परमात्मा के विराट स्वरुप और सर्व व्यापकता के सामने जब अपनी हस्ती की तुलना करता हूँ तो उस असीम के सम्मुख नगण्य पाता हूँ! किसी दूसरे की उससे तुलना करने का प्रयास करता हूँ तो शर्म आती है अपने प्रयास पर! क्योंकि उसकी सत्ता, सामथ्र्य, दया और न्याय की बराबरी करना तो दूर, पर्वत के सामने राई जैसा तुलनीय भी दृष्टि में नहीं आता! वह कौन है जिसने धरती पर सबसे पहले अन्न, औषधियों, फल, फूलों, कंदों और प्रकंदों से युक्त वनस्पति जगत को बनाया? किसने पर्वत उपत्यकाएं बनाई, जल स्रोत बनाये? किसके लिए? जिनके लिए प्रभु ने सृष्टि बनाई, उनमे से किन जीवों को कर्म करने में परतंत्र बनाया? जिसने मानवेतर प्राणियों को भी कर्म में परतंत्र नहीं बनाया, वह प्रभु सर्वाधिक बुद्धिमान मानव को कर्म करने में स्वतंत्र क्यों नहीं करेगा? उसे बुद्धि दी थी, इसलिए कि वह विवेकशील बनकर समाज को उदात्त बनाकर रहेगा और चरम सुख को प्राप्त करेगा! किन्तु जड़ प्रकृति और मानवेतर प्राणियों पर विजय प्राप्त कर कुछ मानव प्रभु के अस्तित्व को ही नकारने लगे और कुछ प्रभु के निर्माता, तो कुछ रक्षक बन बैठे! कुछ स्वयं को प्रभु घोषित कर बैठे तो कुछ बने प्रभु के दलाल! कर्म की स्वतंत्रता का तत्पर्य यह नहीं कि प्रभु कुछ नहीं करेगा! कर्मों के फल की व्यवस्था को भारतीय ऋषियों के अतिरिक्त संसार के कोई दार्शनिक नहीं समझे! ईसा, मूसा, मोहम्मद, आदि कोई नहीं! जो कहता है कि कर्म का तत्काल फल नहीं मिलता, वह साइनाइड खाए, या जलती चिता मे कूदे या ट्रेन के पहिये के नीचे अपनी छाती देकर ट्रेन चलवाए! जो कहता है कि फल बाद में नहीं मिलता वे भविष्य की योजनाएं क्यों बनाते हैं? क्यों वृद्ध लोग फलों के वृक्ष लगाते हैं? हर मानव से कुछ त्रुटि होती है, जिसका कोई दंड उसे तत्काल नहीं मिलता! अत: उसे अच्छाई का फल भी तुरंत नहीं मिलने पर या बुरे लोगों को फलते देखकर निराश नहीं होना चाहिए! बुरे लोग अपने बनाये बुरे समाज रुपी नरक में ही रहते हैं और भले लोग भी अपनी अकर्मण्यता रूपी बुराई के कारण उस नरक में रहने को बाध्य है! धर्म एव हतो हन्ति! समझ में आया प्रभु का न्याय?

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