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सत्य निष्ठा की मूर्ति एक असाधारण मनुष्य : बाबा मुकुंदा लाहौर

ओ३म्

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एक साधारण मनुष्य भी सत्य को धारण कर महान कार्यों को करके यशस्वी बनने सहित समाज में मान-सम्मान पा सकता है। ऐसा ही एक व्यक्तित्व हुआ है जिसे बाबा मुकुन्दा, लाहौर के नाम से जाना जाता है। बाबा मुकुन्दा जी का परिचय ऋषिभक्त और आर्यसमाज के यशस्वी संन्यासी महात्मा आनन्द स्वामी की श्री सुनील शर्मा लिखित जीवनी में पढ़ने को मिलता है। इतिहास में साधारण लोगों की सत्यनिष्ठा के इस घटना के समान उदाहरण कम ही सुनने में आते हैं। इस व्यक्तित्व ने हमें भी प्रभावित किया और इसे लेख रुप में प्रस्तुत करने की प्रेरणा हुई है। हमारे पाठक मित्र भी इसे पसन्द करेंगे। बाबा मुकुन्दा जैसा एक साधारण मनुष्य अपनी बहिन की रक्षा तथा अपने कर्तव्य की पूर्ति के लिये किस प्रकार सूझबूझ और त्याग का अप्रतिम उदाहरण प्रस्तुत कर सकता है, यह इनके जीवन की घटनाओं को पढ़कर मिलता है। महात्मा आनन्द स्वामी जी की जीवनी से हम इस असाधारण व्यक्ति का परिचय प्रस्तुत कर रहे हैं।

महात्मा आनन्द स्वामी जी लाहौर से उर्दू दैनिक मिलाप का सम्पादन व प्रकाशन करते थे। जीवनीकार श्री सुनील शर्मा जी लिखते हैं कि किसी भी समाचार पत्र की सफलता का रहस्य उसके मालिक के व्यवहार में छिपा होता है। मिलाप पत्र के सम्पादक खुशहालचन्द जी में यह विशेषता थी कि वह धर्म और जाति की दलदल में न फंसकर मनुष्यता और मेहनत में विश्वास रखते थे। उन्होंने अपने स्टाफ में उन्हीं व्यक्तियों को स्थान दिया, जो कर्म में आस्था रखते थे और जिनकी दृष्टि में ईमानदारी से बड़ा कोई धर्म नहीं था। उदाहरण के लिए हम ‘बाबा मुकुन्दा’ को याद कर सकते हैं। कहने को वह चपरासी था, किन्तु खुशहालचन्द जी उस पर आंख मूंदकर विश्वास कर सकते थे, क्योंकि मुकुन्दा ‘बात का धनी’ था। तीन शब्दों के इस मुहाविरे का मर्म समझने के लिए हमें एक विचित्र-सी कहानी पर से पर्दा उठाना होगा।

मुकुन्दराम के दो भाई तो बड़े थे और एक छोटा। चारों भाइयों की एक ही प्यारी बहन थी। सब-के-सब कुंआरे थे। सबसे पहले भाइयों ने अपनी लाडली बहन के लिए एक सुन्दर-सा घर-वर ढूंढा। बड़े चाव से उसका विवाह किया। बारात जैसे ही गांव से बाहर हुई, घोड़ा बिदक गया और दूल्हा घोड़े पर से गिरकर दम तोड़ गया। लोग तरह-तरह से दुल्हन को बदनाम करने लगे। चारों भाई अपनी अभागिन बहिन को घर ले आए। रात को भाइयों ने आपस में विचार किया। एक ने समस्या उठाई–‘‘अब इस विधवा बहन का क्या होगा?’’

‘‘होना क्या है? यहीं रहेगी और हम सब मिलकर इसे खुश रक्खेंगे।” दूसरा बोला–‘‘हमारी पत्नियां आएंगी तो इसकी सेवा करेंगी।”

तीसरे ने हाथ नचाकर व्यंग से कहा–‘‘वाह-वाह-वाह! हम तो अपनी पत्नियों के साथ रंगरलियां माएंगे और हमारी बहन? शर्म नहीं आती ऐसी बात सोचते हुए?’’

आखिर वे इस निर्णय पर पहुंचे कि बहन विधवा है तो भाई भी विवाह नहीं कराएंगे। न बाहर की कोई औरत घर में आएगी और न किसी तरह का झगड़ा-टंटा खड़ा होगा। ‘बात के धनी’ भाइयों ने सचमुच अपना वचन निभाया। अपनी बहन को खुश रखने के लिए तीनों भाई कुंवारे रह गए।

बाबा मुकुन्दा अपनी जमीन या घर-बार छोड़कर लाहौर क्यों चला आया, यह सब उसने कभी किसी को नहीं बताया। खुशहालचन्द जी यद्यपि उसके बारे में सब-कुछ जानते थे, किन्तु उन्होंने भी उसका भेद किसी के सामने नहीं खोला। ‘मिलाप’ के दफतर में उसे चपरासी के तौर पर नियुक्त किया गया था, परन्तु व्यवहार में उसे ‘मिलाप’ परिवार का एक सदस्य ही समझा। जब कभी वह बीमार पड़ा, खुशहालचन्द जी ने न केवल उसकी दवा-दारू की तुरन्त व्यवस्था की, अपितु रातें जाग-जागकर उसकी सेवा-टहल में लगे रहे। आमतौर पर अपने प्यारे-से-प्यारे कर्मचारी को भी मालिक लोग धन या मीठे आश्वासनों से ही भरमाए रहते हैं, किन्तु खुशहालचन्द जी उसकी टांगें भी दबाते थे और कमरे की सफाई भी निस्संकोच कर जाते थे।

ऐसे मालिक के लिए कर्मचारी भी अपनी जान छिड़कने को तत्पर रहता है। मुकुन्दा की इस ईमानदारी और कर्तव्य-परायणता का पता तब चला, जब कर्मचारियों के वेतन के लिए चैक भुनाने उसे बैंक भेजा गया। यह बात भारत-विभाजन के दिनों की है। मुकुन्दा ने पन्द्रह हजार की रकम गांठ में बांधी और बैंक से चल पड़ा। तभी शहर में मार-काट मच गई और कफ्र्यू लागू हा गया। दफ्तर में हर कोई मुकुन्दा की राह में आंखें बिछाए बैठा था, किन्तु दिन ढलता गया और शाम गहराती गई, मुकुन्दा नहीं लौटा। शहर के कुछ हिस्सों में छूरेबाजी से कुछ लोग दम तोड़ चुके थे। मुकुन्दा के पास पूरे पनद्रह हजार की रकम थी जो उन दिनों बहुत बड़ी रकम थी–आज एक लाख के बराबर। (यह पुस्तक 1989 में प्रकाशित हुई है। इस दृष्टि से तीस वर्ष बाद आज यह रकम लाखों में होती है-मनमोहन आर्य)। पैसों के लिए उन दिनों भी हत्याएं की जाती थीं। दंगों का माहौल वैसे भी गर्म था, इसलिए मुकुन्दा की चिन्ता में हर कोई घुला जा रहा था। इतना विश्वास तो हर किसी को था कि मुकुन्दा रकम लेकर भाग नहीं सकता था। अवश्य कोई दुर्घटना घट गई होगी। कफ्र्यू के कारण कोई उसे खोजने के लिए बाहर भी नहीं निकल सकता था। दूसरा दिन भी तरह-तरह की आशंकाओं में निकल गया।

तीसरे दिन कफ्र्यू खुला तो घण्टे-भर बाद ही मुकुन्दा मिट्टी में लथपथ दफ्तर में पहुंचा। उसकी उड़ी हुई रंगत देखकर हर कोई समझ गया कि वह जीवित तो पहुंच गया है, किन्तु रकम गंवा आया है। मुकुन्दा ने गांठ में बंधी नोटो की गड्डिया निकालकर मेज पर रख दीं और क्षमा-याचना करते हुए बताया कि वह मार-काट शुरू होते ही एक सूखे नाले में छिपकर बैठ गया था। पुलिस की मदद उसने इस कारण नहीं ली कि उसके पास रकम थी और पैसे के लालच में कोई भी उसे लूट-मार सकता था।

जैसा चरित्र बाबा मुकुन्दा का है, ऐसे ही सच्चे, धर्म पारायण व चरित्रवान् लोग अतीत में भारत में रहते थे। आज ऐसी सत्य घटनायें सुनते हैं तो हैरानी होती है क्योंकि आज किसी से ऐसी अपेक्षा नहीं की जाती। ऐसी घटनायें सुनकर सबको अच्छा लगता है तथा सबकी आत्मा ऐसे महान सत्य के रक्षक व कर्तव्य के धनी लोगों को पसन्द करती हैं। हमने इस घटना को पढ़ा तो हमें भी आत्मिक सुख की अनुभूति हुई और इसे लेख द्वारा प्रस्तुत करने की इच्छा हुई। उसी का परिणाम यह पंक्तियां हैं। पाठक बन्धु इस बाबा मुकुन्दा के जीवन व कार्य को पसन्द करेंगे। ऐसे संस्कारों को सुनकर व उसे धारण कर ही मनुष्यो में महानता के लक्षण विकसित होते हैं। इसी कारण से स्वाध्याय तथा विद्वानों के प्रवचनों के श्रवण का महत्व सृष्टि के आदि काल से प्रचारित होता आ रहा है। हम महात्मा आनन्द स्वामी जी सहित बाबा बालमुकुन्दा को भी अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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