महापुरुष द्वेष को जीत लेते हैं

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*🌷 प्रस्तुति : आचार्य ज्ञान प्रकाश वैदिक 🌷*

महापुरुषों के उदाहरण से पता चलता है कि उन्होंने द्वेष को किस प्रकार से जीत लिया था। उनका व्यवहार अपने विरोधियों के प्रति कैसा था।
मर्यादा पुरुषोत्तम *श्रीरामचन्द्रजी महाराज* को विमाता कैकेयी के कारण वनवास मिला। विधि की विडम्बना देखिए कि जिन्हें कल राजा बनना था उन्हें फकीर बनना पड़ा। साम्यावस्था को धारण करने वाले व्यक्ति ने वनवास को भी वरदान समझकर स्वीकार कर लिया। इससे भी बड़ी बात है कि उन्होंने कैकेयी के प्रति कोई दुर्भाव मन में नहीं रखा। उसके विषय में कोई अपशब्द मुँह से नहीं निकाला। अद्वेष की यह चरम सीमा है। यही महापुरुष का महापुरुषत्व है।
जिसके कारण महलों में पले एक राजकुमार को चौदह वर्ष तक जंगल के कष्ट सहने पड़े, पत्नी को खोना पड़ा, भयंकर युद्ध करना पड़ा―कितने ही घोर दुःख सहने पड़े!
परन्तु उस महापुरुष के मुख से कैकेयी के प्रति कोई अपशब्द नहीं निकला। यह बड़े धैर्य और आत्मविजय का लक्षण है।

काशी शास्त्रार्थ की समाप्ति पर *महर्षि दयानन्द*जी का घोर अपमान हुआ। उन पर ईंट, गोबर, पत्थर व जूते फेंके गये। पण्डित ईश्वरसिंह नाम के एक निर्मले सन्त काशी में वास करते थे। उनके मन में इच्छा हुई कि चलो इस समय चलकर दयानन्द की दशा देखें यदि इस महान अनादर से उनका चित्त विचलित न हुआ तो समझेंगे कि वह *सच्चा ब्रह्मज्ञानी* और एक पहुँचा हुआ *महात्मा* है।
यह विचार लेकर *सन्त ईश्वरसिंह* आनन्दोद्यान में पहुँचे। *ईश्वरसिंह* को आते देख *ऋषि दयानन्द* जी मुस्कुराये और उनका बड़े आदर से स्वागत किया गया। दोनों मिलकर बहुत समय तक *आत्मा* और *परमात्मा* के सम्बन्ध में बात करते रहे।
इतनी लम्बी बातचीत में *ईश्वर सिंह* को *स्वामी जी* के मुखमण्डल पर उदासीनता का एक भी चिह्न दिखाई नहीं दिया। उन्होंने लोगों के अन्याय व अत्याचार की कोई चर्चा नहीं की।
पण्डित *ईश्वर सिंह* ने जब देखा कि इतने घोर अपमान और निष्ठुर अन्याय के पश्चात् भी *ऋषि दयानन्द* जी ने मुख से एक भी अपमानजनक शब्द नहीं निकाला तो उन्होंने *ऋषि दयानन्द* के चरण छूकर कहा, “महाराज! आज तक मैं आपको वेदशास्त्र का ज्ञाता एक पण्डितमात्र समझता रहा हूँ, परन्तु आज के पण्डितों के घृणित उत्पात से और विरोध की भयंकर आँधी से आपके ह्रदय सागर में राग-द्वेष की एक भी लहर न उठते देखकर मुझे पूर्ण निश्चय हो गया है कि आप *वीतराग महात्मा* और *सिद्धपुरुष* हैं।

_उपर्युक्त घटना सिद्ध करती है कि *महर्षि दयानन्द* में द्वेष का सर्वथा अभाव था।_

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