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पर्यावरण

कुंओं का कातिल कौन ?

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विगत 3 दिन पहले 10 जून को अंतरराष्ट्रीय भूगर्भ जल दिवस मनाया गया | यह अंतरराष्ट्रीय जल दिवस 22 मार्च से अलग मनाया जाता है | भारत की संस्कृति ऐसी रही है जहां हर दिन किसी गांव मोहल्ले कस्बे में नव प्रसूता महिला 40 वें दिन नवजात को गोद में लेकर गांव मोहल्ले की बुजुर्ग स्त्रियों के साथ मंगल गीतों का गान कर कुआं पूजन जैसी परंपराओं के माध्यम से प्रत्यक्ष रूप से अंतरराष्ट्रीय भूगर्भ जल दिवस को सदियों से मनाती रही है|

दिल्ली एनसीआर में कुआं पूजन की परंपरा लुप्त हो गई है कुआं पूजन के नाम पर समर्सिबल पानी की टंकी को पूज लिया जाता है| आखिर क्या जरूरत है इनको भी पूजने की? पूज रहे हो तो फिर कुआं पूजन नाम क्यों टंकी पूजन समर्सिबल पूजन नाम रख देना चाहिए|हमारी विज्ञान सम्मत परंपराएं फॉर्मेलिटी बनकर रह गई है | इस संबंध में आई ओपनर स्टोरी नवभारत टाइम्स के वरिष्ठ पत्रकार श्यामवीर चावड़ा जी ने 1 वर्ष पूर्व ग्रेटर नोएडा नवभारत टाइम्स में प्रकाशित की थी|

कुआं भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग रहे हैं| लेकिन अतिक्रमण कारी सोच लोभ लालच ने इस अभिन्न अंग को काटकर भिन्न कर दिया है| इसमें शुरुआती योगदान अंग्रेजों का रहा बाद में हमारा योगदान है जो आज भी जारी है |

कुए भारत की पहचान रहे हैं| महानगरों में मोहल्लों बाजारों का नामकरण कुएं के नाम पर मिलता है| गांवों में भी आज भी कितने ही मोहल्ले मिल जाएंगे जिनकी पहचान कुआं वाला मोहल्ला से आज भी कायम है|
किसी का नाम लाल कुआं तो किसी का धौला कुआं किसी का संख्या समूह के आधार पर तिनकुआं पंचकुइयां तो किसी को पत्थर का कुआं तो किसी को ईटों वाला कुआं कहते हैं |कुछ का नामकरण व्यक्ति विशेष उनके बनवाने ,खुदवाने वाले के नाम पर भी होता है|

लेकिन वहां यदि हम कुएं ढूंढने जाए तो इसरो डीआरडीओ भी सर्च अभियान में कुएं को न ढूंढ पाए |

सघन सर्च अभियान में कुछ कुआं मिल भी जाए तो कुएं ना होकर डस्टबिन ,कूड़ा घर नजर आएंगे|

बात देश की राजधानी दिल्ली की करते हैं जो अब कोरोना महामारी से जूझ रही है| जब दुनिया के सर्वाधिक प्राचीन माने जाने वाले रोम, इस्तांबुल में इंसान तो क्या परिंदों का भी बसेरा नहीं था.. उससे भी हजारों वर्ष पहले चक्रवर्ती सम्राट पांडवों ने इंद्रप्रस्थ जैसी भव्य नगरी यमुना ,अरावली के बीच बसा दी थी| 1883- 84 में प्रकाशित दिल्ली गजट आंकड़े मिलते हैं इस दस्तावेज के अनुसार 1872-75 के दौरान दिल्ली में सर्वेक्षण में पाया गया दिल्ली में 2256 से अधिक कुआं काम कर रहे थे|

1912 में प्रकाशित गजट मैं यह संख्या बढ़कर 10700 हो गई| दिल्ली के जल कूपों की दुर्दशा शुरू होती है जब अंग्रेज कलकत्ता से दिल्ली राजधानी लाए 1914-15 से अंग्रेजों ने कुआं को लेकर आदेश जारी कर दिया कुओं के पानी के इस्तेमाल पर रोक लगा दी उनका तर्क था कि इस प्रकार के पानी के इस्तेमाल से बीमारियां फैलती है अंग्रेजों ने दिल्ली में नल से पानी सप्लाई की व्यवस्था शुरू की| अंग्रेजों ने कानून बना बना कर लोगों की आस्था पर चोट पहुंचाई यहां कुआं खुदवाने पुण्य का कार्य माना जाता था| नतीजा आज यह है आज दिल्ली कुआं से मुक्त हो गई है उनकी जमीनों को पाटकर ऊपर बड़े-बड़े बाजार बन गए हैं| दिल्ली की जनता कूप के रहते कभी प्यासी नहीं मरी लेकिन आज प्यासी मर रही है| पूरा दिन एमसीडी के टैंकरों की प्रतीक्षा में चला जाता है |

यही दुर्दशा गांवों के कुआं की हो गई विशेषकर एनसीआर के गांवों में | कुछ कुआं पर चौधरियों की बैठक कोठिया बन गई तो कुछ , जो कुए जैसी हालत में जीवित है मोहल्ले के कूड़े ,बच्चों के डायपर से भरे हुए नजर आते हैं|

कुछ चतुर चौकस प्राणी तर्क देते हैं कुआं का क्या करें जब ग्राउंड वाटर लेवल नीचे चला गया है?
क्या कभी विचार किया भूजल स्तर किस कारण नीचे गया उसका कारण भी यही है कुएं का प्रचलन में ना होना| चलो मान लिया कुआं का पहले जैसा प्रयोग संभव नहीं है लेकिन कुएं को उनकी सरंचना के अनुसार वर्षा जल भंडारण ग्राउंड वाटर रिचार्ज के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है रिचार्ज मतलब भूमि जल की पुनर्भरण में | कोई भी कुआं कभी भी निष्प्रयोज्य नहीं हो सकता वह तो हमें पूर्वजों द्वारा बनाया हुआ रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम है जो हमें अब निशुल्क मिल रहा है| पूरे मोहल्ले की छतों का पानी उसमें पहुंचाया जा सकता है| आज संसाधन भी है तकनीक भी है जरूरत है तो केवल इच्छाशक्ति की |

आप यदि ऐसा कर सकते हैं तभी आप नैतिक तौर पर अंतरराष्ट्रीय जल दिवस या भूगर्भ जल दिवस मनाने के अधिकारी है अन्यथा तो आपका सब कार्य मिथ्याचार की श्रेणी में ही उसकी गणना की जाएगी |

आर्य सागर खारी ✍✍✍

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