वर्ण व्यवस्था , योग साधना और विश्व प्रबंधन

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(मधुकथा २००५०३)

यदि हम अष्टांग या राजाधिराज योग का पालन करें और आध्यात्मिक साधना करें तो कर्म काण्ड की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। जो जीवन गुण-धर्म तब हम अपनाएँगे वह सहज, सामयिक, ज्ञान विज्ञान युक्त व तर्क संगत होंगे। कुछ नया होने लगेगा या जो सही हो रहा था वह युक्ति पूर्ण लगने लगेगा!

तब हम वर्ण व्यवस्था के व्यूह से निकल ध्यान कर ‘द्विज’ (द्वितीय या पुन: जन्मे) अवस्था में आजाएँगे। समाधि से परे जाकर हम ‘सद्विप्र’ (सद्+विप्र = सच्चे विशुद्ध प्रिय= आध्यात्मिक व्यक्ति) बन जाएँगे।

तब ब्राह्मण, वैश्य, क्षत्रिय व शूद्र एवं समस्त विश्व वासी मानव, जीव जन्तु व वनस्पति ही नहीं पंचभूत भी हमें अनायास गद् गद् हो विशुद्ध स्नेह करने लगेंगे और हम उन्हें!

उस मनःस्थिति में पहुँच हम अपनी तथा-कथित स्वनिर्मित सीमाओं से परे जाकर समस्त मानव व भूमा समाज को अन्त: करण से प्रेम कर पाएँगे और तत्क्षण उनका भी भरपूर सहयोग व समर्पण हम अपने इन्हीं चक्षुओं से देख व चख सकेंगे! ज़रूरत है अपने चित्त को साध दृष्टि भाव ब्रहत्, महत व ब्रह्म-भाव वत कर लेने की!

वर्ण व्यवस्था से प्रत्येक वर्ण पीड़ित व शोषित है। पर यह सब संघर्ष हमारे अपने मन की जड़ता या मोहावस्था के कारण ही है। यदि हम योग, तंत्र व समाधि से ऊपर की अपनी ईश्वरीय अवस्थाओं में पहुँच जाएँगे तो हमें सृष्टि प्रबंधन का अधिकार व उत्तरदायित्व मिल जाएगा। तब हमारी सारी सोच, झेंप, झिझक, शिकायत या दोषारोपण की प्रवृत्ति अथवा अकड़, अहंकार व पर-पीड़न की वृत्ति हमारे मन में में ठहर नहीं पाएगी।

तब सब व्यक्ति, वर्ण व व्यवस्थाएँ और उनकी अवस्थाएँ व सीमाएँ हमें व्यथित व आहत नहीं करेंगी! हम उनकी सेवा व सहभागिता करने दौड़ पड़ेंगे। तब उनके लड़खड़ाते चरण हम कृष्ण बन उन्हें सुदामा-सरिस मित्र समझ चूमना चाहेंगे!

मानव व जीव समाज के विकसित, व्यवस्थित व तरंगित होने में लाखों वर्ष लग गए हैं! उनके इतिहास का एक एक पल यद्यपि उल्लेखनीय, गौरवपूर्ण व संग्रहण योग्य है पर उस इतिहास की पीड़ा, क्रीड़ा व संवेदना में सबको सब समय उलझना उचित नहीं होगा! उससे सीख समझ कर आगे बढ़ हमें अपना इतिहास बनाना उचित व उपयोगी होगा!

हमारे साथ जो अच्छा हुआ उसे याद रखें। जो कोई अज्ञान वश या संकुचित भाव वश कुछ समुचित नहीं कर पाए, उन्हें अपने ईश्वरीय भाव से क्षमा करते हुए आगे बढ़ जाएँ। सम्भव है अब वे भी वैसे नहीं रहे जैसे पहले थे! हम भी तो प्रति पल बदल रहे हैं। अब हम अपने उत्क्रष्ट भाव से उन्हें आध्यात्मिक भाव तरंग दे बदल भी सकते हैं! आवश्यक हो तो परम पुरुष से ध्यान में शिकवे शिकायत भी कर सकते हैं!

जब हम सद्विप्र होगए तो उनके भी वरेण्य होगए और वे भी हमें पूज्य भाव से देखने लगे! तब द्वैत व द्वेष कहाँ रहा!

वस्तुतः यह परिवर्तन, परिमार्जन व परिष्कार हमारे अन्त:करण में हुआ या होना है और जगत (जो हमारे आस पास चल रहा है या परिलक्षित है) हमारी छाया मात्र है! जैसे हम होंगे वैसा ही जगत हमारे इर्द गिर्द निर्मित होगा। हम बदल जाएँ तो वह भी वैसा नहीं रहेगा!

हमारा मन छोटा है तो हमारा सोच, विचार, परिकल्पना, धारणा, योजना, कार्य प्रणाली, व्यवहार, आकाँक्षा, अभिलाषा, अपेक्षा, आदि सब क्षत विक्षत, दीन हीन, संकीर्ण व सीमित हैं!

यदि आत्म ईश्वरीय स्वरूप इख़्तियार कर ले तो सारा विश्व उसके आधीन हो कार्य करने लगता है! पर तब हम अपने ब्रह्माण्ड के हर पिण्ड व अण्ड की सेवा करने, सृष्टि प्रबंधन करने व सब कुछ अर्पण समर्पण कर अपने पूरे मनोयोग व आत्म- योग से युक्त जहाँ कहीं हैं वहीं से ओत प्रोत योग में समाहित हुए व्यस्त हो जाते हैं!

यह मात्र सिद्धान्त या दर्शन की बात नहीं है। प्रयोगात्मक सार्वभौमिक सत्य है। अनन्त ईश्वरीय सत्ता से संभूत प्राण हर काल, हर देश में, हर पात्र के साथ विश्व रंगमंच पर लीला करते रहे हैं, कर रहे हैं व करते रहेंगे! आवश्यकता है उन्हें समझने की, उनके जैसे बनने व उनसे भी बेहतर कार्य करने की!

बस छोटा सा काम करना है, योग साधना व ध्यान सीख उसका अभ्यास करना है! इसके लिए मात्र मानव देह होना पर्याप्त है और कुछ नहीं चाहिए! वैसे अन्य प्राणी भी साधना करते हैं पर मनुज रूप में यह करना ज़्यादा आसान है। हम अपना मन बनायें तो दीक्षा देने वाले स्वयं आ जाएँगे! तो बात बस अपना मन बनाने की है। शेष सब हो जाएगा!

वे हर घड़ी अपनी विश्व व्यवस्था हमारे हाथ में थमा हमें निदेशक, व्यवस्थापक, प्रबंधक, परिचालक, इत्यादि पदों पर प्रतिष्ठित व सुशोभित करना चाहते हैं! हम सबका सदा स्वागत है!

✍🏻 गोपाल बघेल ‘मधु’

दिनांक ३ मई २०२० रविवार – ००:४५
टोरोंटो, ओंटारियो, कनाडा

www.GopalBaghelMadhu.com

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