाक गतिविधियों को इसी संदर्भ में देखा जा सकता है उसे अब भारत की ओर से सख्त निर्णयों से भय सताने लगा है। यही कारण है कि सीमा पर दबाव बनाने के चीनी प्रयास जारी हैं। पाकिस्तान को अब पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर को बचाने की चिंता अधिक सताने लगी है। इसमें कोई दो राय नहीं कि थोड़ा-सा जोखिम लेकर बदलाव की बयार चलाई जा सकती है। देशवासियों के दिल में कश्मीर की स्थिति किसी शूल से कम नहीं चुभी हुई थी पर देश भी अवसर की तलाश में था और एक सख्त व रिस्की निर्णय ने हालातों को तेजी से बदल कर रख दिया है। आज कश्मीर देश की विकास की मुख्य धारा से जुड़ता जा रहा है। 18 मई 2020 के यूनियन टेरिटरी डोमिसाइल कानून के तहत कश्मीर में 15 साल से किसी भी बाहरी राज्य के रहने वाले नागरिकों को नागरिकता मिलने का सिलसिला शुरू हो गया है। धारा 35 ए के प्रावधानों के अनुसार आईएएस नवीन कुमार पहले व्यक्ति हो गए हैं जिन्होंने इस प्रावधान के अनुसार नागरिकता प्राप्त कर ली है।

हालांकि किसी भी बड़ी घटना के एक साल के परिणामों का विश्लेषण करना उसके साथ न्याय नहीं कहा जा सकता क्योंकि दशकों की व्यवस्था को तोड़कर नया रचने के लिए समय, धन और लोगों की मानसिकता में बदलाव की लंबी पारी खेलनी होती है। पर एक साल में कश्मीर और लद्दाख में जो बदलाव आने लगे हैं उन्हें कम नहीं आंका जा सकता है। इसमें कोई दो राय नहीं कि कश्मीर और लद्दाख में बदलाव की बयार बहने लगी है। केन्द्र के सभी 890 कानून और योजनाओं का लाभ मिलने लगा है तो आरक्षण प्रावधान भी लागू हो गए हैं। सरकार शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, औद्योनिक निवेश, आधारभूत सुविधाओं के विस्तार की दिशा में चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ने लगी है। पंचायतीराज के चुनाव संपन्न कराकर 58 लाख से अधिक जनप्रतिनिधियों को स्थानीय स्वशासन का जिम्मा सौंप दिया गया है। 1500 करोड़ रुपये के काम पंचायतों को दिए गए हैं। दस हजार युवाओं को रोजगार दिया जा चुका हैं वहीं 25 हजार नौकरियां पाइप लाईन में हैं। पांच लाख युवाओं को खेल गतिविधियों से जोड़ा जा रहा है। जम्मू और कश्मीर को स्मार्टसिटी प्रोजेक्ट से जोड़ा गया है। झेलम की बाढ़ को क्षमता बढ़ाकर वरदान के रूप में बदला जा रहा है। कश्मीर की जान या यों कहा जाए कि पर्यटन उद्योग कश्मीर की विकास धारा है और पर्यटन को बढ़ावा देना सरकार ने प्राथमिकता की श्रेणी में रखा और पयर्टन क्षेत्र में 552 करोड़ के निवेश किए गए हैं जिसमें 52 प्रोजेक्ट पूरे हो चुके हैं वहीं 70 परियोजनाओं पर काम जारी है। औद्योगिक विकास का रोडमैप बनाते हुए निवेश के लिए 6 हजार एकड़ का लैंड बैंक बनाया जा चुका है। सेब और सूखा मेवा कश्मीर, लद्दाख के कृषि विकास का प्रमुख आधार है तो इसके लिए ई-मण्डी विकसित की जा चुकी है। यह तो कुछ बानगी मात्र है।

दरअसल देखा जाए तो युवाओं को अच्छी शिक्षा और रोजगार मिलने के साथ ही विकास के अवसर मिलते हैं तो उन्हें मुख्य धारा से आसानी से जोड़ा जा सकता है। इसके लिए योजनाबद्ध प्रयास किए जा रहे हैं और उनके परिणाम भी आने लगे हैं। इसके साथ ही सरकार और मीडिया ने कश्मीर के अतिवादी संगठनों और उनके नेताओं को जिस तरह से एक्सपोज किया है और उनके पाकिस्तान सहित अन्य देशों से फण्डिंग और संबंधों की जानकारी व इन अतिवादी नेताओं के दोहरे चरित्र के उजागर होने से भी काफी प्रभाव पड़ा है। सरकार ने जिस तरह से इन नेताओं को विशेष महत्व देने से हाथ खींचा है और जिस तरह से इन पर अंकुश लगाया है उसका भी सकारात्मक प्रभाव देखने को मिला है। आज आम कश्मीरी के यह समझ में आने लगा है कि इन अतिवादियों के बच्चे तो इन गतिविधियों से दूर हैं कोई विदेशों में पढ़ रहे हैं तो किसी के बच्चे विदेशों में नौकरी या रोजगार कर रहे हैं। अतिवादी नेता स्वयं आम कश्मीरियों के कंधे पर बंदूक रखकर स्वयं पंच सितारा सुविधाओं का लाभ उठाते रहे हैं। सरकार द्वारा सख्ती दिखाने और इनके असली चेहरे को मीडिया द्वारा बेनकाब करने का परिणाम यह हो गया है कि पिछले एक साल में इन अलगाववादी नेताओं की देश विरोधी आवाज लगभग बंद हो चुकी है। कुछ छुट-पुट आतंकियों की घटनाओं को छोड़ दिया जाए तो आज हालात तेजी से विकास और मुख्य धारा से जुड़ते जा रहे हैं। आर्थिक गतिविधियां पटरी पर आने लगी हैं। कश्मीर और लद्दाख के नागरिकों में भी विश्वास जमने लगा है और यही अपने आप में बड़ी बात है। जिस तेजी से कश्मीर और लद्दाख मुख्य धारा से जुड़ने लगे हैं वह दिन दूर नहीं जब पीओके सहित पूरा कश्मीर एक होगा।

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