पटियाला में आर्यों की दूसरी अग्नि परीक्षा

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आर्य समाज के इतिहास में १९०९ के पटियाला अभियोग की अपनी ही महता हैं। आर्यों के तप, बलिदान और त्याग की परीक्षा पटियाला अभियोग के समय हुई थी जिसमें सोने के समान आचरण वाले आर्य कुंदन बनकर निकले थे, जिसमे महात्मा मुंशीराम ने अपने विरोधियों के भी दिल जीत लिए थे।

पटियाला अभियोग के समान आर्य समाज और सिखों का एक और संघर्ष इतिहास की एक बड़ी महत्वपूर्ण दास्तान हैं।

स्वामी दयानंद के काल में सिखों और आर्यों में परस्पर मित्र भाव था। जैसे जैसे आर्यसमाज पंजाब में प्रगति करता रहा वैसे वैसे सिखों और आर्यों में विरोध बढ़ता रहा। १८९० के दशक में रहतियों की शुद्धि विशेष रूप से मुंडन आदि के कारण आर्यों का सिख खुलकर विरोध करने लगे।

सत्यार्थ प्रकाश के छपने के साथ ही न केवल हिन्दू अपितु मुसलमान और ईसाई भी आर्यसमाज के विरुद्ध साहित्य को छापते थे।

सिखों ने भी आर्यसमाज के मंतव्य को न समझ कर आर्यसमाज के विरुद्ध साहित्य लिखा।

उनके सबसे पसंदीदा विषय नियोग और स्वामी दयानंद के वंश और जीवन पर अश्लील टिपण्णी होती थी।

भिदौड़ समाज के प्रधान रोनकराम शाद उर्दू के अच्छे कवि तथा अच्छे गायक थे। वे अपनी कविताओं तथा गीतियों के द्वारा आर्य धर्म का प्रचार करते रहते थे। आजीविका के लिए दुकानदारी चलते थे। पटियाला के राजद्रोह में एक अभियुक्त वे भी थे।

सिखों की पुस्तकों के उत्तर में महाशय रोनकराम ने “खालसा पंथ की हकीकत” के नाम से पुस्तक लिखी। वह ६ मास तक बाजार में बिकती रही और उसका अच्छा प्रचार हुआ। एक अध्याय में नियोग का प्रकरण था। उसमें स्वयं सिखों के इतिहास से सिद्ध करने का यतन किया गया था की गुरु साहिबान उस आपद धर्म के विरोधी न थे। इस उल्लेख को आधार बनाकर सरदार मान सिंह ने आन्दोलन करना आरंभ किया की महाशय रोनक राम ने सिख धर्म का अपमान किया हैं।

उन्होंने इस पुस्तक की कई प्रतियाँ सिख सभाओं आदि को भेजी। अंत में लायलपूर के “लायल गजट” ने एक उत्तेजना पूर्ण लेख लिखा और सब और से पुस्तक के विरुद्ध प्रतिवाद होना आरंभ हो गया।

अंतत २३ जून १९१४ को महाशय रोनक राम को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया।

इसके १५ दिन पश्चात महाशय विशम्भर दत्त को जो की भिदौड़ से चार कोस की दूरी पर स्थित एक ग्राम के आर्य सभासद थे, निगृहित कर हवालात में डाल दिया गया। अभियुक्तों को यह भी न बताया गया की उनका कसूर क्या हैं। महाशय रोनक राम की दुकान की तलाशी लेते हुए पुलिस ने कहा जाता हैं की कई अनियमपूरक कार्य किये।

१९ अगस्त को गिरफ़्तारी के एक मास के पश्चात अभियुक्तों को खान बहादुर मुहम्मद फ़ज़ल-इ-मतीन के सामने पेशी हुई।

वे इस मुक़दमे को सुनते रहे। १० मास ऐसे ही बीत गए। अभियुक्तों की और से लाला रोशन लाल, लाला वजीर चंद और लाला पृथ्वी चंद वकील थे। लाल पृथ्वी चाँद बरनाला में रहते थे। वे भी राजद्रोह के लिच्ले मुक़दमे में पकड़े गए थे और तभी से रियासत छोड़कर अपना अलग से व्यवसाय कर रहे थे। अभियोग की सारी तैयारी उन्होंने और बहस लाला वजीरचंद ने की थी। लाला वजीर चंद रावल पिण्डी से पटियाला अभियोग के लिए जाते थे। यात्रा के कष्ट के अतिरिक्त वे अपनी वकालत के कार्य में भी बड़ा हर्ज करते थे। आपकी बहस बहुत तर्कयुक्त और पांडित्यपूर्ण होती थी। कुछ सिखों ने भी अभियुक्तों के पक्ष में गवाही दी। वे अपनी पुस्तकों का ठीक वही अर्थ करते थे जो महाशय रोनक राम जी करते थे। अदालत ने १० मास के पश्चात अभियुक्तों को अपराधी करार दिया और एक एक वर्ष का कारावास और २००-२०० रुपये का जुर्माना लगाया, जुर्माना न दे पाने की स्थिति में ४ माह की अतिरिक्त सजा सुनाई गई। अपील की गई पर कुछ भी लाभ न हुआ। मुकदमा में चाहे आर्यों को सजा हुई हो पर उससे यह जरुर सिद्ध हो गया की आर्य जनता को जब भी विपत्ति आती हैं तब सभी आर्य उनका सहयोग करते हैं और न्याय दिलवाने का यतन करते हैं।

लाला वजीर चंद की बहस से भी यह सिद्ध हो गया की सिख धर्म कोई नया अभिर्भाव नहीं था। वह सनातन आर्य धर्म में सुधार का ही एक प्रयत्न था। अग्निहोत्र, यज्ञोपवित आदि संस्कार स्वयं गुरुओं ने किये थे। उनका रहन-सहन चाल ढाल सब उस समय के हिन्दुओं के समान थे। हिन्दुओं से पृथक सिखों की सत्ता स्थापित करने का प्रयत्न नया हैं। कैसे एक समाचार पत्र के लेख के कारण मित्र अमित्र बन गए। आर्यसमाज के ने दोनों पक्षों के मान्य पुरुषों को बुलाकर समाधान करने का प्रेस किया पर विफल रहा।

अदालत का दृश्य भी बड़ा विचित्र था। लाला वज़ीरचंद अभियोगियों की युक्तियों का प्रतिपादन करते जाते थे और हँस हँस कर चोटों को सहन करते जाते थे। भगवन दयानंद के सम्बन्ध में उनके उस समय के भक्ति के उद्गार आज भी पाठक के ह्रदय को अभिभूत कर देते हैं।

यह अभियोग भी आर्यसमाज के इतिहास में पटियाला में आर्यों की दूसरी अग्नि परीक्षा थी।

डॉ विवेक आर्य

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