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इतिहास के पन्नों से

स्वतंत्रता आंदोलन में रहा है बिहार का अविस्मरणीय योगदान

 

डॉ0 विजय कुमार

स्वतंत्रता का सीधा सा अर्थ दासता – से मुक्ति है, किन्तु गहराई से विचार करने पर इसके कई गूढार्थ हैं, जो विविध आयामी और लोकोपकारी हैं। बिहार में स्वतंत्रता संघर्ष का लम्बा इतिहास है, जो वीर कुंवर सिंह से लेकर चम्पारण सत्याग्रह व सन् 1942 के करो या मरो तक चला। ___सन् 1911 ई. तक बंगाल, बिहार और उड़ीसा एक साथ थे, जिनका मुख्यालय कलकत्ता था। 1912 ई. में बिहार और उड़ीसा को बंगाल से अलग कर दिया गया। अप्रैल 1936 में उड़ीसा से बिहार भी अलग हो गया। सन् 1911 ई. में पटना (बांकीपुर) में कांग्रेस का 27वाँ अधिवेशन हुआ। रघुनाथ सिंह मधोलकर अध्यक्ष थे। सच्चिदानन्द सिन्हा महासचिव थे। प्रसिद्ध समाज सेवा मौ0 मजहरूल हक स्वागत समिति के अध्यक्ष थे। 1915 में मजहरूल हक कांग्रेस के बम्बई अधिवेशन में भी शरीक हुए थे। राजेन्द्र प्रसाद अपने छात्र जीवन और युवावस्था से ही राजनीतिक में गहरी रूचि लेने लगे थे। वे बिहारी छात्रों को संगठित कर समितियाँ बनाते और विविध प्रांतीय राजनीतिक सम्मलेनों में भाग लिया करते थे। देश के प्रथम राष्ट्रपति होने के अलावा प्रमुख स्वतंत्रता सेनानियों में राजेन्द्र बाबू का स्थान गौरवपूर्ण है। सन् 1916 ई. में गृह शासन (होम रूल) आंदोलन शुरू हुआ । मद्रास में श्रीमती एनी बेसेंट के नेतृत्व में और पूना में बाल गंगाधर तिलक के नेतृत्व में होम रूल लीग स्थापित किया गया। बिहार में भी मौलाना मजहरूल हक के नेतृत्व में होम रूल लीग की स्थापना की गयी। सरफराज हुसैन खाँ उपाध्यक्ष और चन्द्रवंशी सहाय सचिव बनाये गये।
1918 ई. में श्रीमती एनी बेसेंट दो बार पटना आयी थीं। हालांकि गृह शासन आंदोलन पूर्ण सफल नहीं हो सका, फिर भी इससे जनमानस में जागृति आयी थीसन् 1916 ई. में लखनऊ में कांग्रेस का 31 वाँ अधिवेशन हुआ, जिसमें बिहार के प्रतिनिधि भी शामिल हुए थे। उनमें एक राजकुमार शुक्ल भी थे, जिन्हें गाँधी जी को चम्पारण लाने का श्रेय प्राप्त है। चम्पारण में नील की खेती होती थी। इस सम्बन्ध में अंगरेज किसानों का शोषण करते थे। उनके साथ अन्याय होता था। शुक्ल जी के अनुरोध पर 15 अप्रील 1917 ई. को गाँधी जी चम्पारण पहुँचे। पहले तो उन्हें अनेक कठिनाईयों का सामना करना पड़ा। किन्तु किसानों की समस्याओं की जाँच के लिए समिति बनी। समिति की अनुशंसा पर कुछ मांगे स्वीकार कर ली गई। किसानों को कुछ राहत मिली। बिहार के चम्पारण में गाँधीजी के अहिंसात्मक संघर्ष का यह पहला प्रयोग था।
राजेन्द्र प्रसाद, मजहरूल हक, ब्रजकिशोर प्रसाद, अनुग्रह नारायण सिह, शभू शरण आदि गाँधी के साथ चम्पारण गये थे। भवानी दयाल संन्यासी आर्य समाज के नेता, देशभक्त और पत्रकार थे। उन्होंने भारत और अफ्रिका में राष्ट्रीयता, संस्कृति तथा गाँधीवाद के प्रचार में बहुमूल्य सहयोग दिया था। वे बिहार निवासी थे। सन् 1918 ई. में प्रथम विश्वयुद्ध समाप्त हुआ। इसमें जर्मनी के साथ टर्की भी पराजित हुआ था। टर्की का सुल्तान जो खलीफा भी कहलाता था, के साथ अंग्रेजों का व्यवहार ठीक नहीं था, इससे अन्य मुसलमानों के साथ भारतीय मुसलमान भी असंतुष्ट थे। उन्होंने खिलाफत आंदोलन शुरू किया। 1916 ई. में ही कांग्रेस और लीग में समझौत हो गया। कांग्रेस ने गाँधीजी के नेतृत्व में खिलाफत आंदोलन का भी समर्थन किया।
सन् 1918 ई. में प्रथम विश्वयुद्ध समाप्त हुआ। इसमें जर्मनी के साथ टर्की भी पराजित हुआ था। टर्की का सुल्तान जो खलीफा भी कहलाता था, के साथ अंग्रेजों का व्यवहार ठीक नहीं था, इससे अन्य मुसलमानों के साथ भारतीय मुसलमान भी असंतुष्ट थे। उन्होंने खिलाफत आंदोलन शुरू किया। 1916 ई. में ही कांग्रेस और लीग में समझौत हो गया। कांग्रेस ने गाँधीजी के नेतृत्व में खिलाफत आंदोलन का भी समर्थन किया। सन् 1919 ई. में भारत शासन अधिनियम पास हुआ। भारतीयों की दृष्टि में यह समझौता संतोषजनक नहीं था। इसके द्वारा एक रोटी का चौथा भाग प्रांत के निवासियों को दिया गया था। राष्ट्रवादियों के विरूद्ध एक रौलेट ऐक्ट भी पास हुआ था, जिसे काला कानून की संज्ञा दी गयी थी। (पंजाब) में भारतीयों की शांतिपूर्ण सभा में अंधाधुंध गोलियां चलाई गई। हत्याकाण्ड के विरोध में अन्य प्रातों की तरह बिहार में भी प्रदर्शन और नारे के माध्यम से विरोध किया गया।
गाँधीजी के नेतृत्व में ब्रिटिश शासन के विरूद्ध असहयोग आंदोलन प्रारंभ किया गया। 1921-22 ई. में अहसयोग आंदोलन अपनी चरम सीमा पर पहुँच हुआ था। किन्तु चौरीचौरा (उ. प्र.) में हिसात्मक घटना से गाँधी ने अचानक आंदोलन स्थगित कर दिया। इस असहयोग आंदोलन में बिहार की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। ब्रिटिश शासन में यथासंभव असहयोग किया गया। छात्रों एवं शिक्षकों ने स्कूल-कॉलेज छोड़ा। वकीलों ने कचहरी छोड़ दीकई अधिकारियों ने अपनी नौकरी छोड़ दी। गई लोगों से सरकारी उपाधियों और डिग्रियों का परित्याग कर दिया। विदेशी माल का बहिष्कार हुआ। राष्ट्रीय शिक्षा के लिए विद्यापीठों की स्थापना हुई।
6 फरवरी 1921 को बिहार विद्यापीठ खोला गया, जिसका उद्घाटन महात्मा गाँधी द्वारा किया गया। ब्रज किशोर प्रसाद इसके कुलपति और मौलना मजहरूल हक इसके कुलाधिपति बनाये गये । हजारों छात्र राष्ट्रीय विद्यालयों में पढने लगे। पटना में ही स्थापित एक राष्ट्रीय महाविद्यालय में राजेन्द्र प्रसाद को प्राचार्य बनाया गया था। राजेन्द्र प्रसाद, ब्रज किशोर प्रसाद तथा कुछ अन्य उम्मीदवारों ने विधान सभा के चुनाव का बहिष्कार किया था। मजहरूल हक ने दीघा के निकट एक आश्रम स्थापित किया, जो सदाकत आश्रम के नाम से प्रसिद्ध हुआ। यह राष्ट्रीय आंदोलन का प्रमुख डॉ0 राजेन्द्र प्रसाद एवं आकर्षक केन्द्र बना। यहीं पर कांग्रेस के नेताओं की गोष्ठियाँ होती थीं। इसी आश्रम में मजहरूल हक ने ‘मदरलैंड’ के नाम से एक अखबार का प्रकाशन शुरू किया था। 30 सितम्बर, 1921 ई. को इसका प्रकाशन प्रारंभ हुआ था। सन् 1921 ई0 में इंग्लैंड के यवराज के पटना आगमन पर पटना शहर में हड़ताल कर दी गई। 10 मार्च 1922 ई0 को गाँधी जी को गिरफ्तार कर लिया गया।
26 जुलाई को मजहरूल हक भी एक ब्रिटिश विरोधी लेख के प्रकाशन के आधार पर गिरफ्तार कर लिये गयेटर्की में मुस्तफा कमाल पाशा के सत्ता में आ जाने के खिलाफत का प्रश्न भी समाप्त हो गया। लेकिन खिलाफत और असहयोग आंदोलनों के कारण हिन्दुओं तथा मुसलमानों-सब में राष्ट्रीय चेतना का विकास हुआ, जनमानस में जागृति आई। कांग्रेस और स्वाधीनता के इतिहास में 1920 से 1947 के काल को गाँधी युग कहा जाता है। 1917 के बाद इस युग में गाँधीजी का बिहार में कई बार आगमन हुआ, उनका भ्रमण हुआ और उनके भाषण हुए। वे 1920-22, 1927, 1934, 1939, 1940 और 1946-47 ई0 में बिहार आये थे। उन्होंने बिहार के विभिन्न क्षेत्रों में अनेक सभाओं को संबोधित किया था।
सन् 1922 ई0 में कांग्रेस का सैंतीसवां अधिवेशन देशबन्धु चितरंजन दास की अध्यक्षता में गया में हुआ। विधायिका में प्रवेश नहीं करने का निर्णय लिया गया, किन्तु पं0 मोतीलाल नेहरू, चित्तरंजन दास आदि कुछ नेता विधायिका में प्रवेश के पक्ष में थे। उन्होंने स्वराज पार्टी की स्थापना की। बिहार में भी स्वराज पार्टी स्थापित हुई, किन्त यहाँ इसे सफलता नहीं मिली। मई 1923 ई0 में नागपुर में सत्याग्रह हुआ। राजेन्द्र प्रसाद कुछ स्वयंसेवकों को लेकर सत्याग्रह में भाग लेने के लिए वहाँ पहुँच गये । सत्याग्रहियों पर लाठियाँ चलायी गयी थीं, जिसमें घायल बिहार के हरदेव सिंह की जेल में ही मृत्यु हो गई। सन् 1928 ई0 मे साइमन आयोग भारत आया। किन्तु देश भर में इसका बहिष्कार किया गया और काले झण्डे दिखाये गये।
बिहार में भी इस आयोग का बहिष्कार किया गया। पंजाब में पुलिस की लाठी से लाला लाजपत राय को धातक चोट लगी और उसी से उनकी मृत्यु हो गयी। उनकी मृत्यु पर बिहार में भी शोक मनाया गया और उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की गई। सन् 1930-32 ई0 में सविनय अवज्ञा आंदोलन हुआ, जिसे ‘नमक सत्याग्रह’ कहते हैं। 1929 में लाहौर कांग्रेस में पूर्ण स्वतंत्रता के लिए प्रस्ताव पास किया गया और प्रत्येक 26 जनवरी को स्वाधीनता दिवस मानने का निर्णय लिया गया । नमक कानून के विरूद्ध बिहार के कई जिलों में नमक निर्माण का कार्य होता रहा। नमक बनाते समय कई कार्यकत्ताओं पर लाठी से प्रहार किया गया। शराबबंदी और विदेशी चीजों की बिक्री पर रोक के लिए पुरुषों के साथ महिलाओं ने भी आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभायी।
जेल एवं लाठी-गोली का भय जाता रहा। ब्रिटिश सरकार ने कठोर दमन की नीति अपना रखी थी। बिहपुर के सत्याग्रह में राजेन्द्र प्रसाद पर भी लाठी प्रहार हुआ था। स्वतंत्रता के सिपाहियों को जेल में घोर यातानाएँ दी जाने लगीं। कोड़े लगाने से लेकर बर्फ की सिल्ली पर सुलाने तक का दंड किया जाने लगा। भोजन के पश्चात् जल के बदले अंगरेजों द्वारा शराब दी जाती थी। सन् 1929 ई0 में ही विदेशी मालों का बहिष्कार शुरू हो गया। 10 अगस्त को समस्त बिहार में राजनीतिक पीडित दिवस मनाया गया। राजेन्द्र प्रसाद की अध्यक्षता में पटना के गुलजारबाग में एक सभा हुई। उन्होंने प्रत्येक भारतवासी को ब्रिटिश शासन के विरोध में राजद्रोही और देशभक्त बन जाने की सलाह दी। 30 जून 1930 ई0 को कांग्रेस अवैध संस्था घोषित कर दी गई। 5 जुलाई को राजेन्द्र प्रसाद की गिरफ्तार कर 6 महीने की सजा दी गई, किन्तु 5 मई 1931 ई0 को गाँधी-इरविन समझौता होने पर ये नेता जेल से छोड़ दिये गये। आंदोलन स्थगित रहा।इंग्लैंड में गोलमेज सम्मेलन काआयोजन हुआ, किन्तु कोई निर्णय नहीं हो सका । आंदोलन फिर शुरू हो गयाफिर सभी प्रमुख नेता जेल में बंद कर दिये गये।
छपरा जेल में कैदियों ने विदेशी वस्त्र का व्यवहार करने से इंकार कर दिया था। वे स्वदेशी वस्त्रों की मांग करते थे। बिहार में चौकीदारी कर के विरूद्ध आंदोलन हुआ। मोतिहारी में गोली चलायी गयी, जिसमें कुछ लोग मरे और कुछ घायल हुए। गाँधीजी ने रैम्जे मैक्डोनलड के साम्प्रदायिक पंचाट का विरोध किया। हरिजनों के हित में उससे संशोधन हुआ। हरिजन सेवक संघ स्थापित हुआ। उसकी शाखाएँ बिहार में भी खोली गई 12 जुलाई 1933 ई0 को गाँधी जी ने व्यक्तिगत सविनय अवज्ञा का समर्थन किया। बिहार में लगभग 900 लोग जेल गये। 1934 में सविनय अवज्ञा आंदोलन स्थगित कर दिया गया। सविनय अवज्ञा आंदोलन से स्वराज तो नहीं मिला, किन्तु राष्ट्रीय जागरण में वृद्धि हई। भारतीय नारी समाज में पर्याप्त राष्ट्रीय चेतना का विकास हुआ, जिससे आंदोलन को काफी बल मिला।
बिहार के योगेन्द्र शुक्ल प्रसिद्ध क्रांतिकारी चन्द्रशेखर आजाद और मन्मथनाथ गुप्त के संपर्क में थे। क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए शुक्ल गिरफ्तार हो गये। उन्हें 22 साल की सजा दी गयी। सन् 1931 ई० में पटना के एक चर्च में चन्द्रशेखर ने अँगरेजों को मारने के लिए षड्यंत्र रचा, किन्तु सफल नहीं हुआ। फिर भी शंका में राम लगन को पुलिस ने मारा डाला। बम निर्माण के अपराध में सूरजनाथ चौबे, कन्हैयालाल मिश्र और श्यामकृष्ण को आजन्म कालापानी की सजा मिली। बिहार की जनजातियों के बीच एक जोरदार आंदोलन शुरू हआ. जिसे ताना भगत आंदोलन कहा जाता है। यह दीर्घ काल तक जारी रहा। इस पर कांग्रेस और गाँधीजी का विशेष प्रभाव था। इस आंदोलन के कार्यकत्ताओं ने अहसयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलन में भी सहयोग दिया था। उरांव जाति के लोगों ने इस आंदोलन में सक्रिय भाग लिया था। जाता उरांव ने इस आंदोलन को प्रारंभ किया था। गरम दल में बिहार के बैकुंठ शुक्ल और चन्द्रमा सिंह भी प्रसिद्ध क्रांतिकारी थे। 12 मई 1934 ई0 को गया सेन्ट्रल जेल में शुक्ल को फाँसी दे दी गई। चन्द्रमा सिंह ने जेल में कठोर श्रम कराया गया। इस क्रम में दो नाम काफी महत्त्वपूर्ण है, जिन्होंने स्वाधीनता आंदोलन में सक्रिय भाग लिया। त्रिगुणानन्द खवाड़े (1930-42) और बटोही (1930-47)। सन् 1919 ई0 के ऐक्ट ने देश के प्रांतों में दोहरे शासन को लागू किया था।
बिहार में भी यह व्यवस्था 29 दिसम्बर 1920 ई0 को लागू की गई। प्रांतीय विषयों को दो भागों में बाँटा गया। एक भाग पर गवर्नर का और दूसरे भाग पर जनप्रतिनिधियों (मंत्रियों) को अधिकार दिया गया। किन्तु मंत्रियों का अधिकार बहुत ही सीमित था। अतः इससे लोग बहुत असंतुष्ट थे। लेकिन उस समय गवर्नर के पद पर एक भारतीय को बिहार में नियुक्त किया गया था। उनका नाम था सत्येन्द्र प्रसन्न सिंह 1935 के ऐक्ट के अनुसार प्रान्त को पूरा शासनाधिकार सौंप दिया गया। केन्द्र में दोहरे शासन की व्यवस्था की गई थी। देशभर में प्रांतीय विधायिकाओं के लिए चुनाव हुए। कुछ अन्य प्रान्तों के साथ बिहार में भी कांग्रेस को बहुमत मिला। दैनिक कार्यों में गवर्नर द्वारा हस्तक्षेप नहीं करने के प्रश्न पर करीब 4 महीने तक कांग्रेस की सरकार नहीं बनी सकी। जब वायसराय ने यह आश्वासन दिया कि मंत्रियों के दैनिक कार्यों में गवर्नर हस्तक्षेप नहीं करेंगे तब 20 जुलाई 1937 को बिहार में श्रीकृष्ण सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बनी। लेकिन 1939 ई0 में दूसरे महायुद्ध के शुरू होने पर ब्रिटिश सरकार ने भारत को युद्ध में मनमाने ढंग से शामिल कर दिया तो इसके विरोध में अन्य प्रांतों के साथ बिहार में भी कांग्रेसी मंत्रिमंडल ने पदत्याग कर दिया।
सन् 1940 ई0 में कांग्रेस का तिरपनवाँ अधिवेशन मौलाना अबुलकलाम आजाद की अध्यक्षता में रामगढ़ में हुआ था। रामगढ़ में ही कांग्रेस की नरम एवं समझौतो वादी नीति के विरोध में सुभाषचन्द्र बोस और स्वामी सहजानन्द सरस्वती के नेतृत एक सम्मेलन का आयोजन किया गया था। 1940 ई0 में ही व्यक्तिगत सत्याग्रह के लिए घोषणा की गयी थी। बिहार में भी कुछ प्रमुख नेताओं ने इस सत्याग्रह में भाग लिया। श्रीकृष्ण सिंह पहले सत्याग्रही थे। महायुद्ध में विषम स्थिति को देखते हुए ब्रिटिश प्रधानमंत्री चर्चिल ने मार्च 1942 ई० में घोषणा की कि युद्ध समाप्त होने के बाद भारत को औपनिवेशिक स्वराज्य का दर्जा दे दिया जायेगा। इसी सम्बन्ध में 22 मार्च को स्टैंफोर्ड क्रिप्स को भारत भेजा गया, किन्तु उनके प्रस्ताव से भारतीय नेताओं को संतोष नहीं हुआ। फिर संघर्ष के लिए तैयारी होनी लगी। राजेन्द्र प्रसाद ने कांग्रेस को होनेवाली कठोर संघर्ष के संबंध में संकेत दे दिया । गाँधी जी ने अंग्रेजों के लिए भारत छोड़ो का संदेश दिया। उन्होंने भारतीयों को ‘करो या मरो’ का नारा दिया। भारत छोडो आंदोलन के सम्बन्ध में अगस्त के प्रथम सप्ताह में बम्बई में कांग्रेस में विचार-विमर्श होने लगा। ब्रिटिश सरकार डर गयी।
9 अगस्त की रात्रि में अचानक सभी प्रमुख नेताओं को पकड़ कर अज्ञात स्थान में भेज दिया गया। अब आभाव में भी देशभर में भयंकर आंदोलन शुरू हो गया। जहाँ-तहाँ सभाएँ और प्रदर्शन होने लगे और तिरंगा झंझे फहराने लगे। 11 अगस्त को पटना में छात्रों का एक विशाल जुलूस निकला। वह जुलूस सचिवालय के पास पहुंचा। सचिवालय भवन पर झंडा फहराना उद्देश्य था। काफी भीड़ थी। भीड़ पर पटना के गोरे जिलाधीश ने गोली चलवा दी। कई लोग घायल हुए। सात सपूत तो वहीं स्वर्गवासी हो गये, जिनकी स्मृति में शहीद स्मारक का निर्माण हआ। अब शासन को पंगु बना देने के लिए प्रयास शुरू हुआ। तार और टेलिफोन की लाइनें काटी गई। रेलवे पटरियाँ उखाड़ी गयी। रेलवे स्टेशनों, डाकघरों तथा अन्य सरकारी भवनों और कार्यालयों में आग लगायी गयी। अधिकारियों और गोरों पर आक्रमण किया गया। सारण जिले के मढ़ौरा में छह गोरे मार दिये गये । वहाँ रामस्वरूप देवी ने अद्भुत साहस का परिचय दिया था। उन्होंने आन्दोलन में सक्रिय भाग लिया था। वे बिहार की लक्ष्मीबाई कही जाती हैं।
मढ़ौरा के आन्दोलन में सुखदेव नारायण मेहता भी काफी सक्रिय थे। युद्ध कार्यों में भी बाधाएँ पैदा की गयीकई स्थानों में शासन शिथिल पड़ गया। कई स्थानों में ब्रिटिश शासन समाप्त-सा हो गया। __ सन् 1942 ई0 के आंदोलन को तोड़-फोड़ का आंदोलन कहते हैंइस आंदोलन में लोकनायक जयप्रकाश नारायण की भूमिका महत्त्वपूर्ण थीउनकी देखरेख में नेपाल में युवकों को शिक्षित करने के लिए एक केन्द्र स्थापित किया गया था। आजाद दस्ता का कार्यालय भी केन्द्रीय कारागार से रात में भागकर पलायन कर गये थे। सरकार ने भी कठोरतापूर्वक आंदोलन दबाने का प्रयास किया। कई जगह-जगह लाठी-गोली चली । बहुत से लोग जेल गये, घायल हुए, शहीद हुए, निर्धन हुए, विकलांग हुए और अनाथ हो गये। कई महिलाएँ विधवा हो गई और कई महिलाओं की गोद सूनी हो गई। कई लोगों पर सामूहिक जुर्माना हुआ। कई स्थानों, निजी भवनों, विद्यालयों, महाविद्यालयों तथा पस्तकालयों को क्षति पहँचायी गयी। इस तरह आंदोलन के कारण अंगरेजों ने धन और जन दोनों को बहुत क्षति 12 अनुग्रह नारायण सिंह पहुँचायी। लेकिन 1942 की अगस्त क्रांति ने स्वाधीनता को निकट ला दिया या यों कहें कि स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए मार्ग साफ हो गया तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
बिहार के सभी विचाराधाओं के लोगों ने स्वाधीनता आंदोलन में सहयोग दियास्वामी सहजानन्द सरस्वती के नेतृत्व में किसानों का संगठन खड़ा हुआ। सन् 1928 ई0 में प्रांतीय किसान सभा का और 1936 में अखिल भारतीय किसान सभा का निर्माण किया गया था। स्वतंत्रता आंदोलन में किसान सभा सक्रिय थी। स्वामी सहजानन्द सरस्वती तीन बार जेल जा चुके थे। फारवर्ड ब्लॉक और समाजवादी दल ने भी स्वाधीनता आंदोलन में भाग लिया। 11 सितम्बर 1942 ई0 को हाउस ऑफ कॉमन्स में ब्रिटिश राजनीतिज्ञ एमरी ने कहा था-” बिहार में उपद्रव विशेष रूप से उग्र है और यह प्रांत एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्र है। प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ0 के0के0 दत्त ने लिखा है- “आधुनिक युग में बिहार ने राष्ट्रीय आंदोलन के क्रमबद्ध रूपों में अद्भुत और प्रेरक भूमिका निभाई है।
सचमुच, विभिन्न कालों में स्वतंत्रता के लिए देश की पुकार पर बिहार का उत्तर मुखर और सफल थासन् 1945 ई० में स्थिति बदली। इग्लैंड में लेबर पार्टी की सरकार बनी। प्रधानमंत्री एटली ने घोषणा की कि अब भारतीयों को सत्ता सौंप दी जायेगी। भारत में सभी नेताओं को जेल से रिहा किया गयासंवैधानिका प्रक्रिया शुरू हुई। संविधान बनाने के लिए संविधान सभा की कार्यवाही शुरू हई। पहले दिन बिहार के डॉ० सच्चिदानन्द सिन्हा ने संविधान सभा की अध्यक्षता की। उसने बाद बिहार के स्वतंत्रता सेनानी डॉ0 राजेन्द्र प्रसाद की अध्यक्षता में संविधान निर्माण का कार्य सम्पन्न हुआ। कांग्रेस और मुस्लिम लीग में वैचारिक भिन्नता के कारण देश का विभाजन हुआ और हिन्दुस्तान को 15 अगस्त 1947 ई0 को स्वतंत्रता प्राप्त हुई। बिहार के ही महान सपूत डॉ० राजेन्द्र प्रसाद स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति निर्वाचित हुए। उन्होंने 12 वर्षों तक इस पद पर रहकर देश की सेवा की।

2 replies on “स्वतंत्रता आंदोलन में रहा है बिहार का अविस्मरणीय योगदान”

सन् 1911 ई. में पटना (बांकीपुर) में कांग्रेस का 27वाँ अधिवेशन हुआ। रघुनाथ सिंह मधोलकर अध्यक्ष थे।
सन् 1912 ई. में पटना (बांकीपुर) में कांग्रेस का 28वाँ अधिवेशन हुआ। रघुनाथ सिंह मधोलकर अध्यक्ष थे।
ek saal piche kahe chal rehe hai ji
galat information hai sayad correction karwa dijiye

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