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कविता

मेरा वतन है भारत

मेरा वतन है भारत

आबोहवा में जिसके जीवन हमारा गुजरा ।
बाजुओं को जिसकी हमने बनाया झूला ।।
गोदी में लोट जिसकी हमने पिया है अमृत ।
वह देश हमको प्यारा बतलाया नाम भारत ।।
मेरा वतन है भारत
मेरा वतन है भारत — – –

बलिदान देना जिसको हमने है समझा गौरव ।
जिसके हितार्थ हमने जीवन किया समर्पण ।।
सर ऊंचा करके जिसकी गायी है हमने गाथा ।
हर काल में लहू से सींची है धरती माता ।।
मेरा वतन है भारत
मेरा वतन भारत – – –

सारे जहां को जिसने रस्ता बताया हरपल ।
सर आंख पे बिठा कर पूजा है जिसको हरक्षण।। जिसकी बुलंदियों को समझा निज बुलंदी ।
रस्ते से वे हटाए बनते थे जो स्वच्छन्दी ।।
मेरा वतन है भारत
मेरा वतन है भारत – – –

विश्व को चाह है जिसकी सरताज है जहां का।
मेरा हिन्द प्यारा नेता है सदियों से जहां का ।।
‘राकेश’ यहाँ जन्मना सौभाग्य है हमारा ।
नहीं कायनात में है कोई देश इससे प्यारा।।
मेरा वतन है भारत
मेरा वतन है भारत में – – –

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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