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भारतीय संस्कृति

बुरा जो देखन मैं चला…..

जीवन प्रबंधन

मनुष्य के जीवन के लिए प्रत्येक प्रकार का प्रबंधन, नियमों का अनुपालन करना बहुत आवश्यक होता है। प्रबंधन का तात्पर्य उचित प्रकार से जीवन को व्यवस्थित बनाने के लिए योजनाबद्ध तरीके से करना होता है। मनुष्य को चाहिए कि वह सर्वप्रथम यह सुनिश्चित करे कि उसे अपनी आत्मा के लिए क्या करना है ? मन की चंचलता और उछल कूद को कैसे शांत करना है ? शरीर साधना के लिए क्या करना ?- तथा संसार में अपनी गौरवपूर्ण उपस्थिति प्रकट करने के लिए कौन सा काम किस समय करना है अर्थात अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किस प्रकार करना है ? मनुष्य को संसार में रहते हुए समयोचित निर्णय लेने होते हैं ।

यही कारण है कि जीवन को सुव्यवस्थित ढंग से चलाने के लिए संस्कारित लोग अपने प्रत्येक पल का सदुपयोग करते रहने का प्रयास करते रहते हैं । उन्हें यह पता होता है कि जीवन बड़ा अनमोल है । अतः इसका प्रत्येक क्षण भी उतना ही महत्वपूर्ण है , इसलिए उनकी जीवन चर्या और दिनचर्या का प्रत्येक पल कहीं ना कहीं सुव्यवस्थित ढंग से व्यतीत होता है।
जो लोग समय का सदुपयोग करना जानते हैं उनका जीवन दूसरों के लिए आदर्श बन जाता है। हमें ध्यान रखना चाहिए कि प्रत्येक व्यक्ति को ही जीने के लिए 24 घंटे , सप्ताह के 7 दिन , महीने के 30 या 31 दिन और वर्ष के 365 दिन ही प्राप्त होते हैं । यह सब कुल मिलाकर कितने हो जाएंगे यह तो हर व्यक्ति की अपनी अवस्था पर निर्भर करता है परंतु जैसे जैसे लोग अपने इन घंटों को , दिनों को , महीनों को व्यतीत करते हैं , वैसे – वैसे ही उनका जीवन बनता चला जाता है । जो जितने अधिक सुव्यवस्थित ढंग से जीवन के प्रत्येक पल को जीता है वह दूसरों के लिए आदर्श बन जाता है और जो पलों की परवाह न करते हुए दिन महीनों और वर्षों को भी आवारागर्दी में गुजार देते हैं वह धरती पर बोझ बन जाते हैं।
अपने लिए स्वयं नियम बनाने , स्वयं अनुशासन में रहने , आहार-विहार, आचार – विचार पर ध्यान रखना यही जीवन के प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं । उचित जीवन प्रबंधन से मनुष्य स्वस्थ रह सकता है और विभिन्न प्रकार की परेशानी और तनावों से दूर रह सकता है । मानसिक प्रबंधन , वाणी प्रबंधन , पर्यावरण प्रबंधन अर्थ प्रबंधन आपदा प्रबंधन सांसारिक जिम्मेदारियां का प्रबंधन , परिवार के प्रति जिम्मेदारियों के प्रबंधन बहुत सारे जीवन प्रबंधन मनुष्य के जीवन में आते हैं । एक सफल मनुष्य के लिए जीवन प्रबंधन प्राथमिक तौर पर आवश्यक है।

इंद्रियों को संयमित रखना

दस इंद्रियां हमारे शरीर में होती हैं। यह इंद्रियां ही मनुष्य की उर्जा को बेलगाम बनाती हैं या ऐसे कह सकते हैं कि ये मनुष्य की ऊर्जा का रस बाहर की तरफ ले जाकर खर्च करती हैं । जो विवेकशील लोग होते हैं वह उचित – अनुचित , आवश्यक – अनावश्यक भला – बुरा , मान – अपमान आदि में विभेद कर सकते हैं और उसी के अनुसार सम्यक विचार के उपरांत ही इंद्रियों का प्रयोग करते हैं । इंद्रियों को वश में करके सफल जीवन जीते हैं। इंद्रियों के माध्यम से ऊर्जा के अपव्यय को रोकते हैं। जब ऊर्जा का दुरुपयोग बहिर्मुखी होने से रुक जाएगा तो ऊर्जा का प्रवाह अंतर्मुखी हो जाता है। इससे जीवन ऊर्जावान होता है और शरीर क्षमतावान होकर अधिक सक्रियता के साथ काम कर सकता है । इसके अतिरिक्त आत्मा उन्नत होती है और मानसिक शक्तियों के द्वारा मनुष्य गूढ़तम रहस्यों को समझने में समर्थ हो जाता है । इसलिए हमारे पूर्वजों ने यह व्यवस्था की है कि
इंद्रियों के वश में मनुष्य को नहीं रहना चाहिए बल्कि इंद्रियों को अपने वश में रखना चाहिए । जीभ के स्वाद के लिए कुछ भी नहीं खा लेना चाहिए। दूसरे के अपमान के लिए जिव्हा से कठोर वचन नहीं बोलना चाहिए । मन में अहंकार नहीं रहना चाहिए जैसे अनेक उदाहरण हैं , जो मनुष्य को धारण करने चाहिए।

आत्मनिरीक्षण

अंतरावलोकान करना आत्म परिष्कार का सर्वोत्तम साधन है। अंतरावलोकन को ही आत्मनिरीक्षण कह सकते हैं। मनुष्य को परछिद्रान्वेषी की भावना का परित्याग करके स्वयं के दोषों को देखना चाहिए ।

बुरा जो देखन मैं चला बुरा न मिलिया कोय ।
जो तिन खोजा आपना तो मुझसे बुरा न कोय ।।

दूसरों की बुराई दूसरों के अवगुण नहीं देख करके दूसरों में गुण देखने चाहिए और दूसरों के गुण ग्रहण करने चाहिए । व्यक्ति को गुणचोर होना चाहिए ।दूसरों के गुणों को ग्रहण करने की क्षमता का विकास करना चाहिए । दूसरों के गुणों की जितनी चोरी हम कर लेंगे उतने ही अधिक मालामाल होंगे और दूसरों के दोषों पर जितना हम अधिक ध्यान देंगे उतना ही वह अप्रत्यक्ष रूप से हमारे मन मस्तिष्क में प्रवेश कर हमारा ही अहित करेंगे । इसलिए अपने स्वार्थ के दृष्टिकोण से भी हमें दूसरों के अवगुणों को कभी चिंतन में नहीं लाना चाहिए। आत्म निरीक्षण करने की शक्ति भी मनुष्य के अंदर होती है।

परमात्मा और जीवात्मा का संबंध

जीवात्मा परमात्मा का अंश है । जिस प्रकार से ईश्वर अमर है , उसी प्रकार से आत्मा भी अमर है। दोनों की अलग-अलग सत्ता है। परमात्मा कोई अभी हम सूर्य मान लें तो सागर के अंदर सूर्य की प्रतिच्छाया को जीवात्मा के रूप में मान लेना चाहिए। परमात्मा के साथ जीवात्मा का संबंध केवल योग से स्थापित किया जा सकता है । योग के माध्यम से ही जीवात्मा का परमात्मा के साथ एकाकार होना संभव है। परमात्मा के साथ जीवात्मा का मिलन तो होता है लेकिन एकीकरण नहीं होता । यहां इस में अंतर समझ लेना बेहतर होगा । जीवात्मा अलग है लेकिन अलग रहते हुए परमात्मा के पास रहती है । स्वतंत्र रहती है। परमात्मा के साथ रहने से जीवात्मा के अंदर भी शक्तियां उत्पन्न हो जाती हैं , परंतु फिर भी वह परमात्मा नहीं हो सकती । वह परम सत्ता केवल परमात्मा ही है। प्रलय के समय जीवात्मा एवं प्रकृति परमात्मा के गर्भ में चली जाती हैं । वहीं से सृष्टि सृजन के समय ईश्वर के गर्भ से ही उत्पन्न होती है। यह सभी अध्यात्म ज्ञान के द्वारा जाने जा सकते हैं। आध्यात्मिक साधना से जाने जा सकते हैं कि परमात्मा इस जग के कण-कण में विद्यमान हैं।

आस्था का स्वरूप

ईश्वर के प्रति श्रद्धा और विश्वास को आस्था कहा जाता है। लेकिन यह श्रद्धा और विश्वास अटूट हो अर्थात सामयिक, तात्कालिक और क्षणिक एवम् केवल अपने स्वार्थ के लिए ही न हो बल्कि विश्वास और प्रेम ईश्वर के प्रति अधिक एवं स्थाई होना चाहिए। केवल संकट के समय ही प्रभु को याद करना यह आस्था नहीं कही जा सकती । सुख भोगने की इच्छा से ईश्वर में आस्था रखना एक मनुष्य के लिए उपयुक्त नहीं है। क्योंकि स्थाई एवं अटूट आस्था ही मनुष्य को आनंद से परमानंद की तरफ ले जाने का एक साधन है। इसलिए संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि आस्था भी ईश्वर मिलन अर्थात आत्मा व परमात्मा के योग में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है।

सत्य ज्ञान

जिस मनुष्य के अंदर सच्चा ज्ञान होगा उसके सभी मौलिक गुणों का विकास प्रारंभ होता है । ऐसे मनुष्य की विचार शैली , चिंतन पद्धति परिवर्तित हो जाती है उसके व्यवहार में अलौकिकता आ जाती है। ऐसा व्यक्ति लोक मर्यादा व सकारात्मक चिंतन का धनी हो जाता है । ऐसा सच्चा ज्ञानी पारिवारिक , सामाजिक , नैतिक उत्तरदायित्व को तथा कर्तव्य पालन का समुचित निर्वहन करता है। ऐसे सच्चे ज्ञानी के अंदर आंतरिक परिवर्तन स्पष्ट परिलक्षित होता है। यहाँ सत्य ज्ञान का तात्पर्य केवल अक्षर ज्ञान से या स्वाध्याय से नहीं है बल्कि आचरण से जुड़ा हुआ है।

यश

संसार में आकर प्रत्येक व्यक्ति यह चाहता है कि उसका यश सर्वत्र फैले । संसार में उसके नाम को लोग जानें और उसके काम का अनुकरण करने वाले हों ।यही कारण है कि अपने शुभ कर्मों की ओर ऐसे लोग ध्यान देते हैं । ऐसे लोग शोध अनुसंधान के माध्यम से नए-नए कीर्तिमान स्थापित करते हैं तो कई लोग बड़े-बड़े राज्य स्थापित करते हैं ,इसके अतिरिक्त कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो समाज सेवा के लिए आगे आते हैं । इन सबका उद्देश्य एक ही होता है कि संसार में उसके नाम का यश फैले । वास्तव में ऐसे लोगों का सारा चिंतन सकारात्मक होता है । ऐसा सकारात्मक सात्विक ज्ञान सभी के पास होना चाहिए । इसके अनुसार यश – कीर्ति के लिए काम करना भी उचित ही कहा जा सकते हैं । जबकि कुछ लोग ऐसे भी होते हैं कि जो दूसरों के अधिकारों का शोषण कर या लोगों का उत्पीड़न कर या उन पर अत्याचार करके अपना नाम पैदा करना चाहते हैं । वास्तव में ऐसे लोगों का सारा नकारात्मक और विध्वंसात्मक चिंतन उन्हें अपयश का भागी बनाता है और लोग यदि उन्हें याद भी करते हैं तो अपशब्दों के साथ ही याद करते हैं। ऐसे लोग कभी किसी के आदर्श नहीं हो सकते।

देवेंद्र सिंह आर्य
चेयरमैन : उगता भारत

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