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विधि-कानून

श्रम कानूनों पर बदलाव पर राजनीति कितनी सही कितनी गलत

 

अजय कुमार

हिन्दुस्तान में श्रमिकों के हितों की बात और सियासत तो खूब की जाती है, लेकिन आजादी के बाद से आज तक केन्द्र या राज्यों की तमाम सरकारें श्रमिक हितों का ढिंढोरा पीट कर पूंजीपतियों, औद्योगिक घरानों, उद्योगपतियों को ही पालती-पोसती रही हैं।

उस श्रम कानून के बदलने पर किसी को भी हो-हल्ला नहीं मचाना चाहिए जो मजदूरों का भविष्य इतना भी सुरिक्षत नहीं रख सकता हो कि यदि किसी मजदूर को एक महीने का वेतन नहीं मिले तो वह भुखमरी की कगार पर पहुंच जाए। जो मजदूर दिन-रात खून-पसीना बहाकर उद्योगपतियों, पूंजीपतियों और बिजनेस घरानों की तिजोरियां भरने और आलीशान कोठियां खड़ी करने के लिए अपनी पूरी जिंदगी बिता देते हैं, उसमें से अधिकांश को अपने लिए छत तक नसीब नहीं हो पाती है। इनके बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ने और मिड-डे-मिल के सहारे पेट भरने के लिए मजबूर होते हैं, तो दूसरी तरफ जिसके लिए यह जीवन भर जाड़ा-गर्मी-बरसात की परवाह किए बिना मेहनत करते हैं उन पैसे वालों के बच्चे देश-विदेश के मंहगे स्कूलों में, आलीशान गाड़ियों में बैठ कर पढ़ने जाते हैं। ऐसे श्रम कानून का क्या फायदा जिसमें किसी उद्योगपति या बिजनेस मैन को अपने यहां काम करने वाले मजदूरों को बाहर का रास्ता दिखाने में एक मिनट भी नहीं लगता हो।

यह दुखद है कि हिन्दुस्तान में श्रमिकों के हितों की बात और सियासत तो खूब की जाती है, लेकिन आजादी के बाद से आज तक केन्द्र या राज्यों की तमाम सरकारें श्रमिक हितों का ढिंढोरा पीट कर पूंजीपतियों, औद्योगिक घरानों, उद्योगपतियों को ही पालती-पोसती रही हैं, इसके एवज में यह बड़े ‘लोग’ राजनैतिक दलों को तन-मन-धन से सहयोग देते रहते हैं। इस कड़वी हकीकत को जानते और समझते सब थे, लेकिन उद्योगपतियों और सियासतदारों के गठजोड़ ने ऐसा तानाबान बुन रखा था कि पर्दे के पीछे सब ठीकठाक नजर आता था, लेकिन कोरोना महामारी ने पूरे देश के सामने मजदूरों की हकीकत खोल कर रख दी। कोरोना महमारी से निपटने के लिए लॉकडाउन की सबसे पहली मार इन मजदूरों पर ही पड़ी, जिन्हें नाम मात्र का पैसा देकर बैठा दिया गया, अब किसी की इतनी हिम्मत तो थी नहीं कि वह उन उद्योगपतियों, पूंजीपतियों, औद्योगिक घरानों या फिर व्यापारियों के खाते खंगाल लेते जो लॉकडाउन में नुकसान का रोना-रोकर मजदूरों की मेहनत का अरबों रूपए डकार गए। दूरदराज के राज्यों में काम कर रहे मजदूरों को जीवन बचाने के लिए अपने गांव-देहात की ओर पलायन करना पड़ रहा है। लॉकडाउन में मजदूरों के पलायन की जो तस्वीर सामने आ रही है, वह झकझोर कर रख देती है।

खैर, सियासतदारों को इससे क्या मतलब, इसीलिए कुछ राज्यों द्वारा श्रम कानूनों में बदलाव किए जाने की खबरें सामने आते ही राजनीति के गलियारों में मजदूरों के हितों के नाम पर नई बहस छिड़ गई है। ताकि मजदूरों के वोट बैंक की तरह भुनाया जा सके। सभी राजनैतिक दल और मजदूर संगठन उद्योगपतियों के पक्ष में श्रम कानून को लचीला बनाए जाने के खिलाफ ‘तलवारें भांज’ रहे हैं। श्रम कानून बदलाव का सबसे अधिक विरोध वह कांग्रेस कर रही है जिसकी पार्टी (कांग्रेस) के नेतृत्व वाली राजस्थान सरकार ने सबसे पहले श्रम कानून में बदलाव किया था, इसके बाद ही उत्तर प्रदेश सहित छह अन्य राज्यों ने भी अपने-अपने यहां श्रम कानून पलट दिए थे। श्रम कानूनों में बदलाव की पहले-पहल शुरूआत राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार ने की इसके बाद मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और गुजरात की भाजपा शासित सरकारों ने भी अपने यहां लगभग 3 साल के लिए श्रम कानूनों में बदलावों की घोषणा कर दी। इसके फौरन बाद महाराष्ट्र की शिवेसना, कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस के गठबंधन वाली सरकार के साथ-साथ ओडिशा और गोवा सरकार ने भी अपने यहां नए उद्योगों को आकर्षित करने और ठप पड़ चुके उद्योगों को गति देने के लिए श्रम कानूनों में बड़े बदलाव किये हैं, जिसके विरोध में आवाजें भी उठने लगी हैं।

श्रम कानूनों मे बदलाव की खबर पता चलते ही मजदूर संगठन आगबबूला हो गया तो कांग्रेस, वामपंथी दलों, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल सहित सभी छोटी-बड़ी पार्टियों ने भी बांहें चढ़ा ली हैं। जिन राज्यों ने अपने यहां श्रम कानून में बदलाव किए हैं उसमें कोरोना वायरस की रोकथाम के लिए लगाए लॉकडाउन की मार उद्योग-धंधों पर बुरी तरह से पड़ी है। बाजार में मांग कम होने से उत्पादन कम हो रहा है और फैक्टरियों से मजदूर, कामगार की या तो नौकरी जा रही है या फिर उनकी सैलरी में कटौती हो रही है। सबसे ज्यादा प्रभावित असंगठित क्षेत्र के मजदूर हुए हैं। रियल सेक्टर में काम बंद होने से कई बड़े प्रोजेक्ट बंद पड़े हैं और मजदूरों के पास काम नहीं है. कंपनियों और फैक्टरियों को घाटा हो रहा है। उद्योग धंधों को इससे उबारने के लिए उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने अगले तीन सालों तक श्रम कानूनों में छूट देने का फैसला किया है। सबसे अहम यह है कि भाजपा शासित राज्य सरकारों द्वारा श्रम कानून में बदलाव किए जाने की बात को विपक्ष के साथ-साथ आरएसएस से जुड़ा भारतीय मजदूर संघ भी पचा नहीं पा रहा है।

खैर, पहले यह समझ लिया जाए कि बदलाव हुए क्या हैं। तमाम राज्य सरकारों की ओर से श्रम कानून को लेकर जो नई गाइड लाइन तय की गई है, उसके अनुसार कारखाना अधिनियम 1948 के अंर्तगत आने वाले रजिस्ट्रीकृत सारे कारखानों को धारा 51, 54, 55, 56, और धारा 59 के तहत कर्मचारियों के लिए साप्ताहिक, घंटों, दैनिक घंटों, अतिकाल और विश्राम आदि से संबंधित विभिन्न नियमों से छूट मिल गई है। नई गाइड लाइन के अनुसार कोई कर्मचारी किसी भी कारखाने में प्रति दिन 12 घंटे और सप्ताह में 72 घंटे से ज्यादा काम नहीं करेगा। गौरतलब हो, पहले यह अवधि दिन में 8 घंटे और सप्ताह में 48 घंटे थी। नये नियम के अनुसार 12 घंटे की शिफ्ट के दौरान 6 घंटे के बाद 30 मिनट का ब्रेक दिया जाएगा। 12 घंटे की शिफ्ट करने वाले कर्मचारी की मजदूरी दरों के अनुपात में होगी यानी अगर किसी मजदूर की आठ घंटे की मजदूरी 80 रुपये है तो उसे 12 घंटे के 120 रुपये दिए जाएंगे। आपको बता दें कि पहले ओवर टाइम करने पर प्रति घंटे सैलरी के हिसाब से दोगुनी सैलरी मिलती थी। सभी छहः राज्यों ने श्रम कानून में जो बदलाव किए हैं, वह करीब-करीब एक जैसे ही हैं।

राज्य सरकारों द्वारा श्रम कानून में संशोधन के बाद जहां एक तरफ यह आशंका जताई जा रही है कि इससे मजदूरों का शोषण होगा तो सरकार को लगता है कि श्रम कानून की जटिलताओं को दूर करने से उद्योग-धंधा पुनः चालू करने वालों तथा नया धंधा लगाने वालों को राहत मिलेगी। श्रम कानून में मिली छूट के बाद श्रमिकों के हितों से जुड़ी सिर्फ औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 25 लागू रहेगी। वहीं नये श्रम कानून के बाद लेबर इंस्पेक्टर उद्योगों की जांच नहीं कर सकेंगे। उद्योगों का पंजीकरण-लाइसेंस प्रक्रिया 30 दिन की जगह एक दिन में ऑनलाइन पूरी होगी। दुकानें सुबह 6 से रात 12 बजे तक खुल सकेंगी जबकि पहले ये समय सुबह 8 बजे से रात 10 बजे तक था। नये नियमों के अनुसार कम्पनियां मजदूरों को अतिरिक्त भुगतान कर सप्ताह में 72 घंटे ओवर टाइम करा सकेंगी और शिफ्ट भी बदल सकती हैं। कामकाज का हिसाब रखने के लिए पहले 61 रजिस्टर बनाने होते थे और 13 रिटर्न दाखिल करने होते थे। संशोधित श्रम कानून में उद्योगों को एक रजिस्टर रखने और एक ही रिटर्न दाखिल करने की छूट दी गई है। पहले कई राज्यों में 20 से ज्यादा श्रमिक वाले ठेकेदारों को पंजीकरण कराना होता था, इस संख्या को बढ़ाकर अब 50 कर दिया गया है। मध्य प्रदेश की शिवराज सरकार ने तो 50 से कम श्रमिक रखने वाले उद्योगों और फैक्ट्रियों को लेबर कानूनों के दायरे से बाहर ही कर दिया गया है। संस्थान सुविधानुसार श्रमिकों को रख सकेंगे। श्रमिकों पर की गई कार्रवाई में श्रम विभाग व श्रम न्यायालय का हस्तक्षेप नहीं होगा। वहीं गुजरात सरकार की बात की जाए तो अब वहां नए उद्योगों के लिए 7 दिन में जमीन आवंटन की प्रक्रिया को पूरा किया जाएगा। नए उद्योगों को काम शुरू करने के लिए 15 दिन के भीतर हर तरह की मंजूरी प्रदान की जाएगी। नए उद्योगों को दी जाने वाली छूट उत्पादन शुरू करने के अगले दिन से 1200 दिनों तक जारी रहेगी। चीन से काम समेटने वाली जापानी, अमेरिकी, कोरियाई और यूरोपियन कंपनियों को लाने का लक्ष्य है।

यहां तक तो सब ठीक था, लेकिन जब केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों द्वारा आर्थिक विकास को बढ़ाने के लिए संरचनात्मक श्रम सुधारों का समर्थन किया तो सियासत गरमा गई। लॉकडाउन में राज्यों द्वारा किए गये श्रम कानून में बदलाव को लेकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने ट्वीट कर कहा कि कोरोना के खिलाफ लड़ाई मानवाधिकारों को रौंदने का बहाना नहीं हो सकता है। राहुल ने कहा कि अनेक राज्यों द्वारा श्रम कानूनों में संशोधन किया जा रहा है। हम कोरोना के खिलाफ मिलकर संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन यह मानवाधिकारों को रौंदने, असुरक्षित कार्यस्थलों की अनुमति, श्रमिकों के शोषण और उनकी आवाज दबाने का बहाना नहीं हो सकता। इन मूलभूत सिद्धांतों पर कोई समझौता नहीं हो सकता।

बात राहुल गांधी की होती तो केन्द्र इसे गंभीरता से नहीं लेता, लेकिन जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े भारतीय मजदूर संघ ने भी श्रम कानूनों में किए जा बदलाव को लेकर अपना विरोध जताया तो मोदी और बीजेपी शासित तमाम राज्यों की सरकारों के कान खड़े हो गए। मजदूर संघ के महासचिव विरजेश उपाध्याय कह रहे थे, ‘भारत में वैसे ही श्रम कानूनों का पालन कड़ाई से नहीं होता और जो हैं भी उन्हें भी निलंबित या खत्म किया जा रहा है, हम इसे स्वीकार नहीं करेंगे। देश में नौकरियों की कमी है और लोगों को मनमाने तरीके से इस्तीफा लेकर नौकरियों से निकाला जा रहा है। मजदूर संघ राज्य सरकारों के इस कदम का समर्थन नहीं करता और इसके विरोध के लिए हम कार्ययोजना बनाएंगे। लेबर कानून के बदलाव से श्रमिक संगठनों को आशंका है कि उद्योगों को जांच और निरीक्षण से मुक्ति देने से कर्मचारियों का शोषण बढ़ेगा। शिफ्ट व कार्य अवधि में बदलाव की मंजूरी मिलने से हो सकता है लोगों को बिना साप्ताहिक अवकाश के प्रतिदिन ज्यादा घंटे काम करना पड़े। हालांकि, इसके लिए ओवर टाइम देने की बात कही गई है। श्रमिक यूनियनों को मान्यता न मिलने से कर्मचारियों के अधिकारों की आवाज कमजोर पड़ेगी। उद्योग-धंधों को ज्यादा देर खोलने से वहां श्रमिकों को डबल शिफ्ट करनी पड़ सकती है। हालांकि, इसके लिए भी ओवर टाइम का प्रावधान किया गया है। पहले प्रावधान था कि जिन उद्योग में 100 या ज्यादा मजदूर हैं, उसे बंद करने से पहले श्रमिकों का पक्ष सुनना होगा और अनुमति लेनी होगी, अब ऐसा नहीं होगा। श्रमिक संगठनों को आशंका है कि मजदूरों के काम करने की परिस्थिति और उनकी सुविधाओं पर निगरानी खत्म हो जाएगी। आशंका है कि व्यवस्था जल्द पटरी पर नहीं लौटी तो उद्योगों में बड़े पैमाने पर छंटनी और वेतन कटौती शुरू हो सकती है। ग्रेच्युटी से बचने के लिए उद्योग, ठेके पर श्रमिकों की हायरिंग बढ़ा सकते हैं।

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