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इतिहास के पन्नों से

कुछ महत्वपूर्ण जानकारी : ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और चाय

भारत के साथ व्यापार करने वाली ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना 31 दिसम्बर 1600ईस्वी में हुई थी। इसे कभी कभी जॉन कंपनी के नाम से भी जाना जाता था। इसे ब्रिटेन की महारानी ने भारत के साथ व्यापार करने के लिये 21 वर्षों तक की छूट दे दी थी । भारत की राजनीतिक परिस्थितियों का लाभ उठाते हुए इस कंपनी ने भारत में धीरे-धीरे राजनीतिक गतिविधियों में रुचि लेनी आरंभ की । अपने छल कपट व प्रत्येक प्रकार के अनुचित व अनैतिक साधनों का प्रयोग करते हुए यहां के कुछ क्षेत्रों पर अपना वर्चस्व स्थापित करने में सफलता प्राप्त की। इस कंपनी के बारे में यह धारणा पूर्णतया निर्मूल है कि इसने संपूर्ण भारत पर अपना राज्य स्थापित किया था । ध्यान रहे कि जिस दिन अंग्रेज 1947 में भारत को छोड़कर अपने देश गए थे उस दिन भी संपूर्ण भारत पर उनका राज नहीं था ।1857 की क्रांति के समय तक कंपनी का भारत के आधे से भी कम भाग पर ही कब्जा था । उसमें से भी कुछ क्षेत्रों पर उसका सीधा हस्तक्षेप नहीं था ।
अतः यह कहना हमारी मूर्खता व अज्ञानता का परिचायक है कि कंपनी ने भारत में आकर सारे भारत पर शासन स्थापित कर लिया था । हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि भारत में 1858 के महारानी विक्टोरिया के घोषणा पत्र तक कंपनी का कुछ क्षेत्रों पर शासन रहा । कंपनी जिन क्षेत्रों पर अपना शासन चलाती थी , उसका शासक गवर्नर जनरल कहलाता था । वास्तव में यह कंपनी के ही सबसे बड़े अधिकारी की एक पोस्ट थी , उसी को उन्होंने राजा का स्वरूप प्रदान कर दिया । सत्य यह भी है कि इस गवर्नर जनरल को उन्होंने राजा कभी नहीं माना , क्योंकि कंपनी ब्रिटेन की महारानी के अधीन काम करती थी , इसलिए अंतिम सत्ता ब्रिटेन की महारानी की ही होती थी । यही कारण था कि भारत में ब्रिटिश लोग कभी भी अपने गवर्नर जनरल को भारत का स्वतंत्र शासक घोषित नहीं कर पाए ।1858 में इसका विलय हो गया। इस कम्पनी का संस्थापक जॉन वॉट्स था ।
कुछ लोग यह भी बार-बार कहा करते हैं कि भारत में बहुराष्ट्रीय कंपनियों का फैलाव इसलिए खतरनाक है कि यह कंपनियां भी भारत को ईस्ट इंडिया कंपनी की तरह गुलाम बना लेंगी । वास्तव में यह भी केवल एक भ्रांति मात्र है और साफ कहें तो यह केवल हमारे भीतर का एक डर है, जिसे इतिहास में झूठ बोल – बोल कर हमारे भीतर बैठा दिया गया है। इस झूठ या भ्रम को उन लोगों ने फैलाया है जिन्होंने भारत के इतिहास का विकृतिकरण किया है । ऐसे लोगों से यह पूछा जा सकता है कि ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी से पहले तो भारत में मुगल और मुगलों से पहले भी तुर्क आए थे । जिन्होंने इस कंपनी से भी अधिक बड़े भूभाग पर भारत में जबरदस्ती अपना शासन स्थापित किया था । क्या वह भी कोई कंपनी लेकर आए थे जिस कंपनी ने इस देश को गुलाम बनाया ? यदि नहीं तो उनके शासन को भारत में वैध और कंपनी के शासन को अवैध ठहराने की कोशिश क्यों की जाती है ? हमारा मानना है कि कंपनी का शासन भी अवैध था और मुगलों व तुर्कों का शासन भी अवैध था । हम तुर्कों व मुगलों से भी अपनी गुलामी के खिलाफ लड़ाई लड़ते रहे और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी से भी लड़े ।
हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी जब स्थापित हुई थी तो उस समय भारत में तथाकथित महान अकबर का शासन था।

इसके बाद 1612में इसी अकबर के बेटे जहांगीर से सर टॉमस रो नाम का ब्रिटिश अधिकारी हुगली और सूरत में ब्रिटिश कोठी स्थापित कर वहां से अपने देश के लिए व्यापार करने का अधिकार नशेड़ी बादशाह को एक हुक्का प्रदान करके प्राप्त करने में सफल हो गया था । कहने का अभिप्राय है कि देश को गुलाम कराने में एक नशेड़ी बादशाह को प्रदान किया गया हुक्का भी अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इस पर भी तथाकथित इतिहासकारों को कुछ प्रकाशित डालना चाहिए कि राजाओं को नशेड़ी नहीं होना चाहिए , आलसी और प्रमादी नहीं होना चाहिए।
जब 1858 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त हो गया तो फिर ब्रिटिश हुकूमत से भी हमने लड़ाई लड़ी।
हमें इतिहास के इस सत्य को भी जानना चाहिए कि जब तक भारत में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन रहा तब तक उनके सर्वोच्च शासक को गवर्नर जनरल कहा जाता था । परंतु जब ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त हो सीधे राजा के आधीन कंपनी द्वारा विजित क्षेत्रों को किया गया तो उसके पश्चात भारत में वायसराय बनकर आने आरंभ हुए। ईस्ट इंडिया कंपनी के पास लाखों लोगों की फौज थी। अपनी खुफ़िया एजेंसी थी। जिसके पास टैक्स वसूली का अधिकार था।
एक समय ऐसा भी था जब ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकार में एशिया के सभी देश थे। इस कंपनी के पास सिंगापुर और पेनांग जैसे बड़े बंदरगाह थे। ईस्ट इंडिया कंपनी ने ही मुंबई, कोलकाता और चेन्नई जैसे महानगरों की नींव रखी । दूसरे शब्दों में कहें तो यही वह स्थान है जहां से भारत का लूट का माल ब्रिटेन पहुंचाया जाता था।
भारत में मुफ्त की चाय पिलाने की परंपरा ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने हीं डाली थी । दुर्भाग्य का विषय है कि मुफ्त में चाय पीने और पिलाने की यह परंपरा भारत में आज भी है । हम जब भी किसी के यहां जाते हैं या जब भी कोई अतिथि हमारे यहां आता है तो उसे हम चाय मुफ्त में अवश्य पिलाते हैं । यही वह चाय है जो गुलामी की सबसे बड़ी प्रतीक बनकर आज तक हमारा पीछा कर रही है । भारत में आज जिन्हें शुगर और दिल की बीमारियों सहित वायु रोग ब्लड प्रेशर आदि की समस्याएं उन्हें ध्यान रखना चाहिए कि इन सारी समस्याएं या रोगों को यह चाय ही पैदा करती है यानि ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी तो चली गई पर उसकी बीमारी आज भी हमारा पीछा कर रही है । आज हमने यह लेख इसलिए लिखा है कि 1 जून 1874 को आज के दिन ही यह कंपनी हमेशा हमेशा के लिए बंद कर दी गई थी ।काश ! हम भी आज यह संकल्प लें कि हम अब से आगे कभी चाय नहीं पिएंगे।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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