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स्वर्णिम इतिहास

कालपी का ऐतिहासिक किला और 23 मई 1858 का वह बलिदानी दिवस

जब जब भी मई का महीना आता है तो प्रत्येक राष्ट्रभक्त भारतवासी के मन मस्तिष्क में 1857 की क्रांति के नायकों से जुड़ी वीर गाथाएं अनायास ही उभर आती हैं । 10 मई 1857 को उत्तर प्रदेश के मेरठ से इस क्रांति का शुभारंभ करने वाले क्रांतिवीर कोतवाल धनसिंह गुर्जर , महर्षि दयानंद , तात्या टोपे , रानी लक्ष्मीबाई , बहादुर शाह जफर और अन्य अनेकों ऐसे क्रांतिकारी बलिदानी रह-रहकर हमारे मन मस्तिष्क को आंदोलित और मथित करने लगते हैं जिन्होंने उस समय देश की अंतश्चेतना का प्रतिनिधित्व करते हुए संपूर्ण देश को क्रांति से मथ डाला था । प्रतिक्रांति के फलस्वरूप चाहे वह क्रांति असफल भी हो गई हो , परंतु उसका अंतिम फल तो 1947 में मिली आजादी ही रही । जिसे हम अमृत कलश भी कह सकते हैं । यदि इस बीच कांग्रेस और उस जैसे सेकुलर दल बीच में ना आए हुए होते निश्चित रूप से देश 1857 की भांति अखंड रूप में ही हमें प्राप्त होता।

1857 की क्रांति के लिए भारत के जिन ऐतिहासिक नगरों को उस समय विशेष से प्रसिद्धि और ख्याति इतिहास में प्राप्त हुई उनमें से एक सौभाग्यशाली शहर कालपी भी माना जाता है।
कालपी का यह ऐतिहासिक दुर्ग आज भी अपने अतीत की गौरवपूर्ण कहानी को कह रहा है , जो उस समय क्रांतिकारियों का गढ़ बन गया था और जहां से बैठकर क्रांतिकारी पूरे देश की क्रांति को सुनियोजित ढंग से आगे बढ़ाने की नीति और रणनीति पर विचार विमर्श किया करते थे। क्रांतिकारियों ने अपना नियंत्रण कक्ष इसी दुर्ग में स्थापित किया था, इतना ही नहीं यहीं पर अपने अस्त्र शस्त्रों को भी उन्होंने सुरक्षित रूप से रखा था। इसी दुर्ग में बैठकर नानासाहब , रानी लक्ष्मीबाई और कुँवरसिंह जैसे क्रांतिकारियों ने कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए थे । इस प्रकार क्रांति के गढ़ के रूप में स्थापित हुए इस किले को आज की सरकार को क्रांतिकारियों के महत्वपूर्ण स्थल अथवा तीर्थ के रूप में विकसित कर नई पीढ़ी को एक अच्छा संदेश देना चाहिए।
तात्या टोपे ने यहीं बैठ कर देश के अन्य राजे रजवाड़ों के लिए एक ऐतिहासिक पत्र लिखा था। जिसमें उन्होंने सभी राजाओं से अंग्रेजों के विरुद्ध उठ खड़ा होने का आवाहन किया था । उन्होंने लिखा था कि हमारा उद्देश्य किसी एक को राजा बनाना नहीं है अपितु विदेशी सत्ता को उखाड़ फेंककर देश की आजादी को प्राप्त करना है । इसके अतिरिक्त अंग्रेज जिस प्रकार देसी नरेशों का अस्तित्व मिटाने पर लगे हैं , उससे मुक्ति प्राप्त करना भी हम सब का सामूहिक उद्देश्य है । यदि समय रहते इस पर सावधान रहकर काम नहीं किया गया तो देश की स्वतंत्रता को प्राप्त करना असंभव हो जाएगा। नाना साहब के सेनापति के रूप में तात्या टोपे ने यह पत्र उस समय देशी राजाओं के लिए लिखा था। जिसे बाबा देवगिरी के माध्यम से सभी राजाओं के पास पहुंचाया गया था।
इस पत्र का बड़ा सकारात्मक प्रभाव हमारे राजाओं पर पड़ा । जैसे ही पत्र राजाओं के पास पहुंचा , वैसे ही देखते ही देखते सेना एकत्र होने लगी । बात साफ है कि सभी के भीतर राष्ट्रवाद की भावना बलवती हो रही थी और सभी अंग्रेजी सत्ता को उखाड़ कर अपने देश की आजादी को प्राप्त करना उचित मान रहे थे।
क्रांति की ज्वाला को बलवती करने के लिए सभी देशभक्त क्रांतिकारियों ने अपनी अपनी भूमिका सुनिश्चित कर ली । जालौन के तहसीलदार नारायण राव ने कार्यालय तथा मुहम्मद इशहाक ने भोजन आदि की व्यवस्था सँभाली। नाना साहब के भाई बालासाहब तथा भतीजे राव साहब भी आ गये। सभी क्रांतिकारियों ने यमुना के पवित्र जल को हाथ में लेकर उससे आचमन करते हुए यह संकल्प लिया कि अंतिम सांस तक देश रक्षा के लिए संघर्ष करते रहेंगे।
देश की क्रांति को अंग्रेजों ने चाहे मात्र सैनिक उपद्रव कहकर हल्का करने का प्रयास किया हो , परंतु क्रांतिकारियों की गतिविधियां और उनके बारे में मिले ऐतिहासिक अभिलेखों से अब यह पूर्णतया स्पष्ट हो चुका है कि यह देश को आजाद कराने के लिए चलाया गया क्रांतिकारी आंदोलन था।
अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए क्रांतिकारियों ने दुर्ग में तोपों की ढलाई का काम आरंभ कर दिया। जालौन से आये कसगरों ने स्थानीय शोरा, कोयला तथा मिर्जापुर से प्राप्त गन्धक से बारूद और बम बनाये। अपनी युद्ध नीति के अंतर्गत जिले में अंग्रेजों का प्रवेश रोकने के लिए यमुना में चलने वाली 200 नौकाओं का नियन्त्रण क्रान्तिकारियों ने अपने हाथ में ले लिया। अब वहाँ 10,000 सैनिक तथा 12 तोपें युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार थीं। कालपी के स्थानीय लोगों ने भी हमारे क्रांतिकारियों और उनके सैनिकों का भरपूर स्वागत सत्कार कर अपनी राष्ट्रवादी भावना का परिचय दिया । जैसी भी आवश्यकता हमारे क्रांतिकारियों या किसी सैनिक को पड़ती थी स्थानीय नागरिक उनकी भरपूर मदद करने के लिए आगे आते थे ।
अप्रैल 1858 के महीने में जब रानी लक्ष्मीबाई ने इस किले में प्रवेश किया तो उनके पीछे अंग्रेज सर ह्यूरोज़ अपने सैनिकों के साथ लगा हुआ था। हमारे क्रांतिकारी और रानी लक्ष्मीबाई के सैनिकों सहित स्थानीय नागरिक अंग्रेज सेना और अंग्रेज अधिकारी सर ह्यूरोज़ को रोकने के लिए कटिबद्ध हो गए।
रानी के सम्मान को सब ने अपना सम्मान समझ लिया और सब ने यह प्रतिज्ञा कर ली कि यदि अंग्रेजों ने रानी को हाथ लगाने का प्रयास किया तो चाहे कितने ही बलिदान क्यों न देने पड़ जाए , पर अंग्रेजों को इस बार ऐसा सबक सिखा देंगे कि वह शताब्दियों तक हमारे पराक्रम को भूलेंगे नहीं । सात मई, 1858 को वहाँ हुए भीषण संघर्ष में 500 क्रान्तिकारी बलिदान हुए। इसके बाद सब लौटकर फिर कालपी आ गये। नाना साहब ने अब निर्णायक संघर्ष की तैयारी प्रारम्भ कर दी।
क्रांतिकारियों ने 84 गुम्बज नामक भवन से यमुना तक खाइयाँ खोदने का कार्य आरंभ किया , जिससे अंग्रेजों को आगे बढ़ने से रोका जा सके। राष्ट्रभक्ति का रंग जिस प्रकार कालपी के इस स्थान पर बिखर गया था उस।में रोमांच झलक रहा था । जिसे देखकर कोई भी व्यक्ति देश भक्ति के भावों से भर जाता था। इधर हमारे क्रांतिकारी खड़े थे तो दूसरी और अंग्रेजों की सेना भी तैयार खड़ी थी। ह्यूरोज ने 22 मई को 20 घण्टे तक अपनी पूर्ण शक्ति का परिचय देते हुए और भारतीय क्रांतिकारियों को भून भूनकर समाप्त करने के उद्देश्य से लगातार दुर्ग पर गोले बरसाये। दूध करने के लिए हमारे क्रांतिकारियों के पास यद्यपि अस्त्र शस्त्र की कमी थी परंतु अंग्रेजों के गोले खाने के लिए भारतीय क्रांतिकारियों की छातियों की कमी नहीं थी । सबकी छातियाँ ही गोला बन गई थीं और अंग्रेजों से कहे जा रही थीं कि जितने चाहो गोले बरसाओ लेकिन ये छातियां सामने से हटने वाली नहीं है। भारी संघर्ष के बाद 23 मई, 1858 की प्रातः ब्रिटिश सेना कालपी में प्रवेश पाने में सफल हो गयी।
युद्ध में बड़ी संख्या में क्रान्तिवीर बलिदान हुए। यमुना की धारा रक्त से लाल हो गयी। दुर्ग में अंगे्रजों को नानासाहब और लक्ष्मीबाई का महत्वपूर्ण पत्र-व्यवहार, छह हाथी, तोप, गोले, 500 बैरल बारूद, ब्रासगन, मोर्टार, ब्रास पाउडर गन, 9,000 कारतूस तथा भारी मात्रा में पारम्परिक शस्त्र मिले।
हमारे क्रांतिकारियों ने फिर शिवाजी और महाराणा उदय सिंह के बताए रास्ते का अनुकरण किया और जब देखा कि अब अंग्रेज सेना किले के भीतर प्रवेश करने में सफल हो गई है तो वे गुप्त मार्गों से किले के बाहर निकलने में सफल हो गए। अंग्रेजों ने किले में प्रवेश पाने के पश्चात हमारे क्रांतिकारियों के नेता तात्या टोपे , रानी लक्ष्मी बाई और नाना साहब को ढूंढने का अभियान चलाया , परंतु उन्हें कहीं भी हमारे क्रांतिकारी हाथ नहीं लगे।
जब देश आजाद हुआ तो आवश्यकता थी कि कालपी के इस दुर्ग जैसे उन ऐतिहासिक स्थलों को इस प्रकार विकसित किया जाता कि जहां जाकर हमें अपने क्रांतिकारी आंदोलनों और इतिहास का भाव बोध होता । दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है कि यहां ‘चाचा बापू’ की समाधियां चमकाने पर तो बल दिया गया लेकिन क्रांतिकारियों के बलिदानों के इन पवित्र स्थलों को उपेक्षा की भट्टी में फेंक दिया गया । आज भी यह किला अपने अंतर में अनेकों बलिदानियों की वीरगाथा को समेटे हुए जर्जर अवस्था में चुप खड़ा आंसू बहा रहा है । संभवतः इसी प्रतीक्षा में है कि कोई देशभक्त राष्ट्रवादी कभी तो इधर आएगा जो तेरे आंसुओं को पोंछने का काम करेगा और यहां पर बलिदानी क्रांतिकारियों का स्मारक बना कर उन्हें भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित कर तेरे ऐतिहासिक महत्व का सम्मान करेगा ???

राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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