जन्म के बाद नवजात शिशु अपनी मा की गोद में खुद को सबसे ज्यादा सुरक्षित महसूस करता है लेकिन कभी-कभी मा के मन में इस बात को लेकर आत्मविश्वास की कमी दिखाई देती है कि वह अपने बच्चे का पालन-पोषण सही ढंग से कर रही हैं या नहीं? क्योंकि बच्चे का पहला साल ऐसा होता है, जिसमें उसकी विशेष देखभाल की जरूरत होती है। इस उम्र में बच्चे को दूध पिलाने, उसे नहलाने, मालिश और उसकी नैपी बदलते समय काफी सावधानी बरतनी पड़ती है ताकि आपका बच्चा हमेशा स्वस्थ और हंसता-खिलखिलाता रहे।

बच्चे का बेवजह रोना

नवजात शिशुओं में यह स्वाभाविक क्षमता होती है कि वे आपका ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने के लिए बार-बार रोते हैं। दरअसल शिशु रोकर ही आपके साथ अपना संवाद स्थापित करता है और इस उम्र में बच्चे में इतनी समझ नहीं होती कि वह अपनी जरूरतों की प्राथमिकता को पहचान सके। इसलिए उसे जब भी कोई बात नापसंद होती है तो वह सिर्फ रोता है। आमतौर पर जब भी बच्चे को भूख लगती है, उसकी नैपी गीली होती है, जब वह कोई नया चेहरा देखता है, जब कोई नई आवाज सुनता है, जब उसे बड़ों द्वारा गोद में उठाए जाने की मुद्रा पसंद नहीं आती या फिर उसे कोई भी बात नापसंद होती है तो वह रोकर ही अपना विरोध प्रदर्शित करता है। कभी-कभी बच्चे थकान की वजह से भी रोते हैं।

अगर आपका बच्चा गहरी नींद से चौंक कर जागने के बाद रोने लगे तो सबसे पहले आप उसकी नैपी चेक करें कि कहीं वह गीलेपन की वजह से तो नहीं रो रहा। फिर आप उसकी गर्दन छूकर देखें कि कहीं उसकी गर्दन से पसीना तो नहीं आ रहा क्योंकि कई बार बच्चे गर्मी की वजह से भी रोते हैं। ये कुछ ऐसे सामान्य कारण हैं, जिन्हें आप आसानी से पहचान कर यह अंतर समझ सकती हैं कि आपका बच्चा किस कारण से रो रहा है।

बच्चे के रोने का एक दूसरा बहुत बड़ा कारण है कि बच्चे जब दूध पीते हैं तो दूध के साथ उनके पेट में थोड़ी-बहुत हवा भी चली जाती है और ऐसी स्थिति में गैस की वजह से बच्चों के पेट में दर्द होता है और वे बहुत रोते हैं। इस दर्द को कॉलिक पेन कहते हैं। अगर बच्चे के पेट में दर्द होता है तो वह लगातार घटों रोता रहता है। इस संबंध में दिल्ली स्थित इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ.पी.के. सिंघल कहते हैं, -अगर वह दूध पीने के बाद भी रो रहा हो तो यह समझना चाहिए कि उसके पेट में गैस की वजह से दर्द हो रहा है। इसके लिए आप अपने कंधे पर बच्चे का सिर टिका कर उसकी पीठ पर हाथ फेरते हुए, उसे डकार दिलवाएं। इससे बच्चे को आराम महसूस होता है।

-कैसे बदलें नैपी

जन्म के बाद शुरुआती छह महीने में बच्चे बहुत जल्दी-जल्दी नैपी गीला करते हैं। इसलिए इस उम्र में हर-एक घटे के बाद बच्चे की नैपी को चेक करके जरूर बदलना चाहिए। थोड़ी-थोड़ी देर में बच्चे की नैपी बदलना भले ही थका देने वाला काम है पर बच्चे को नैपी रैशेज से बचाने के लिए ऐसा करना बहुत जरूरी है। नैपी बदलने से पहले आप साफ नैपी, कॉटन वूल और बैरियर क्त्रीम ये सारी जरूरी चीजें बच्चे के पास रख लें, उसके बाद ही बच्चे की नैपी बदलें। नैपी बदलते समय आप इन बातों का

-ध्यान जरूर रखें

नैपी बदलने से पहले आप अपने हाथ गुनगुने पानी और साबुन से अच्छी तरह धो लें। उसके बाद आप बच्चे की गंदी नैपी हटाकर फेंक दें और गुनगुने पानी में कॉटन डुबोकर बच्चे को अच्छी तरह साफ करें। फिर साफ सूती कपड़े के टुकड़े को गीला करके अच्छी तरह निचोड़ लें और बच्चे के डॉयपर एरिया को अच्छी तरह पोंछें।

फिर थोड़ा-सा बैरियर क्त्रीम लगाएं और बेबी पाउडर छिड़कें।

-अगर आप अपने बच्चे के लिए घर में बना डॉयपर इस्तेमाल करती हैं तो इस बात का ध्यान रखें कि डॉयपर सूती कपड़े का बना हो और उसे गरम पानी और किसी अच्छे एंटीसेप्टिक लोशन से अच्छी तरह धोने के बाद ही इस्तेमाल करें। बेहतर तो यही होगा कि आप उसके लिए डिस्पोजेबल डॉयपर का इस्तेमाल करें।

-इस बात को अपने मन से निकाल दें कि नैपी बदलना आपके या बच्चे के लिए तकलीफदेह काम है। बल्कि यही समय ऐसा है जब आप अपने बच्चे को थोड़ी देर के लिए बिना नैपी के खुला छोड़ सकती हैं ताकि वह थोड़ी देर तक अपने हाथ-पैर फेंक कर आराम से खेल सके।

-बच्चे की मालिश

मालिश से न केवल बच्चे के शरीर को आवश्यक पोषण मिलता है बल्कि उसके शरीर की कसरत भी होती है। साथ ही मा के हाथों का प्यार भरा स्पर्श बच्चे को सुरक्षा का अहसास दिलाता है। इसलिए बच्चे के लिए मालिश बहुत जरूरी है और रोजाना बच्चे को नहलाने से पहले उसकी मालिश जरूर करनी चाहिए। बच्चे की मालिश करने का सबसे सही तरीका यह है कि आप जिस कमरे में बच्चे की मालिश करने जा रही हैं, उसकी खिड़किया और दरवाजे अच्छी तरह बंद कर दें ताकि बाहर की हवा से बच्चे को ठंड न लगे। फिर आप अपने पैर फैलाकर बच्चे को अपने दोनों पैरों के बीच लिटाएं और अपने हाथों में बेबी ऑयल लगा कर बच्चे की मालिश शुरू करें। मालिश की शुरुआत हमेशा बच्चे के पैरों से करें। फिर हलके हाथों से उसके पेट और छाती की मालिश करें। उसके बाद बच्चे को पेट के बल उलटा लिटाकर उसकी पीठ और कमर की मालिश करें और सबसे अंत में बच्चे के सिर की मालिश करें।

-बच्चे का स्नान

हर मौसम में बच्चे की मालिश करने के बाद उसे प्रतिदिन नहलाना चाहिए। बच्चे को नहलाने के लिए पहले उसके नहाने से संबंधित सारा जरूरी सामान जैसे बेबी सोप, शैंपू, तौलिया, बच्चे के कपड़े और बाथ टब को एक जगह एकत्र करके फिर बच्चे को नहलाना शुरू करना चाहिए। बच्चे को नहलाने के लिए गुनगुने पानी का इस्तेमाल करना चाहिए। इस संबंध में डॉ. सिंघल कहते हैं, छोटे बच्चों को नहलाते समय इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि बच्चे की आख, नाक या कान में पानी न जाने पाए। इसके लिए बच्चे को अपने बाएं हाथ पर उल्टा लिटाकर नहलाना चाहिए।

बच्चे को नहलाते समय उसके प्राइवेट पार्ट्स, अंडर ऑर्म्स और गर्दन की सफाई का विशेष ध्यान रखना चाहिए क्योंकि ऐसी जगहों में पसीना ज्यादा जमा होने की वजह बच्चे की कोमल त्वचा में रैशेज पड़ सकते हैं। बच्चे के कान और नाक की सफाई करते समय विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। केवल मुलायम सूती कपड़े के कोने से बच्चे के कान का बाहरी हिस्सा साफ करना चाहिए।

कान का भीतरी हिस्सा बहुत नाजुक होता है इसलिए बच्चे के कान के भीतरी हिस्से को ईयर बड्स जैसी चीज से कभी भी साफ करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। इसी तरह बच्चे की नाक की भी नियमित रूप से सफाई करनी चाहिए। सप्ताह में एक बार बच्चे का सिर किसी अच्छे बेबी शैंपू से जरूर धोना चाहिए। शैंपू करते समय इस बात का ध्यान जरूर रखें कि शैंपू बच्चे की आखों में न जाने पाए। नहलाने के तुरंत बाद बच्चे का सिर सूखे तौलिये से पोंछें वरना बच्चे को जुकाम हो सकता है।

इस तरह जब आप छोटे बच्चे की सफाई का पूरा ध्यान रखेंगी तो आपका बच्चा हमेशा स्वस्थ और प्रसन्न रहेगा।

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