वेद सम्मत गृहस्थ आश्रम का सम्यक निर्वाह ही गृहस्थी जीवन की सफलता है

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ओ३म्

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युवक व युवतियों के वैदिक विधि से विवाह होने से पति व पत्नी गृहस्थी कहलाते हैं। विवाह के बाद का जीवन गृहस्थ जीवन तथा इसे ही गृहाश्रम भी कहते हैं। गृहस्थाश्रम पर लोगों के तरह तरह के विचार हैं। कोई गृहाश्रम को अच्छा मानता है और ऐसे भी लोग हैं जो इस आश्रम को अन्य तीन आश्रमों की तुलना में हेय मानते हैं। गृहस्थ आश्रम की महत्ता का निर्णय वेदों के परम विद्वान ऋषि दयानन्द के वचनों से होता है। यह वचन सत्यार्थप्रकाश के चैथे समुल्लास की समाप्ति पर कहे गये हैं। ऋषि दयानन्द जी कहते हैं कि जितना कुछ व्यवहार संसार में है उस का आधार गृहाश्रम है। जो यह गृहाश्रम न होता तो सन्तानोत्पत्ति के न होने से ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम कहां से हो सकते? जो कोई गृहाश्रम की निन्दा करता है वही निन्दनीय है और जो प्रशंसा करता है वही प्रशंसनीय है। परन्तु गृहाश्रम में सुख तभी होता है जब स्त्री पुरुष दोनों परस्पर प्रसन्न, विद्वान, पुरुषार्थी और सब प्रकार के व्यवहारों के ज्ञाता हों। इसलिये गृहाश्रम के सुख का मुख्य कारण ब्रह्मचर्य और स्वयंवर विवाह है। ऋषि दयानन्द जी ने पूर्वोक्त पंक्तियों में गृहाश्रम की प्रशंसा व महत्ता में जो कहा है वह पूर्णतः सत्य एवं सबके लिए ग्राह्य है।

गृहाश्रम एक सामाजिक एवं धार्मिक बन्धन है जिसके अनुशासन में रहकर मनुष्य धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष को सिद्ध करने सहित देश व समाज के लिये हितकारी कार्यों को करता है, समाज को वेदानुसार चलाने में सहायक होता है, सृष्टि क्रम अवरुद्ध नहीं होता, मनुष्य सुख भोगता है, स्त्री व पुरुष गृहाश्रम में ऋषि, देव तथा पितृ ऋण से उऋण होते हैं। देश व समाज की उन्नति का मुख्य आधार भी वेदोक्त गृहाश्रम एवं विवाह आदि व्यवस्थायें हैं तथा वैदिक जीवन से ही गृहाश्रम व मनुष्य जीवन की सफलता है। इतिहास पर दृष्टि डालते हैं तो पाते हैं कि हमारे याज्ञवल्क्य आदि ऋषियों सहित हमारे महापुरुष मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम और योगेश्वर श्री कृष्ण भी गृहस्थी थे। जिस मनुष्य का अपनी सभी इन्द्रियों पर संयम होता है और जो वेदानुसार जीवन व्यतीत करता है, ऐसे सभी मनुष्य सद्गृहस्थी व ब्रह्मचारी ही होते हैं। गृहस्थाश्रम का विधान है कि उन्हें प्रतिदिन पंचमहायज्ञ करने चाहियें। यह यज्ञ हैं 1- ब्रह्मयज्ञ अर्थात् सन्ध्या, 2- देवयज्ञ अग्निहोत्र जो वायु-जल शुद्धि सहित ईश्वरोपासना के लिए किया जाता है, 3- पितृ यज्ञ अर्थात् माता पिता की सेवा शुश्रुषा, 4- अतिथि यज्ञ अर्थात् देश व समाज के हितकारी विद्वान जो सामाजिक उन्नति में जीवन व्यतीत करते हैं, उनके घर आने पर उनकी सम्मानपूर्वक सेवा तथा 5- बलिवैश्वदेव यज्ञ करना होता है। बलिवैश्वदेव यज्ञ में मनुष्य को न केवल मनुष्यों के प्रति अपितु सभी प्राणियों व पशु आदि के प्रति भी प्रेम, स्नेह, ममता तथा पूर्ण अहिंसा का व्यवहार करना होता है। इसका अर्थ है कि किसी भी प्राणी की बिना उचित कारण से हिंसा निषिद्ध है एवं मांसाहार पूर्णतः निषिद्ध है। जो मनुष्य मांसाहार करते हैं वह यद्यपि पशुओं की स्वयं हत्या नहीं करते परन्तु हत्या करने वाले मनुष्य मांसाहारियों के लिये ही पशुवध करते हैं जिससे इन दोनों श्रेणी तथा इसमें सहयोगी अन्य लोग सभी लोग भी पाप व अधर्म के भागी होते हैं। महाभारत तक वैदिक काल में भारत में पशु हिंसा नहीं होती थी। यदि किसी ग्रन्थ में कहीं ऐसा कोई संकेत दिखता है तो वह यथार्थ अर्थ न होकर मिथ्यार्थ या प्रक्षिप्त होता है। मांसाहार न करने से मनुष्य की शारीरिक, आत्मिक व सामाजिक उन्नति मांसाहारियों से अधिक होती है। शारीरिक उन्नति में मांसाहार न करने से किसी प्रकार की बाधा नहीं आती। हमारे वैदिककालीन सभी राजा, ऋषि मुनि, विद्वान शाकाहारी वा दुग्ध, अन्न व फल का आहार ही किया करते थे। हाथी, हिरण, गाय तथा अश्व आदि प्राणी भी शुद्ध शाकाहारी हैं जिनमें शक्ति, दयाभाव, बल, शक्ति, संसार की उन्नति तथा प्राणी को सर्वाधिक सुख प्राप्त होता है।

गृहस्थाश्रम का आधार विवाह होता है। विवाह भी वैदिक विधि से होने पर श्रेष्ठ होता है। वैदिक विवाह में विवाह का उद्देश्य तथा पति व पत्नी के कर्तव्यों का विधान भी है। पंचमहायज्ञों की चर्चा हम कर चुके हैं। इसके साथ यह भी व्यवस्था है कि जहां तक सम्भव हो पति व पत्नी के गुण, कर्म व स्वभाव समान हों। दोनों एक दूसरे को जानकर प्रसन्नतापूर्वक विवाह करें। विवाह पूर्ण युवावस्था में होना चाहिये। संसार में संस्कारों से युक्त सुसन्तानों का निर्माण धार्मिक तथा मर्यादित जीवन जीवन जीने वाले सद्गृहस्थी ही कर सकते हैं। यही कारण हैं कि वैदिक काल में भारत में ऋषि, मुनि, योगी, ध्यानी, चिन्तक, देशभक्त, राम व कृष्ण से महानपुरुष, ब्रह्मचर्य के आदर्श रूप हनुमान व देवव्रत भीष्म उत्पन्न होते थे परन्तु महाभारत के बाद वैदिक धर्म के गुणों का आचरण घटने से ऐसे महापुरुष उत्पन्न होना बन्द हो गये। यदि दयानन्द, श्रद्धानन्द, लेखराम, गुरुदत्त विद्यार्थी, हंसराज, आनन्दस्वामी, सरदार पटेल, नेताजी सुभाष, पं. रामप्रसाद बिस्मिल, भगतसिंह आदि महान लोग हुए भी तो इसका कारण उनके पूर्वजन्म के संस्कार व इस जन्म की उनकी परिस्थितियां व परिवेश था। सुसंस्कारित सन्तान बनाने के लिये ही ऋषि दयानन्द जी ने संस्कारविधि का प्रणयन किया था। आज के वातावरण में इसका पालन न होने से इससे देश व समाज को जो लाभ हो सकते थे, वह पूरी मात्रा में नहीं हो रहे हैं। देश का सौभाग्य है कि ऋषि दयानन्द प्रदत्त संस्कार विधि हमारे पास है। कभी न कभी लोग इसका महत्व समझेंगे और इसका पालन कर इससे अपनी इच्छा के अनुरूप संस्कारित सन्तान भी उत्पन्न कर सकते हैं जिससे वैदिक धर्म एवं संस्कृति की न केवल रक्षा ही होगी अपितु दिग्दिगन्त प्रचार प्रसार भी होगा। विद्वानों तथा युवक युवतियों का कर्तव्य हैं कि वह सत्यार्थप्रकाश एवं संस्कारविधि आदि ग्रन्थों को पढ़कर इससे लाभ उठायें। इसी में देश व समाज का हित छिपा है।

गृहस्थ जीवन का एक ऐतिहासिक उदाहरण देना भी समीचीन है। योगेश्वर कृष्ण जी ने माता रुक्मणी जी से वैदिक मर्यादाओं का पालन करते हुए विवाह किया था। उनकी एक ही धर्मपत्नी थी। कृष्ण विषय पुराणों की अनेक कथायें काल्पनिक एवं कृष्ण जी के चरित्र को दूषित करने वाली है। ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश में इस पर प्रकाश डाला है। कृष्ण जी एकपत्नीव्रत धारी थे। वह वेदानुयायी थे और वेदों में एकपत्नीव्रत धारी को ही श्रेष्ठ माना गया है। रामचन्द्र जी भी इसका प्रशंसनीय उदाहरण हैं। माता रुक्मणी जी से विवाह होने पर कृष्ण जी व रुक्मणी जी का संवाद हुआ। प्रश्न हुआ कि विवाह किस लिये किया जाता है? इसका उत्तर मिला कि विवाह सुसंस्कारित सन्तान के लिये किया जाता है। कृष्ण जी ने पूछा कि रुक्मणी जी कैसी सन्तान चाहती हैं? इसका उत्तर मिला कि पूर्णतः कृष्ण जी के समान गुण, कर्म, स्वभाव व रूप वाली सन्तान। इस पर कृष्ण जी बोले थे कि यह तभी सम्भव है कि जब हम 12 वर्षों तक वनों व पर्वतों में रहकर ब्रह्मचर्यपूर्वक तपस्वियों व साधकों का सा जीवन व्यतीत करें। दोनों ने ऐसा ही किया जिसके परिणामस्वरूप उन्हें प्रद्युम्न नाम के पुत्र की प्राप्ति हुई। महाभारत में लिखा है कि सायं समय में कृष्ण जी व प्रद्युम्न जी अपने कामों को करके वापिस घर लौटते थे। माता रुक्मणी अपने महल पर खड़ी उनकी प्रतीक्षा करती थी। कृष्ण जी और प्रद्युम्न जी में परस्पर ऐसी समानता थी कि रुक्मणी जी कृष्ण व प्रद्युम्न को देखकर अचम्भित हो जाती थी कि उनमें कौन कृष्ण है और कौन प्रद्युम्न? वह दोनों का अन्तर पता नहीं कर पाती थी। यह वेद के विधानों के आचरण कर प्राप्त होने वाली सन्तान का उदाहरण है। गृहस्थ जीवन में सुख उन्हीं को मिलता है जो वेद धर्म का पालन करते हैं। सुख का आधार भी धर्म है। मत व धर्म में कुछ समानतायें होती हैं और भिन्नतायें होती हैं। धर्म वेद निहित शिक्षाओं सहित अन्य वेदानुकूल शिक्षाओं व सिद्धान्तों के धारण करने को कहते हैं। असत्य, वेदविरुद्ध विचारों व मान्यताओं का त्याग भी मनुष्य का धर्म है। यह भी तथ्य है कि मत-मतान्तरों में अवैदिक वा वेदविरुद्ध मान्यतायें बहुतायत में पाई जाती हैं। अतः सभी गृहस्थियों को वेदपालक सद्गृहस्थी होना चाहिये। उत्तम सन्तान उत्पन्न कर ही पितृ ऋण चुकता है। वेदाध्ययन, वेदप्रचार तथा वैदिक जीवन व्यतीत कर मनुष्य ऋषि व देव ऋणों से भी उऋण हो जाता है। सत्कर्मों व योगाभ्यास से समाधि को प्राप्त होने होकर मनुष्य के धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष सिद्ध होते हैं। वैदिक जीवन वा गृहस्थाश्रम ही सबके लिये श्रेयस्कर है।

गृहस्थाश्रम श्रेष्ठ आश्रम है। इसकी महत्ता वेदानुकूल मर्यादित वैदिक जीवन जीने में है। इसी से मनुष्य का जीवन सफल होता है। सभी को वेदाध्ययन व सत्यार्थप्रकाश का अध्ययन कर अपने कर्तव्यों तथा जीवन शैली को जानना चाहिये तथा उसे अपनाना चाहिये। इति ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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