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भारतीय संस्कृति

हमारी ऊर्जा शक्ति और गुरु की महिमा

आइए , पहले भजन की यह दो पंक्तियां गुनगुनाते हैं :–

आनंद स्रोत बह रहा पर तू उदास है ।
अचरज है जल में रहके भी मछली को प्यास है।।

जल में रहकर भी मछली तभी प्यासी रहती है जब उसे जल का बोध ना हो । कहने का अभिप्राय है कि असीम ऊर्जावान , ज्ञानवान मनुष्य जब अपनी ऊर्जा को ऊर्जा के प्रमुख स्रोत से जुड़ा हुआ नहीं पाता है या जोड़ नहीं पाता है तो वह उदास रहता है और जब वह अपने मन की सारी शक्तियों को , अपनी ऊर्जा के स्रोत को अनंत ऊर्जा के स्रोत के साथ जोड़ देता है तो बहुगणित ऊर्जावान होकर अर्थात असीम ऊर्जा से भर कर बड़े से बड़े काम कर जाता है । क्योंकि तब उसे यह आभास हो जाता है कि मेरे साथ ऊर्जा का वह अनंत और अक्षय स्रोत है जो कभी समाप्त नहीं होता , जो कभी क्षरण को प्राप्त नहीं होता , इसलिए मैं भी सदैव ऊर्जावान रहता हूं , सदैव गतिशील रहता हूं ,क्योंकि मेरा इष्ट सदैव ऊर्जावान रहता है , सदैव गतिशील रहता है । ऊर्जा के ऐसे स्रोत के सामने ही भक्त बड़े भक्ति भाव से और बड़ी श्रद्धा के साथ कह देता है :–

“अब सौंप दिया इस जीवन का
सब भार तुम्हारे हाथों में ।
है जीत तुम्हारे हाथों में
और हार तुम्हारे हाथों में ।।”

मन को इंद्रियों का राजा कहा गया है। मन बहुत शक्तिशाली होता है। यह मन ही है जो अपने इच्छाशक्ति के द्वारा पृथ्वी एवं अंतरिक्ष में उपस्थित सभी सूक्ष्म तत्वों को प्राप्त कर लेता है । ग्रहण कर लेता है और जिस प्रकार वह कल्पना करता है उसी ऊर्जा शक्ति से मनुष्य जुड़ जाता है । मनुष्य यदि प्राणमान बनना चाहता है तो वह उसको प्राणमान बनाता है । मनुष्य यदि यह चाहता है कि उसको परम सत्ता के दर्शन हों तो यह मन ही उस की तरफ मनुष्य को जागृत करता है , प्रेरित करता है। बस मन को वश में करने की आवश्यकता है। इसीलिए कहा जाता है :–

” इतनी शक्ति हमें देना दाता
मन का विश्वास कमजोर हो ना ।
हम चलें नेक रस्ते पे हम से
भूलकर भी कोई भूल हो ना ।।”

मन के अनुसार ना चल के मन को अपने अनुसार चलाने की आवश्यकता है। क्योंकि यह जीवन हमारी सोच व प्रवृत्तियों पर आधारित है और सोच और प्रवृत्ति मन की देन होती हैं । इसीलिए कहा गया कि हमारी सोच जितनी संकीर्ण होगी , हमारी बुद्धि जितना कम विकसित होगी , उतना ही हम स्थूलता से जुड़ेंगे और जब बुद्धि में विवेकशीलता और सूक्ष्मता आएगी तब हम सूक्ष्म तत्वों से जुड़ेंगे।
बुद्धि की इसी पवित्र अवस्था को प्राप्त करने के लिए जब हम यज्ञ करते हैं तो उस समय अंग स्पर्श करते हुए उस परमपिता परमेश्वर की शक्तियों का स्मरण कर अपने शरीर के विभिन्न अंगों में शक्ति प्रदान करने की प्रार्थना करते हैं । उस से प्रार्थना करते हैं कि हे परमपिता परमेश्वर ! मेरे मुख में वाक शक्ति हमेशा बनी रहे , मेरी नासिका में प्राण शक्ति सदैव बनी रहे , मेरी आंखों में देखने की शक्ति सदैव बनी रहे , मेरे कानों में श्रवण शक्ति सदैव काम करती रहे , मेरी बाहों में पराक्रम सती सदैव काम करती रहे , मेरी जंघाओं में भी सदैव शक्ति बनी रहे । अंत में उससे प्रार्थना करते हैं कि मेरे शरीर के प्रत्येक अंग में किसी प्रकार की कोई कमी कहीं से न रह जाए , जब तक मैं संसार में रहूं तब तक यह शरीर पूर्ण स्वस्थ रहकर मेरा साथ देता रहे। गायत्री मंत्र में भी हम ऊर्जा की प्रार्थना करते हुए परम पिता परमेश्वर से उसके तेज स्वरूप को धारण करने की क्षमता प्राप्त करने की प्रार्थना करते हैं । इस प्रकार हमारी दिनचर्या ही ऊर्जा की प्रार्थना से प्रारंभ होती है

वास्तविक गुरु

गु का तात्पर्य होता है ।रू का तात्पर्य दूर करना।
अर्थात गुरु वह जो अंधकार को दूर कर दे। दूसरे शब्दों में यह कह सकते हैं कि अंधकार रूपी अज्ञान को दूर करके ज्ञान रूपी प्रकाश को जो प्रदान करें वह गुरु है।
सृष्टि के आरंभ में चार ऋषियों अग्नि , वायु, आदित्य और अंगिरा की आत्मा में ईश्वर ने चारों वेदों में दिए गए ज्ञान को उतारा और इंद्रियों द्वारा यही ज्ञान अगली पीढ़ी को मौखिक रूप से सुना कर दिया जाता रहा। इसलिए वेदों को प्रारंभ में श्रुति कहते थे। हजारों लाखों वर्षों बाद यह वर्तमान स्वरूप में अर्थात लिखित होकर हमारे समक्ष प्रकट हुआ , जिसे वेद कहते हैं।
वेद में भौतिक विज्ञान हो , चाहे अध्यात्म विज्ञान हो और चाहे ब्रह्म विज्ञान हो सभी का ज्ञान कराया गया है। इसलिए कहा जाता है कि वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है।
वेद इस प्रकार से ईश्वरीय ज्ञान है और वेद से ही ज्ञान का प्रकाश सर्वत्र व्याप्त है वेद में दिए गए ज्ञान के अतिरिक्त संसार में कुछ भी नहीं है। क्योंकि ईश्वर ही ज्ञान का आदि स्रोत है। जिसके कारण ईश्वर को ब्रह्म कहते हैं। ईश्वर ज्ञान का पुंज है। इसलिए ईश्वर गुरुओं का गुरु है। अर्थात एकमात्र वास्तविक गुरु यदि कोई है तो वह ईश्वर है।
भौतिक गुरुओं ने अपने आप को पूजित कराने के लिए एक मनगढ़ंत कहानी गढ़ के प्रस्तुत की है कि गुरु ईश्वर से बड़ा है , यह अज्ञानता है । गुरु ईश्वर से बड़ा नहीं हो सकता क्योंकि ईश्वर सभी का रचयिता है और ईश्वर ही सबको ज्ञान देता है । ईश्वर ही सबको प्रेरित करता है । वह भौतिक गुरु जो हमें पुस्तकों का ज्ञान देते हैं उन पुस्तकों में जो ज्ञान है , वह आध्यात्मिक ज्ञान भी ईश्वर प्रदत्त है।

 

इसलिए यह दोहा मूर्खतापूर्ण है कि :-

गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागू पाय।
बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताए।।

यहां पर अज्ञानी मैं इसलिए कह रहा हूं कि वास्तव में यह अज्ञानता है क्योंकि इस दोहा में भी यह नहीं कहा गया कि ईश्वर से बड़ा गुरु है बल्कि गुरु की प्रशंसा की है और गुरु पर अपने आप को वारने की ,बलिहारी करने की बात कही है। क्योंकि गुरु ने गोविंद के विषय में अर्थात ईश्वर के विषय में ज्ञान दिया । इसलिए हे गुरु मैं आपका ऋणी हूं। सिर्फ इतनी सी बात है । जिसको यह कहा जाता है कि ईश्वर से पहले गुरु की पूजा करो ।नहीं , क्योंकि हम जान चुके हैं कि ईश्वर ही परम गुरु है , इसलिए भौतिक गुरु ईश्वर से बड़ा नहीं हो सकता और ईश्वर से पहले उस भौतिक गुरु की पूजा नहीं हो सकती । जो लोग ऐसा कहते हैं वह अज्ञानी लोग हैं । वह इस दोहे का अर्थ भी नहीं जानते । वह दोहे को वास्तविक स्वरूप में प्रस्तुत नहीं करते । क्योंकि इससे उनके गुरुत्व पर प्रश्नचिह्न लगता है । समाज को भ्रमित रखकर ईश्वर से पहले अपनी पूजा कराना उनका उद्देश्य रह गया है , यह मूर्खता नहीं तो और क्या है ?
हां , इतना अवश्य है कि जब कोई व्यक्ति किसी विषय में जानकारी नहीं रखता हो और उस विषय में जानकारी रखना और उसमें सफलता पाने के लिए उसको भौतिक गुरु बनाने की आवश्यकता पड़ती है। गुरु भी देख करके बनाओ । जांच परख करके बनाओ । ऐसा गुरु बनाओ जो कभी किसी शाश्वत नियम का उल्लंघन नहीं करता और जो हमारा दिव्य संबंध स्थापित करा सकता हो ।
उपनिषदों का आदेश है कि मनुष्य को अत्यंत आदर पूर्वक उन गुरु के चरणों का सहारा लेना चाहिए जो सभी शास्त्रों में पारंगत हो और जिन्होंने दिव्य ज्ञान एवं सिद्धियां प्राप्त कर ली हों । उसी व्यक्ति से गुरु और शिष्य की परंपरा का अनुसरण करना चाहिए। वर्तमान में जो गुरु देखने को मिल रहे हैं वह न तो शास्त्रों के बारे में ज्ञान रखते हैं और न ही शास्त्रों को जानते हैं । वेदों को जानने की बात तो बहुत दूर की है। ऐसे ही लोग अपने आपको गुरु मानते हुए संसार में पूजित कराने का नाटक करते हैं । वास्तव में यह गुरु गुरु नहीं है बल्कि यह ढोंगी और पाखण्डी मात्र हैं। आज के विद्यालयों में शिक्षक के रूप में काम कर रहे गुरु भी इस अर्थ में गुरु नहीं है । क्योंकि ये बच्चों को रोजगारपरक शिक्षा पढ़ाकर अपनी जीविकोपार्जन कर रहे हैं। ऐसे गुरुओं का आध्यात्मिकता से कोई संबंध नहीं होता बल्कि उनमें आध्यात्मिकता का पूर्णरूपेण अभाव होता है । आध्यात्मिक गुरु बनने की क्षमताएं होती ही नहीं है और अध्यात्म के नाम पर भी प्रथा के अनुसार व्यवसायिक गुरु बने हैं । जो अधिकतर अब जेल में पड़े हुए हैं । क्योंकि उन्होंने जनता का पागल बना कर बिना आध्यात्मिक ज्ञान दिए केवल और केवल धन अर्जित किया है । संपत्ति पैदा की है। ऐशोआराम का जीवन जीते हैं और सारी पाप लीलाएं पर्दे के पीछे करते हैं । यह गुरु नहीं हैं, बल्कि गुरु के नाम पर कलंक है।

वास्तविक संत

जिसकी अंतरात्मा में विवेक हो ,और जो संतोषी हो उसी को वास्तविक संत मानो। मात्र गेरूवे कपड़े देखकर के हर किसी को संत मत मान बैठना संत के नाम पर धोखा बहुत है :-

“मेरे अतराफ में पानी तो बहुत है
लेकिन अब मुझे प्यास का एहसास नहीं होता ।
गेरूवे कपड़ों पे ना इतरा जोगी,
सिर्फ कपड़ों से सन्यास नहीं होता ।।”

मिल गया तो खा लिया नहीं मिला तो दुख नहीं, भूख भी नहीं। भौतिक भूख नहीं। आध्यात्मिक भूख जिसको लगी है , उसकी भौतिक भूख स्वतःसमाप्त हो जाती है। उस आध्यात्मिक भूख वाले व्यक्ति को ढूंढ लेना, वह वास्तविक संत होगा। वही वास्तविक संत होगा जिसके दर्शन मात्र से ऐसा अनुभव आत्मा को होने लगे कि किसी से मिल रहे हैं ,और जिससे मिल रहे हैं उससे ऐसा लगे कि परमात्मा का मिलन पृथ्वी पर ही संभव है। यह व्यक्ति जो संत के रूप में हैं वह परमात्मा से भी मिला सकता है ।यह आत्मा और जीवात्मा को अर्थात दो को एक कर सकता है। यह संत द्वंद्व को मिटा सकता है। यह अध्यात्म का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। जिसके चेहरे पर सदैव प्रसन्नता चमक और तेज रहती हो, जो किसी से मिले और वह उसका भक्त हो जाए ,तथा उसको अपना बना ले।
वह संत होता है जो मैं से परे होता है, जो विनम्र और शालीन होता है। भद्र और शिष्ट होता है। ऐसे ही लोग समाज और धर्म का अंग हो जाते हैं ।जो दिखावा नहीं करते हैं। जो दुकानदारी नहीं करता है। जो धर्म को नहीं बेचता है। जो पैसा नहीं कमाता है। जो भगवान के नाम पर लोगों को धोखा नहीं देता है।
जो स्वयं दुर्गुणों से दूर रहता है ।जो आसक्ति को मिटा देता है ।जो लोगों को भी निरासक्त रहने का उपदेश देता है।
जो स्वयं कोठी और कारों से दूर रहता हो ,जो लोगों को मोह से दूर रहने का उपदेश करता है और स्वयं इन दुर्गुणों से दूर रहता है। ईश्वर की पूजा पाठ करता है ।वहीं लोगों को अच्छा लगता है। जिसकी कथनी और करनी में अंतर नहीं है। जो स्वयं भटका हुआ नहीं है। जिसमें बड़प्पन का गर्व नहीं है। वास्तव में जो धर्म पालक और धर्म रक्षक है। जिसके अंदर आडंबर नहीं है। संत सद्गुरु चारों ओर सात्विक भावों के प्रतीक होते हैं । संतों का आविर्भाव मानवता के कल्याण के लिए होता है , संत देवदूत के समान हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से संत वे लोग हैं , जो सत्य स्वरूप परम तत्व का साक्षात कर चुके हैं, उसी में प्रतिष्ठित हैं। संत वह है जो समस्त सांसारिक जीवों को सत्य ज्ञान और आनंद में प्रतिष्ठित रहने को प्रेरित करें। स्थूल, सूक्ष्म और कारण जगत सभी माया चक्र के अंतर्गत हैं ,ऐसा समझाएं ।जिसकी स्वभाव में ही परोपकार हो। जो परनिंदा से दूर रहता हो। जो संतुष्ट ,निष्काम और दूसरे के तीखे वचनों को सुनने की क्षमता से युक्त हो, मान अभिमान को एक जैसा समझने वाले, सुख दुख में समान हो। संत दूसरों का दोष नहीं बल्कि गुण देखने वाले होते हैं। जिसमें काम, क्रोध ,लोभ, मोह ,मद आदि अवगुण नहीं होते ।जो पुण्यात्मा स्थितप्रज्ञ, बाहर भीतर से पवित्र ,मन, वचन ,कर्म से शुचिता वाला, अल्पाहारी, सत्य निष्ठ, और सांसारिक प्रपंच से दूर रहने वाला, अभिमान रहित ,धैर्यवान, सदाचरण करने वाला होता है, तथा संसार को और सृष्टि के कण-कण में ईश्वर का वास मानता हो ,जो करुणा का भंडार हो,वही वास्तविक संत हैं।
संत की भी पहचान करके तब दान करना चाहिए ।
जो अपनी शक्ति और गुणों का प्रयोग दूसरे मनुष्यों की उन्नति के हेतु करता है। जो धन से उत्तम ज्ञान को समझता है , क्योंकि ज्ञान से वह अपनी और समाज की रक्षा करता है और धन की तो उल्टे रक्षा करनी पड़ती है , धन तो परेशान करता है। जिसने काम , क्रोध पर काबू पा लिया है , जो सांसारिक पदार्थों के मोह माया से दूर हो गया।

संत शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के सत शब्द से हुई है :–

है उसी का कीर्ति कारक जन्म इस संसार में।
जिसने दे दिया सर्वस्व लोग के उपकार में।

आत्मबोध

आत्म बोध के माध्यम से मनुष्य यह जान चुका होता है कि ईश्वर व आत्मा अचल है । संसार और शरीर नश्वर है। यह भी जान चुका होता है कि जो हमारी यह यात्रा है यह बाहर की यात्रा है। मैं गहराई की तरफ न जाकर के किनारे की तरफ जा रहा हूं ।ऐसे किनारे की तरफ जा रहा हूं जहां से वापस गहराई में आना, अध्यात्म में जाना ईश्वर को प्राप्त करना, संभव नहीं है। यह भौतिक यात्रा है ।यह लोगों की यात्रा है। जो मेरी अधोगति है। जिसमें मनुष्य अपने उद्देश्य से भटक चुका होता है। ऊर्ध्व गति के स्थान पर अधोगति में जा रहा होता है। इस यात्रा में मनुष्य की वृत्ति पशु वत होती है। इसलिए अधोगति को छोड़कर ऊर्ध्वगामी होना ही आत्मबोध है।

देवेंद्र सिंह आर्य
चेयरमैन : उगता भारत

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