गोरक्षा के बिना मनुष्य जाति का अस्तित्व सुरक्षित नहीं

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ओ३म्

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हमारे ब्रह्माण्ड में सूर्य, पृथिवी, चन्द्र, अग्नि, वायु, जल आदि को सर्वव्यापक, सर्वज्ञ तथा सर्वशक्तिमान सत्ता परमात्मा ने बनाया है। परमात्मा ने ही सृष्टि पर मनुष्यों सहित इतर सभी प्राणियों, अन्न, वनस्पतियों तथा ओषिधियों को भी उत्पन्न किया है। पशुओं में गाय श्रेष्ठ प्राणी है जिसकी उत्पत्ति परमात्मा ने मनुष्यों के हित व रक्षा के लिये की है। गाय का दूध, मूत्र, गोबर सहित दूध से बनने वाले अनेकानेक पदार्थ तथा मरने के बाद गो चर्म भी मनुष्यों के हित करता व काम में आता है। यदि यह वस्तुयें न हो तो मनुष्य को जीवनयापन करने में अनेक प्रकार की कठिनाईयां आती हैं। इसका अर्थ यह है कि परमात्मा ने गाय आदि दुग्धधारी व अन्य पशुओं को मनुष्य के हित के लिये ही बनाया है। मनुष्य इन प्राणियों से अपना जो जो हित सिद्ध करते हैं उसके लिये वह इन सभी पशुओं के ऋणी व कृतज्ञ बनते हैं। यदि कोई मनुष्य अविवेक व अज्ञान के कारण इन पशुओं के ऋण को स्वीकार न कर इन्हें किसी भी प्रकार की पीड़ा देता है तो निश्चय ही उसकी सोच व विचारों में मलिनता व अशुद्धता होती है। परमात्मा ने सृष्टि के आरम्भ में मनुष्यों को उनके कर्तव्यों का बोध कराने के लिये वेदों का ज्ञान दिया था। वेदों में भी गो का महत्व बताया गया है। गो को विश्व की नाभि व केन्द्र कहा गया है। हिन्दुओं में प्राचीन काल से विवाह एवं कुछ अन्य विशेष अवसरों पर गोदान करने की प्रथा है। अनेक प्राचीन कथायें भी हैं जब हमारे राजा बड़े बड़े यज्ञ व समारोहों में ऋषि-मुनियों को गोदान किया करते थे। गोदान श्रेष्ठ दान की श्रेणी में आता है। जिस घर में भी गो होती है उस परिवार के सदस्यों को शुद्ध दुग्ध, घी, छाछ, मक्खन तथा दही आदि खाने को मिलते है। परिवार दुग्ध व इससे बने अनेक प्रकार के पौष्टिक एवं स्वादिष्ट पदार्थों सहित मिष्ठान्नों की उपलब्धि व सेवन से निरोग, स्वस्थ, बुद्धिमान तथा दीर्घजीवी बनता है। यही कारण था कि हमारे प्राचीन राज परिवारों के लोग भी गोपालन करते व कराते थे।

योगेश्वर कृष्ण स्वयं गोपालक थे। उनमें वीरता, धीरता, साहस और बल का कारण उनका गोपालन एवं गोमाता से प्राप्त दुग्ध, मक्खन, घृत आदि पदार्थों का सेवन भी माना जा सकता है। आज भी गोपालन तथा गो से प्राप्त होने वाले पदार्थों का महत्व निर्विवाद है। आज भी हमारे सभी गुरुकुलों में एक गोशाला होती है। प्राचीन काल में सभी ऋषियों के आश्रमों में गोमातायें बहुतायत में पाली व रखी जाती थी। गोपालन का एक लाभ हमें स्वस्थ एवं निरोग जीवन सहित दीर्घायु की प्राप्ति का होना प्रतीत होता है। आज भी गोरक्षा एवं गोपालन प्रासंगिक है। बहुत से प्रदेशों में गोरक्षा के लिए कानून भी बने हैं। संविधान में भी गोवंश के संरक्षण संबंधी निर्देश हैं। आश्चर्य है कि आज के ज्ञान विज्ञान के युग में मात्र कुछ आर्थिक लाभ व जिह्वा के स्वाद के लिये सरकारें व लोग गोहत्या करते व गोमांसाहार करते कराते हैं। उनका यह व्यवहार समझ से बाहर है और किसी भी दृष्टि से उचित प्रतीत नहीं लगता। आर्य हिन्दुओं का कर्तव्य है कि वह यथासम्भव गोपालन करें और गोदुग्ध का ही सेवन करें जिससे उन्हें राम व कृष्ण के समान बुद्धि व बल सहित वेदज्ञान प्राप्त करने की प्रेरणा प्राप्त हो और यह देश महाभारत काल से पूर्व के वैदिक भारत के अनुरूप उन्नत और विकसित हो।

मनुष्य का जीवन में दुग्ध का महत्वपूर्ण स्थान है। दुग्ध एक पूर्ण आहार व भोजन होता है। केवल दुग्धपान करके भी मनुष्य अपने जीवन का निर्वाह कर सकता है। शिशु अवस्था में दुग्ध ही एकमात्र आहार होता है। जिन बच्चों की दुर्भाग्य से माता न हो तो वह बालक गोमाता के दुग्ध को पीकर ही बड़े होते हैं। शायद ही इस संसार में कोई ऐसा मनुष्य हो जिसने कभी गोदुग्ध व गो से मिलने वाले पदार्थों का सेवन व उपयोग न किया हो। अतः सभी मनुष्य ईश्वर सहित गोमाता के ऋणी होते हैं। ऐसे उपयोगी व लाभकारी पशुओं का संरक्षण होना ही चाहिये। प्राचीन काल में हम देश में गो हत्या व मांसभक्षण के विषय में सोच भी नहीं सकते। वेदों में गो को अवध्य बताया गया है। यह मान्यता विवेकपूर्ण है। गाय से हमें ईधन व खाद के रुप में गोबर भी प्राप्त होता है। आर्थिक दृष्टि से एक गाय से प्राप्त होने वाला गोमूत्र एवं गोबर सहस्रों रुपये प्रतिमाह का होता है। गोबर से प्राचीन घरों व झोपड़ियां का लेपन होता था। गोबर एक किटाणुनाशक रसायन होता है। गोबर से लिपे हुए घर में कीड़े मकोड़े आदि कम होते हैं तथा स्वच्छता व स्वास्थ्य की दृष्टि से भी यह उत्तम होता है। गो के लिए एक महत्वपूर्ण बात यह है कि मनुष्य जो अन्न व तरकारियां खाता है, उसका उत्पादन व कृषि करनी होती है जबकि गाय का मुख्य भोजन घास व वनस्पतियां वनों व गांवों में परमात्मा बिना कृषि व बुआई के ही प्राप्त होती हैं। साधारण अन्न घास खाकर भी गाय हमें अमृतमय दुग्ध देती है और हमसे अपने भोजन तक के लिये कुछ नहीं लेती। उसे मात्र गांव व वनों के चरागाहों में छोड़ना पड़ता है। अतः गाय एक स्वावलम्बी एवं मनुष्यों के लिये अतीव हितकर प्राणी है जिसका सम्मान, पूजा, संवर्धन एवं सदुपयोग होना चाहिये तथा वाणी व अन्य प्रकार से उसकी हिंसा किन्हीं भी परिस्थितियों में नहीं होनी चाहिये। ऐसा करना मनुष्यता व मानवता के विरुद्ध है।

गाय से गोदुग्ध आदि अनेकानेक पदार्थ तो मिलते ही हैं इसके साथ ही गाय से हमें बछड़े व बछियायें भी मिलती हैं। बछियाओं का उपयोग गाय के समान तथा बछड़ों का बैलों के रूप में कृषि कार्यों तथा सामान की ढुलाई में किया जाता है। बैल व सांड भी जो गोबर व मूत्र देते हंै, वह तथा मरने पर उसका चर्म भी मनुष्यों के लिये हितकारी सिद्ध होता है। अतः बैल व सांड भी अन्य लाभों सहित गोवंश की वृद्धि में सहायक एवं आवश्यक होने के कारण अवध्य होते हैं। मनुष्य का धर्म श्रेष्ठ गुणों को धारण करना होता है जिसमें एक गुण अहिंसा का पालन भी है। अहिंसा का मुख्य अर्थ सभी प्राणियों के प्रति वैरभावना का त्याग करना होता है। जो मनुष्य अहिंसा के इस अर्थ को ग्रहण व धारण करेगा वही मनुष्य कहलाने योग्य होगा और ऐसा मनुष्य केवल गाय व बैल की ही नहीं अपितु अन्य किसी पशु व पक्षी की भी कभी अकारण हत्या नहीं कर सकता।

परमात्मा ने इस समस्त चराचर जगत को बनाया है और उसी ने अपने वेदज्ञान द्वारा यज्ञ करने की आज्ञा दी है। यज्ञ बिना गाय व उसके दुग्ध एवं घृत के सम्पन्न नहीं किया जा सकता। यज्ञ का प्रमुख अवयव व पदार्थ गोघृत होता है। यह घृत वायु को सुगन्धित करने वाला तथा वायु के सभी दोषों व प्रदुषण को दूर करने वाला होता है। रोग आदि से हानि पहुंचाने वाले सूक्ष्म किटाणु भी यज्ञधूम से निष्क्रिय होते हैं। मनुष्य की बुद्धि तीव्र होती है तथा यज्ञ करने से आरोग्य की प्राप्ति व मनुष्य का यश व बल भी बढ़ता है। मनुष्य दीर्घायु को प्राप्त होता है। आज कल छोटे छोटे रोगों के लिये नर्सिंग होम में उपचार कराने पर लाखों रुपये व्यय होते हैं तथा प्राण रक्षा की गारण्टी भी नहीं होती। यज्ञ जीवन के सुरक्षित एवं सुखी होने सहित मरने के बाद पुनर्जन्म में भी सुखों की प्राप्ति की गारण्टी होता है। अतः यज्ञ के अनुष्ठान के लिये भी गोपालन तथा गोसंरक्षण की अतीव आवश्यकता है। यज्ञ करने वाले यजमानों को परमात्मा का आशीर्वाद प्राप्त होता है। उन्हें आत्मसन्तोष एवं आत्मिक सुख वा आनन्द की उपलब्धि परमात्मा के द्वारा होती है। अतः सुख की प्राप्ति व दुःख की निवृत्ति के लिए भी परमात्मा की यज्ञ करने की आज्ञा का पालन करते हुए सबको गोपालन, गोरक्षा, गोसंवर्धन का समर्थन तथा गोहत्या का पुरजोर विरोध करना चाहिये।

गाय देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। गाय जितनी अधिक होगीं उतना दूध व दूध के उत्पाद अधिक मात्रा में सस्ते दाम पर सुलभ होंगे। गोदुग्ध की महत्ता के कारण हम जो धन अन्य खाद्य पदार्थों पर व्यय करते हैं वह बचेगा और प्रचुर मात्रा में दुग्धादि पदार्थों से अन्न के समान व उससे भी अधिक स्वास्थ्य व बल प्रदान की दृष्टि से लाभ होंगे। ऋषि दयानन्द ने एक पुस्तक ‘गोकरुणानिधि’ लिखी है। इसका उद्देश्य गोपालन व गोरक्षा को बढ़ावा देना तथा गोहत्या जैसे अमानवीय कार्य को बन्द करवाना था। इस पुस्तक में गाय से देश की अर्थव्यवस्था को जो लाभ होते हैं उसकी गणित के आधार पर गणना की गई है। ऋषि दयानन्द ने गणना कर बताया है कि एक गाय की एक पीढ़ी से दूध व बैलों से उत्पन्न अन्न को मिलाकर देखने से निश्चय होता है कि 4,10,440 चार लाख दस हजार चार सौ चालीस मनुष्यों का पालन एक बार के भोजन के बराबर गोदुग्ध से होता है। वह यह भी बताते हैं इसके विपरीत गाय को मार कर खाने से मात्र अस्सी मांसाहारी मनुष्य एक बार में तृप्त हो सकते हैं। वह आगे लिखते हैं देखो! तुच्छ लाभ के के लिए लाखों प्राणियों को मार असंख्य मनुष्यों की हानि करना महापाप क्यों नहीं? इस पुस्तक में ऋषि दयानन्द ने बकरी, भेड़ आदि दुग्धारी पशुओं की रक्षा व उसने लाभों पर भी प्रकाश डाला है।

वर्तमान समय में कृषि का कार्य बैलों से न लेकर ट्रेक्टर आदि से लिया जाता है जिसमें डीजल का प्रयोग किया जाता है। ईधन के लिये भी भूमिगत गैस, एलपीजी तथा लकड़ियों का प्रयोग किया जाता है। आजकल ईधन व नगरीकरण आदि अनेक प्रयोजनों से वनों का कटान वा नाश हो रहा है। जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है। आने वाले कुछ वर्षों में पेट्रोल व इसके उत्पाद मिलना समाप्त हो जायेंगे। वनों में लकड़ी का मिलना भी दुष्कर होगा। ऐसी स्थिति में गोरक्षा के कार्यों से अन्न की पूर्ति तथा ईधन के रूप में गोबर का महत्व निर्विवाद है। आज रसायनिक खाद से रोगों में वृद्धि का तथ्य प्रकाश में आ चुका है। स्वास्थ्य एवं भूमि की उर्वरता की रक्षा के लिए गोबर की आरगेनिक व प्राकृतिक खाद ही उत्तम है। यह सुविधायें तभी सुलभ हो सकती है जब गोहत्या तत्काल बन्द कर गोरक्षा के उपाय किये जायें। गोरक्षा से ही देश व विश्व बच सकता है। यदि वर्तमान की तरह गोमांसाहार आदि जारी रहा तो एक दिन गो पूर्णतः समाप्त हो जाने पर मनुष्य मनुष्य को मार कर खा सकता है। ईश्वर करे वह स्थिति कभी न आये। गाय की रक्षा राष्ट्र की रक्षा है और गो की हत्या राष्ट्र की हत्या है। इसे हमें समझना है। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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