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नेताओं का मतलब केवल सत्ता से होता है, जिससे उनके अपराध छिपे रहें।

विजय कुमार

राज्यों में जाति के प्रभाव से जातीय माफिया भी राजनीति में आ गये। इनका स्थानीय राजनीति में दखल हमेशा रहता था। उनके भय से लोग किसी नेता या पार्टी को वोट डाल देते थे। ऐसे विजयी नेता मजबूरी में उन्हें पुलिस से बचाते थे। खनन, शराब जैसे कामों से ये अरबपति बन गये।

विकास दुबे प्रकरण इन दिनों चर्चा में है। उसने पुलिस वालों को कैसे मारा; किसने मुखबिरी की; वह कहां छिपा; सुरक्षाकर्मियों ने उसे पकड़ा या वह खुद गिरफ्तार हुआ और जिस मुठभेड़ में वह मारा गया, वह असली थी या नकली….? ये सवाल लम्बे समय तक पूछे जाएंगे। इससे पुलिस, अपराधी और राजनेताओं के गठजोड़ का चिरंतन प्रश्न फिर जीवित हो गया है। यह प्रश्न हमारी राजनीतिक यात्रा में उतार-चढ़ाव का साक्षी है।

1947 के बाद के नेता स्वाधीनता आंदोलन से जुड़े हुए थे। प्रायः सभी ने जेल यात्रा की थी। 50-55 साल के होने के कारण ये अनुभवी तो थे ही, उनकी आर्थिक स्थिति भी ठीक थी। जनता ने दिल खोलकर उन्हें वोट दिये। अतः केन्द्र और राज्यों में कांग्रेस सरकारें बनीं; पर गांधीजी के बाद नेहरू सर्वेसर्वा हो गये। इससे लोगों का उनसे और उनकी वामपंथी नीतियों से मोहभंग होने लगा। अतः वैचारिक आधार पर कई दल बने; पर कोई सफल नहीं हुआ। इसका लाभ उठाकर नेहरू ने इंदिरा गांधी को और उन्होंने संजय और फिर राजीव को अपनी विरासत सौंप दी। इस प्रकार राजनीति में परिवारवाद घुस गया। क्रमशः यह बीमारी बाकी दलों में भी पहुंच गयी। भाजपा और वामपंथियों के अलावा बाकी दल किसी एक परिवार की विरासत मात्र हैं।

इंदिराजी ने अपनी विरासत बचाने के लिए 1975 में आपातकाल लगाया; पर भारत लोकतांत्रिक स्वभाव का देश है। तानाशाही यहां नहीं चल सकती। अतः 1977 के चुनावों में जनता ने उन्हें धूल चटा दी। इस दौरान जो विधायक या सांसद बने, वे सब आपातकाल विरोधी आंदोलन में जेल गये थे। उन पर जयप्रकाशजी का नैतिक दबाव था। अतः उनका आचरण संतुलित रहा; पर फिर स्थिति बदलने लगी। आजादी के आंदोलन वाले नेता या तो चल बसे या वयोवृद्ध होकर निष्क्रिय हो गये। इधर राज्यों में ऐसे राजनीतिक दल बने, जिन्होंने जाति और क्षेत्रवाद भड़काया। परिवार के मोह में कांग्रेस ने राज्यों में नये नेताओं को पनपने नहीं दिया। अतः जातीय नेताओं ने कांग्रेस का वोटबैंक कब्जा लिया। आज भविष्यहीन कांग्रेस अधिकांश राज्यों और केन्द्र की सत्ता से बाहर है।

पर राज्यों में जाति के प्रभाव से जातीय माफिया भी राजनीति में आ गये। इनका स्थानीय राजनीति में दखल हमेशा रहता था। उनके भय से लोग किसी नेता या पार्टी को वोट डाल देते थे। ऐसे विजयी नेता मजबूरी में उन्हें पुलिस से बचाते थे। खनन, शराब और सम्पत्ति जैसे कामों से ये अरबपति बन गये। पुलिस भी इन पर हाथ नहीं डालती थी। अब इन माफियाओं ने सोचा कि जब हमारे समर्थन से ये नेता विधायक या सांसद बन रहे हैं, तो फिर हम ही चुनाव क्यों न लड़ें ? इस प्रकार ये माफिया से नेता और फिर मंत्री बनने लगे। जो लोग मुकदमों के कारण चुनाव नहीं लड़ सकते, वे अपनी पत्नी, भाई या बेटे को आगे कर देते हैं। चुनावों में नेता जेल में जाकर इनसे मिलते हैं। इसका संकेत सब समझ जाते हैं। इसीलिए अपराध और राजनीति का घालमेल लगातार बढ़ रहा है।

यदि किसी एक दल से ऐसा व्यक्ति खड़ा हो, तो लोहे से लोहा काटने के लिए दूसरा दल भी ऐसा ही व्यक्ति ले आता है। आम जनता जिधर पलड़ा झुका देखती है, वहीं वोट दे देती है। इन नेताओं का मतलब केवल सत्ता से होता है, जिससे उनके अपराध छिपे रहें। इसलिए ये विभिन्न दलों में घूमते रहते हैं। इस समस्या के समाधान के लिए कई सरकारी समितियां बनीं; पर उनकी रिपोर्ट लागू नहीं हुई। कभी दलों को कहा जाता है कि वे इन्हें टिकट न दें, तो कभी जनता को कि वे इन्हें न चुनें; पर ये माफिया वोट दिलाते हैं, इसलिए दलों को इन्हें गले लगाना मजबूरी है। यदि हम ‘सूची प्रणाली’ अपना लें, तो इसका समाधान हो सकता है।

सूची प्रणाली में लोग नेता की बजाय दल को वोट देते हैं। माना किसी विधानसभा में 100 सीट हैं, तो हर मान्यता प्राप्त दल अपने सौ लोगों की सूची चुनाव से पहले ही चुनाव आयोग को देगा। अब लोग उस दल को वोट देंगे। जिसे जितने प्रतिशत वोट मिले, उसके नंबर एक से गिनते हुए उतने प्रतिशत लोग विधायक बन जाएंगे। वह विधायक एक स्थान का न होकर पूरे राज्य का होगा। ऐसा ही लोकसभा में हो। इससे गुंडे और भ्रष्ट लोगों की बजाय अनुभवी, बुद्धिजीवी और समाजसेवी लोग सदनों में पहुंचेंगे। सांसदों और विधायकों का काम देश और राज्य के लिए कानून बनाना है। बिजली, सड़क, पानी की व्यवस्था नगर और जिला पंचायतों की है। हो सकता है कि इससे नगर और जिले में गुंडों का वर्चस्व बढ़ जाए; पर जब उन्हें विधायकों या सांसदों की शह नहीं मिलेगी, तो उनका राजनीति में दखल भी समाप्त हो जाएगा।

इस प्रणाली से चुनाव का खर्चा बहुत घट जाएगा। यदि किसी सांसद या विधायक का असमय निधन हो गया, या उसने त्यागपत्र दे दिया, तो सूची का अगला व्यक्ति शेष समय के लिए सांसद या विधायक बन जाएगा। इससे उपचुनाव कभी नहीं होंगे तथा चुनाव के लिए पैसे बटोरने की बाध्यता नहीं रहेगी, जो भ्रष्टाचार का मुख्य कारण है। राजनीति को अपराधियों से मुक्त करने की यह अचूक दवा है। आवश्यकता साहसपूर्वक इसे प्रयोग करने की है।

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