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भारतीय संस्कृति

अधिकार से पहले कर्तव्य , अध्याय — 10 : राष्ट्र के प्रति हमारे कर्तव्य

वेदों का राष्ट्रवाद बहुत निराला है । राष्ट्र , राष्ट्रवाद और राष्ट्रीयता की इतनी उत्कृष्ट व्यवस्था हमारे वेदों में प्रस्तुत की गई है कि उसका विश्व में कहीं कोई सानी नहीं है । वेदों की यह व्यवस्था है कि व्यक्ति निजी स्वार्थ से पहले समूह के स्वार्थ पर ध्यान दे और समूह के स्वार्थों से पहले राष्ट्र के स्वार्थ पर ध्यान दे । वास्तव में यह व्यवस्था भी वेदों की ही है कि हम अधिकार से पहले कर्तव्य पर ध्यान दें। अधिकारों के संघर्ष से हटाकर वेद हमें कर्तव्य पथ पर चलने की प्रेरणा देता है। वेद का राष्ट्र , राष्ट्रवाद और राष्ट्रीयता का संदेश निराला इसलिए है कि वह हमें राष्ट्र के माध्यम से विश्वमानस का धनी बनने की प्रेरणा देता है।
सृष्टि उत्पत्ति के पश्चात जब मनुष्य का धरती पर आगमन हुआ तो उसने वेदों में दी गई शिक्षाओं के अनुसार अपने बौद्धिक कौशल का प्रदर्शन करना आरंभ किया । तदुपरांत उसने परिवार , गांव व नगर बसाने आरम्भ किए । इन सबको मिलाकर उसने एक विश्व राष्ट्र अथवा विश्व परिवार का सपना भी देखा और उसे मूर्त रूप भी प्रदान किया। इस विश्व परिवार को उसने ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के पवित्र आदर्श के साथ प्रस्तुत किया । जब किसी ऋषि के मुँह से ये शब्द पहली बार निकले होंगे तो वह निश्चय ही उस समय का बहुत बड़ा तपस्वी ऋषि रहा होगा। क्योंकि संपूर्ण वसुधा को अपना परिवार मानना और उसके लिए ऐसी व्यवस्था तैयार करना जिसमें व्यष्टि से समष्टि तक परिवार की भावना अंतर्निहित हो , सचमुच ही सामाजिक , राजनीतिक और आध्यात्मिक क्षेत्र में मानव द्वारा की गई आज तक की सबसे बड़ी क्रांति है। सत्ताओं को पलट कर अपनी-अपनी सत्ताएं स्थापित करना और अपने सिक्के चलाकर अपने ढंग से निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए शासन का संचालन करना तो अभी तक बहुत से सम्राटों और बादशाहों ने किया है परंतु ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की इस पवित्र भावना के सामने उन सम्राटों और बादशाहों के सारे प्रयास तुच्छ ही दिखाई देते हैं। इसका कारण यही है कि जहां इन सम्राटों और बादशाहों के द्वारा अपनी-अपनी सत्ताएं स्थापित करने का उद्देश्य अपने स्वार्थों की पूर्ति करना और स्वयं की राजनीतिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए अनेकों लोगों का रक्त बहाना था , वहीं हमारे ऋषियों का उद्देश्य सर्वमंगल करना था। उनका प्रयास रहता था कि अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए अधिकतम लोगों का अधिकतम कल्याण किया जाए।
इसी को उन लोगों ने धर्म मार्ग कहा है। आज के संदर्भ में यह धर्म मार्ग ही कर्तव्य मार्ग है।

ऋषियों ने की भद्र की उपासना

अथर्ववेद की यह ऋचा हमारे ऋषियों के इस पवित्र उद्देश्य को इस प्रकार स्पष्ट करती है : —
भद्रमिच्छन्त ऋषयः स्वर्विद तपो दीक्षामुप निषेदुरग्रे।
ततो राष्ट्रं बलमोजश्‍च जातं तदस्मै देवा उपसन्नमन्तु॥ अथर्ववेद 18.41.1
वेद की इस ऋचा से स्पष्ट होता है कि वैदिक आत्मज्ञानी ऋषि-मुनियों ने मनुष्य जीवन के कल्याण के लिये अपने सम्मुख ध्येय को रखा, तप किया, दीक्षित हुए जिसके परिणामस्वरूप राष्ट्र संकल्पना साकार हुई, जिसमें ओज, बल और प्राण हैं। ‘राट्‘ इस शब्द से राष्ट्र शब्द बना। ब्राह्मण, संहिताओं में ‘राष्ट्र संकल्पना‘ अधिक स्पष्ट हुई है। सार्वभौम राजा के अधीन जितनी भूमि है, वह राष्ट्र कहलाता है (तैत्तिरीय संहिता 7.5.18.1)।
वेद की इस ऋचा से यह स्पष्ट होता है कि हमारे ऋषियों ने भद्र की उपासना की। भद्र अर्थात लोक कल्याण की उपासना , लोक कल्याण का ऐसा भागीरथ प्रयास जो किसी को भी अधर्मी ,अन्यायी और अत्याचारी न बनने दे । उनकी यह जिद थी , उनका जुनून था और जीवन का कठोर व्रत था कि जिएंगे तो इसी व्रत की पूर्ति के लिए जिएंगे । जिस देश में ऐसे जुनूनी और कठोरव्रती साधक , आचार्य और समाज को सही दिशा देने वाले लोग होते हैं , वही देश आगे बढ़ता है , उन्नति करता है और विश्व गुरु बनता है।
वेद का उपरोक्त मंत्र स्पष्ट कर रहा है कि सार्वभौम राजा के अधीन जितनी भूमि है वह राष्ट्र कहलाता है – यहाँ पर इस वाक्य को ध्यान से पढ़ने की आवश्यकता है । इससे स्पष्ट होता है कि संपूर्ण भूमंडल पर जब एक ही राजा का राज होता था , तब वह संपूर्ण भूमंडल के अपने राज्य को राष्ट्र की संज्ञा देता था। इस ऋचा से यह भी स्पष्ट होता है कि संपूर्ण भूमंडल के निवासियों के प्रति हम वैसा ही व्यवहार करें जैसे परिवार में हम अन्य परिजनों के साथ करते हैं। यह भी कि हम संपूर्ण भूमंडल को एक परिवार मान कर साथ – साथ रहने के अभ्यासी बनेंगे और परस्पर राग- द्वेष के भाव को उत्पन्न नहीं होने देंगे। इस प्रकार हम महान राष्ट्र की अवधारणा को लेकर सृष्टि के प्रारंभ में आगे बढ़े।
उत्तम राष्ट्र की स्थापना के अपने संकल्प अथवा धारणा को स्पष्ट करते हुए अथर्ववेद कहता है- पृथिवी, जन, संस्कृति मिलकर राष्ट्र बनता है। तेज और बल राष्ट्र भावना को पुष्ट करते हैं। (अथर्ववेद 12.3.10) वेद के इस आदेश से स्पष्ट होता है कि राष्ट्र के नागरिकों में तेज और बल का होना अनिवार्य है । कहने का अभिप्राय है कि राष्ट्रवासियों का यह पवित्र कर्तव्य है कि वह स्वयं को तेज और बल से युक्त करें।
प्राचीन काल में हमारे देश में व्यक्ति , परिवार , ग्राम , प्रान्त और राष्ट्र के प्रमुख भी हुआ करते थे। इनके प्रमुखों को गृहप्रमुख , समूहप्रमुख , ग्रामप्रमुख , प्रांतप्रमुख और राष्ट्रप्रमुख कहा जाता था। हमारे ऋषियों की भद्र की उपासना तभी पूर्ण होती थी जब वे पृथ्वी , जन और संस्कृति तीनों का समन्वय कर राष्ट्र का सर्वोत्तम निर्माण करते थे।
ऐसी व्यवस्था की जाती थी कि जो राष्ट्र प्रमुख सोचता था उसी को गृहप्रमुख सोचता या करता था।
जो व्यक्ति शासन के शीर्ष पर बैठा होता था उसकी आज्ञा का यथावत पालन गृहपति करता था और जो गृहपति सोचता था उसकी भावनाओं का सम्मान शासन के शीर्ष पर बैठा व्यक्ति करता था। दोनों के बीच इतना सुंदर समन्वय होता था कि एक एक दूसरे की भावनाओं के अनुसार स्वाभाविक रूप से कार्य करता था। जिससे कहीं भी शासन की नीतियों में विरोधाभास नहीं झलकता था। सबके सुर एक जैसे निकलते थे और उन सुरों का उद्देश्य लोक कल्याण होता था। इस प्रकार के परिवेश में भद्र की उपासना अपने रंग बखेरती थी ।
वास्तव में सुशासन की विशेषता भी यही होती है कि इसमें व्यक्ति से लेकर राष्ट्र तक के सभी व्यक्तियों और संस्थानों के सुर एक समान निकलते हैं । इसी सुरीले और मनोरम संगीत के साथ समन्वय स्थापित करना देशवासियों का प्रमुख कर्तव्य है। वेदों ने मानव शरीर को एक वाद्य यंत्र भी कहा है। इसके साथ ही साथ वेद में राष्ट्र रूपी शरीर का समन्वय मानव शरीर के साथ स्थापित किया गया है । यदि मानव शरीर किसी सुरीले संगीत पर झूमने लगता है तो उस समय अंग प्रत्यंग एक दूसरे का साथ देते हैं। वैसे ही राष्ट्र भी जब सुरीले संगीत पर झूमने लगे तो उसके अंग – प्रत्यंग अर्थात जन – जन को उसका साथ देना ही चाहिए ।
कुल मिलाकर कहने का अभिप्राय यह है कि एक राष्ट्र , एक ही संगीत , एक ही लक्ष्य , एक ही सोच , एक ही दिशा , एक ही झंडा और एक ही एजेंडा सब राष्ट्रवासियों का होना चाहिए। इसी से राष्ट्र महान बनता है । इसीलिए सभी राष्ट्रवासियों का यह परम कर्तव्य है कि वे एक राष्ट्र , एक संगीत, एक लक्ष्य , एक सोच , एक दिशा ,एक झंडा और एक एजेंडा पर काम करेंगे और राष्ट्र को महान बनाने में अपना अप्रतिम योगदान देने का हरसंभव प्रयास करेंगे ।
वैदिक विद्वानों ने राष्ट्र को भी एक देह माना है। इसीलिए वैदिक संस्कृति देशवासियों को यह परामर्श देती है कि वे राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों को वैसे ही निर्वाह करें जैसे हम अपने शरीर के प्रति अपने कर्तव्यों का ध्यान रखते हैं । शरीर की साफ सफाई , स्वच्छता और इसके संवर्धन हेतु पौष्टिक भोजन , शुद्ध जल आदि लेने पर जिस प्रकार हम ध्यान देते हैं वैसे ही राष्ट्र रूपी देह के संरक्षण व संवर्धन के प्रति भी अपने कर्तव्यों को समझना प्रत्येक देशवासी के लिए परमावश्यक है।

चार वर्ण और हमारा राष्ट्र रूपी शरीर

यजुर्वेद (25.9) में यह स्पष्ट निर्देश दिया गया है कि अपनी देह के समान ही हमें अपने राष्ट्र की सुरक्षा करनी चाहिए। हमारी अपनी देह में जिस प्रकार सिर, बाहु, पेट और पांव-ये चार अवयव हैं। उसी प्रकार राष्ट्र में ज्ञानी, वीर, व्यापारी और सेवा करने वाले कर्मचारी भी हैं। जैसे हमारी अपनी देह का सिर , बाहु , पेट और पांव के बिना कोई अस्तित्व नहीं हो सकता , वैसे ही राष्ट्र रुपी देह का भी ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य और शूद्र रूपी चार अवयवों के बिना कोई अस्तित्व नहीं हो सकता । जैसे हमारे शरीर को सिर , बाहु , पेट और पांव एक स्वरूप प्रदान करते हैं और इसे खड़ा करने में एक मजबूत स्तंभ का भी कार्य करते हैं , वैसे ही ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य और शूद्र रूपी चार स्तंभ राष्ट्र रूपी देह को खड़ा करने में और उसे एक स्वरूप प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करते हैं । यह चारों वर्ण अपने अपने लिए निर्धारित किए गए कर्तव्य कर्मो का निर्वाह करते हुए राष्ट्र रूपी देह को एक स्वरूप प्रदान करते हैं।
राष्ट्र के निर्माण में पृथ्वी को महत्वपूर्ण स्थान देते हुए हमारे विद्वानों ने और वेदों ने उसका बहुत अधिक गुणगान किया है। ‘भूमे मातः‘ (अथर्ववेद 12.1.63), ‘माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः‘ (अथर्ववेद 12.1.12)। वेद की ऋचाएं कहती हैं- भूमि हमारी माता है और हम उसके पुत्र हैं। माता और पुत्र का यह संबंध बहुत ही अधिक पवित्र है । राष्ट्र भूमि को पिता नहीं कहा है । माता कहने का अभिप्राय बहुत ही अधिक पवित्र है । माता हमारी निर्माता होती है। राष्ट्रभूमि भी हमारी निर्माता है । दूसरी बात यह है कि माता संसार में हमें ईश्वर के प्रतिनिधि के रूप में सबसे पहले प्राप्त होती है । जैसे हमारी जननी माता हमारा पालन-पोषण करती है , वैसे ही राष्ट्र भूमि भी हमारा पालन-पोषण करती है । वह हमें प्रत्येक प्रकार के ऐश्वर्य को प्राप्त कराने में वैसे ही ध्यान रखती है जैसे मां हमारा ध्यान रखती है । यही कारण है कि राष्ट्रभूमि को भी माता कहकर सम्मान दिया जाता है ।
इसीलिए देशवासियों के विषय में राष्ट्र और अपनी राष्ट्रभूमि के प्रति कर्तव्य निर्धारित करते हुए वेद कहता है कि सर्वत्र मातृभूमि के यश की रक्षा करें। ‘पृश्‍निमातरः मर्त्तासः … स्तोता वो अमृतः स्यात्‘ (ऋ. 1.38.4) वेद का यह शाश्वत , सनातन और अमर संदेश है कि मातृभूमि को अपनी माता मानने वाला स्तोता अमर हो जाता है।
‘इळा सरस्वती मही तिस्रो देवी मयोभुवः‘ मातृभूमि, मातृसंस्कृति, मातृभाव ये तीन देवियां हैं, जिनके अस्तित्व से ही राष्ट्र का निर्माण होता है, उत्कृष्ट और उन्नत होता है (ऋ. 1.13.9)। वेद ने यह और भी ऊंची बात कह दी है। इससे पता चलता है कि वेद राष्ट्रभूमि के प्रति हमारे पवित्र संबंध को कितना महत्व देता है ? मातृभूमि , मातृ संस्कृति और मातृभाव इन तीनों देवियों के प्रति हमें सदैव सम्मान भाव अपनाना चाहिए । उनके प्रति श्रद्धा रखने से राष्ट्रवासियों के प्रति प्रेम भावना स्वयं विकसित हो जाती है। ऐसा भाव रखने से हम समझ जाते हैं कि हम सभी एक ही माता की संताने हैं और एक ही माता की संतानें होने के कारण हमें परस्पर भाई-बहन के जैसा व्यवहार करना चाहिए । राष्ट्र भूमि को माता मानने से ही ऐसा भाव हमारे बीच उत्पन्न हो सकता है कि हम परस्पर भाई – भाई जैसा व्यवहार करें। इससे समस्त राष्ट्र वासियों के बीच परिवार की पवित्र भावना विकसित होती है और सब एक दूसरे के दुख दर्द में स्वेच्छा से सम्मिलित होते हैं। यह संबंध वास्तव में राष्ट्र के प्रति हमारी कर्तव्यपरायणता का प्रमाण है कि हमें अपनी राष्ट्रभूमि के प्रति कितना अधिक भक्तिभाव रखना चाहिए और कितना अधिक संवेदनशील होना चाहिए ?

हमारी समितियां ऐसी हों

अथर्ववेद में राष्ट्र भूमि के प्रति ऐसी प्रार्थना भी की गई हैं :-

ये ग्रामा यदरण्यं या: सभा अधि भूम्याम् ।
ये संग्रामा: समितयस्तेषु चारु वदेम ते ।।
(अथर्ववेद : 12.1.56)

अर्थ : हे मातृभूमि ! जो तेरे ग्राम हैं, जो जंगल हैं, जो सभा – समिति ( ग्राम सभा से लेकर राष्ट्र की संसद तक ) अथवा संग्राम-स्थल हैं, हम उनमें से किसी भी स्थान पर क्यों न हों सदा तेरे विषय में उत्तम ही विचार तथा भाषण आदि करें – तेरे हित का विचार हमारे मन में सदा बना रहे ।
ग्राम सभा से लेकर राष्ट्र की संसद तक जब राष्ट्रभूमि के विषय में सोचने वाले लोग बैठेंगे तो प्रत्येक स्थान पर राष्ट्रवादी चिंतन निकलेगा । जिसमें स्वार्थ की या भ्रष्टाचार की या किसी जाति या संप्रदाय पर किसी भी प्रकार का अत्याचार करने की या किसी का भी किसी प्रकार से शोषण करने की भावना सर्वथा विलुप्त हो जाएगी। जब राष्ट्र भूमि को जमीन का मात्र एक टुकड़ा माना जाता है और उसे निर्जीव समझकर उसके साथ कोई अपना आत्मिक या भावनात्मक संबंध स्थापित नहीं किया जाता , तब व्यक्ति संवेदना शून्य होकर अपने कर्तव्य से मुंह फेरकर जनहित और राष्ट्रहित के विरुद्ध कार्य करता है। ऐसे ही नेता या जनप्रतिनिधि भ्रष्टाचार में या किन्हीं दूसरे अपराधों में संलिप्त पाए जाते हैं।
मातृभूमि के लिए प्राणों तक की बलि देने को उद्यत रहना चाहिए, यह बात का प्रकाश करते हुए अथर्ववेद (12.1.62) में कहा है –

उपस्थास्ते अनमीवा अयक्ष्मा अस्मभ्यं सन्तु पृथिवि प्रसूता: ।
दीर्घं न आयु: प्रतिबुध्यमाना वयं तुभ्यं बलिहृत: स्याम ॥

अर्थ : हे मातृभूमि ! हम सर्व रोग-रहित और स्वस्थ होकर तेरी सेवा में सदा उपस्थित रहें । तेरे अन्दर उत्पन्न और तैयार किए हुए – स्वदेशी पदार्थ ही हमारे उपयोग में सदा आते रहें । हमारी आयु दीर्घ हो । हम ज्ञान-सम्पन्न होकर – आवश्यकता पड़ने पर तेरे लिए प्राणों तक की बलि को लाने वाले हों ।
इससे उत्तम राष्ट्र धर्म का उपदेश क्या हो सकता है ? राष्ट्र के ऐश्वर्य को भी खूब बढ़ाने का यत्न करना चाहिए । इस बात का वेद उपदेश देता है । इस पर कुछ भी प्रकाश डालने की आवश्यकता नहीं है कि महर्षि दयानंद जैसे वेद प्रेमी राष्ट्र भक्तों ने जब देशवासियों का ध्यान वेदों की ओर किया तो स्वदेशी की भावना लोगों के सिर चढ़कर बोलने लगी थी । देशभक्ति की पवित्र भावना इतनी प्रबल हुई कि सर्वत्र स्वदेश ,स्वराष्ट्र , स्वभूषा , स्वभाषा ,स्वराज्य की दुंदुभी बजने लगी थी। वास्तव में हमारे भीतर जागृत हुआ यह ‘स्वबोध’ हमारे लिए वेद की ही देन था। , प्रभाव के हमारे काल में जब यह भाव हमसे दूर हुआ तो हम अधोगामी हो गए और जब यह भाव महर्षि दयानंद के उपकार से फिर से जागृत हुआ तो हम स्वतंत्रता के लिए उठ खड़े हुए।
जहाँ ईश्वर से वैयक्तिक, पारिवारिक और सामाजिक कल्याण के लिए प्रार्थना की जाती है वहाँ प्रत्येक देशभक्त को यह भी प्रार्थना प्रतिदिन करनी चाहिए और इसके लिए प्रयत्न करना चाहिए कि –

स नो रास्व राष्ट्रमिन्द्रजूतं तस्य ते रातौ यशस: स्याम । (अथर्ववेद : 6.39.2)

अर्थ : हे ईश्वर ! आप हमें परम ऐश्वर्य सम्पन्न राष्ट्र को प्रदान करें । हम आपके शुभ-दान में सदा यशस्वी होकर रहें ।
इस प्रकार यह स्पष्ट है कि वेदों में राष्ट्र की सर्वतोमुखी उन्नति में सहायक सभी कर्तव्यों का उत्कृष्ट वर्णन पाया जाता है । ( संदर्भ : पण्डित धर्मदेव विद्यावाचस्पति कृत ‘आर्य कुमार निबन्ध-माला’ पुस्तक ।)

राकेश कुमार आर्य

संपादक : उगता भारत

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