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भारतीय क्षत्रिय धर्म और अहिंसा स्वर्णिम इतिहास

भारतीय क्षात्र धर्म और अहिंसा ( है बलिदान इतिहास हमारा ) , अध्याय — 5 , धार्मिक पाखंडवाद ,बौद्ध धर्म और अहिंसा

राष्ट्रकवि इकबाल की निम्नलिखित पंक्तियां बहुत ही सार्थक हैं :—

यूनानियों को जिसने हैरान कर दिया था,
तुर्कों का जिसने दामन हीरों से भर दिया था,
मिट्टी को जिसकी हमने जर का असर दिया था,
सारे जहां को जिसने इल्मो – हुनर दिया था ,
मेरा वतन वही है , मेरा वतन वही है ।।

जिस भारत देश ने सारे विश्व को ज्ञान – विज्ञान का प्रकाश देकर आलोकित किया , हम उसी की सन्तानें हैं। यह हमारे लिए आत्मगौरव की बात है कि हमारे पास अपना एक गौरवमयी अतीत है । उज्ज्वल भविष्य की समुज्ज्वल आशा है और वर्तमान को गौरवमय बनाने की एक कसक है , हृदय में तड़प है , एक पीड़ा है , एक दर्द है , टीस है । भारत की जीवन्तता का रहस्य भी इसी में छिपा है , इसीलिए हम संसार में जीवित हैं । यह विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि भविष्य में भी हमारा देश इसी प्रकार एक जीवन्त राष्ट्र के रूप में बना रहेगा ।
हमने प्रभु प्रदत्त शुद्ध और निर्मल वैदिक ज्ञान को प्राप्त किया और उसी के अनुसार अपने जीवन व आचरण को ढालकर वैज्ञानिक एवं प्राकृतिक रूप से जीने का प्रयास किया । वैश्विक रंगमंच पर अभिनय प्रस्तुत करती विभिन्न संस्कृतियों में सर्वोत्कृष्ट और जीवित रहने वाली भारतीय संस्कृति के स्थायी बने रहने का एकमेव कारण यही है। जो लोग प्रकृति के विरुद्ध चले उन्हें प्रकृति ने अपने कोप का भाजन बनाया और आज वह नहीं रहे , जबकि हमारा अस्तित्व आज भी है।

जहाँ सरिता की गहराई सबसे अधिक होती है , वहीं उसका जल भी सबसे अधिक शान्त होता है । विश्व के रंगमंच पर जितनी भी संस्कृतियों ने अपना अभिनय आज तक प्रस्तुत किया है उनके अभिनय के तुलनात्मक अवलोकन के पश्चात यह बात निर्विवाद रूप से कही और मानी जा सकती है कि हम भारतीय भी सागर की भान्ति धैर्यवान , सहनशील , गम्भीर , शान्तचित्त और विशाल हृदयता वाले जन रहे हैं । क्योंकि धर्म के सच्चे स्वरूप को स्वीकार कर हमारे जीवन का लक्ष्य भौतिक उन्नति ना होकर आध्यात्मिक उन्नति था। हमारे जीवन का लक्ष्य दृश्य से अदृश्य की ओर, स्थूल से सूक्ष्म की ओर , परिवर्तनशील से अपरिवर्तनशील की ओर , चलायमान से अचलामान की ओर, अस्थिर से स्थिर की ओर चलना था । प्रत्येक मानव को अपने जीवन में विकास के इस सोपान तक पहुँचा देना धर्म का स्वाभाविक कार्य है।

उत्थान पतन है नियम प्रकृति का

प्रत्येक मानव के जीवन में शाश्वत सुख और शान्ति की प्रतिष्ठा कराना उसका अन्तिम लक्ष्य है । यदि मानव का लक्ष्य इस परमसत्य तक पहुँचना है तो धर्म का लक्ष्य इस तत्व से मानव जीवन को ओतप्रोत कर देना है । यह सब कुछ हमने जान लिया था । यह राज़ जान लेना कि धर्म क्या है ?- हमारे उत्थान और पतन दोनों का कारण बना । जब हम आत्मविकास के रास्ते पर चलते हुए ऊपर उठने लगे तो उठते ही चले गए और जब गिरने लगे तो गिरते ही चले गए । जब धर्म संप्रदायों में दिखाई देने लगा , वह बंट गया तो उसकी पतन की अवस्था आयी , जिसने भारतीय समाज को भी विखण्डित और पतित किया। विकास का चरमोत्कर्ष विकास का अचूक लक्षण है । यह भी सत्य है कि जब परिस्थितियां सर्वथा आपके अनुकूल हों तो यह समझ लेना चाहिए कि प्रतिकूल परिस्थितियों का पतझड़ भी समीप है। सौ के पश्चात शून्य आ जाता है ।

उत्थान पतन है नियम प्रकृति का
शाश्वत चलता रहता है ।
तुलसी की यह उक्ति सही है
जो बरता वह बुझता है ।।

विनाश और विकास दोनों मनुष्य के लिए एक अबूझ पहेली बने रहे हैं । यह दोनों मनुष्य के लिए आदि काल से एक ऐसा मनोरंजक खेल बने रहे हैं , जिसे खेलते – खेलते हमें सदियां नहीं युग बीत गए । यह पहेली अथवा खेल सम्भवत: ईश्वर ने बना दिया। इसी पहेली और मनोरंजक खेल का हल निकालने में मनुष्य आदिम युग से अद्यतन जूझ रहा है । वह विनाश से जब विकास की ओर चलता है तो प्रभु स्मरण और प्रभु भक्ति की गंगा – जमुना उसके हृदय में हिलोरें मार रही होती हैं । जिनके शीतल जल से स्नान कर वह स्वयं तो धन्य होता ही है ,साथ ही दूसरों को भी इस शाश्वत सुख और शान्ति के लिए प्रेरित करता है। वह जैसे-जैसे विकास के समीप आता जाता है वैसे-वैसे प्रभु स्मरण और प्रभु भक्ति की गंगा यमुना को तिरस्कृत और उपेक्षित कर स्वयं से बिछोह देता है । जिस कारण हृदय में शीतल जल की हिलोरों के स्थान पर नास्तिकता का रेगिस्तान हावी और प्रभावी हो जाता है ।
फलस्वरूप समग्र सृष्टि के स्वामी सर्वनियन्ता सर्वेश्वर सर्वांतर्यामी परमेश्वर को न मानकर मनुष्य स्वयं को सृष्टि का सर्वेसर्वा अर्थात सृष्टि का स्वामी समझने लगता है । इस घोर नास्तिकतापूर्ण मन:स्थिति के शिकार मनुष्य को तब प्राकृतिक प्रकोप का प्रबल झटका लगता है और विकास का सारा खेल विनाश में परिवर्तित हो जाता है । सारा अहंकार चकनाचूर हो जाता है । यहाँ तक आते-आते समाज की सारी नैतिक मर्यादा समाप्त हो जाती हैं और समाज में अनीति व अन्याय बढ़ जाता है । न्याय और नीति की बातें विकृतावस्था में धर्म का चोला ओढ़कर अन्याय और अनीति में परिवर्तित हो जाती हैं । तब पतन के गहन गह्वर में पड़ा व्यक्ति फिर उठने एवं सम्भलने का प्रयास करने लगता है ।
जब लक्ष्य निकट हो तो व्यक्ति के भीतर आलस्य, प्रमाद ,अहंकार और नास्तिकता उत्पन्न होती है। जिससे कई बार बना बनाया काम बिगड़ जाया करता है :-

मुतमईन न होना राही करीब ए मंजिल पे कभी। काफिले लुटते हैं अक्सर मंजिल के करीब।।

प्रभु की असीम अनुकंपा के पात्र हैं हम

संसार में आत्मोन्नति के मार्ग पर जब मनुष्य आरूढ़ होता है तो यह ईश्वर की कृपादृष्टि का ही परिणाम होता है । यहाँ तक कि अनन्तकाल से जन्म मरण के चक्कर में पड़े होकर भी इस बार फिर हमको मानव चोला उस परमपिता परमेश्वर ने उपलब्ध कराया है तो यह भी उसी की कृपा दृष्टि है । अनन्तकाल के इस अनन्त यात्रा पथ में हमारे द्वारा कितने ही गलत कार्य किए गए होंगे । व्यक्ति के लाखों अपराधों को क्षमा करते हुए भी अभी उसका प्यार मनुष्य पर यथावत है। वह उसे और भी उठने और सम्भलने का अवसर देना चाहता है , यह इसी बात का प्रमाण है । परमपिता परमेश्वर कितना दयालु और सहिष्णु है ? – यह सोचकर उसके सामने हृदय नतमस्तक हो जाता है । युग – युगों से अपने इस यात्रा पथ पर अग्रसर मानव उतार-चढ़ाव और उत्थान – पतन के कितने ही कीर्तिमान स्थापित करता चला आ रहा है । हर स्थिति में और हर काल में इसकी यात्रा का एक ही उद्देश्य होता है – शान्ति की खोज ।
ईश्वर के सान्निध्य में आध्यात्मिक मनोवृति के कारण मनुष्य सच्ची शान्ति का अभिलाषी होता है। जबकि अपने नास्तिक भावों के कारण समाज की पतन की अवस्था में अर्थात भौतिकतावादी उन्नति के दौर में उसे भौतिक उन्नति के लिए भौतिक शान्ति की इच्छा होती है । यह ऐसी शान्ति होती है जिसमें ईश्वर के सान्निध्य में मिलने वाली शाश्वत शान्ति का पुट नहीं होता , अपितु भौतिक ऐश्वर्यों में मिलने वाली शान्ति की क्षणिक उपलब्धि की अनुभूति होती है । मानव शान्ति के लिए मृगतृष्णा का शिकार होता है । यह मनुष्य का पतन का समय होता है , जिसकी कहानी वह स्वयं लिखता है।

महाभारत का युद्ध और हमारा ज्ञान विज्ञान

भारतीय सांस्कृतिक इतिहास में महाभारत का युद्ध एक निर्णायक मोड़ है । यहाँ तक हम उन्नति एवं विकास की ऊंचाई पर खड़े थे , किन्तु इसके पश्चात अवन्नति और पतन के गहन गह्वर में जा पड़े हुए अपना यात्रा पथ खोजने लगे । उन्नति के उजालों ने यहाँ आकर पतन के अंधेरों से मित्रता कर ली। इसको हम भारत के पराभव का काल कहते हैं । पराभव के इसी काल में विदेशी आक्रमणकारियों ने भारत को लूटने का काम किया । कइयों ने यहाँ पर अपने साम्राज्य स्थापित करने में सफलता प्राप्त की तो कइयों ने यहां पर भयंकर मारकाट और नरसंहार भी किये ।
सचमुच में महाभारत के युद्ध के समय जिस ज्ञान – विज्ञान एवं सामाजिक नैतिक मर्यादाओं के उजालों के आधार पर हम विकास के चरमोत्कर्ष पर थे , इसके पश्चात यह सारा ज्ञान – विज्ञान सामाजिक नैतिक मर्यादाएं जिनके आधार पर सारा सामाजिक ढांचा वैदिक परम्परा के अनुसार खड़ा हुआ था , छिन्न -भिन्न हो गया । जिसके परिणामस्वरूप वैदिक ज्ञान के शुद्ध और निर्मल ज्ञान के उजालों ने मानो आत्महत्या कर ली । इसके पश्चात वैदिक ज्ञान का दिव्य दिवाकर तिमिर – तिरोहित होकर अस्ताचल के अंक में समाहित हो गया।
पतन के पश्चात सामाजिक परिवर्तन का क्रम यद्यपि प्रकृति के शाश्वत नियमों के अनुसार चलता रहता है , परन्तु इसके उपरान्त भी यह अपने आने-जाने का श्रेय किसी न किसी महान व्यक्तित्व के सिर बांध जाते हैं । इसको आप ऐसे भी कह सकते हैं कि राष्ट्र या समाज की परिस्थितियां व्यक्तित्व का निर्माण करती हैं।
महाभारत कालीन उन्नत समाज को विध्वंस और विनाश की भट्टी में झोंकने का श्रेय दुर्योधन को जाता है , क्योंकि उसकी महत्वाकांक्षा और अहम की भावना ने श्रीकृष्ण , भीष्म पितामह , द्रोण और कृपाचार्य आदि सभी परम विद्वानों एवं शूरवीरों को अपमानित व लज्जित किया । इनमें से श्रीकृष्ण को छोड़कर शेष सभी ने दुर्योधन का अन्न खाया था । यही कारण रहा कि यह लोग समय पर दुर्योधन के अनुचित आचरण का प्रतिरोध नहीं कर पाए। इसके अतिरिक्त एक बात यह भी है कि जब विनाश के क्षण आते हैं तो अच्छे – अच्छे लोगों का विवेक मर जाता है। ऐसे समय में भले लोग भी दुष्ट लोगों का साथ देने लगते हैं या सही समय पर कुछ न बोल कर मौन साध जाते हैं। दुर्योधन का अहंकार और अविवेक सिर चढ़कर बोलता रहा , जबकि धृतराष्ट्र पुत्र मोह में अविवेकी बना रहा । उनके दरबार में रहने वाले भीष्म, द्रोण और कृपाचार्य जैसे लोग भी इन पिता पुत्रों के अविवेक और अहंकार को समाप्त नहीं कर पाए । यहां तक कि विदुर की नीति भी उन दोनों को समझाने में असफल हो गई ।

अयोग्यों का सम्मान करना होता है घातक

दुर्योधन नित्य प्रति विघटन और विखंडन की राजनीति करता रहा । वह द्वेष भाव से युद्धिष्ठिर व उसके चारों भाइयों को राजसत्ता से वंचित करने की चाल चलता रहा । उसके कई अनिष्टकारी , अनीतिपरक और अन्याय पर आधारित कृत्यों को उक्त महापुरुष देखते ही रह गये । हमारे नीतिकारों की स्पष्ट मान्यता है ‘यत्र अपूज्य पूज्यंते तत्र दुर्भिक्ष मरणम भयम’ – अर्थात जहाँ अयोग्यों का सम्मान होता है वहां दुर्भिक्ष , मरण और भय का साम्राज्य होता है। यह सभी विनाश के लक्षण हैं । दुर्योधन के अहंकार में दिन-प्रतिदिन की हो रही वृद्धि किसी अनिष्ट का संकेत दे रही थी । जिसे समभाव और तटस्थवादी योगिराज श्रीकृष्ण की आंखें देख और समझ रही थी । धृतराष्ट्र के पुत्रमोह की अविवेकशील और राजधर्म के सर्वथा विपरीत नीति और दुर्योधन की हठधर्मिता व महत्वाकांक्षा ने कृष्ण जी की पाँच गांव मांगने और उन्हीं में पांडवों को संतुष्ट करने की प्रार्थना भी स्वीकार नहीं की ।
फलस्वरूप युद्ध का होना अवश्यम्भावी हो गया। योगीराज कृष्ण की इच्छा के विपरीत वह भयंकर और महाविनाशकारी युद्ध हुआ । जिसके दुष्परिणाम हम आज तक भोग रहे हैं । यह भारतीय इतिहास की वह निर्णायक किन्तु दुर्भाग्यपूर्ण घटना थी । जिसने आगे आने वाले भारतीय इतिहास की दिशा ही बदल दी। इसके लिए दुर्योधन का अहंकार उत्तरदायी था। वह भारतीय राज धर्म के विपरीत आचरण जो कर रहा था। भारतीय इतिहास में पहली बार किसी शासक अथवा युवराज को हमने राज सत्ता प्राप्ति हेतु हर प्रकार का कुत्सित प्रयास करते हुए देखा । जिसमें जनाकांक्षा को नहीं अपितु निजी महत्वाकांक्षा को ही सर्वोच्च मानते हुए प्राथमिकता दी गई । यह तत्कालीन भारतीय राजनीति के आदर्शों के खोखले पन और राजनीति में आई गिरावट का स्पष्ट प्रमाण है। जिस कारण मंजिल के करीब पहुँचते-पहुँचते भारतीय राष्ट्र एवं समाज का काफिला लूट लिया गया।
भारत के ऋषि , मुनि , संतों और महात्माओं के द्वारा भारतीय राष्ट्र व समाज को नैतिक मूल्यों पर आधारित सामाजिक व्यवस्था के लिए किए गए सारे पुरुषार्थ और अध्यवसाय पर अकेले दुर्योधन ने व्यर्थ कर दिया। यह युद्ध भारतीय संस्कृति के लिए सर्वाधिक विडम्बनापूर्ण सिद्ध हुआ । क्योंकि इसके पश्चात हमारी संस्कृति के ध्वजारोही सभी महापुरुषों का विनाश हो गया।

फैल गया अज्ञान अंधकार

इस युद्ध के पश्चात भारतीय राष्ट्र एवं समाज में धार्मिक नेतृत्व का अभाव हो गया । समाज एवं राष्ट्र की शान्ति के लिए जिस समाजोन्मुखी संकल्पना की आवश्यकता होती है वह राजनीतिक नेतृत्व में लुप्तप्राय हो गई । जिससे भारतीय राष्ट्र व समाज का क्रमिक पतन आरम्भ हो गया । परिणामस्वरूप भारतीय समाज धार्मिक पाखण्डवाद के दौर में प्रविष्ट हो गया । वेद की निर्मल ज्ञानधारा विलुप्त होने लगी। उसके स्थान पर कितने ही प्रकार के पुराण आदि वेद विरुद्ध शास्त्रों की रचना होने लगी । वेद का ज्ञाता एवं वेद प्रतिपादित मानव धर्म को प्राथमिकता देने वालों का अभाव हो गया । जिस कारण पौराणिक मान्यताएं एवं धारणाएं समाज में मान्यता प्राप्त करने लगीं । हम वेद पाठकों के द्वारा वेद के ही नाम पर समाज में हिंसा की जाने लगी । अहिंसावाद का अभी तक का प्रचलित अर्थ अनर्थ में परिवर्तित होकर हिंसावाद का पर्याय बन गया । यह हमारे लिए राष्ट्रीय दुर्भाग्य का काल था । जिसमें सभी कुछ वेद विरुद्ध होने लगा। यज्ञ में पशु बलि दी जाने लगी। यज्ञ का यौगिक अर्थ विस्मृत कर दिया गया । अब सर्व कल्याण के लिए नहीं अपितु स्वकल्याण के लिए और प्राणधारियों के उद्धार के लिए नहीं अपितु उनकी हत्या के लिए यज्ञ किए जाने लगे । जो यज्ञ कभी पवित्रता और शुद्धता के प्रतीक होते थे वही अब अत्याचार , अनाचार और अनैतिक कृत्यों के पर्याय बन गए । ‘पशून पाहि’ अर्थात पशुओं की रक्षा कर – का उद्घोषक और प्राणी मात्र का हिताभिलाषी एवं शुभचिन्तक पावन वेद पशु रक्षक के स्थान पर पशु भक्षक बना दिया गया। कहने का अभिप्राय है कि भारतवर्ष में सर्वत्र अज्ञान अन्धकार फैल गया।
जो वेद ‘मा हिंसी तन्वा:’ अर्थात शरीर से हिंसा मत कर ,की पावन आज्ञा प्रदान करता था वही अब धार्मिक पाखण्डवाद में फंसे भारतीयों के लिए हिंसा का आज्ञा प्रदाता हो गया । यह सभी कुछ वेद विरुद्ध था । सर्वत्र अत्याचार और अनाचार का बोलबाला था। विश्व का प्राचीनतम वैदिक धर्म जो मानवता का पुजारी था , सांस्कृतिक खोखलेपन की दहलीज पर आ चुका था । परिस्थितियां सामाजिक चेतना को झंकृत कर रही थीं , क्योंकि परिस्थितियां महापुरुषों का निर्माण करती हैं । परिस्थितियों की प्रतिकूलता में एक ललकार छिपी होती है। एक चुनौती छिपी होती है । जिन्हें पूर्व स्थिति में यथावत लाने के लिए कोई सूरमा सुन लेता है । यह सूरमा इन परिस्थितियों को एक चुनौती मानकर स्वीकार करता है।
प्रतिकूल परिस्थितियों की भट्टी में से यह सूरमा सोने से कुंदन बन कर बाहर निकलता है। महान व्यक्तित्व के लिए विपरीत परिस्थितियों का होना बहुत आवश्यक होता है । यह उसी प्रकार आवश्यक होता है जिस प्रकार अरुणोदय से पूर्व अंधकार का होना आवश्यक होता है। गहन अंधकार के पश्चात उदित होने वाला अरुण ही सबके लिए पूजनीय होता है। इसी प्रकार हिमालय के उत्तुंग शिखर में गंगा की लहरों के साथ जब तक कोई प्रस्तर लहरों की तीक्ष्णता एवं भयंकरता के साथ बह नहीं निकलता तब तक वह अपनी टेढ़ी-मेढ़ी शक्ल से गोल अर्थात सुंदर कटी छोटी आकृति वाला नहीं हो जाता तब तक वह लोगों के लिए अपने घर में लाकर पूजा स्थल पर रखने योग्य भी नहीं होता । जिसे अपने स्तवन की अभिलाषा है वह परिस्थितियों के साथ समझौता नहीं करता बल्कि परिस्थितियां उसके साथ समझौता करती हैं और उसकी अनुगामी होकर उसके अनुसार आचरण करती हैं।

परिस्थितियों ने किया महात्मा बुद्ध का निर्माण

महाभारत कालीन युद्ध के पश्चात सदियों तक भारतीय समाज में जो क्रमिक ह्रास होता रहा । उसने भारतीय समाज के परिवेश में एक चुनौती ,एक ललकार , एक पुकार उत्पन्न कर दी । प्रसंगवश यह स्पष्ट कर देना उचित होगा कि हम अहिंसावादियों ने अहिंसा के प्रति जो अति उत्साह दिखाया था , वह क्योंकि भारतीय सभ्यता , संस्कृति और धर्म के विरुद्ध था , इसलिए उसने इस हिंसावाद को समाप्त कराने के लिए किसी ना किसी महान व्यक्तित्व को उत्पन्न करने के लिए अनुकूल परिस्थितियां सृजित कर दीं।
भौतिकवाद में पहली घटना भविष्य की दूसरी घटना को जन्म देती है । अतः अति हिंसावाद ने बुद्ध के अहिंसावाद को जन्म दिया । कालान्तर में प्रकृति के नियमों के अनुसार इस अहिंसावाद ने भी अपना रूपान्तरण किया , जो हमारे लिए कायरता का पर्याय बन गया । तत्कालीन भारतीय सामाजिक परिस्थितियों में हिंसावाद का विरोध करने वाले और भारतीय सामाजिक परिस्थितियों की चुनौती और ललकार को सुनने वाले महान व्यक्तित्व का नाम महात्मा बुद्ध था । इन्होंने कुछ नया नहीं कहा था अपितु वेद की ही पावन सांस्कृतिक परम्परा के शब्द ‘अहिंसा’ पर उन्हें बल दिया था । वैदिक सांस्कृतिक परम्परा में अहिंसा , सत्य , अस्तेय , अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य – योग दर्शन में पूर्व से ही उपलब्ध था । मानव के चारित्रिक उत्थान के लिए महात्मा बुद्ध ने इन्हीं सद्गुणों पर अधिक बल दिया था । महात्मा बुद्ध द्वारा अपनी ओर से कुछ भी नया ना कहने के उपरान्त भी उनके प्रयासों को सादर स्मरण किया जाता है । क्योंकि उन्होंने भारतीय समाज को उसके गौरवपूर्ण अतीत की सांस्कृतिक परम्पराओं से जोड़ने का सराहनीय प्रयास किया।
अपने हिंसावादी चेहरे को देखकर हम एक बार पुनः अहिंसावादी बन गए । तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों में हिंसावाद अति मुखर था । इसलिए महात्मा बुद्ध ने उसी अनुपात में युगीन आवश्यकता को दृष्टिगत रखते हुए अहिंसावाद को अत्यधिक महिमामण्डित किया । कहा जाता है कि ‘अति सर्वत्र वर्जयेत’ अर्थात अति सर्वत्र वर्जित है। पूर्व में यदि भारतीय समाज में अत्याचार ,अनाचार और हिंसा का बोलबाला था तो इस बार हम अति अहिंसावादी बन गए । भारतीय समाज में यदि जनसाधारण ही इससे प्रभावित होता तो कुछ बुरा नहीं था किन्तु इस नए परिवर्तन ने क्षत्रिय धर्म और बौद्ध धर्म को भी प्रभावित किया । अपने क्षत्रिय धर्म को त्यागकर हमने कायरों की भांति पिटना आरम्भ कर दिया । ऐसा हमारी रग-रग में व्याप्त हो गया । हमने यह पक्का मन बना लिया कि चाहे कोई हमारी गर्दन काट ले , अत्याचार , अनाचार, उत्पीड़न और शोषण के माध्यम से हम पर कितने ही अत्याचार करे किंतु हम प्रतिशोध स्वरूप उसकी हत्या कर हिंसा नहीं करेंगे ।

अहिंसा की गलत गढ़ी गई परिभाषा

अहिंसा की इसी परिभाषा के हम आज तक अनुगामी हैं। यह वह काल था जब हम अपने क्षात्र धर्म से और राज धर्म से विमुख हो चुके थे । इस नए परिवर्तन से पूर्व यज्ञ में पशु बलि की जो प्रथा प्रचलित थी , उस पहली बुराई से अपने क्षत्रिय धर्म को त्यागने की यह दूसरी बुराई हमारे लिए अत्यधिक घातक सिद्ध हुई । अब ‘अहिंसा परमो धर्म:’ – हमारा राष्ट्रीय उद्घोष बन गया। पापियों , अत्याचारियों ,अनाचारियों एवं पथभ्रष्ट अधर्मियों की हत्या तक को भी हिंसा की श्रेणी में गिना जाने लगा । जिससे कुछ समय पश्चात समाज में पुनः हिंसक प्रवृत्ति के लोगों का वर्चस्व स्थापित हो गया।
बौद्ध धर्म की उत्पत्ति और उसके भारतीय इतिहास पर प्रभाव का सर्वाधिक दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह रहा कि बौद्ध धर्म की अहिंसावादी नीति ने प्राचीन भारत के एक शासक सम्राट अशोक को अधिक प्रभावित किया । जिस कारण अशोक ने क्षत्रिय धर्म के सर्वथा विपरीत जाकर स्वयं को अहिंसावादी घोषित कर दिया । उसने अपने धनुष बाण खूंटी पर टांग दिये और जनता को आदेश दिया कि वह भी अहिंसावादी बन जाए । अहिंसावाद के भूत ने शस्त्र और शास्त्र के भारतीय समन्वय को अशोक की दृष्टि से ओझल कर दिया । अशोक यह भूल गया कि उपदेश देने के लिए आदेश की भी आवश्यकता होती है । उसके पूर्वज चन्द्रगुप्त मौर्य ने अपने गुरु महामति चाणक्य की नीतियों पर चलकर जिस विशाल साम्राज्य की स्थापना की थी ,उसकी मजबूती का आधार साम , दाम ,दण्ड ,भेद की सफल कूटनीति थी । जिसे अशोक ने भुला दिया । वह केवल साम पर केन्द्री हो गया। साथ में कठोर दंड के प्रावधान को उसने उपेक्षित कर दिया।

पैदा हुईं नई नई भ्रान्तियां

भारतीय राजधर्म के प्रति विदेशियों को इससे जो संदेश मिला वह भारतीय राष्ट्रवाद के लिए एक अपशकुन था । अब विदेशी भारत की ओर दृष्टि उठाकर देखने का साहस करने लगे । उनके लिए भारत अब अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति का सस्ता साधन बन गया । जिस कारण उन लोगों ने भारत पर कुदृष्टि डालनी आरम्भ कर दी। जिससे भारत को पर्याप्त क्षति उठानी पड़ी । भारत का विशाल विश्व साम्राज्य सिमटने लगा और दूर देशों के रहने वाले हमारे ही राजा या क्षत्रिय लोगों ने अपने-अपने अलग राज्य स्थापित कर लिए । इसके अतिरिक्त भारत का जब इन क्षेत्रों या देशों में रहने वाले लोगों से सम्पर्क टूटा तो उन्होंने धीरे-धीरे अपनी अलग परम्पराएं , अपना अलग सम्प्रदाय , मजहब या धर्म स्वीकार कर लिया । जिससे आगे चलकर यह भ्रान्ति पैदा हुई कि भारत और भारत के ही रहने वाले इन लोगों के अलग-अलग पूर्वज रहे हैं । इनका इतिहास , इनकी संस्कृति आदि भी सब अलग-अलग रहे हैं। उदाहरण के रूप में हम शक , हूण और कुषाण जैसे विदेशी कहे जाने वाले आक्रमणकारियों को ले सकते हैं , जिनका मूल भारतीय होकर भी इतिहास में हमें कुछ ऐसा पढ़ाया व समझाया गया कि जैसे इनका इतिहास और मूल हमसे अलग है।
यद्यपि अशोक के पश्चात भी ऐसे कई महान शासक भारतवर्ष में हुए जिन्होंने भारतीय धर्म, संस्कृति और इतिहास की रक्षा के लिए विदेशी आक्रमणकारियों का डटकर सामना किया। साथ ही यदि मुस्लिम आक्रमणकारियों ने भारत के लोगों का धर्मांतरण करने में कहीं सफलता प्राप्त की तो उन लोगों की ‘घर वापसी’ कराने का महान कार्य भी सम्पादित किया। इनमें गुर्जर प्रतिहार वंश के शासकों का नाम अग्रणी है । यद्यपि ऐसे भी अनेकों उदाहरण भारतीय इतिहास में हैं , जब हमारे राजाओं ने राष्ट्रीय सेना बनाकर विदेशी आक्रमणकारियों का सामना किया । इन सबके उपरान्त भी जो महत्वपूर्ण तथ्य है वह यही है कि अशोक के द्वारा महात्मा बुद्ध की अहिंसा को राजकीय संरक्षण देने से हमारे क्षत्रिय धर्म को महान क्षति उठानी पड़ी।

तब इतिहास कुछ और ही होता

उसी का परिणाम यह हुआ कि उच्च नैतिक परम्पराओं की समाज में संस्थापना के लिए भटकती हुई जनता को कालान्तर में सम्प्रदायों का सहारा लेना पड़ा । अशोक का मिथ्या अहिंसावाद यदि एक ओर भारत पर विदेशी आक्रमणकारियों के लिए मार्ग प्रशस्त करने में सफल हुआ तो दूसरी ओर उसके विशाल साम्राज्य के पतन का कारण भी बना । उसकी मृत्यु के लगभग 50 वर्ष पश्चात ही 187 ई0पू0 में उसके उत्तराधिकारी बृहद्रथ का उसी के सेनापति पुष्यमित्र शुंग द्वारा वध कर दिया गया ।
इस प्रकार अहिंसावादियों का हिंसा से विनाश होना भारतीय इतिहास की संभवत: यह पहली घटना है। हमारा मानना है कि ऐसा तभी होता है जब हम किसी सिद्धांत को सीमाओं से अधिक स्वीकृति प्रदान करने लगते हैं। इस घटना ने यह भी सिद्ध कर दिया कि राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में अहिंसावाद की उदारवादी नीति आत्मघाती ही सिद्ध होती है । जिससे समाज विरोधी तत्वों को ही संरक्षण और प्रोत्साहन मिलता है । पुष्यमित्र शुंग का यह घृणास्पद षड़यंत्र पूर्ण कृत्य अशोक की मिथ्या अहिंसावादिता का ही परिणाम था । यदि अशोक और उसके उत्तराधिकारी आततायियों एवं समाज विरोधी लोगों के प्रति कठोर होते तो आज भारत का इतिहास कुछ और ही होता।
यह ठीक है कि अशोक के समय में किसी प्रकार के विप्लव की अथवा विद्रोह की जानकारी हमें नहीं मिलती । जो उसकी कठोरता का प्रमाण हो सकती है। यह भी सत्य है कि उसके राजकुमारों अथवा उत्तराधिकारियों का लालन-पालन जिस परिवेश में हुआ वह मिथ्या अहिंसावाद से परिपूर्ण था और क्षत्रिय धर्म के सर्वथा प्रतिकूल था । इस प्रकार अशोक के उत्तराधिकारी के संस्कार पूर्णतया अहिंसावादी बन गये । क्योंकि स्वयं अशोक ने युद्ध और अतिवादी लोगों का वध करने को अनुचित मानना आरम्भ कर दिया था । अशोक की ऐसी मनोदशा ने हिंसा और राष्ट्रद्रोहियों को प्रोत्साहित किया।
फलस्वरूप पुष्यमित्र शुंग जैसे दरबारियों की महत्वाकांक्षा जागृत हो उठी । क्या ही अच्छा होता कि राष्ट्रहित की दृष्टि से अतिवादी ,राष्ट्रद्रोही , समाजद्रोही पुष्यमित्र शुंग जैसे लोगों पर कठोरता से नियंत्रण स्थापित किया जाता और राजनीति को सजग व सावधान रखते हुए ऐसा कोई भी कुकृत्य करने का अवसर नहीं दिया जाता जिससे इतिहास कलंकित होता हो। महात्मा बुद्ध ने हमें जिस हिंसा से सावधान किया था , हम उसी हिंसा में जाकर फंस गए और राजनीति को हिंसा की भेंट चढ़ा दिया ।
हमें महात्मा बुद्ध की अहिंसा से यह समझना चाहिए था कि स्वार्थवश किसी के प्राण लेना हिंसा है , जबकि सामूहिक हित को दृष्टिगत रखते हुए ऐसे लोगों का विनाश करना राजधर्म है जो समाज और राष्ट्र के शत्रु बन गए हैं या जो नैतिकता , न्याय और धर्म में विश्वास न रखकर निहित स्वार्थों को प्राथमिकता देते हों। शास्त्र उन लोगों के लिए बने हैं जो न्यायशील हैं और समाज में शांति व्यवस्था बनाए रखना चाहते हैं। जबकि शस्त्र उनके लिए बने हैं जो शास्त्र में विश्वास रखने वाले लोगों को चोट पहुँचाने का कार्य करते हैं या उन्हें चोट पहुँचाने के षड़यंत्र में कहीं सम्मिलित होते हैं।
अहिंसा की गलत परिभाषा गढ़कर या महात्मा बुद्ध के अहिंसावादी आन्दोलन का गलत अर्थ लगाकर हमने अपने देश के पराभव का मार्ग स्वयं ही प्रशस्त किया।

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