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महाभारत में भी उल्लेख मिलता है उज्जैयिनी का

प्राचीन संस्कृत और पाली साहित्य में इस नगर का सैकड़ों बार उल्लेख हुआ है। महाभारत में सहदेव द्वारा अवंती को जीतने का वर्णन मिलता है। (सभापर्व 31-10) अंगुत्तर निकाय के अनुसार बौद्घकाल में उत्तरी भारत के सोलह महाजनपदों में इस नगर की गिनती थी और जैन धर्म के भगवती सूत्र में इसी जनपद को मालवा अथवा मालव कहा गया है।वैसे मूलरूप से इस जनपद में वर्तमान मालवा, निमाड और मध्य प्रदेश के बीच का भाग सम्मिलित था। पुराणों के अनुसार इस नगर की स्थापना यदुवंशीय राजाओं द्वारा की बतलाई गयी है। चौथी सदी ई. पूर्व में अवंती का जनपद मौर्य साम्राज्य में सम्मिलित था और उज्जैयिनी मगध साम्राज्य के पश्चिमी प्रांत की राजधानी थी। इससे पूर्व अवंती और उज्जैयिनी का संघर्ष लंबे समय तक चलता रहा था। विष्णु पुराण (4,24/68) से मालूम होता है कि संभवत: गुप्ताकल से पूर्व इस नगर का आभीर इत्यादि शूद्रों अथवा विजातियों का वर्चस्व रहा था। ऐतिहासिक सूत्रों से ऐसा भी ज्ञात होता है कि पहली सदी ई पूर्व में विक्रम सम्वत के संस्थापक किसी अज्ञात राजा ने शकों को हराकर उज्जैयिनी को अपना राजधानी बनाया था। गुप्ताल में चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने अवंती को पुन: जीता और यहां से विदेशी सत्ता को उखाड़ फेंका था। इसी समय से विक्रम सम्वत (ई. पूर्व 57) आरंभ हुआ था। चीनी यात्री युवानच्वांग के यात्रावृत्त से ज्ञात होता है कि 615-630 में अवंती का राज्य मालव राजय से अलग था और वहां एक स्वतंत्र राजा का शासन था। 9-10वीं सदी में उज्जैयिनी में परमार राजाओं का शासन रहा था, इसके बाद उन्होंने धारा नगरी को अपनी राजधानी बनाई थी। मध्यकाल में इस नगरी को केवल उज्जैयिनी ही कहा जाता था। दिल्ली के सुल्तान इल्तुतमिश ने उज्जैन को बुरी तरह से लूटा और यहां के महाकाल मंदिर को नष्ट कर दिया था। संभवत: यह मंदिर गुप्तकाल से भी पूर्व का था। अगले 500 वर्षों तक इस नगर पर मुसलमानों का आधिपत्य रहा। सन 1750 में सिंधिया का इस नगर पर अधिकार हुआ और सन 1850 तक उज्जैन में उनकी राजधानी रही। इसी साल सिंधिया ने अपनी राजधानी उज्जैन से हटाकर ग्वालियर में बनाई। मराठों के राज्यकाल में उज्जैन के कुछ मंदिरों का जीर्णोद्घार कराया गया जिसमें महाकाल का एक मंदिर भी था।

उज्जैयिनी के वर्तमान स्मारकों में महाकाल का मंदिर मुख्य है जो शिप्रा नदी के तट पर भूमि के नीचे बना है। इसका निर्माण प्राचीन मंदिर के स्थान पर राणोजी सिंधिया के मंत्री रामचंद्र बाबा ने 19वीं शती के उत्तराद्र्घ में कराया था। इस मंदिर की गणना भारत के द्वादश ज्योर्तिलिंगों में की जाती है। इसी वजह से इस नगरी को शिवपुरी अथवा शिवधाम भी कहा जाता है। दूसरा दर्शनीय स्थल हरसिद्घ का मंदिर है। कहा जाता है कि मंदिर उसी प्राचीन मंदिर का प्रतिरूप है जहां विक्रमादित्य इस देवी की पूजा किया करते थे। राजा भर्तृहरि की गुफा, चौबीस खंभा दरवाजा, संभव है यह दरवाजा प्राचीन महाकाल मंदिर के प्रांगण का मुख्यद्वार रहा हो। कालीदह महल जिसका निर्माण सन 1500 में हुआ था। यहां की प्रसिद्घ वेधशाला जयपुर नरेश सवाई जयसिंह द्वितीय ने सन 1733 में बनवाई थी जिसका जीर्णोद्घार सन 1925 में हुआ था।
वर्तमान उज्जैन नगर भी प्राचीन अवंती नगर के स्थान पर ही बसा हुआ है चूंकि शिप्रा नदी आज भी इस नगर के पास ही बहती है। इस नगर से करीब दो किमी. उत्तर की ओर भैरोगढ़ में दूसरी तीसरी सदी ईसा पूर्व की अवंती नगरी के खंडहर पाए जाते हैं। यहां पर वेश्या टेकरी और कुम्हार टेकरी नाम के दो टीले मौजूद हैं जिनका संबंध प्राचीन उज्जैयिनी नगर से रहा था।
धार्मिक दृष्टि से उज्जैन आज भी महत्वपूर्ण नगरी है जहां लाखों यात्री प्रतिवर्ष महाकाल के दर्शनों को जाते हैं।

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