स्कूलों की जगह नहीं ले सकती ऑनलाइन पढ़ाई

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शतरंज सिखाने वाली अनुराधा बेनीवाल अपने वक़्त को ब्रिटेन और भारत के बीच में बांटती हैं. वो अलग-अलग महाद्वीपों में मौजूद छात्रों को शतरंज सिखाती हैं।
लंदन के महंगे स्कूल से लेकर भारत के दूर-दराज़ के इलाक़े में रहने वाले ग़रीब बच्चों तक उनके यहां हर तरह के बच्चे सीखते हैं. लेकिन, कोविड-19 ने उनके लिए स्थितियां पूरी तरह से बदल दी हैं।
कोरोना वायरस फैलने के बाद डिजिटल साधनों तक पहुंच में बड़ी असमानता भारत में शिक्षा के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई है।

शैक्षिक नीतियों में आमूल-चूल बदलाव की ज़रूरत

लंदन से फ़ोन पर बेनीवाल बताती हैं कि किस तरह से कोरोना वायरस ने शिक्षाविदों को नए सिरे से सोचने और मौजूदा शैक्षिक नीतियों को फिर से तैयार करने के लिए मजबूर कर दिया है.
वो कहती हैं, “मैं लंदन में अधिकतम आठ छात्रों के लिए ज़ूम क्लास लेती हूं। यहां ज़्यादातर बच्चों के पास अपने कमरे हैं, उनके पास तेज़ रफ़्तार इंटरनेट, लैपटॉप और टैबलेट्स जैसे मल्टीपल स्क्रीन हैं और ये तकनीक से अच्छी तरह से वाकिफ भी हैं.”

विकसित देशों के मुक़ाबले भारत के हालात बिलकुल जुदा
दूसरी ओर, भारत की अगर बात करें तो यहां कई स्कूलों और विश्वविद्यालयों ने ऑनलाइन शिक्षा को अपनाया है। लेकिन, यहां शिक्षाविदों और छात्रों का इसे लेकर मिलाजुला अनुभव है।

दिल्ली की अशोका यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर सैकत मजूमदार कहते हैं, “ऑनलाइन पढ़ाई की तरफ़ शिफ़्ट होना ज़्यादातर तो आसान रहा था।लॉकडाउन छुट्टियों के दौरान हुआ और इसके तुरंत बाद हम ऑनलाइन पर शिफ्ट हो गए। सभी कक्षाएं या तो गूगल मीट या ज़ूम पर हो रही हैं.”
“लेकिन, इसके साथ ही यूनिवर्सिटी के कुछ छात्र ऐसे भी हैं जिन्हें इंटरनेट की दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। ये छात्र अमूमन कश्मीर या दूसरे दूर-दराज़ के इलाकों के हैं.”
‘ऑनलाइन कक्षाएं एक अस्थाई इंतज़ाम से ज़्यादा कुछ नहीं’
देश के ज़्यादातर बड़े निजी स्कूलों ने जूम क्लासेज़ का सहारा लिया है, लेकिन, बच्चों के अभिभावकों का कहना है कि यह सब एक अस्थाई इंतज़ाम से ज़्यादा कुछ नहीं है।

नाम न छापने की शर्त पर स्कूल जा रही दो बच्चियों के पिता ने बीबीसी को बताया, “मेरे बच्चे ज़ूम पर रेगुलर क्लास ले रहे हैं, लेकिन इस ऑनलाइन पढ़ाई-लिखाई का अनुभव बस ठीक ही है।हर बच्चे पर विशेष रूप से ध्यान देने की समस्या इसमें दिखाई दे रही है।”
इस तरह की बात तकरीबन हर शख्स ने बताई है, चाहे वह शिक्षक हो, छात्र या पेरेंट्स. इस महामारी ने कैंपस एक्सपीरियंस के पूरे आइडिया को ही बदल दिया है।

सैकत बताते हैं, “पूरी संभावना है कि हमारे अगले सेमेस्टर के इम्तिहान ऑनलाइन हों. हमने छात्रों को कोर्स मैटेरियल ऑनलाइन दे दिया है. साइंस के विद्यार्थियों के लिए यह थोड़ा चुनौती भरा है, क्योंकि इनमें लैब में जाकर प्रयोग करने पड़ते हैं.”
स्कूल और यूनिवर्सिटी यह भी विचार कर रहे हैं कि खुलने के बाद वे किस तरह से काम करेंगे।
सामाजिक दूरी अहम होगी और शैक्षिक संस्थानों को यूरोप, दक्षिण कोरिया और चीन के अनुभवों से सबक लेना पड़ेगा।

कुछ अन्य स्कूलों ने छात्रों के बिल्डिंग या कक्षा में प्रवेश के दौरान उनका तापमान लेना अनिवार्य बना दिया है।लेकिन, भारत जैसे सामाजिक और आर्थिक विविधता वाले देश में अलग-अलग छात्रों को देखते हुए शिक्षा का भविष्य शायद कुछ अलग रहेगा।
ऑनलाइन शिक्षा भले ही एक नया ट्रेंड बनकर उभर रही है, लेकिन हाशिए पर मौजूद बच्चों के लिए किस तरह से इसे मुमकिन बनाया जाएगा?
अनुराधा बताती हैं, “कई लड़कियों के लिए स्कूल अपने घर की मुश्किल भरी ज़िंदगी से एक आज़ादी की तरह से थी।सीखने के अलावा, स्कूल में दोस्त बनते हैं, बातचीत होती है और मिड-डे मील भी मिलता है, ये सब चीज़ें अब ख़त्म हो गई हैं।”
नौ साल की रानी राजपूत दिल्ली के एक सरकारी प्राइमरी स्कूल में पढ़ती हैं. उनकी मां राधा राजपूत ने बीबीसी को बताया कि जब से लॉकडाउन लागू हुआ है, तब से उनकी बेटी घर पर खाली बैठी है।
राधा कहती हैं, “हम काम की तलाश में यूपी से दिल्ली आए थे। मेरे पति ऑटोरिक्शा चलाते हैं और मैं लोगों के घर पर घरेलू कामकाज करती हूं. हमें पता चला है कि बड़े स्कूल कंप्यूटर पर कक्षाएं ले रहे हैं.”
“लेकिन, हमारे पास तो स्मार्टफ़ोन तक नहीं है।स्कूल के बंद होने के बाद से हमें कोई सूचना नहीं मिली है. मेरी बेटी एक कमरे के घर में सारा दिन रहते-रहते परेशान हो गई है।”

इनोवेशन की ज़रूरत
चुनिंदा शहरी स्कूलों के ऑनलाइन क्लासेज़ कराने और इनकी पहुंच सीमित होने के चलते शिक्षाविदों को हर तरह के आर्थिक-सामाजिक पृष्ठभूमि वाले बच्चों के लिए पढ़ाई के इनोवेटिव तरीकों को ढूंढने की चुनौती पैदा हो गई है।
एकोवेशन के फाउंडर रितेश सिंह कहते हैं, “भले ही यह ऑनलाइन एजूकेशन का दौर है, लेकिन यह स्कूलों की जगह कभी नहीं ले पाएगी.”
रितेश को पढ़ाई के लिए उन्नयन एप बनाने के लिए प्रधानमंत्री का इनोवेशन पुरस्कार मिल चुका है। देश के आठ राज्यों में इस एप के ज़रिए करीब 12 लाख छात्र पढ़ाई करते हैं.
वो कहते हैं, “अगर हम चाहते हैं कि ऑनलाइन लर्निंग सिस्टम प्रभावी हो तो हमें हर छात्र के लिहाज़ से इसे तैयार करना पड़ेगा.”
वो कहते हैं, “मिसाल के तौर पर दिल्ली में रहने वाले किसी छात्र के लिए तैयार किया गया वीडियो ट्यूटोरियल बाड़मेर या लातेहर के रिमोट इलाके में रहने वाले छात्र के लिए उतना प्रभावी नहीं होगा। साथ ही अगर आप कम समझ वाले बच्चे को त्रिकोणमिति सिखा रहे हैं तो इससे बच्चे को कोई फ़ायदा नहीं होने वाला.”
रितेश और उनकी टीम क्षेत्रीय ज़रूरतों के हिसाब से स्टडी मैटेरियल तैयार कर रही है।

जिनके पास स्मार्टफोन, इंटरनेट नहीं उन तक कैसे पहुंचे शिक्षा?
लेकिन, बड़ा सवाल यह है कि कोविड-19 के बाद की दुनिया में मोबाइल एप्लिकेशन आधारित शिक्षण व्यवस्था भारत जैसे देश में कैसे बड़ी तादाद में बच्चों तक पहुंच सकती है जहां बहुत सारे लोगों के पास न तो स्मार्टफोन हैं और न ही इंटरनेट तक उनकी पहुंच है।
इसी वजह से रितेश और उनकी टीम एक टीवी फ़ॉर्मेट की ओर शिफ्ट हो रही है।इन्होंने एडेप्टिव लर्निंग के एक ब्रॉडकास्ट मॉडल को तैयार किया है। इसमें कई राज्यों में एपिसोड्स को प्रसारित किया जा रहा है।
रितेश कहते हैं, “कक्षा 9 से कक्षा 12 के लिए हमारे एपिसोड्स का डीडी बिहार और झारखंड पर प्रसारण 20 अप्रैल से शुरू हो चुका है। इनकी इतनी अच्छी प्रतिक्रिया मिली है कि हम अब मिडल स्कूल कक्षाओं के लिए भी सामग्री तैयार कर रहे हैं।”

लेकिन, यह साफ है कि टीवी सेट के सामने बच्चों को बिठाए रखने और इससे पढ़ाई करने की अपनी कुछ दिक्कतें हैं।इसमें टीवी होने, घर के अच्छे वातावरण और एकाग्रता जैसे मसले शामिल हैं।
गुजरात के चिकोदरा गांव में सरकारी बालिका विद्यालय की एक शिक्षिका छाया बेन कहती हैं, “हमारी फ्यूचर स्ट्रैटेजी व्हाट्सएप के ज़रिए छात्रों तक पहुंचने और उन्हें स्टडी मैटेरियल मुहैया कराने की है। लेकिन, इस ज़रिए से हम केवल 30 फीसदी छात्रों तक ही पहुंच पा रहे हैं।”
“मेरे स्कूल में कुल 380 छात्राएं हैं।इनमें से ज़्यादातर बेहद ग़रीब परिवारों से आती हैं। इनके मां-बाप के पास स्मार्टफोन नहीं हैं और इन्हें अपने बच्चों की पढ़ाई की ज़्यादा चिंता भी नहीं है।”
छाया का कहना है कि ऐसे परिवारों के बच्चों के लिए महामारी एक बड़ी मुश्किल बनकर सामने आई है। इनके बच्चों का पूरा एक साल ख़त्म हो सकता है या फिर पढ़ाई के लंबे-वक्त के मौके भी ख़त्म हो सकते हैं।

स्कूलों को खुद को प्रासंगिक बनाने के तरीके ढूंढने होंगे
24 साल के आनंद प्रधान भारत के ऐसे सबसे युवा शिक्षाविद हैं जिन्होंने अपने मूल राज्य ओडिशा में इंटरनेशनल पब्लिक स्कूल ऑफ रूरल इनोवेशन की नींव रखी है।
वो मानते हैं कि कोविड-19 के बाद की दुनिया में स्कूलों को प्रासंगिक बनाए रखने के लिए खुद को पूरी तरह से दोबारा खड़ा करना पड़ेगा।
वो कहते हैं, “ऑनलाइन शिक्षा अब एक हकीकत है। ऐसे में स्कूलों को यह सोचना पड़ेगा कि वे किस तरह से बच्चे की ज़िंदगी में अपना योगदान दे सकते हैं.”
आनंद के स्कूल में स्किल डिवेलपमेंट और इनोवेटिव सोच पर खास ज़ोर दिया जा रहा है। छात्र वैज्ञानिक खेती, आंत्रप्रेन्योरशिप और डिज़ाइन सोच जैसी प्रैक्टिकल स्किल सीख रहे हैं।
“हम स्किल्ड लोग तैयार करना चाहते हैं जो कि किसी समस्या को समझ सकें और अकेले बूते इसका हल निकाल सकें।”

न केवल छात्र, बल्कि शिक्षकों के लिए भी है चुनौती
शिक्षा के भविष्य की एक और तस्वीर हरियाणा के रोहतक ज़िले में दिखाई देती है। यहां पर बिजेंदर हुड्डा की टीम काम कर रही है।
बिजेंदर मेहम ब्लॉक में ब्लॉक लेवल एजूकेशन अफ़सर के तौर पर काम कर रहे हैं। वो अपने शिक्षकों के नेटवर्क के ज़रिए डिजिटल खाई को पाटने की कोशिश कर रहे हैं।
वो कहते हैं, “हम व्हाट्सएप के जरिए अधिकतम छात्रों तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं। हम उन्हें वीडियो और ऑडियो ट्यूटोरियल भेज रहे हैं।”
लेकिन, बिजेंदर इस बात की ओर इशारा करते हैं कि ग़रीब परिवारों से आने वाले अधिकतर बच्चों के मां-बाप काम पर चले जाते हैं और फ़ोन अपने साथ ले जाते हैं। ऐसे बच्चे केवल शाम के वक्त ही फ़ोन पर ऑनलाइन ट्यूटोरियल पढ़ पाते हैं।
“हम रात में देर तक काम करते हैं ताकि उनके सवालों को हल किया जा सके।हमारे शिक्षक भी ऑडियो और वीडियो का इस्तेमाल करना सीख रहे हैं. यह काफी थकाऊ है, लेकिन हमारे पास दूसरा कोई विकल्प नहीं है.”
बिजेंदर की टीम ने दूध पाउडर और मिड-डे मील की कच्ची सामग्री के वितरण के वक्त गांव के हर बच्चे की शैक्षिक स्थिति का सर्वे किया है।
एक्सपर्ट्स का कहना है कि कोविड-19 के बाद की दुनिया में इस तरह की चुनौतियां मौजूद रहेंगी चाहे स्कूल कितना ही बड़ा या छोटा क्यों न हो। शिक्षा एक क्रांति के दौर से गुज़र रही है और हम देखेंगे कि किस तरह से यह लंबी अवधि में बच्चों पर असर डालती है।
(बीबीसी से सभार)

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